सतलुज और यमुना के बीच की पुरानी धरती आज भी चुपचाप बोलती है। कभी-कभी एक किसान की फावड़े में तांबे की छोटी मुद्रा चिपक जाती है। उस पर एक युवा देवता खड़े होते हैं। हाथ में भाला। चरणों में मोर। किनारे पर ब्राह्मी अक्षरों में लिखा होता है: यौधेय गणस्य जय।
यह मुद्रा किसी राजा की तस्वीर नहीं है। यह एक पूरे गण की घोषणा है। यौधेय नाम योद्धा से बना।
वे क्षत्रिय थे, कृषक थे, और कार्तिकेय के उपासक थे। रोहतक के खोखराकोट से लेकर हिसार, सोनीपत और सतलुज के किनारे तक उनकी उपस्थिति फैली हुई थी। विदेशी आक्रमणों ने उन्हें दबाया, पर मिटा नहीं पाया। रुद्रदामन जैसे शक्तिशाली शासक को भी उन्हें “सभी क्षत्रियों में वीर” कहना पड़ा।
यह लेख उसी गण की कथा है। धान्य की भूमि पर जन्मे योद्धाओं की कथा। स्कंद को अपना स्वामी मानने वाले स्वतंत्र लोगों की कथा। और उस छोटी मुद्रा की कथा, जो आज भी मिट्टी से निकलकर याद दिलाती है कि यहाँ कभी जय केवल एक व्यक्ति की नहीं, पूरे गण की होती थी।
यौधेय कौन थे
नाम ही उनका ध्वज था। यौधेय शब्द संस्कृत के ‘योद्धा’ से बना है। योद्धा का अर्थ है लड़ने वाला, युद्ध करने वाला। इस प्रकार यौधेय का सीधा अर्थ है ‘योद्धाओं की सन्तान’ या ‘योद्धा जाति’। वे स्वयं को शस्त्र से परिभाषित करते थे। उन्होंने इस बात को कभी छिपाया नहीं। उन्होंने इसे अपनी मुद्राओं पर, अपनी मुहरों पर और अपनी परंपरा में खुलेआम अंकित किया।
पाणिनि ने ईसा पूर्व चौथी-पाँचवीं शताब्दी के आसपास अष्टाध्यायी में उन्हें आयुधजीवी संघों की श्रेणी में रखा। आयुधजीवी का अर्थ है वे लोग जो शस्त्र-वृत्ति से जीवन निर्वाह करते हैं। पाणिनि ने उन्हें त्रिगर्त और अन्य उत्तरी युद्ध-संघों के साथ गिना। व्याकरणकार कविता नहीं लिख रहे थे। वे अपने समय की जीवित सामाजिक व्यवस्था का वर्णन कर रहे थे। इससे स्पष्ट होता है कि यौधेय तब तक एक स्थापित युद्ध-गण के रूप में पहचाने जा चुके थे।
वे स्वयं को क्षत्रिय मानते थे। उनका यह आत्म-बोध केवल गर्व नहीं था। उनके शत्रु भी इसे स्वीकार करते थे। रुद्रदामन के गिरनार शिलालेख में उन्हें ‘सभी क्षत्रियों में वीर’ कहा गया। यह उपाधि उन्होंने स्वयं धारण की थी और अपने आचरण से सिद्ध की थी। उनकी मुद्राएँ किसी एक राजा को अकेला जारीकर्ता नहीं बतातीं। वे बार-बार ‘गण’ की बात करती हैं। विजय यौधेय गण की है, किसी एक सिंहासन की नहीं। यही गण-व्यवस्था उनकी राजनीतिक पहचान का मूल थी।
महाभारत और पुराणों ने उन्हें और गहरी जड़ दी। एक परंपरा यौधेय को युधिष्ठिर का पुत्र बताती है। दूसरी उन्हें पंजाब के उशीनर वंश से जोड़ती है। महाभारत में रोहीतक देश को कार्तिकेय-प्रिय और समृद्ध बताया गया है। वहाँ मत्तमयूरक नाम से एक योद्धा जाति का उल्लेख आता है। विद्वान लंबे समय से इस नाम में यौधेयों का संकेत देखते हैं, क्योंकि उनकी मुद्राओं पर स्कंद का वाहन मोर बार-बार आता है। चाहे हर वंशावली शाब्दिक इतिहास हो या सांस्कृतिक दावा, संदेश एक ही है। यौधेय भारत के पवित्र क्षत्रिय कुलों में अपना स्थान चाहते थे और उसे जीकर सिद्ध करते थे।
वे घूमंतू लुटेरे नहीं थे। वे स्थायी कृषक-योद्धा थे। बहूधान्यक नाम ही बताता है कि उनकी भूमि धान्य से भरपूर थी। वे खेती करते थे, पशु पालते थे और आवश्यकता पड़ने पर सेना खड़ी कर लेते थे। खेत और भाला दोनों उनके जीवन के अभिन्न अंग थे। इसी दोहरी शक्ति ने उन्हें लंबे समय तक स्वतंत्र रखा। विदेशी आक्रमणों के दबाव में भी वे पूरी तरह नष्ट नहीं हुए। वे झुकते थे, फिर उठते थे और अपने क्षेत्र को वापस लेते थे।
उनकी मुद्राएँ और मुहरें इस आत्म-छवि को बार-बार दोहराती हैं। ‘यौधेय गणस्य जय’ का लेख केवल विजय का नारा नहीं था। वह एक पूरे समुदाय की घोषणा थी। कोई वंशगत राजा नहीं, बल्कि समूचा गण विजेता था। बिजयागढ़ अभिलेख में उनके नेता को महाराज महासेनापति कहा गया है। यह विरुद बताता है कि सर्वोच्च पद सैन्य नेतृत्व का था, जन्मसिद्ध राजत्व का नहीं। सुनैत की मुहरें ‘जयमंत्रधर’ यौधेयों की बात करती हैं। इनमें सभा और मंत्रणा की झलक मिलती है। गण भीड़ नहीं था। वह संगठित, सलाह-मशविरे वाला और युद्ध में एकजुट रहने वाला समुदाय था।
इस प्रकार यौधेय केवल एक प्राचीन जाति का नाम नहीं थे। वे क्षत्रिय धर्म, गण-व्यवस्था, कार्तिकेय-भक्ति और कृषि-शक्ति का जीवंत संयोग थे। उन्होंने अपने नाम को अपने कर्म से सिद्ध किया। योद्धा शब्द उनके लिए उपाधि नहीं, पहचान थी।

पवित्र भूगोल: रोहतक और बहूधान्यक
यौधेयों का हृदय-प्रदेश केवल एक नगर नहीं था। वह एक पूरी भूमि थी, जिसका नाम स्वयं उसकी समृद्धि बताता था: बहूधान्यक, अर्थात प्रचुर धान्य की भूमि। इस देश की राजधानी रोहीतक में थी। आज हम उसे रोहतक कहते हैं। पुरातत्त्व उसे खोखराकोट के टीलों में खोजता है।
तीन नाम एक ही मिट्टी की तीन परतें हैं। रोहीतक महाकाव्य का नाम है। बहूधान्यक मुद्रा का नाम है। खोखराकोट खुदाई का नाम है।
महाभारत इस भूगोल को स्नेह और गर्व दोनों से याद करता है। युधिष्ठिर के राजसूय के समय नकुल पश्चिम दिशा की विजय के लिए निकले। उन्होंने सबसे पहले रोहीतक पर प्रहार किया। महाकाव्य कहता है कि वह पर्वतीय प्रदेश कार्तिकेय को प्रिय था। वह रमणीय था, समृद्ध था, गौओं और हर प्रकार के धन-धान्य से भरा था। वहाँ नकुल का युद्ध मत्तमयूरकों से हुआ। मत्तमयूरक का अर्थ है ‘मदमस्त मोर वाले लोग’। यह नाम संयोग नहीं लगता। बाद की यौधेय मुद्राओं पर स्कंद का वाहन मोर बार-बार आता है। रोहीतक, कार्तिकेय और मोर, तीनों एक ही कथा में बँध जाते हैं।
यह केवल साहित्यिक स्मृति नहीं है। बौद्ध ग्रंथ महामायूरी भी रोहीतक को कार्तिकेय-कुमार की प्रसिद्ध भूमि कहती है। दो अलग परंपराएँ एक ही बात दोहराती हैं। यह नगर युद्ध-देवता का प्रिय निवास था। यौधेयों ने बाद में जिसे अपने राज्य-देवता के रूप में मुद्रा पर उतारा, उसकी जड़ इसी भूमि में पहले से गड़ी हुई थी।
बहूधान्यक नाम स्वयं एक आर्थिक सत्य है। घग्गर और यमुना के बीच की पट्टी, पुरानी सरस्वती की स्मृति वाली यह भूमि, किसान और सैनिक दोनों को पाल सकती थी। शस्त्र से जीने वाला गण भी अन्नागार के बिना नहीं टिकता। यौधेय केवल तलवार की जाति नहीं थे। वे धान्य की जाति भी थे। इसीलिए उनकी प्रारंभिक मुद्राओं पर बैल बार-बार आता है। बैल प्रायः वेदिका या बलि-स्तंभ के सामने खड़ा है। पीछे हाथी है, नन्दिपद है, पताका है। एक ओर यज्ञ और कृषि है। दूसरी ओर राज्य और शक्ति है। अनाज और युद्ध एक ही चक्र पर साथ चलते हैं।
मुद्राओं का लेख इस पहचान को और पक्का करता है। प्रारंभिक ताम्र मुद्राओं पर लिखा मिलता है: यौधेयानां बहूधान्यके। अर्थात बहूधान्यक के यौधेयों की मुद्रा। यह छोटा सा वाक्य बड़े अर्थ रखता है। गण अपने को किसी अमूर्त आकाश से नहीं जोड़ता। वह अपने को एक ठोस देश से जोड़ता है। देश का नाम धान्य है। जाति का नाम योद्धा है। दोनों मिलकर यौधेय पहचान बनाते हैं।
सन् 1936 में वनस्पतिशास्त्री और पुरातत्त्ववेत्ता बीरबल साहनी ने खोखराकोट के टीलों की जाँच की। उन्हें राजसिंहासन या सोने का कोष नहीं मिला। उन्हें कुछ अधिक ईमानदार वस्तु मिली। हजारों खंडित मिट्टी के साँचे मिले, जिनसे यौधेय मुद्राएँ ढाली जाती थीं। उन साँचों ने पुरानी पढ़त को पुष्ट किया। बहूधान्यक कोई कल्पित नाम नहीं था। टकसाल उसी भूमि में थी, जिसका नाम मुद्रा पर लिखा था। एक टीला एक पूरे गण की कार्यशाला बन गया।
खोखराकोट केवल टकसाल नहीं था। वहाँ मुहरें, टेराकोटा मूर्तियाँ, मृद्भांड और बाद के काल की वस्तुएँ भी मिलीं। टीलों की परतें बताती हैं कि यह स्थल बहुत प्राचीन है। महाभारत-युग से जुड़े चित्रित धूसर मृद्भांड की चर्चा भी इसी क्षेत्र से जुड़ती है। नगर एक रात में नहीं बसा। वह शताब्दियों तक जिया। कुषाण दबाव के समय इसका कुछ भाग छूटता दिखता है, पर दक्षिण हिस्सा आबाद रहता है। बाद में भी जीवन चलता रहता है। राजधानी कभी पूरी तरह निर्जन शिविर नहीं बनी। वह घर रही।
रोहतक के आसपास की भूमि यौधेय शक्ति का पहला घेरा थी। हिसार, सिरसा, हांसी, सोनीपत और पानीपत उसी पट्टी के नाम हैं। ये बाद के प्रशासनिक जिले नहीं, प्राचीन संचार और कृषि के पड़ाव हैं। नौरंगाबाद से मिली एक मिट्टी की मुहर रोहित-यौधेय जनपद की बात करती है। इससे लगता है कि रोहीतक के लोग आवश्यकता पड़ने पर दूसरा कार्यकारी केंद्र भी चला सकते थे। गण एक दीवार के भीतर बंद नगर-राज्य नहीं था। वह एक जनपद था। भूमि बदल सकती थी, नाम नहीं।
पश्चिम और दक्षिण में यह भूगोल घग्गर के गलियारे से हनुमानगढ़ और रंग महल तक फैलता है। उत्तर में सुनैत जैसे स्थल बाद में बड़ी टकसाल बनते हैं। पर मूल कथा रोहतक से शुरू होती है। बहूधान्यक हृदय है। शेष पट्टी उसकी साँस है।
इस पवित्र भूगोल का अर्थ केवल नक्शा नहीं है। यह एक दृष्टि है। यौधेय अपनी भूमि को देवता से जोड़ते थे। महाभारत रोहीतक को कार्तिकेय-प्रिय कहता है। मुद्राएँ उसी देवता को गण का स्वामी बनाती हैं। धान्य की भूमि युद्ध-देवता की भूमि भी है। किसान का खेत और योद्धा का अखाड़ा एक ही मिट्टी पर खड़े हैं। इसीलिए यह भूगोल पवित्र है। इसमें मंदिर की घंटी भी है और टकसाल की ठक-ठक भी।
आज रोहतक के खेत और टीले चुप लगते हैं। पर मिट्टी अब भी बोलती है। कभी एक किसान को तांबे की छोटी मुद्रा मिल जाती है। कभी साँचे का टुकड़ा हाथ लगता है। उस टुकड़े पर बहूधान्यक का पुराना गर्व चिपका रहता है। प्रचुर धान्य की भूमि ने अपने योद्धाओं को खिलाया। योद्धाओं ने उस भूमि को शस्त्र से बचाया। दोनों ने मिलकर कार्तिकेय के प्रिय देश को इतिहास में जीवित रखा।

कार्तिकेय, गण के स्वामी
उत्तर भारत के प्राचीन गणों में यौधेय अकेले ऐसे नहीं थे जिन्होंने किसी देवता की पूजा की। पर वे उन गिने-चुने समुदायों में थे जिन्होंने एक देवता को अपने राज्य का स्वामी बना दिया। वह देवता कार्तिकेय थे। स्कंद, कुमार, महासेन, ब्रह्मण्यदेव, ये सब एक ही दिव्य सेनापति के नाम हैं। यौधेयों ने उन्हें केवल घर का इष्ट नहीं माना। उन्होंने उन्हें गण का संप्रभु घोषित किया।
मुद्राएँ इस बात की सबसे स्पष्ट गवाही हैं। कुछ मुद्राओं पर कार्तिकेय एकमुख खड़े हैं। हाथ में लंबा भाला है। चरणों के पास मोर है। यह रूप सरल और तेजस्वी है। सेनापति सीधे रणक्षेत्र में खड़ा दिखता है। कुछ मुद्राओं पर वे षण्मुख हैं। छह मुख का अर्थ केवल अलंकरण नहीं। इसका अर्थ है हर दिशा पर दृष्टि। यौधेय जब अपने देवता को छह मुखों वाला बनाते हैं, तो वे कह रहे होते हैं कि उनका रक्षक पूरे क्षितिज को देखता है। कोई दिशा अंधेरे में नहीं रहती।
लेख और भी साहसिक हैं। एक रजत मुद्रा और कई ताम्र मुद्राओं पर पाठ लगभग इस भाव का है: ब्रह्मण्य, यौधेयों के दिव्य स्वामी। दूसरी जगह कुमार को ब्रह्मण्यदेव कहा गया है। यहाँ देवता केवल पूज्य नहीं। वे स्वामी हैं। भगवत-स्वामी। गण के ऊपर बैठा दिव्य अधिपति। यह राजनीतिक धर्म है। वंशगत राजा के अभाव में गण को केंद्र चाहिए था। यौधेयों ने वह केंद्र स्कंद में रखा। मुद्रा जारी करने का अधिकार मानो उसी के नाम पर चल रहा था।
महाभारत पहले से इस संबंध की भूमि तैयार कर चुका था। रोहीतक को कार्तिकेय-प्रिय कहा गया। नकुल जब उस देश पर चढ़ाई करता है, तो महाकाव्य स्पष्ट लिखता है कि वह भूमि देवताओं के सेनापति को प्रिय है। समृद्ध है, गौ-धान्य से भरी है। मत्तमयूरकों से युद्ध होता है। मोर का संकेत फिर आ जाता है। यौधेय मुद्राओं का मोर अचानक नहीं आया। वह उसी प्राचीन स्मृति का विस्तार है। भूमि देवता की थी। जाति उसी भूमि की थी। अतः देवता जाति का स्वामी बना।
बाद की कार्तिकेय-देवसेना मुद्राएँ इस भक्ति को और लोकप्रिय रूप देती हैं। कार्तिकेय सामने खड़े हैं। भाला बाएँ या दाएँ हाथ में। मोर साथ में। चारों ओर लेख: यौधेय गणस्य जय। पीछे देवी खड़ी हैं। उन्हें प्रायः देवसेना माना जाता है, स्कंद की पत्नी। कुछ विद्वान उन्हें लक्ष्मी या षष्ठी से भी जोड़ते हैं। जो भी हो, चित्र स्पष्ट है। युद्ध का देवता और शुभ का प्रतीक एक ही मुद्रा पर साथ हैं। शस्त्र और कल्याण एक चक्र में बँधे हैं।
यह भक्ति निजी नहीं थी। यह सार्वजनिक थी। किसान जब ऐसी मुद्रा हाथ में लेता था, तो वह केवल मूल्य नहीं ले रहा था। वह गण की घोषणा ले रहा था। व्यापारी जब उसे बाजार में चलाता था, तो वह यौधेय पहचान को दूर तक पहुँचा रहा था। शत्रु जब उसे लूट में पाता था, तो वह जानता था कि यह जाति स्कंद के नीचे लड़ती है। मुद्रा धर्म का वाहन भी थी और राजनीति का औजार भी।
कार्तिकेय का चुनाव संयोग नहीं था। वे युद्ध के देवता हैं। देवसेना के नायक हैं। तारकासुर जैसे असुरों के संहारक हैं। यौधेय स्वयं आयुधजीवी थे। शस्त्र उनकी आजीविका और धर्म दोनों था। अतः उनका आराध्य भी शस्त्रधारी होना चाहिए था। शिव के पुत्र, कृत्तिकाओं के लाल, अग्नि और गंगा की कथाओं से जुड़े कुमार, ये सब तत्व मिलकर एक ऐसा रूप देते हैं जो गृहस्थ को भी स्वीकार हो और योद्धा को भी। सनातन दृष्टि में युद्ध और भक्ति अलग-अलग नहीं चलते। यौधेय मुद्राएँ इसी एकता को धातु में ढालती हैं।
ब्रह्मण्यदेव नाम विशेष ध्यान खींचता है। ब्रह्मण्य का संबंध ब्रह्मचर्य, तप और दिव्य शुद्धता से भी जुड़ता है। कुमार ब्रह्मचारी देवता माने जाते हैं। यौधेय जब उन्हें ब्रह्मण्यदेव कहते हैं, तो वे केवल वीरता नहीं माँग रहे होते। वे संयम, तेज और धर्मयुक्त शक्ति भी माँग रहे होते हैं। क्षत्रिय धर्म केवल मारने का नहीं। रक्षा और व्यवस्था का भी है। कार्तिकेय दोनों को एक साथ रखते हैं।
कुषाण काल में जब विदेशी दबाव बढ़ा, तो यही देवता और अधिक केंद्र में आ गए। षण्मुख रूप का उभार संकट की भाषा लगता है। जब मैदान असुरक्षित हुए, गण ने अपने रक्षक को और स्पष्ट, और व्यापक रूप में मुद्रा पर बिठाया। बाद में जब कुषाण शक्ति पीछे हटी, तो कार्तिकेय फिर जय के नारे के साथ लौटे। यौधेय गणस्य जय। विजय अब गण की थी, और गण का स्वामी स्कंद था।
इस प्रकार कार्तिकेय यौधेय इतिहास में केवल पूजा की वस्तु नहीं रह जाते। वे संविधान का शीर्ष बन जाते हैं। कोई मानव राजा उनके ऊपर नहीं। सभा हो सकती है। महासेनापति चुना जा सकता है। पर अंतिम स्वामित्व दिव्य है। यही कारण है कि उनकी मुद्राएँ आज भी बोलती हैं। एक छोटे तांबे के टुकड़े पर खड़ा युवा देवता आज भी भाला थामे हुए है। मोर उसके चरणों में है। छह मुख या एक मुख, दृष्टि वही है। वह दृष्टि यौधेय गण की रक्षा करती रही। और जब गण इतिहास के पृष्ठों में विलीन हो गया, तब भी वह दृष्टि मुद्राओं में सुरक्षित रह गई।
कार्तिकेय, गण के स्वामी। यह उपाधि केवल धार्मिक नहीं। यह यौधेय अस्मिता का सार है। भूमि बहूधान्यक की। नाम योद्धा का। जय गण की। और स्वामी स्कंद के। चारों सूत्र एक ही भक्ति में बँधे हैं।
वह जाति जो झुकी नहीं
यौधेय खतरनाक सीमा पर रहते थे। मौर्यों के दुर्बल होने के बाद इंडो-यवन राजा पूर्व की ओर बढ़े। फिर शक आए। फिर कुषाणों ने मध्य एशिया से गंगा के मैदान तक साम्राज्य खड़ा किया।
यौधेय लुप्त नहीं हुए। जब आवश्यक हुआ, झुके। जब अवसर मिला, फिर उठे।
ईसा पूर्व दूसरी-पहली शताब्दी की प्रारंभिक बैल-हाथी मुद्राएँ बहूधान्यक की उस स्वतंत्रता की हैं जो मौर्य पतन के बाद मिली। शक और कुषाण दबाव बढ़ने पर चित्र बदलता है। षण्मुख कार्तिकेय अधिक दृढ़ता से आते हैं। कुछ मुद्राएँ गढ़वाल की सुरक्षित पहाड़ियों से जुड़ी मानी जाती हैं, संभव शरण जब मैदान पर विदेशी नियंत्रण अधिक था।
वे सदा विजयी नहीं रहे। लगभग 150 ईस्वी में पश्चिमी क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम ने जूनागढ़ के गिरनार शिलालेख में अपना प्रशस्ति-लेख खुदवाया। परिष्कृत संस्कृत में वे अपनी विजयों की सूची देते हैं। फिर यौधेयों तक पहुँचते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने बलपूर्वक उन यौधेयों का नाश किया जो समर्पण नहीं करना चाहते थे, क्योंकि वे सभी क्षत्रियों में वीर कहलाने के गर्व से भरे थे।
इस पंक्ति को दो बार पढ़िए। एक शक महाक्षत्रप, अपनी महिमा लिखते हुए भी, उन्हें सभी क्षत्रियों में वीर कहने को बाध्य है। वे स्वीकार करते हैं कि यौधेय सरलता से नहीं झुके। प्रशंसा विजय के दंभ में लिपटी है, फिर भी प्रशंसा बनी रहती है। किसी शत्रु से ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी सम्मान-उक्ति कम जातियों को मिली।
यौधेय उस आघात के बाद भी जीवित रहे। तीसरी शताब्दी में कुषाण शक्ति पीछे हटी तो वे मैदान में पूरे बल से लौटे। इतिहासकार देखते हैं कि उत्तरवर्ती कुषाण राजाओं की मुद्राएँ सतलुज के पूर्व दुर्लभ हैं, जबकि कार्तिकेय-देवसेना शैली की उत्तरकालीन यौधेय ताम्र मुद्राएँ पुरानी मातृभूमि में भर जाती हैं। सोनीपत, हिसार, हांसी, खोखराकोट और अनेक स्थलों से निधियाँ मिली हैं। गण ने अपने खेत वापस ले लिए थे।
उनकी सैन्य ख्याति कवि की कल्पना नहीं थी। इसी कारण रुद्रदामन ने उन्हें उल्लेख के योग्य समझा। इसी कारण उनकी मुद्राएँ पूरे गण के नाम पर जय पुकारती हैं।
शक्ति की विस्तृत पट्टी
रोहतक से यौधेय उपस्थिति सिंचित फसल की तरह फैली।
हरियाणा में उनकी मुद्राएँ और साँचे रोहतक, हिसार, सिरसा, हांसी, सोनीपत और पानीपत को चिह्नित करते हैं। पट्टी पंजाब में जाती है। लुधियाना के निकट सुनैत से उत्तरकालीन मुद्रा-श्रृंखला के हजारों मिट्टी के साँचे और मुहरें मिलीं। वह स्थल दूसरी बड़ी टकसाल और प्रशासनिक केंद्र लगता है। खोजें उत्तर में कांगड़ा तथा पूर्व में सहारनपुर और देहरादून तक पहुँचती हैं।
पश्चिम और दक्षिण में यह मार्ग उत्तरी राजस्थान तक चलता है। हनुमानगढ़ और रंग महल क्षेत्र घग्गर के उसी प्राचीन गलियारे पर बैठे हैं। मुद्रा-वितरण भटनेर, अबोहर और यहाँ तक कि मुल्तान पट्टी की ओर भी जाता है। यह गण छोटा नगर-राज्य नहीं था। यह यमुना के निकट से सतलुज और मरुस्थल की किनारी तक फैली क्षत्रिय पट्टी था।
नौरंगाबाद की एक मिट्टी की मुहर रोहित-यौधेय जनपद की बात करती है और संकेत देती है कि रोहतक के लोग आवश्यकता पड़ने पर कार्यकारी राजधानी बदल सकते थे। लचीलापन गण का गुण है। जब खोखराकोट पर साम्राज्य का ताप बढ़ा, दूसरा नगर नाम और टकसाल दोनों सँभाल सका।
बाद की स्मृति ने इस पट्टी को जोहिया राजपूतों से जोड़ा, जो सतलुज के दोनों तटों और कभी जोहियाबार कहे गए देश में रहे। अनेक विद्वान इस नाम को यौधेयवार से जोड़ते हैं। अलेक्जेंडर क Cunningham ने नाम, भूगोल और कुछ मुद्राओं पर अंकित द्वि तथा त्रि के संकेत से यह संबंध बताया। यह पहचान परंपरा है, अदालती प्रमाण नहीं। फिर भी ऐसी परंपराएँ मायने रखती हैं। वे बताती हैं कि गण की मुद्राएँ बंद होने के बहुत बाद भी एक जाति ने योद्धा नाम जीवित रखा।
गण कैसे चलता था
गण भीड़ नहीं होता। वह संगठित जनता होता है।
यौधेय मुद्राएँ प्रायः किसी व्यक्तिगत नरेश की महिमा नहीं गातीं। वे गण की महिमा गाती हैं। यही धातु में लिखा संविधान है। शक्ति सामूहिक मानी गई।
नेतृत्व फिर भी था। भरतपुर क्षेत्र के बिजयागढ़ प्रस्तर अभिलेख में, प्रारंभिक लिपि में, यौधेय गण के नेता के रूप में चुने गए एक महाराज महासेनापति का उल्लेख है। दोहरा विरुद अर्थपूर्ण है। महाराज गरिमा देता है। महासेनापति, सेना का महान नायक, बताता है कि वास्तविक अधिकार कहाँ था। शीर्ष पर बैठा व्यक्ति पहले सेनापति था।
सुनैत की मुहरें उन यौधेयों की बात करती हैं जो जयमंत्रधरा हैं, विजय की मंत्रणा धारण करने वाले। इस वाक्य में परिषद की गंध है, समिति की गंध है, वे पुरुष जो युद्ध और नीति साथ सोचते थे। के. पी. जायसवाल और बाद के विद्वानों ने ऐसे शब्दों में पुरानी भारतीय सभा-परंपरा देखी, सेनापति के साथ चलती समिति या परिषद।
शस्त्र और कृषि का संतुलन व्यावहारिक था। प्रारंभिक मुद्राओं पर बलि-स्तंभ के निकट बैल और राज्य-शक्ति का हाथी है। जो जाति अपने देश को बहूधान्यक कहे, वह केवल लूट पर नहीं जी सकती। उन्होंने अनाज पर कर लिया, तांबा बड़ी मात्रा में ढाला, और एक से अधिक नगरों में टकसाल रखी। खोखराकोट और सुनैत में मुद्रा-साँचों का व्यापक उत्पादन कामकाजी प्रशासन दर्शाता है, छापामार शिविर नहीं।
उन्होंने सोना लगभग नहीं चलाया और चाँदी बहुत कम। तांबा जनता की धातु था। यह भी कृषक-योद्धा गण के अनुकूल है, विलासी राजसभा के नहीं।
धर्म ने इस यंत्र को बाँधे रखा। यदि ब्रह्मण्यदेव स्वामी हैं, तो प्रत्येक सभा-निर्णय स्कंद के नीचे खड़ा है। मुद्रा का भाला शस्त्र भी है और संकल्प भी।
जाति का उत्तर जीवन
साम्राज्य उन राजाओं को पसंद करते हैं जिन्हें सूची में लिखा जा सके। चौथी शताब्दी में मगध से गुप्त लहर उठी। समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तंभ लेख में, हरिषेण द्वारा रचित, यौधेयों का नाम उन सीमांत जातियों में है जिन्होंने कर दिया, आदेश माने और प्रणाम करने आए। वे उस सूची में मालव, आर्जुनायन, मद्रक और अन्य के साथ खड़े हैं।
शब्दावली सावधानी भरी है। यह नहीं कहती कि गण मिट गया। यह कहती है कि महान गुप्त ने उनकी प्रभुसत्ता स्वीकार कराई। उस गर्वीले गण के लिए, जिसे कभी सभी क्षत्रियों में वीर कहा गया था, यह स्वतंत्रता की समाप्ति का आरंभ था।
उत्तरवर्ती गुप्तों के अधीन पुराने टकसाल-नगर धीरे-धीरे चरित्र बदलते गए। विशिष्ट यौधेय मुद्राएँ फीकी पड़ती गईं। लोग एक रात में गायब नहीं हुए। वे बड़े साम्राज्य-क्रम में समाहित हो गए, जैसा उत्तर के अनेक गणों के साथ हुआ। कार्तिकेय का भाला भारतीय धर्म से नहीं गया। वह मंदिर, घर और बाद के राजकीय पूजा-क्रम में चला गया। राजनीतिक गण की अलग आवाज समाप्त हो गई।
स्मृति हठधर्मी होती है। सतलुज प्रदेश में जोहिया नाम ने उन्हीं नदियों और रेत के साथ योद्धा पहचान रखी। हरियाणा में स्थानीय कुल और मौखिक इतिहास आज भी प्राचीन क्षत्रिय मूल की बात करते हुए पुराने गण तक पहुँचते हैं। खेतों से मुद्राएँ अब भी निकलती हैं। सोनीपत या हिसार का किसान कभी-कभी मिट्टी से छोटा ताम्र स्कंद उठा लेता है और जाने बिना प्राचीन गण का एक मत अपने हाथ में पकड़ लेता है।
यौधेय एक शांत पाठ पढ़ाते हैं। किसी जाति को अभिलेख में पराजित कहा जा सकता है, चरित्र में नहीं। रुद्रदामन को उन्हें वीर कहना पड़ा। समुद्रगुप्त को उन्हें सूची में रखना पड़ा। रोहतक की मिट्टी आज भी उनके साँचे देती है।
कनिष्क की धार्मिक नीति
कनिष्क कुषाण साम्राज्य के सबसे प्रसिद्ध शासक थे। उनकी धार्मिक नीति का सार एक शब्द में कहा जा सकता है: उदार सहिष्णुता के साथ बौद्ध धर्म का विशेष संरक्षण। वे किसी एक धर्म के कट्टर अनुयायी मात्र नहीं थे। वे एक विशाल, बहु-सांस्कृतिक साम्राज्य के सम्राट थे। इसलिए उनकी नीति में कई परंपराएँ साथ-साथ चलती दिखती हैं।
बौद्ध धर्म का विशेष संरक्षण
बौद्ध परंपरा में कनिष्क को अशोक के बाद बौद्ध धर्म के सबसे बड़े शाही संरक्षक के रूप में याद किया जाता है। परंपरा के अनुसार उन्होंने कश्मीर के कुण्डलवन विहार में चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन कराया। कुछ स्रोतों में जालंधर या गांधार का भी उल्लेख आता है। अध्यक्ष वसुमित्र थे। अश्वघोष जैसे विद्वान भी इससे जुड़े बताए जाते हैं। लगभग पाँच सौ भिक्षुओं ने भाग लिया।
इस संगीति का मुख्य कार्य सर्वास्तिवाद अभिधर्म की व्याख्या और सिद्धांतों का संकलन था। महाविभाषा जैसे विशाल टीका-ग्रंथ इसी प्रक्रिया से जुड़े माने जाते हैं। संस्कृत भाषा को महत्व मिला। महायान धारा के विकास और प्रसार में भी इस काल की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। कनिष्क ने स्तूप और विहार बनवाए। पेशावर के पास शाहजी-की-ढेरी का विशाल स्तूप और कनिष्क पेटिका इसी संरक्षण की याद दिलाते हैं।
क्या कनिष्क स्वयं बौद्ध हो गए थे? बौद्ध ग्रंथ उन्हें धर्मानुरागी और संरक्षक बताते हैं। आधुनिक विद्वान अधिक सावधानी बरतते हैं। वे कहते हैं कि कनिष्क ने बौद्ध धर्म को राज्याश्रय दिया, पर साम्राज्य की आधिकारिक धार्मिक भाषा पूरी तरह बौद्ध नहीं थी।
मुद्राओं पर बहुदेवतावाद
कनिष्क की मुद्राएँ उनकी नीति की सबसे जीवंत तस्वीर हैं। एक ओर सम्राट मध्य एशियाई वेश में खड़े दिखते हैं। दूसरी ओर दर्जनों देवता आते हैं।
- ईरानी परंपरा से: नाना, मिहिर (मिथ्र), माओ, आतश, और अन्य।
- यूनानी परंपरा से: हेलियोस, सेलेने जैसे नाम।
- भारतीय परंपरा से: ओएशो (शिव), स्कंद-कुमार, विशाख, और बुद्ध (बोद्दो)।
बाद में शाक्यमुनि बुद्ध और मैत्रेय जैसे रूप भी आते हैं।
यह मिश्रण संयोग नहीं था। कुषाण साम्राज्य ईरानी, यूनानी, भारतीय और मध्य एशियाई संस्कृतियों का संगम था। मुद्रा पर कई देवताओं को स्थान देकर कनिष्क विभिन्न प्रजा और व्यापारिक समुदायों को संबोधित कर रहे थे। राजत्व को एक नहीं, अनेक दिव्य स्रोतों से जोड़ा जा रहा था।
रबतक अभिलेख का महत्व
1993 में अफगानिस्तान के रबतक से मिला बैक्ट्रियन भाषा का अभिलेख कनिष्क की धार्मिक दृष्टि को और स्पष्ट करता है। इसमें कहा गया है कि कनिष्क को नाना और सभी देवताओं से राज्य प्राप्त हुआ। वे एक मंदिर बनवाते हैं जिसमें पूर्वजों की मूर्तियाँ और कई देवताओं की मूर्तियाँ रखी जानी थीं। सूची में नाना, उम्मा, अहुरमज्द, स्रोशर्द (जिसे भारतीय भाषा में महासेन और विशाख कहा गया), नरसा और मिहिर आदि आते हैं।
यहाँ दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली, राजत्व का स्रोत ईरानी-बैक्ट्रियन देवमंडल से जुड़ा है। दूसरी, स्कंद-महासेन को भी इस सूची में स्थान मिला है। यौधेय जैसे गण जो कार्तिकेय को अपना स्वामी मानते थे, उसी देवता को कुषाण शाही सूची में भी देखा जा सकता है। संपर्क और संवाद का यह संकेत महत्वपूर्ण है।
सहिष्णुता की व्यावहारिक नीति
कनिष्क की नीति को धार्मिक उदारता कहना सही है, पर यह उदारता राजनीतिक भी थी। विशाल साम्राज्य में एक धर्म थोपना असंभव था। रेशम मार्ग के व्यापार, विभिन्न जातियों और पुरानी स्थानीय परंपराओं को साथ रखना जरूरी था। बौद्ध धर्म को विशेष प्रोत्साहन मिला क्योंकि वह अंतरराष्ट्रीय था, नगरों और व्यापार से जुड़ा था, और मध्य एशिया से चीन तक फैलने में सक्षम था। साथ ही शिव, स्कंद, नाना और मिथ्र को मुद्रा और मंदिरों में जगह देकर स्थानीय और ईरानी भावनाओं का सम्मान भी किया गया।
कला पर प्रभाव
गांधार कला का विकास इसी वातावरण में हुआ। ग्रीक शिल्प-शैली में बुद्ध और बोधिसत्त्व की मूर्तियाँ बनीं। कनिष्क काल को महायान मूर्तिकला और स्तूप-निर्माण का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। धार्मिक नीति केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रही। वह पत्थर, धातु और चित्र में उतर आई।
संक्षेप में
कनिष्क की धार्मिक नीति तीन स्तंभों पर खड़ी थी।
- एक, बौद्ध धर्म का सक्रिय संरक्षण, चौथी संगीति, स्तूप-विहार और महायान के प्रसार में योगदान।
- दो, मुद्राओं और अभिलेखों में बहुदेवतावादी सहिष्णुता, जिसमें ईरानी, यूनानी और भारतीय देवता साथ हैं।
- तीन, राजत्व को दिव्य वैधता देने का व्यावहारिक उपयोग, जिसमें नाना सहित कई देवताओं से राज्य-प्राप्ति का दावा किया गया। वे शुद्ध बौद्ध सम्राट नहीं थे, न ही किसी एक पंथ के प्रचारक। वे एक साम्राज्य-निर्माता थे जिन्होंने धर्म को एकता और स्थिरता का साधन बनाया। इसी नीति ने कुषाण काल को धार्मिक दृष्टि से असाधारण रूप से मिश्रित और जीवंत बना दिया।
गांधार कला की शैलीगत विशेषताएँ
गांधार कला की शैली यूनानी-रोमन यथार्थवाद और भारतीय बौद्ध भाव का मिश्रण है। इसमें शरीर की बनावट, वस्त्र, चेहरा और रचना-विधि में कुछ स्पष्ट लक्षण बार-बार दिखाई देते हैं।
- यथार्थवादी शरीर-रचना: मूर्तियाँ वास्तविक मानव अनुपात के करीब होती हैं। मांसपेशियाँ, हड्डियों की संरचना और अंगों का संतुलन ध्यान से उकेरा जाता है। खड़े या बैठे बुद्ध और बोधिसत्त्व में शरीर भारी या स्थूल नहीं, बल्कि सुगठित और प्राकृतिक लगता है। यूनानी कंट्रापोस्टो जैसी मुद्रा भी मिलती है, जिसमें वजन एक पैर पर होता है और शरीर में हल्का मोड़ आता है।
- वस्त्र और तहें: गांधार शैली की सबसे पहचानी जाने वाली बात चीवर या वस्त्र की गहरी, लहरदार तहें हैं। ये तहें ग्रीक हिमेटियन या रोमन टोगा की याद दिलाती हैं। कपड़ा शरीर से चिपकता नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से लटकता और मुड़ता दिखता है। कंधे, बाँह और पैरों पर तहों का प्रवाह बहुत साफ और नियमित होता है।
- केश-सज्जा और मुखमुद्रा: बुद्ध के बाल प्रायः लहरदार या घुँघराले होते हैं। कभी-कभी वे अपोलो जैसी केश-रचना की ओर झुकते हैं। बाद में भारतीय ऊष्णीय (उष्णीष) और कर्ण भी स्पष्ट होते हैं। चेहरा शांत, ध्यानमग्न और कोमल होता है। आँखें आधी बंद या नीचे झुकी, होठ बंद, भाव करुणा और समाधि का। कुछ मूर्तियों में पश्चिमी अनुपात अधिक दिखता है, कुछ में भारतीय शांति अधिक।
- अनुपात और आदर्श सौंदर्य: शुरुआती चरण में यूनानी आदर्श सौंदर्य का प्रभाव मजबूत है। चेहरा अंडाकार, नाक सीधी, माथा चौड़ा। बाद की मूर्तियों में भारतीय तत्व बढ़ते हैं। बोधिसत्त्व मूर्तियों में राजसी आभूषण, मुकुट, हार और वस्त्र अधिक सजावटी हो जाते हैं। वे राजकुमार जैसे लगते हैं।
- राहत और कथा-चित्रण: गांधार में स्वतंत्र मूर्तियों के साथ-साथ कथात्मक राहत बहुत विकसित हुई। स्तूप की वेदिकाओं पर बुद्ध के जीवन और जातक कथाएँ क्रम से उकेरी जाती थीं। आकृतियाँ अपेक्षाकृत छोटी, पर विवरण भरपूर। पृष्ठभूमि में पेड़, भवन, पशु और दर्शक भी आ जाते हैं। रचना घनी होती है, खाली स्थान कम।
- सामग्री का प्रभाव: धूसर या नीले शिस्ट पत्थर पर बारीक नक्काशी संभव थी। इसलिए बाल, वस्त्र की तहें और आभूषण बहुत स्पष्ट बनते थे। बाद में स्टक्को (प्लास्टर) का उपयोग बढ़ा। स्टक्को से नरम और गोल रूप अधिक बने। रंग भी लगाए जाते थे, जिससे शैली और जीवंत होती थी।
- भाव और आध्यात्मिकता: यथार्थवादी शरीर के बावजूद अंतिम लक्ष्य आध्यात्मिक शांति है। बुद्ध की मूर्ति में शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि ध्यान और करुणा है। यह गांधार शैली को शुद्ध यूनानी मूर्ति से अलग करता है। तकनीक पश्चिमी है, आत्मा बौद्ध।
- समय के साथ परिवर्तन: प्रारंभिक चरण अधिक हेलेनिस्टिक है। कुषाण काल में शैली परिपक्व और मानक बनती है। बाद के चरण में रूप कुछ भारी और कम सूक्ष्म हो जाते हैं। स्टक्को काल में नरमपन बढ़ता है।
संक्षेप में
गांधार शैली की पहचान है: यथार्थवादी शरीर, गहरी वस्त्र-तहें, लहरदार केश, शांत मुखमुद्रा, कथात्मक राहतें और यूनानी तकनीक में बौद्ध भाव का समावेश। यही मिश्रण इसे भारतीय कला के इतिहास में अद्वितीय बनाता है।
गांधार कला और मथुरा कला में अंतर
गांधार और मथुरा कलाएँ लगभग एक ही काल (कुषाण युग) में फली-फूलीं, पर दोनों की शैली, सामग्री और भावना अलग-अलग हैं। नीचे प्रमुख अंतर दिए गए हैं।
- सांस्कृतिक प्रभाव: गांधार कला पर यूनानी-रोमन (हेलेनिस्टिक) प्रभाव बहुत गहरा है। शरीर, वस्त्र और अनुपात पश्चिमी यथार्थवाद से प्रभावित हैं। मथुरा कला मुख्य रूप से भारतीय परंपरा से निकली है। इसमें स्थानीय यक्ष-यक्षी, प्राचीन मूर्तिकला और भारतीय भाव अधिक हैं।
- सामग्री: गांधार में धूसर या नीला शिस्ट पत्थर और बाद में स्टक्को (प्लास्टर) प्रमुख था। मथुरा में चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर (रेड सैंडस्टोन) का उपयोग होता था। यह रंग और बनावट दोनों को अलग पहचान देता है।
- शरीर-रचना और अनुपात: गांधार मूर्तियाँ अधिक यथार्थवादी और सुगठित होती हैं। मांसपेशियाँ, अंग-प्रत्यंग और मुद्रा प्राकृतिक लगती हैं। मथुरा मूर्तियाँ अपेक्षाकृत स्थूल, गठीली और शक्तिशाली होती हैं। शरीर भरा-भरा और Native Indian अनुपात वाला दिखता है।
- वस्त्र और तहें: गांधार में चीवर की तहें गहरी, लहरदार और ग्रीक-रोमन वस्त्र जैसी होती हैं। कपड़ा स्वतंत्र रूप से लटकता है। मथुरा में वस्त्र शरीर से सटे हुए या हल्के संकेतित होते हैं। कभी-कभी लगभग पारदर्शी जैसा प्रभाव भी मिलता है।
- केश और मुखमुद्रा: गांधार बुद्ध के बाल लहरदार या घुँघराले होते हैं। चेहरा शांत, कभी-कभी अपोलो जैसा। मथुरा बुद्ध में ऊष्णीष अधिक स्पष्ट भारतीय शैली का होता है। चेहरा प्रायः प्रसन्न, कोमल और भारतीय लक्षणों वाला होता है।
- विषय और दायरा: गांधार कला लगभग पूरी तरह बौद्ध है। बुद्ध, बोधिसत्त्व और जातक-कथाएँ केंद्र में हैं। मथुरा कला बहुधर्मी है। बौद्ध के साथ जैन तीर्थंकर, हिंदू देवी-देवता, यक्ष-यक्षी और राजकीय मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में बनीं।
- भाव और अभिव्यक्ति: गांधार में ध्यान, करुणा और शांत समाधि का भाव प्रधान है। मथुरा में शक्ति, प्रसन्नता और लोक-जीवन की ऊर्जा अधिक झलकती है। यक्षी मूर्तियाँ इसकी अच्छी मिसाल हैं।
- कथात्मक राहत: गांधार में स्तूपों पर विस्तृत कथा-राहतें बहुत विकसित हुईं। मथुरा में स्वतंत्र मूर्तियाँ और प्रतीकात्मक रूप अधिक प्रमुख रहे, हालांकि राहतें भी बनीं।
- क्षेत्र: गांधार: उत्तर-पश्चिम (तक्षशिला, पेशावर, स्वात, पूर्वी अफगानिस्तान)। मथुरा: गंगा-यमुना दोआब का मथुरा क्षेत्र (उत्तर प्रदेश)।
दोनों शैलियों ने मिलकर कुषाण काल की मूर्तिकला को समृद्ध किया। गांधार ने बुद्ध को यथार्थवादी मानव रूप दिया। मथुरा ने उसे भारतीय आत्मा और विविधता दी। बाद की भारतीय कला दोनों से सीखकर आगे बढ़ी।
पाँच निष्कर्ष, एक चित्र
- पहला, वे नाम से और कर्म से क्षत्रिय थे। योद्धा कोई उपाधि नहीं थी जिसकी वे प्रतीक्षा करते। वह नाम था जो उन्होंने तांबे पर अंकित किया।
- दूसरा, वे गण थे। विजय गण की थी। उनका सर्वोच्च नश्वर अधिकारी चुना हुआ महासेनापति था, जन्मजात देव-राजा नहीं।
- तीसरा, उनकी राजधानी रोहीतक बहूधान्यक में थी, वह भूमि जिसे महाभारत पहले से कार्तिकेय-प्रिय और धान्य-संपन्न कहता है। खोखराकोट का पुरातत्त्व टकसाल और नाम दोनों सिद्ध करता है।
- चौथा, कार्तिकेय केवल निजी इष्ट नहीं थे। वे यौधेयों के दिव्य स्वामी थे। एक मुख या छह, भाला और मोर, लेख पर ब्रह्मण्यदेव: राज्य स्वयं स्कंद की छाया में खड़ा था।
- पाँचवाँ, वे सस्ते में नहीं झुके। यवन, शक और कुषाण उन पर दबाव डालते रहे। रुद्रदामन ने विजय का दावा किया और फिर भी उन्हें सभी क्षत्रियों में वीर कहना पड़ा। अवसर आने पर उन्होंने सतलुज तक शक्ति वापस धकेली। अंत में गुप्त साम्राज्य-व्यवस्था ने गण को बड़े मानचित्र में समेट लिया।
अंतिम चित्र संभालिए। घिसी हुई मुद्रा। युवा सेनापति के छह मुख। एक मोर। outer एक भाला। किनारे पर वह वाक्य जिसे सिंहासन की आवश्यकता नहीं: यौधेय जाति की विजय।
यही सनातन अर्थ में क्षत्रिय सम्मान है। शोर नहीं, क्रूरता नहीं, बल्कि यह संकल्प कि भूमि, अनाज, सभा और युद्ध-देवता साथ हैं। यौधेयों ने यह संकल्प इतने समय तक निभाया कि शिला, धातु और महाकाव्य उन्हें याद रख सके। रोहतक के खेतों में साँचे अब भी मिट्टी में प्रतीक्षा करते हैं, मानो गण केवल एक ऋतु के लिए चला गया हो और किसी दूसरे रूप में भाला फिर उठा लेगा।
यौधेय इतिहास के पन्नों में खो नहीं गए। वे मुद्राओं में, अभिलेखों में और भूमि की स्मृति में बचे रहे। उन्होंने दिखाया कि क्षत्रिय धर्म केवल सिंहासन से नहीं चलता। वह गण से, धान्य से और युद्ध-देवता की शरण से भी चल सकता है।
उनकी सबसे बड़ी सीख यही है। स्वतंत्रता दबाव में सिकुड़ सकती है, पर समाप्त नहीं होती। कार्तिकेय का भाला मुद्रा पर बना रहा। जय का नारा दबने के बाद फिर उठा। जब साम्राज्य आए, तब भी गण ने अपनी पहचान नहीं बेची।
आज रोहतक और आसपास के खेत आधुनिक हो चुके हैं। पर मिट्टी पुरानी है। उस मिट्टी से जब कभी तांबे का टुकड़ा निकलता है, तो वह केवल पुरावस्तु नहीं होता। वह एक संकल्प होता है। योद्धा होने का संकल्प। गण के साथ खड़े रहने का संकल्प। और स्कंद की दृष्टि में अपनी रक्षा देखने का संकल्प।
यौधेय चले गए। उनकी जय शेष है।
