भारत का वो ‘अदृश्य जासूस’ जिसकी पूरी जिंदगी सिर्फ दो तस्वीरें ही खींची जा सकीं, पाकिस्तान के दो टुकड़े करने वाले और ‘सिक्किम’ को भारत में मिलाने वाले RAW संस्थापक और रहस्यमयी स्पाईमास्टर ‘R.N. Kao’

आज की नौजवान पीढ़ी जब सिनेमाघरों में ‘टाइगर’, ‘पठान’ या हॉलीवुड के ‘जेम्स बॉन्ड’ को गोलियां चलाते हुए देखती है, तो खूब तालियां पीटती है।

हमें लगता है की जासूस ऐसे ही होते हैं- सिक्स पैक एब्स वाले, जो हर जगह धमाके करते घूमते हैं। लेकिन सच बताऊं ? ये सिर्फ पर्दे के नकली और खोखले हीरो हैं।

असल जिंदगी में जासूसी गोलियों के शोर से नहीं, बल्कि खामोशी से होती है। भारत की इसी धरती पर एक ऐसा असली ‘सुपरहीरो’ पैदा हुआ था, जो बंदूक से नहीं, बल्कि अपने शांत और शातिर दिमाग से दुनिया का भूगोल बदल देता था।

ज़रा सोचिए एक ऐसे इंसान के बारे में, जिसके बिछाए ख़ुफ़िया जाल में फंसकर पाकिस्तान आधा हो गया। जिसने दुनिया के नक्शे पर रातों-रात एक नया मुल्क खड़ा कर दिया।

जिसने बिना एक भी गोली चलाए पूरे के पूरे एक देश (सिक्किम) को भारत का राज्य बना दिया। लेकिन… इस इंसान का खौफ और रहस्यमयी अंदाज़ ऐसा था की उसकी पूरी जिंदगी में दुनिया उसकी सिर्फ दो तस्वीरें ही खींच पाई!

जी हाँ, सिर्फ दो तस्वीरें! जो इंसान दशकों तक भारत की सुरक्षा की सबसे मजबूत ढाल बना रहा, उसका चेहरा आज भी आम हिंदुस्तानी ठीक से नहीं पहचानता।

हम बात कर रहे हैं 10 मई 1918 को बनारस के एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे रामेश्वर नाथ काव (R.N. Kao) की।

दुनिया आज इन्हें भारत की सबसे खूंखार ख़ुफ़िया एजेंसी ‘रॉ’ (R&AW – Research and Analysis Wing) के संस्थापक और पहले चीफ के रूप में जानती है।

दुश्मनों के लिए वो साक्षात् काल थे और अपने दोस्तों व जूनियर अफसरों के लिए वो महज़ ‘रामजी’ थे। चलिए आज भारत के इस ‘द जेंटलमैन स्पाईमास्टर’ की उस गुमनाम जिंदगी के पन्ने पलटते हैं।

1962 और 1965 की वो इंटेलिजेंस विफलता जिसने इंदिरा गांधी को भारत की सबसे खूंखार एजेंसी ‘RAW’ बनाने पर मजबूर किया

कहानी की शुरुआत होती है 1960 के दशक से। उस वक्त भारत के पास बाहर और अंदर की ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने के लिए सिर्फ एक ही एजेंसी हुआ करती थी- इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB)।

लेकिन 1962 में जब चीन ने पीठ में छुरा घोंपा और हम युद्ध हार गए, तो भारत सरकार को एक बहुत बड़ा झटका लगा।

आईबी (IB) को चीन की इस नापाक हरकत की रत्ती भर भी भनक नहीं लगी थी। इसके ठीक तीन साल बाद, 1965 में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ, तब भी क्रॉस-बॉर्डर इंटेलिजेंस (सीमा पार की ख़ुफ़िया जानकारी) के मामले में हमारा सिस्टम बुरी तरह फेल साबित हुआ।

हमें पता ही नहीं चलता था की दुश्मन अपने कैंप में बैठकर हमारे खिलाफ क्या खिचड़ी पका रहा है।

उस वक्त देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह बात बहुत अच्छी तरह समझ आ गई थी की अगर भारत को एक महाशक्ति बनना है, तो हमें एक ऐसी ख़ुफ़िया एजेंसी चाहिए जो देश के बाहर, दुश्मनों के घर में घुसकर उनकी नींदें हराम कर सके।

उन्हें एक ऐसा तेज़तर्रार और शातिर दिमाग चाहिए था जो इस नई ख़ुफ़िया एजेंसी की नींव रख सके। इंदिरा गांधी की नज़र जाकर रुकी रामेश्वर नाथ काव पर। काव साहब उस समय इंटेलिजेंस ब्यूरो में ही एक बेहद काबिल अफसर थे और अपनी गज़ब की कार्यशैली के लिए जाने जाते थे।

इंदिरा गांधी ने उन्हें बुलाया और विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसी बनाने का जिम्मा सौंप दिया। काव साहब ने बिना कोई शोर-शराबा किए काम शुरू किया और 21 सितंबर 1968 को मात्र 250 कर्मचारियों के एक छोटे से स्टाफ के साथ ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (RAW) की स्थापना कर दी।

शुरुआत में किसी ने इस नई एजेंसी को ज्यादा भाव नहीं दिया। पाकिस्तान और चीन को लगा की ये बस कोई छोटा-मोटा सरकारी विभाग होगा।

लेकिन उन्हें कहां पता था की आर. एन. काव ने जिस ‘रॉ’ की नींव रखी है, वो आने वाले चंद सालों में दक्षिण एशिया का पूरा इतिहास हमेशा के लिए बदलकर रख देगी।

बिना वर्दी पहने पाकिस्तान के दो टुकड़े करने वाला वो मास्टरमाइंड R.N. Kao जिसने रातों-रात बना दिया नया मुल्क ‘बांग्लादेश’

रॉ को बने हुए मुश्किल से तीन साल ही हुए थे की आर. एन. काव ने अपना असली जलवा दिखा दिया। 1971 का युद्ध इतिहास में भारत की सबसे बड़ी सैन्य जीतों में से एक माना जाता है।

हम सब जानते हैं की हमारी बहादुर फौज ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था। लेकिन क्या आप जानते हैं की युद्ध के मैदान में गोली चलने से बहुत पहले ही, एक ख़ुफ़िया जंग लड़ी जा चुकी थी और उस जंग के अकेले सिकंदर काव साहब थे!

1971 के युद्ध की औपचारिक शुरुआत दिसंबर में हुई थी, लेकिन काव साहब का दिमाग सालों आगे चल रहा था। उन्होंने बहुत पहले ही भांप लिया था की पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में बगावत की आग भड़कने वाली है।

पश्चिमी पाकिस्तान के तानाशाह अपनी ही बंगाली जनता पर जुल्म ढा रहे थे। काव साहब ने इस मौके को भारत के पक्ष में भुनाने का ऐसा खौफनाक प्लान बनाया की पाकिस्तानी जनरलों को भनक तक नहीं लगी।

काव साहब ने अपने ख़ुफ़िया एजेंटों को पूर्वी पाकिस्तान के चप्पे-चप्पे में बिछा दिया। उन्होंने भारतीय सेना के साथ मिलकर ‘मुक्ति वाहिनी’ (बांग्लादेशी लड़ाकों) को ऐसी घातक गुप्त ट्रेनिंग, हथियार और ख़ुफ़िया जानकारी दी कि पाकिस्तानी सेना अंदर ही अंदर खोखली हो गई।

यह शुद्ध रूप से एक ‘मनोवैज्ञानिक युद्ध’ था। काव साहब का ख़ुफ़िया नेटवर्क इतना तगड़ा और अभेद्य था की पाकिस्तानी जनरल बंद कमरों में जो भी रणनीति बनाते थे, उसकी रिपोर्ट अगले कुछ घंटों में सीधे काव साहब की टेबल पर पहुंच जाती थी।

पाकिस्तानियों को समझ ही नहीं आ रहा था की उनके हर दांव का भारत को पहले से कैसे पता चल जाता है! उन्हें भनक तक नहीं लगी की दिल्ली में बैठा एक शांत सा आदमी उनके सिस्टम की एक-एक ईंट निकाल रहा है।

नतीजा क्या हुआ? भारतीय सेना के दमखम और काव साहब की बिछाई हुई ख़ुफ़िया बिसात के आगे 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को नाक रगड़कर सरेंडर करना पड़ा।

बिना वर्दी पहने, बिना सीमा पर गए, आर. एन. काव ने पाकिस्तान का सबसे बड़ा घमंड तोड़ दिया। एक देश के दो टुकड़े कर दिए और दुनिया के नक्शे पर रातों-रात एक नया मुल्क ‘बांग्लादेश’ खड़ा कर दिया।

अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) जो उस वक्त पाकिस्तान का साथ दे रही थी, वो भी भौचक्की रह गई थी की आखिर भारत के इस जासूस ने उन्हें उनके ही खेल में कैसे मात दे दी!

एक भी गोली चलाए बिना ‘सिक्किम’ को भारत का 22वां राज्य बनाने वाला वो सीक्रेट मिशन जिसकी भनक चीन तक को नहीं लगी

पाकिस्तान के दो टुकड़े करने के बाद आर. एन. काव शांत नहीं बैठे। उनकी नज़रों में अब एक और बड़ा मिशन था, जो भारत की सुरक्षा के लिए सबसे ज़रूरी था।

बात 1970 के दशक की शुरुआत की है। उस समय सिक्किम भारत का पूरी तरह से हिस्सा नहीं था.. वह एक संरक्षित राज्य (Protectorate) था।

वहां के राजा, जिन्हें ‘चोग्याल’ (पाल्डेन थोंडुप नामग्याल) कहा जाता था, सिक्किम को एक अलग और आज़ाद देश बनाना चाहते थे।

और इस काम में उन्हें पर्दे के पीछे से भड़का रहा था हमारा सबसे बड़ा दुश्मन- चीन। चीन चाहता था की सिक्किम आज़ाद हो जाए ताकि वह वहां अपनी सेना बैठाकर भारत की गर्दन (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) पर कब्ज़ा कर सके।

इस खतरे को भांपते हुए 1972 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने सबसे भरोसेमंद सलाहकार पी.एन. हक्सर और काव साहब के साथ एक बेहद ख़ुफ़िया मीटिंग की।

इंदिरा ने काव साहब से पूछा, “क्या हम सिक्किम को भारत में मिला सकते हैं?” काव साहब ने हालात का जायज़ा लेने के लिए 2 हफ्ते का वक्त मांगा।

लेकिन यह आदमी इतना तेज़ था की महज़ 10 दिन में ही वापस आकर डंके की चोट पर बोला- “हाँ, हम ये कर सकते हैं!”

इसके बाद काव साहब ने दिसंबर 1972 से लेकर मई 1975 तक (पूरे 27 महीने) एक ऐसा खामोश और खतरनाक ख़ुफ़िया ऑपरेशन चलाया की चीन और अमेरिका की CIA सोते के सोते रह गए।

रॉ (RAW) के एजेंटों ने सिक्किम के अंदर ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार किया की सिक्किम की जनता खुद ही अपने राजा (चोग्याल) की तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर उतर आई। वहां ऐसा जन-विद्रोह हुआ की मजबूर होकर राजा को खुद भारतीय सेना से मदद मांगनी पड़ गई।

बिना भारत का कोई सैनिक गंवाए, बिना एक भी गोली चलाए, सिक्किम में जनमत संग्रह कराया गया और 16 मई 1975 को सिक्किम हमेशा-हमेशा के लिए भारत का 22वां राज्य बन गया।

पान वाले का भेष बदलकर ढाका पहुंचे भारत के सुपर स्पाई, शेख मुजीबुर्रहमान को मौत की चेतावनी देने वाला वो किस्सा

काव साहब की ख़ुफ़िया जानकारी कितनी सटीक होती थी, इसका एक किस्सा सुनकर आपका दिमाग सन्न रह जाएगा। बात 1975 की है।

रॉ को अपने ख़ुफ़िया नेटवर्क से एकदम पक्की भनक लग चुकी थी की बांग्लादेश में तख्तापलट की बहुत भयानक साज़िश रची जा रही है और बांग्लादेश के संस्थापक व राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान (जिन्हें बंगबंधु कहा जाता था) की हत्या होने वाली है।

काव साहब चाहते तो किसी जूनियर को भेज सकते थे, लेकिन मामला एक देश के राष्ट्रपति की जान का था। इसलिए यह ‘सुपर स्पाई’ खुद मैदान में उतरा।

किसी को कानों-कान खबर न हो, इसलिए भारत के इस सबसे बड़े ख़ुफ़िया चीफ ने एक मामूली ‘पान वाले’ (Paanwala) का भेष बनाया और सीधे ढाका के धानमंडी स्थित 32 नंबर घर में पहुंच गए, जहाँ मुजीब रहते थे।

पान वाले के भेष में काव साहब ने मुजीबुर्रहमान को साफ-साफ चेतावनी दी की सेना के ही कुछ अफसर तुम्हारी हत्या करने वाले हैं, अपनी सुरक्षा बढ़ा लो।

लेकिन अति-आत्मविश्वास में चूर मुजीब ने काव साहब की बात को हंसी में उड़ा दिया। मुजीब ने घमंड में कहा- “पाकिस्तानी मेरा बाल बांका नहीं कर पाए, तो मेरे अपने लोग मुझे क्या मारेंगे? ये फौज तो मेरे बेटों जैसी है… तुम ये पान वाले का कपड़ा बदलो और यहाँ से बाहर निकलो।”

काव साहब चुपचाप लौट आए। और इतिहास गवाह है की इसके कुछ ही महीने बाद, 15 अगस्त 1975 की काली रात को उसी ‘बेटों जैसी’ फौज ने शेख मुजीबुर्रहमान और उनके पूरे परिवार को गोलियों से भून डाला।

काव साहब की वो ख़ुफ़िया रिपोर्ट 100 टका सच निकली थी, लेकिन मुजीब की बेवकूफी ने उनकी जान ले ली।

आर. एन. काव सिर्फ एक जासूस नहीं थे, वो भारत माता के वो खामोश और घातक हथियार थे, जिसकी धार ने हिंदुस्तान को कभी झुकने नहीं दिया।

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