इस देश में ‘गंगा-जमुना तहजीब’ और ‘भाईचारे’ का चूरन हमेशा से सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं को ही खिलाया गया है। हमारे दिमाग में हमेशा ये बात ठूंसी गई की तुम दूसरों के धर्म का सम्मान करो, तो वो भी तुम्हारा सम्मान करेंगे।
लेकिन कश्मीर के उस खूनी इतिहास के पन्ने पलटकर देखिए, तो पता चलेगा की जिस-जिस हिन्दू ने इस झूठे सेक्युलरिज्म का ज़हर पिया है, उसकी कीमत उसे अपनी और अपने बच्चों की जान देकर चुकानी पड़ी है।
कश्मीर में 1990 का वो खौफनाक दौर कोई भूला नहीं है।
आज अगस्त में 36 साल बाद जब जम्मू-कश्मीर की SIA (State Investigation Agency) ने एक केस की फाइल दोबारा खोली है और ताबड़तोड़ रेड मारनी शुरू की है, तो एक ऐसा खौफनाक सच बाहर आया है जिसे सुनकर आपका दिल दहल जायेगा।
यह कहानी है कश्मीर के एक ऐसे महान हिन्दू विद्वान की, जिसने ज़िंदगी भर भाईचारे का गीत गाया, लेकिन जिहादियों ने उसे ऐसा सिला दिया जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।
सेक्युलरिज्म का वो भद्दा मज़ाक जिसने ली एक महान कश्मीरी पंडित की जान, गीता और कुरान साथ रखने का मिला ये खौफनाक सिला
अगर आप वामपंथियों की मानें, तो कश्मीर में जिहादियों ने सिर्फ उन लोगों को मारा जो सरकार के करीबी थे या जो कट्टर थे।
लेकिन सर्वानंद कौल प्रेमी जी की कहानी इस पूरे झूठे नैरेटिव के मुंह पर एक बहुत बड़ा तमाचा है।
सर्वानंद प्रेमी जी कश्मीर के अनंतनाग ज़िले के एक बेहद सम्मानित, पढ़े-लिखे और मशहूर कश्मीरी पंडित कवि थे।
वो ऐसे इंसान थे जिन्होंने ‘श्रीमद्भगवद गीता’ का कश्मीरी भाषा में अनुवाद किया था ताकि घाटी के लोग सनातन धर्म के ज्ञान को अपनी भाषा में समझ सकें।
लेकिन प्रेमी जी के भीतर वो सेक्युलरिज्म वाला कीड़ा भी था जो अक्सर हमारे भोले-भाले हिन्दू समाज को डस लेता है। वो साम्प्रदायिक सौहार्द (Communal harmony) के बहुत बड़े पैरोकार थे।
आपको जानकर हैरानी होगी की वो अपने घर के पूजा कक्ष में गीता के ठीक बगल में ‘कुरान’ भी रखते थे! वो रामायण भी पढ़ते थे और कुरान की आयतें भी।
उन्हें लगता था की अगर वो कश्मीर के बहुसंख्यक मुस्लिम समाज के धर्म का सम्मान करेंगे, तो वो मुसलमान भी उनकी और उनके परिवार की रक्षा करेंगे।
वो अक्सर कहते थे की कश्मीर में हिन्दू और मुसलमान एक ही पेड़ की दो शाखाएं हैं।
पर अफ़सोस! भाईसाहब, जिहाद अंधा होता है। इन खूंखार जिहादियों और आतंकियों को इस बात से रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता था की सामने वाला पंडित उनके धर्म की कितनी इज़्ज़त करता है या वो कितनी कुरान पढ़ता है।
उनके लिए सर्वानंद प्रेमी सिर्फ और सिर्फ एक ‘काफ़िर’ थे। एक ऐसा हिन्दू, जिसके माथे पर तिलक था और जो कश्मीर घाटी में सनातन धर्म का जीता-जागता प्रतीक था।
इन जिहादियों का मकसद कश्मीर से हर उस इंसान को मिटाना था जो ‘निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा’ के रास्ते में रोड़ा था।
सर्वानंद जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी जिस मुस्लिम समाज के साथ उठने-बैठने और उन्हें प्यार बांटने में निकाल दी, उसी समाज के बीच से निकले दरिंदों ने उनके साथ वो वहशीपन किया, जिसकी मिसाल शायद इतिहास के पन्नों में और कहीं ना मिले।
ये सेक्युलरिज्म का वो भद्दा और घिनौना मज़ाक था, जिसने एक महान विद्वान को मौत के घाट उतार दिया और ये साबित कर दिया की जब सामने वाले के दिमाग में जिहाद का ज़हर भरा हो, तो आपकी गीता और कुरान की बातें उसे इंसान नहीं बना सकतीं।
1990 की वो काली रात जब जिहादी घर में घुसे और एक बहादुर बेटे ने अपने बाप के लिए मौत के मुंह में रख दिया कदम
तारीख थी 29 अप्रैल 1990… वो दौर जब कश्मीर घाटी में मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से खुलेआम ऐलान हो रहा था की ‘रालिव, गालिव या चालिव’ (या तो हमारे साथ मिल जाओ, या मरो, या कश्मीर छोड़कर भाग जाओ)।
सड़कों पर खून बह रहा था और कश्मीरी पंडितों के घर-बार जलाए जा रहे थे। सर्वानंद प्रेमी जी का परिवार अनंतनाग के अपने घर में डरा-सहमा बैठा था।
उन्हें कई लोगों ने कहा था की घाटी छोड़कर जम्मू चले जाओ, लेकिन प्रेमी जी को अपने ‘पड़ोसियों’ पर कुछ ज़्यादा ही भरोसा था।
उन्हें लगता था की उन्होंने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया, तो उनके साथ कोई क्या ही बुरा करेगा!
लेकिन 29-30 अप्रैल की उस खौफनाक रात को उनका यह भ्रम हमेशा-हमेशा के लिए टूट गया। रात के अंधेरे में हथियारों से लैस 3 खूंखार आतंकी उनके घर का दरवाज़ा तोड़कर अंदर घुस आए।
और पता है, इन आतंकियों का पहला काम क्या था? आज़ादी और जिहाद का नारा लगाने वाले ये दरिंदे असल में निहायत ही गिरे हुए चोर और लुटेरे थे।
घर में घुसते ही इन्होंने सबसे पहले लूटपाट मचानी शुरू कर दी। महिलाओं के गहने, घर में रखा कैश, कीमती सामान और यहाँ तक की सूटकेस में रखे हुए शॉल तक ये बेशर्म लोग लूट ले गए।
लूटपाट करने के बाद इन जिहादियों ने सर्वानंद जी की तरफ अपनी बंदूकें तान दीं। उन्होंने परिवार से कहा की वो प्रेमी जी को अपने ‘कमांडर’ से मिलाने के लिए ले जा रहे हैं और पूछताछ के बाद छोड़ देंगे।
एक बूढ़ा बाप, जो पूरी ज़िंदगी कलम चलाता रहा, उसे हथियारों के दम पर वो आतंकी घसीट कर ले जाने लगे।
लेकिन तभी वहां कुछ ऐसा हुआ जो एक बेटे के असीम प्यार और बलिदान की सबसे रुला देने वाली कहानी है।
सर्वानंद जी का छोटा बेटा, वीरेंद्र कौल, अपने बूढ़े बाप को उन दरिंदों के बीच अकेला जाता हुआ नहीं देख सका। वीरेंद्र सामने आकर खड़ा हो गया।
उसने आतंकियों से कहा की मेरे पिताजी बूढ़े हैं, उन्हें ठीक से चलना भी नहीं आता, मैं उन्हें इस रात के अंधेरे में तुम्हारे साथ अकेला नहीं जाने दूंगा। मैं भी साथ चलूंगा!
उन वहशी आतंकियों ने वीरेंद्र को भी कॉलर से पकड़ा और बाप-बेटे दोनों को बंदूकों की नोक पर रात के उस खौफनाक अंधेरे में घसीटते हुए ले गए।
घर की औरतें रोती-बिलखती रह गईं, मिन्नतें करती रह गईं, लेकिन उन दरिंदों का दिल नहीं पसीजा।
और पड़ोसी? वो मुस्लिम पड़ोसी जिनके साथ सर्वानंद जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी थी, जिनके साथ वो कुरान की बातें करते थे… उस रात उन सबके घरों के दरवाज़े और खिड़कियां कसकर बंद थीं।
किसी एक इंसान ने हिम्मत नहीं करी की वो बाहर निकलकर उन निहत्थे बाप-बेटे को आतंकियों के चंगुल से बचा सके। सालों का वो भाईचारा उस रात हमेशा के लिए दफ़न हो गया था।
आंखें निकालीं और माथे में ठोंक दी कीलें, इंसानियत को कंपा देने वाली वो जिहादी दरिंदगी
उस खौफनाक रात के बाद परिवार वालों की आँखों से नींद हमेशा के लिए उड़ चुकी थी। रो-रोकर उनका बुरा हाल था।
उन्हें उम्मीद थी की शायद वो आतंकी पूछताछ करके बाप-बेटे को छोड़ देंगे। आखिर सर्वानंद जी ने किसी का क्या बिगाड़ा था? वो तो एक निहत्थे, बूढ़े कलमकार थे।
लेकिन उन्हें क्या पता था की जिन दरिंदों के हाथ उनके घर की महिलाओं के गहने और शॉल लूटने में नहीं कांपे, वो इंसानियत के नाम पर क्या ही रहम करेंगे।
दो दिन बाद, यानी 1 मई 1990 को, अनंतनाग के उस घर से करीब 20 किलोमीटर दूर जंगल में जो नज़ारा दिखा, उसने पूरी इंसानियत को शर्मसार कर दिया।
सर्वानंद प्रेमी जी और उनके उस बहादुर बेटे वीरेंद्र की लाशें एक पेड़ से लटकी हुई मिलीं।
भाईसाहब, मौत तो सबको आनी है, लेकिन जिहादियों ने उन दोनों बाप-बेटे को जिस वहशीपन और दरिंदगी के साथ तड़पा-तड़पा कर मारा था, उसकी डिटेल सुनकर आज भी किसी भी पत्थर दिल इंसान के आंसू निकल आएं।
उन आतंकियों ने सीधे गोली नहीं मारी थी। उन्होंने पहले अपने भीतर के उस ‘इस्लामिक जिहाद’ का पूरा नंगा नाच किया।
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और उस समय के चश्मदीदों के रोंगटे खड़े कर देने वाले बयानों के मुताबिक, दोनों बाप-बेटे की हड्डियां बुरी तरह से तोड़ दी गई थीं।
जिहादियों ने ज़िंदा रहते हुए उनकी आंखें निकाल ली थीं! इनका वहशीपन यहीं खत्म नहीं हुआ। एक कश्मीरी पंडित के लिए उसका तिलक, उसका माथा उसकी सबसे बड़ी पहचान और उसका गुरूर होता है।
उन जिहादियों ने सर्वानंद प्रेमी जी के माथे के बीचों-बीच, ठीक उसी जगह जहां वो तिलक लगाते थे, वहां लोहे की बड़ी-बड़ी कीलें ठोंक दी थीं!
पूरे शरीर को सिगरेट से दागा गया था। उनकी खाल जलाई गई थी। कल्पना कीजिए उस दर्द की, जब एक बूढ़ा बाप अपने जवान बेटे को अपने सामने इस तरह तड़पते हुए देख रहा होगा, और वो बेटा अपने बाप के माथे में कीलें ठुकते हुए देख रहा होगा!
जब तड़पाने से उनका जी भर गया, तब जाकर उन हैवानों ने दोनों को गोलियों से छलनी किया और पेड़ से लटका दिया।
ये सिर्फ दो लोगों की हत्या नहीं थी। ये पूरे कश्मीरी पंडित समाज को, सनातन धर्म को एक बहुत बड़ा मैसेज था की अगर तुमने यहां रहने की कोशिश की, तो तुम्हारा भी यही हश्र होगा।
और सबसे बड़ा दर्द तो इस बात का था की जिस समाज के बीच सर्वानंद जी ने ज़िंदगी गुज़ार दी, उनमें से किसी एक भी इंसान ने आगे आकर उन दरिंदों को रोकने की कोशिश नहीं की।
ये कैसी ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ थी जो एक पंडित के खून से लाल हो गई और किसी ने उफ़ तक नहीं किया?
36 साल बाद पाताल से दरिंदों को नोच निकालने उतरी SIA की टीम, अब कश्मीर में एक-एक जिहादी का होगा पक्का हिसाब
1990 से लेकर आज तक, पूरे 36 साल बीत गए। वो दरिंदे, जिन्होंने सर्वानंद प्रेमी और उनके बेटे के शरीर में कीलें ठोंकी थीं, वो यही सोच रहे थे की अब उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
उन्हें लगता था की उन्होंने जो खून बहाया, वो बर्फ के नीचे दबकर हमेशा के लिए गायब हो गया।
लेकिन आज की तारीख कश्मीर के जिहादी इकोसिस्टम के लिए एक ऐसा दिन बनकर आई है, जिसकी उन्होंने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की होगी।
जो केस अनंतनाग पुलिस की फाइलों में कहीं धूल फांक रहा था, उसे अब जम्मू-कश्मीर की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने अपने हाथ में ले लिया है।
और सिर्फ हाथ में नहीं लिया है, आज सुबह से ही कश्मीर के कई ठिकानों पर SIA की ताबड़तोड़ छापेमारी चल रही है!
36 साल बाद SIA के हाथ कुछ ऐसे छुपे हुए और बेहद अहम सुबूत लग गए हैं, जो सीधे तौर पर उन दरिंदों के गिरेबान तक पहुंचेंगे जिन्होंने इस खौफनाक हत्याकांड को अंजाम दिया था।
आज वो हत्यारे अपने घरों में दुबक कर थर-थर कांप रहे होंगे। उन्हें लग रहा था की फाइलें बंद हो गईं, गवाह मिट गए। लेकिन वो भूल गए की अब सिस्टम बदल चुका है।
बाप-बेटे की वो चीखें जो 1990 में अनंतनाग के जंगलों में गुम हो गई थीं, आज 36 साल बाद इंसाफ का हथौड़ा बनकर इन जिहादियों के दरवाज़े तोड़ रही हैं।
अब कोई कश्मीरी पंडितों के खून को ‘बीती हुई बात’ कहकर रफा-दफा नहीं कर सकता।
सरला भट से लेकर सर्वानंद प्रेमी तक, अब खुलेगी हर फाइल, क्योंकि ये नया भारत है जो सनातनियों का खून कभी भूलता नहीं
ये कोई एक दिन का एक्शन नहीं है दोस्तों! ये उस नई आंधी की शुरुआत है जो कश्मीर घाटी से जिहाद का पूरा कचरा साफ करने के लिए चल पड़ी है।
आपको याद होगा अभी पिछले ही महीने पहले इसी SIA ने 1990 के ही एक और रोंगटे खड़े कर देने वाले केस में 737 पन्नों की चार्जशीट दायर की थी।
वो केस था एक बेगुनाह कश्मीरी पंडित नर्स ‘सरला भट’ का, जिसके साथ दरिंदगी करके उसकी हत्या कर दी गई थी।
और उस चार्जशीट में मुख्य आरोपी किसे बनाया गया? उसी खूंखार अलगाववादी यासीन मलिक को, जिसे पिछली सरकारें कभी दिल्ली बुलाकर प्रधानमंत्री से हाथ मिलवाती थीं!
यासीन मलिक जैसे दरिंदे जो कल तक फाइव स्टार होटलों में दावतें उड़ाते थे, आज वो तिहाड़ जेल की कालकोठरी में सड़ रहे हैं।
और अब बारी है सर्वानंद प्रेमी जी के हत्यारों की। याद दिला दें की 2022 में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा जी ने सर्वानंद प्रेमी जी को मरणोपरांत ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया था।
लेकिन सच कहूं तो, उनके सम्मान और उनकी आत्मा को असली शांति तो उसी दिन मिलेगी, जिस दिन उनके और उनके बेटे के हत्यारों को सरेआम फांसी के फंदे पर लटकाया जाएगा या एनकाउंटर में जहन्नुम पहुंचाया जाएगा।
गीता और कुरान साथ रखने वाले सर्वानंद जी ने जो कीमत चुकाई, वो हम सब हिंदुओं के लिए एक बहुत बड़ा सबक है की अपने दुश्मनों को कभी भी अपना दोस्त समझने की भूल मत करना।
जब बात धर्म की आती है.. तो ये तथाकथित ‘भाईचारा’ और ‘सेक्युलरिज्म’ सिर्फ हमें बर्बादी की तरफ ले जाने का रास्ता है!
