AMU में ‘कुरान’ की आयतें पढ़ना ‘सेक्युलर’ और IIT दिल्ली में ‘उपनिषद’ के श्लोक पढ़ना ‘कम्युनल’, वामपंथियों का ये दोगला चरित्र चीख-चीख कर बताता ‘सनातन’ से इनकी जन्मजात नफरत का राज

इस देश में ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर पिछले कई दशकों से जो भद्दा मज़ाक और वन-वे ट्रैफिक चल रहा है ना, उसे देखकर अब किसी भी सनातनी का दिमाग भन्ना जाना लाजमी है।

सेक्युलरिज्म का सीधा सा मतलब होना चाहिए की सभी धर्मों का सम्मान हो या फिर सरकार और शिक्षा से धर्म बिल्कुल अलग रहे।

लेकिन हमारे हिंदुस्तान में इस सेक्युलरिज्म की परिभाषा वामपंथियों और लिबरल इकोसिस्टम ने अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ कर रख दी है।

इनके लिए सेक्युलरिज्म का बस एक ही मतलब है- हिन्दू धर्म, सनातन संस्कृति, संस्कृत भाषा और हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा को दिन-रात गालियां दो, उसे सरेआम जलील करो।

और वहीं दूसरी तरफ.. मुस्लिम समुदाय की हर कट्टरपंथी सोच के आगे घुटने टेक दो।

अभी हाल ही में अगस्त 2026 में जो बवाल इन वामपंथियों ने खड़ा किया है, उसने इनके इस दोगले और दोमुंहे चेहरे से सेक्युलरिज्म का सारा नकाब नोच कर फेंक दिया है।

जो नफरत इनके दिलों में सनातन के लिए भरी है, वो अब छलक कर सड़कों और सोशल मीडिया पर आ गई है।

PM Modi के IIT दिल्ली दौरे में गूंजे उपनिषद तो लिबरलों के सीने पर लोट गए सांप, और AMU का कुरान पाठ इन्हें लगता भाईचारे की मिसाल

बात अभी 8 अगस्त 2026 की ही है। देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में से एक, IIT दिल्ली (IIT Delhi) का 57वां दीक्षांत समारोह (Convocation) चल रहा था।

यह वो दिन होता है जब सालों तक खून-पसीना एक करने वाले छात्रों को उनकी डिग्री मिलती है, वो असल ज़िंदगी में कदम रखने जा रहे होते हैं।

इस बड़े मौके पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मुख्य अतिथि (Chief Guest) के तौर पर वहां मौजूद थे।

ऐसे शुभ अवसर पर, हमारे देश की हज़ारों साल पुरानी ज्ञान परंपरा का सम्मान करते हुए, समारोह में ‘उपनिषद’ के श्लोकों का पाठ किया गया।

ये वो श्लोक थे जो सीधे तौर पर एक छात्र को उसके जीवन, कर्तव्य और शिक्षा के असली मायने समझाते हैं।

लेकिन भाई साहब, जैसे ही इन श्लोकों की गूंज और संस्कृत के पवित्र शब्द उस हॉल में गूंजे, लुटियंस दिल्ली में बैठे अर्बन-नक्सलों, वामपंथी तत्वों के पेट में ऐसा भयंकर दर्द उठा की जैसे किसी ने इनकी दुखती रग पर हथौड़ा मार दिया हो!

इन्होंने सोशल मीडिया पर पर अपना रोना-धोना शुरू कर दिया। एकदम से हाय-तौबा मच गई की “अरे बाप रे! ये क्या हो गया!

एक साइंस और टेक्नोलॉजी के इंस्टिट्यूट में धर्म की बातें कैसे हो सकती हैं? सेक्युलरिज्म तो खतरे में आ गया! शिक्षा का भगवाकरण (Saffronisation) हो रहा है!” इन लिबरलों ने आसमान सिर पर उठा लिया।

लेकिन ज़रा रुकिए और इनके इस घटिया पाखंड को गौर से देखिए। जब यही लिबरल और सेक्युलरिज्म के ठेकेदार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) या जामिया मिलिया इस्लामिया के कार्यक्रमों में जाते हैं, तो इनकी आंखों पर कौन सा पर्दा पड़ जाता है?

क्या आप जानते हैं की AMU के हर छोटे-बड़े फंक्शन, और खासकर उनके दीक्षांत समारोहों की आधिकारिक शुरुआत हमेशा ‘तिलावत-ए-कुरान’ (कुरान की आयतों के पाठ) से होती है?

वहां बाकायदा टोपी पहनकर, धार्मिक लिबास में आकर कुरान पढ़ी जाती है।

तब ये वामपंथी कहाँ जाकर छुप जाते हैं? तब किसी नेता का ट्वीट क्यों नहीं आता की “एक अकैडमिक संस्थान में कुरान क्यों पढ़ी जा रही है?” तब इनका सेक्युलरिज्म खतरे में क्यों नहीं आता?

सच तो ये है की AMU में अगर कुरान पढ़ी जाए तो इन वामपंथियों को उसमें भाईचारा (Brotherhood), माइनॉरिटी राइट्स और गंगा-जमुनी तहज़ीब नज़र आती है। इन्हें लगता है की वाह! कितना प्यारा माहौल है!

लेकिन जैसे ही देश के किसी संस्थान में संस्कृत का एक श्लोक पढ़ दिया जाए, तो इनके सीने पर सांप लोटने लगते हैं। ये दोगलापन नहीं तो और क्या है?

ये चीख-चीख कर बता रहा है की इन्हें सेक्युलरिज्म से कोई प्यार नहीं है, इन्हें बस ‘सनातन’ से जन्मजात नफरत है।

उपनिषद को गायत्री मंत्र बताने वाले इन पढ़े-लिखे जाहिलों का अज्ञान और सनातन के खिलाफ इनका अंधा विरोध

इस पूरे वाकये में सबसे हास्यास्पद और शर्मनाक बात तो तब हुई जब विपक्षी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता शमा मोहम्मद (Shama Mohamed) ने अपना आधा-अधूरा ज्ञान बघारने के लिए ट्विटर (X) पर एंट्री मारी।

शमा मोहम्मद ने एक वीडियो क्लिप शेयर करते हुए तंज़ कसा और सवाल उठाया की एक अकैडमिक इवेंट में “गायत्री मंत्र” क्यों पढ़ा जा रहा है?

ज़रा इनकी मूर्खता और बौद्धिक दरिद्रता (Intellectual bankruptcy) का लेवल देखिए यार! जो श्लोक वहां पढ़े जा रहे थे, वो ‘तैत्तिरीय उपनिषद’ (Taittiriya Upanishad) के ‘शिक्षावल्ली’ अध्याय के श्लोक थे।

और ये मैडम, जो खुद को बहुत पढ़ी-लिखी और नेशनल टीवी की डिबेटर मानती हैं, उन्हें ये तक नहीं पता की ‘उपनिषद’ के श्लोक और ‘गायत्री मंत्र’ में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है!

मतलब सोचिए, जिन्हें अपने ही देश की संस्कृति, वेदों, उपनिषदों और मंत्रों के बीच का बुनियादी अंतर तक नहीं पता, वो लोग हमें और इस देश को सेक्युलरिज्म का ज्ञान बांट रहे हैं।

ये पढ़े-लिखे जाहिल हैं, जिन्हें बस इतना पता है की अगर कुछ ‘संस्कृत’ में बोला जा रहा है, तो वो हिन्दू धर्म का है, और अगर हिन्दू धर्म का है, तो उसका सरेआम विरोध करना है।

शमा मोहम्मद की इस बेवकूफी ने इस पूरे वामपंथी इकोसिस्टम का वो काला सच नंगा कर दिया है जिसे ये लोग हमेशा ‘तर्कवाद’ (Rationalism) के पीछे छुपाते हैं।

सच तो ये है की इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की उस श्लोक में क्या ज्ञान दिया जा रहा है। इन्होंने तो श्लोक का अर्थ जानने की जहमत तक नहीं उठाई होगी।

इनका तो बस एक ही टूलकिट है- सनातन का विरोध करो।

ये वो ‘भूरे अंग्रेज़’ (Brown Sahibs) हैं जिन्हें आज भी कॉन्वेंट स्कूलों की अंग्रेज़ी और अरबी शब्दों से तो बहुत प्यार है, लेकिन अपनी ही मिट्टी की भाषा ‘संस्कृत’ इन्हें सांप्रदायिक (Communal) लगती है।

अगर शमा मोहम्मद या उनके वामपंथी साथियों ने थोड़ी सी भी शर्म की होती और उस उपनिषद के श्लोक का असली अर्थ जान लिया होता, तो शायद वो मारे शर्म के अपना ट्विटर अकाउंट ही डिलीट कर देते।

लेकिन बेशर्मी तो इस इकोसिस्टम का गहना है। ये अपनी अज्ञानता को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाकर पेश करते हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद का वो परम ज्ञान जिसे कम्युनल बता रहे ये वामपंथी, असल में वो है दुनिया का सबसे महान शैक्षणिक ग्रंथ

अब ज़रा बात कर लेते हैं उस ‘उपनिषद’ की, जिसके नाम से ही इन वामपंथियों के बदन में आग लग गई थी। आखिर उस दिन IIT दिल्ली के मंच से ऐसा क्या पढ़ा गया था जिसने लुटियंस दिल्ली के इस पूरे गिरोह की रातों की नींद उड़ा दी?

जिस मंत्र को पढ़कर वहां मौजूद हर इंसान का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था, वो प्राचीन ‘तैत्तिरीय उपनिषद’ (Taittiriya Upanishad) के ‘शिक्षावल्ली’ अध्याय का 11वां अनुवाक (खंड) है।

अगर इन वामपंथियों और लिबरल पत्रकारों ने कभी अपनी ज़िंदगी में विदेशी लेखकों की गटर-छाप किताबों से बाहर निकलकर अपने देश का साहित्य पढ़ा होता, तो इन्हें पता होता की ‘शिक्षावल्ली’ दुनिया का सबसे प्राचीन और महान ‘दीक्षांत उपदेश’ (Convocation Address) है।

ज़रा सुनिए की उन श्लोकों में क्या कहा गया है। उसमें गुरु अपने शिष्य को, जो अपनी पढ़ाई पूरी करके समाज में जा रहा है, ज़िंदगी का सबसे बड़ा मूलमंत्र देता है- “सत्यं वद, धर्मं चर।”

मतलब, जीवन में हमेशा सच बोलना और अपने धर्म (कर्तव्य और नैतिकता) के रास्ते पर चलना।

आगे कहा गया है- “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव।” यानी अपनी माता को भगवान के समान मानना, अपने पिता को भगवान मानना, अपने गुरु और घर आए मेहमान का देवता की तरह सम्मान करना।

अरे भाई, अब आप ही बताइए! क्या अपने माँ-बाप का सम्मान करना ‘सांप्रदायिक’ (Communal) है? क्या सच बोलना और अपने फर्ज़ को ईमानदारी से निभाना ‘भगवाकरण’ है?

क्या गुरु का आदर करना देश के सेक्युलरिज्म के लिए खतरा है? अगर इन वामपंथियों को लगता है की माता-पिता का सम्मान सिखाने वाले ये श्लोक कम्युनल हैं, तो फिर चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ऐसे इकोसिस्टम को!

ये सनातन धर्म का वो ज्ञान है जो किसी को बम बनाना नहीं सिखाता, किसी को पत्थर मारना नहीं सिखाता, और ना ही किसी दूसरे मज़हब वाले की गर्दन काटना सिखाता है।

ये श्लोक एक छात्र के चरित्र का निर्माण करते हैं, उसे एक बेहतरीन इंसान बनाते हैं। लेकिन दिक्कत यही है ना दोस्त, की इस वामपंथी इकोसिस्टम को ‘चरित्रवान’ और ‘संस्कारी’ युवा चाहिए ही नहीं!

इन्हें तो वो भटके हुए युवा चाहिए जो जेएनयू (JNU) में बैठकर “भारत तेरे टुकड़े होंगे” के नारे लगाएं।

इसीलिए जब कोई संस्थान युवाओं को उनकी जड़ों और संस्कारों से जोड़ता है, तो इन लिबरलों को अपने वजूद पर खतरा मंडराता हुआ दिखने लगता है।

अगर सत्य बोलना और माँ-बाप का आदर करना ही सांप्रदायिकता है, तो हाँ, हम डंके की चोट पर कहते हैं की हम सांप्रदायिक हैं और हमें इस बात पर गर्व है!

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मंच से जब पढ़ी जाती हैं कुरान की आयतें, तब कहाँ मर जाता है इन वामपंथियों का सेक्युलरिज्म

अब ज़रा सिक्के का दूसरा पहलू भी देख लेते हैं। वामपंथियों का दोगलापन समझना हो, तो आपको बस इनका चश्मा उतारकर देखना होगा।

जब IIT दिल्ली में ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ पढ़ा गया, तो शमा मोहम्मद से लेकर पूरे लिबरल इकोसिस्टम ने ट्विटर (X) पर आंसुओं की बाढ़ ला दी।

लेकिन जब बात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) या जामिया मिलिया इस्लामिया की आती है, तो इन सबके मुंह में दही क्यों जम जाता है?

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कोई प्राइवेट मदरसा नहीं है, भाई! वो एक ‘सेंट्रल यूनिवर्सिटी’ (Central University) है। वो भी हमारे और आपके दिए हुए टैक्स के पैसों से चलती है।

लेकिन क्या आपको पता है की AMU के किसी भी बड़े कार्यक्रम, उनके सर सैयद डे (Sir Syed Day) या उनके हर एक दीक्षांत समारोह (Convocation) की शुरुआत कैसे होती है?

वहां की आधिकारिक परंपरा है ‘तिलावत-ए-कुरान’ (Tilawat-e-Quran)।

जी हाँ, आपने बिल्कुल सही सुना। AMU के मंच पर बाकायदा टोपी पहनकर, धार्मिक लिबास में कुरान की आयतें पढ़ी जाती हैं।

पूरा का पूरा माहौल विशुद्ध रूप से एक मज़हब के रंग में रंगा होता है। और ये कोई छुपी हुई बात नहीं है, ये उनकी सदियों पुरानी ‘परंपरा’ है जिसे वो सीना ठोक कर निभाते हैं।

तो सवाल ये है की जब AMU के अकादमिक मंच से कुरान पढ़ी जा रही होती है, तब इन लिबरल पत्रकारों को सांप क्यों सूंघ जाता है?

तब शमा मोहम्मद या उनके जैसे नेता ट्वीट करके ये क्यों नहीं पूछते की “एक अकैडमिक संस्थान में धार्मिक आयतें क्यों पढ़ी जा रही हैं? भारत का सेक्युलरिज्म खतरे में क्यों नहीं है?”

तब किसी वामपंथी बुद्धिजीवी के पेट में मरोड़ क्यों नहीं उठते?

इनके लिए AMU में कुरान पढ़ना ‘अल्पसंख्यकों का हक़’ है, ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ का हिस्सा है, ‘ डाइवर्सिटी’ (Diversity) है! लेकिन जैसे ही IIT में सनातन धर्म का वो उपनिषद पढ़ा जाता है जो पूरी दुनिया के कल्याण की बात करता है, तो वो तुरंत ‘कम्युनल’ हो जाता है!

ये दोगलापन इस बात का सबसे बड़ा सुबूत है की इस देश में ‘सेक्युलरिज्म’ का मतलब सिर्फ और सिर्फ ‘हिन्दू-विरोध’ रह गया है।

तुम मदरसों और अपनी सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ में अरबी पढ़ो, कुरान पढ़ो, वो सब सेक्युलर है।

लेकिन अगर बहुसंख्यक सनातनी समाज का युवा अपनी हज़ारों साल पुरानी ज्ञान परंपरा के दो श्लोक संस्कृत में पढ़ ले, तो पूरा का पूरा इकोसिस्टम छाती पीटने लगता है की देश हिंदू-राष्ट्र बन रहा है।

70 सालों तक शिक्षा व्यवस्था पर कब्ज़ा जमाए बैठे वामपंथियों की असली छटपटाहट का राज अब खुलकर आ गया सामने

सच पूछो तो ये जो लिबरल पत्रकार, अर्बन-नक्सल और वामपंथी बुद्धिजीवी आज बिलबिला रहे हैं ना, इनका असली दर्द कुछ और ही है।

आज़ादी के बाद के पिछले 70 सालों के इतिहास को उठाकर देख लीजिए।

इस देश की शिक्षा व्यवस्था, हमारी टेक्स्टबुक, हमारे विश्वविद्यालयों के सिलेबस और पूरे के पूरे अकादमिक इकोसिस्टम पर सिर्फ और सिर्फ वामपंथी इतिहासकारों और मैकाले की औलादों का कब्ज़ा रहा है।

इन लोगों ने 70 सालों तक एक ऐसा नैरेटिव सेट किया जिसमें भारत के स्वर्णिम इतिहास को छुपा दिया गया।

हमारे स्कूलों की किताबों में मुगलों और आक्रांताओं का तो खूब महिमामंडन किया गया, बताया गया की वो कितने महान थे, लेकिन हमारे अपने वेदों, उपनिषदों और प्राचीन भारतीय विज्ञान को सिर्फ ‘मिथक’ (Myths) और अंधविश्वास कहकर खारिज कर दिया गया।

इन्होंने पीढ़ियों के दिमाग में ये ज़हर घोल दिया की “ज्ञान तो सिर्फ पश्चिम (West) से आता है, भारत के पास तो सिर्फ सपेरे और तंत्र-मंत्र थे।”

IIT दिल्ली में उपनिषद का गूंजना कोई छोटी बात नहीं है भाई! यह इस बात का प्रतीक है की भारत का युवा अब अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है।

और यही बात इन वामपंथियों को अंदर ही अंदर खाए जा रही है। इनकी हालत आज बिल्कुल पानी से बाहर निकाली गई उस मछली की तरह हो गई है जो तड़प रही है, क्योंकि इसका ‘झूठ का इकोसिस्टम’ अब सूखने लगा है।

इन्हें डर इस बात का नहीं है की IIT में उपनिषद पढ़ा गया। इन्हें असली डर इस बात का है की अगर भारत का टॉप इंजीनियर, डॉक्टर और साइंटिस्ट अपने उपनिषदों पर गर्व करने लगा, तो ये वामपंथी जो विदेशी एजेंडे वाली किताबें और थ्योरी बेचते आए हैं, उन्हें खरीदेगा कौन?

इनकी वो ‘इंटेलेक्चुअल’ दुकान ही बंद हो जाएगी यार! इसीलिए जैसे ही देश का युवा अपनी संस्कृति की तरफ एक कदम बढ़ाता है, ये पूरा का पूरा इकोसिस्टम छाती पीटने लगता है और ‘कम्युनल-कम्युनल’ का राग अलापने लगता है।

दुनिया भर के वैज्ञानिक और विद्वान ले रहे सनातन का ज्ञान, लेकिन हमारे देश के अर्बन-नक्सलों को अपनी ही संस्कृति से होता पेट में दर्द

अगर आप इन लिबरल पत्रकारों और वामपंथी ज्ञानियों की बातों को सुनकर यह सोचने लगें की शायद सच में हमारे उपनिषद और प्राचीन ग्रंथ पुराने ज़माने की आउटडेटेड बातें हैं, तो ज़रा अपनी आँखें खोलिए और दुनिया के नक्शे की तरफ देखिए।

आपको पता चलेगा की जिस सनातन ज्ञान को हमारे देश के ये अर्बन-नक्सल ‘कम्युनल’ और पिछड़ा बताते हैं, आज पूरी दुनिया का आधुनिक विज्ञान उसी सनातन के सामने नतमस्तक है।

अरे भाई, परमाणु बम (Atomic Bomb) के पितामह कहे जाने वाले महान अमेरिकी वैज्ञानिक ‘जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर’ (J. Robert Oppenheimer) का नाम तो सुना ही होगा?

जब ओपेनहाइमर ने दुनिया का पहला सफल परमाणु परीक्षण किया था और जब उसके सामने महाविनाश की वो भयंकर आग उठी थी, तो उसके मुंह से किसी बाइबल या अंग्रेज़ी किताब की लाइनें नहीं निकली थीं!

उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर पवित्र ‘श्रीमद्भगवद गीता’ (Bhagavad Gita) का श्लोक पढ़ा था- “अब मैं मृत्यु हूँ, जो दुनिया का विनाश करने आया हूँ।” ओपेनहाइमर खुद संस्कृत सीखकर गीता पढ़ता था।

चलिए, क्वांटम फिजिक्स (Quantum Physics) की बात कर लेते हैं, जिसे आज के विज्ञान का सबसे मुश्किल और एडवांस विषय माना जाता है।

क्वांटम थ्योरी के जन्मदाता और नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक ‘इरविन श्रोडिंगर’ (Erwin Schrödinger) ने दुनिया के सामने यह बात मानी थी की उनकी क्वांटम थ्योरी का असली आधार हमारे ‘उपनिषदों’ का ज्ञान है।

श्रोडिंगर हमेशा अपने सिरहाने उपनिषद रखकर सोते थे। निकोला टेस्ला से लेकर वर्नर हाइज़नबर्ग (Heisenberg) तक, दुनिया के जितने भी बड़े-बड़े वैज्ञानिक हुए हैं, उन सबने यह माना है की ब्रह्मांड के जो रहस्य वेस्टर्न साइंस आज सुलझा रहा है, वो भारत के वेदों और उपनिषदों में हज़ारों साल पहले लिखे जा चुके हैं।

ज़रा सोचिए! दुनिया भर का विज्ञान, अमेरिका और यूरोप के सबसे तेज़ दिमाग आज सनातन धर्म, वेदों और संस्कृत की तरफ भाग रहे हैं, वो इसमें अपने सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं।

लेकिन हमारे अपने ही देश में पैदा हुए इन ‘भूरे अंग्रेजों’ और वामपंथियों को अपनी ही महान संस्कृति से बदबू आती है।

इन्हें लगता है की अगर ये संस्कृत का विरोध करेंगे और उपनिषदों को गालियां देंगे, तो ये बहुत ‘मॉर्डन’ और ‘कूल’ कहलाएंगे।

दुनिया हमारे प्राचीन सनातन ज्ञान से सीख कर आविष्कार करने में लगी है, और ये लिबरल पत्रकार उसी ज्ञान को ‘सांप्रदायिक’ साबित करने के लिए ट्विटर पर रात-दिन पसीना बहा रहे हैं। ये बौद्धिक दरिद्रता नहीं, तो और क्या है?

Scroll to Top