जब भी इसरो (ISRO) का कोई रॉकेट अंतरिक्ष की तरफ उड़ान भरता है, तो हम सब टीवी के सामने बैठकर खूब तालियां बजाते हैं। चंद्रयान और मंगलयान की कामयाबी देखकर हमें अपने देश पे बेहद गर्व होता है।
लेकिन क्या कभी हमने एक पल के लिए भी ये सोचा है की लोहे के उन भारी-भरकम रॉकेट्स को आसमान में धकेलने वाली वो ताकत, वो ‘इंजन’ आखिर किसने बनाया था?
आज मैं आपको हिंदुस्तान के इतिहास की एक ऐसी सच्ची और खौफनाक कहानी बताने जा रहा हूँ, जिसे सुनकर आपकी आँखों से आंसू छलक पड़ेंगे।
ये कहानी भारत के उस महान और पागल देशभक्त ‘नंबी नारायणन’ की है, जिसने इस देश को अंतरिक्ष का सरताज बनाने के लिए अपनी पूरी जवानी खपा दी, लेकिन बदले में हमारे ही देश के बिके हुए सिस्टम ने उसे क्या दिया…
गद्दारी का तमगा, पुलिस की बेतहाशा मार और एक कालकोठरी!
देश को मंगलयान का सपना दिखाने वाला ISRO का वो जीनियस, जिसे सिस्टम ने इनाम की जगह दी कालकोठरी
सत्तर के दशक में जब भारत के पास साइकिलों और बैलगाड़ियों पर रॉकेट के पुर्जे ढोने की नौबत थी, तब यह इंसान अमेरिका की टॉप ‘प्रिंसटन यूनिवर्सिटी’ (Princeton University) से लिक्विड प्रोपल्शन (Liquid Propulsion) की पढ़ाई कर रहा था।
इनका टैलेंट देखकर अमेरिका की नासा (NASA) पागल हो गई थी। नासा ने नंबी नारायणन के सामने मुंहमांगी दौलत, अमेरिका की नागरिकता और एक ऐसी ऐशो-आराम की ज़िंदगी का ऑफर रखा था, जिसके लिए कोई भी इंसान अपना ईमान बेच दे।
लेकिन इस आदमी के खून में भारत माता की मिट्टी की महक थी! इन्होने नासा के करोड़ों डॉलर के ऑफर को एक झटके में ठोकर मार दी और अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर वापस हिंदुस्तान लौट आए, क्योंकि इन्हें अपने देश के लिए कुछ बड़ा करना था।
वापस आकर इन्होने इसरो में दिन-रात एक कर दिया और भारत को दिया उसका अपना ‘विकास इंजन’ (Vikas Engine)।
आपको जानकर हैरानी होगी की आज तक ISRO जितने भी बड़े पीएसएलवी (PSLV) और जीएसएलवी (GSLV) रॉकेट उड़ाता है, उन सबकी धड़कन यही ‘विकास इंजन’ है।
इसी इंजन के दम पर हमने मंगल और चाँद को छुआ है। जो इंसान देश को इतनी बड़ी ताक़त दे रहा था, उसे तो पलकों पर बिठाना चाहिए था।
लेकिन हमारे देश का सिस्टम, कुछ विदेशी ताकतों के टुकड़ों पर पलने वाले अफ़सरों की मुट्ठी में इस कदर कैद था, की उन्होंने इस देशभक्त को इनाम की जगह सीधा टॉर्चर रूम में भेज दिया।
अगर ये वैज्ञानिक कामयाब हो जाता तो अंतरिक्ष में अमेरिका और रूस को बहुत पीछे छोड़ देता हिंदुस्तान
नब्बे के दशक का वो दौर था जब अंतरिक्ष की दुनिया में सिर्फ तीन ताकतों का सिक्का चलता था- अमेरिका, रूस और फ्रांस।
भारत के पास छोटे रॉकेट तो थे, लेकिन अगर हमें भारी कम्युनिकेशन सैटेलाइट आसमान में भेजने थे, तो हमें ‘क्रायोजेनिक इंजन’ (Cryogenic Engine) की सख्त ज़रूरत थी।
नंबी नारायणन ने ठान लिया की वो भारत में क्रायोजेनिक इंजन लाएंगे। रूस भारत को ये तकनीक देने को तैयार हो गया। डील पक्की हो गई।
लेकिन अमेरिका के पेट में भयंकर दर्द शुरू हो गया। अमेरिका को अच्छे से पता था की अगर भारत के पास ये इंजन आ गया, तो भारत दुनिया का सबसे सस्ता और बेहतरीन रॉकेट बना लेगा..
और फिर दुनिया भर के देश अमेरिका के बजाय भारत से अपने सैटेलाइट लॉन्च करवाएंगे। इससे अमेरिका का अरबों डॉलर का स्पेस मार्केट तबाह हो जाता।
अमेरिका ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी। उसने रूस को धमकाया, ब्लैकमेल किया और आख़िरकार रूस को भारत के साथ वो डील कैंसिल करनी पड़ी।
लेकिन नंबी नारायणन हार मानने वाले लोगों में से नहीं थे। जब सीधी उंगली से घी नहीं निकला, तो इन्होने वो ‘जुगाड़’ भिड़ाया जिसकी कल्पना सीआईए (CIA) ने भी नहीं की थी।
इन्होने रूस की एयरलाइन उरल एविएशन (Ural Aviation) के विमानों का इस्तेमाल करके, वहां के कुछ ईमानदार रूसी वैज्ञानिकों की मदद से क्रायोजेनिक तकनीक के कुछ बेहद खुफ़िया पार्ट्स और डिज़ाइन गुपचुप तरीके से हिंदुस्तान मंगा लिए।
भारत अंतरिक्ष का सुपरपावर बनने की बिल्कुल दहलीज़ पर खड़ा था! बस कुछ ही सालों में हम अपना क्रायोजेनिक इंजन उड़ाने वाले थे।
और बस यहीं पर विदेशी खुफ़िया एजेंसी (CIA) ने भारत के स्पेस प्रोग्राम को तोड़ने का वो गंदा खेल शुरू किया, जिसमें उन्हें साथ मिला हमारे ही सिस्टम में बैठे कुछ ‘जयचंदों’ का।
मालदीव की दो औरतों के नाम पर बुना गया फर्जी जासूसी का वो खौफनाक जाल जिसने देश को सन्न कर दिया
विदेशी ताकतों को पता था की अगर इसरो को तबाह करना है, तो सबसे पहले नंबी नारायणन को रास्ते से हटाना होगा।
अक्टूबर 1994 में केरल पुलिस ने त्रिवेंद्रम में मालदीव की दो महिलाओं- मरियम रशीदा और फौज़िया हसन- को पकड़ा। उनका कसूर बस इतना था की उनका वीज़ा खत्म हो गया था और वो ओवरस्टे कर रही थीं।
लेकिन हमारे ही देश के कुछ बिकाऊ पुलिस अफ़सरों और खुफ़िया विभाग (IB) के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने इन औरतों के इर्द-गिर्द ऐसी कहानी गढ़ी, जो किसी सी-ग्रेड सस्पेंस फिल्म से भी घटिया थी।
उन्होंने ऐलान कर दिया की ये औरतें पाकिस्तान की जासूस हैं। और सबसे बड़ा बम तब फोड़ा गया, जब इन पुलिसवालों ने बिना किसी सबूत के भारत के सबसे बड़े वैज्ञानिक नंबी नारायणन का नाम इन महिलाओं से जोड़ दिया।
सिस्टम ने कहानी गढ़ी की नंबी नारायणन ने मालदीव की इन औरतों के ज़रिए इसरो के टॉप ‘क्रायोजेनिक सीक्रेट्स’ पाकिस्तान को बेच दिए हैं!
और कीमत क्या बताई गई? महज़ कुछ लाख रुपये! यार, थोड़ा तो दिमाग लगाते! जो इंसान नासा के करोड़ों डॉलर और अमेरिका की ऐशो-आराम वाली ज़िंदगी को लात मार चुका हो, वो चंद लाख रुपयों के लिए अपने ही देश से गद्दारी करेगा?
और उससे भी बड़ा मज़ाक ये था की जिस ‘क्रायोजेनिक इंजन’ को भारत ने अभी तक खुद पूरी तरह बनाया ही नहीं था, उसके सीक्रेट्स वो पाकिस्तान को कैसे बेच सकता था?
पाकिस्तान के पास तो क्रायोजेनिक दूर की बात, तब एक ढंग का साइकिल का टायर बनाने की भी औकात नहीं थी!
लेकिन इस सिस्टम को लॉजिक या सच से कोई मतलब थोड़ी था। उन्हें तो बस ऊपर से मिले ऑर्डर फॉलो करने थे।
उन्हें एक ऐसा जाल बुनना था जिसमें फंसकर भारत का स्पेस प्रोग्राम हमेशा के लिए अपाहिज हो जाए।
बिना किसी सबूत, बिना किसी आधार के, सिर्फ एक मनगढ़ंत कहानी के दम पर पुलिस ने नंबी नारायणन को गिरफ्तार कर लिया।
जो इंसान कल तक इसरो का हीरो था, आज उसे देश के सामने एक नीच ‘गद्दार’ और महिलाओं का शौकीन बनाकर पेश कर दिया गया।
भारत के स्पेस प्रोग्राम को ख़त्म करने के लिए जब एक सच्चे देशभक्त को निर्वस्त्र करके पीटा
अब ज़रा टॉर्चर रूम की उस कहानी पर आते हैं, जिसे सुनकर किसी भी पत्थर दिल इंसान की रूह कांप जाएगी।
जब पुलिस ने नंबी नारायणन को गिरफ्तार किया, तो उनके साथ ऐसा सलूक किया गया जो पुलिस खूंखार से खूंखार आतंकियों के साथ भी करने से पहले सौ बार सोचती है।
हमारे ही देश के इस बिकाऊ सिस्टम ने एक महान वैज्ञानिक को नंगा करके पीटा।
लगातार 50-50 घंटों तक उस इंसान को सोने नहीं दिया गया। जब वो प्यास से तड़पकर पानी मांगते, तो उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां दी जाती थीं।
आईबी (IB) और लोकल पुलिस के अफ़सरों ने उन्हें टॉर्चर करके इस बात का भयंकर दबाव डाला की वो एक झूठे कबूलनामे पर दस्तखत कर दें।
और जानते हैं वो कबूलनामा क्या था? वो अफ़सर चाहते थे की नंबी सर सिर्फ अपना ‘फर्जी गुनाह’ कबूल न करें, बल्कि इसरो के तत्कालीन टॉप अधिकारियों (जैसे सतीश धवन) का नाम भी लें!
सोच रहे हैं आप इस विदेशी साजिश का लेवल? विदेशी ताकतें सिर्फ नंबी को नहीं, बल्कि भारत के पूरे के पूरे स्पेस प्रोग्राम को ही हमेशा के लिए खत्म करना चाहती थीं।
लेकिन सलाम है उस देशभक्त को, जिसने बेतहाशा मार खा ली, बेइंतहा ज़ुल्म सह लिए, लेकिन झूठ नहीं बोला। उन्होंने अपने देश के साथ गद्दारी करने वाले उस कागज़ पर साइन करने से साफ़ इंकार कर दिया।
इधर टॉर्चर रूम में वो इंसान खून के आंसू रो रहा था, और उधर बाहर बिकाऊ मीडिया ने बिना किसी सबूत के उनका पूरा कैरेक्टर असैसिनेशन (Character Assassination) कर दिया था।
अखबारों ने उन्हें सरेआम ‘औरतों का शौकीन’ और ‘देशद्रोही’ छाप दिया।
CBI जांच में खुली बिकाऊ सिस्टम की पोल और बेदाग साबित हुआ ISRO का हीरो
जब बवाल बहुत ज़्यादा बढ़ा और 1996 में इस पूरे मामले की जांच सीबीआई (CBI) के हाथ में गई, तो दूध का दूध और पानी का पानी होने में ज़रा भी देर नहीं लगी।
सीबीआई ने जब पुलिस की फाइलें खंगालीं और अपनी ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन की, तो अफ़सर खुद सन्न रह गए।
सीबीआई ने कोर्ट में जो रिपोर्ट पेश की, उसमें डंके की चोट पर लिखा गया की ये पूरा का पूरा केस 100% “फर्जी और मनगढ़ंत” (Fabricated) है!
ना तो कोई सीक्रेट भारत से बाहर गया था, ना ही नंबी नारायणन ने कोई पैसा लिया था, और ना ही मालदीव की उन औरतों से उनका कोई लेना-देना था।
पुलिस ने जानबूझकर, किसी साज़िश के तहत झूठे सबूत गढ़े थे। आख़िरकार, 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने नंबी नारायणन को बाइज्ज़त बरी कर दिया।
कोर्ट ने भी माना की कुछ पुलिस अफ़सरों ने अपने निजी फायदों और गहरी साज़िश के तहत इस निर्दोष वैज्ञानिक की ज़िंदगी तबाह कर दी।
आख़िरकार वक़्त ने करवट ली। देश को अपने इस हीरो की असली अहमियत समझ में आई। साल 2019 में, भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ (Padma Bhushan) से नवाज़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी उस बिके हुए सिस्टम को आईना दिखाते हुए आदेश दिया की केरल राज्य सरकार नंबी नारायणन को उनके मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के लिए भारी मुआवज़ा (1.3 करोड़ रुपये से ज़्यादा) दे।
खैर, पैसा मिल गया, अवार्ड मिल गया, सम्मान वापस मिल गया… लेकिन उनके जो जवानी के 25 कीमती साल इस सिस्टम ने एक झटके में छीन लिए, क्या वो कोई उन्हें लौटा सकता है?
अगर हमारा सिस्टम विदेशी ताकतों के इशारे पर अपनों का ही खून पीता रहेगा, तो कल को कोई भी दूसरा नंबी नारायणन इस देश के लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर क्यों लगाएगा?
