बाड़ के पार देवता, बंदूक के पार गाँव: गाईडिनल्यु का हेराका

पुलोमी की वह सुबह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं थी। वह उस लड़की की आखिरी खुली साँस थी जिसे साम्राज्य ने आतंक कहा था, और जिसे गाँवों ने बेचा नहीं था। सोलह वर्ष की गाईडिनल्यु हथकड़ी में चली, पर उसके पीछे पहाड़, आस्था और हेराका की रीढ़ चलती रही। यह लेख उसी चलते रहने की कहानी है: जादोनांग की फाँसी के बाद उठाया गया नेतृत्व, कर और पोथांग के खिलाफ गाँवों का इनकार, चौदह वर्ष की घूमती जेलें, और 1947 के बाद वह दूसरा निर्णय कि पहाड़ियाँ भारत से कटकर नहीं जाएँगी। रानी की उपाधि नेहरू ने जेल की सलाखों के पार दी। अर्थ गाँवों ने पहले ही तय कर दिया था। जिसे खरीदा नहीं जा सका, वही इस इतिहास का केंद्र है।

17 अक्टूबर 1932 की सुबह अभी पूरी तरह नहीं खुली थी। पुलोमी पर असम राइफल्स टूट पड़ी। कैप्टन मैकडोनाल्ड ने धोखे से काम लिया था। सोलह साल की लड़की के अनुयायियों ने जो लकड़ी का किला उठाना शुरू किया था, वह अभी अधूरा था। सिपाही भोर में ही घुस आए। उन्होंने उसे पकड़ लिया। हथकड़ियाँ पहना दीं।

साम्राज्य पहले ही उसकी कीमत लिख चुका था। पाँच सौ रुपये और दस साल का घर-कर माफ, किसी भी गाँव को जो उसे पकड़कर दे दे। गाँवों ने पैसे नहीं लिए। छूट नहीं ली। राइफलें आने तक उन्होंने उसे अपने पास रखा।

उसे पैदल कोहिमा ले जाया गया, फिर इंफाल। वह तामेंगलोंग के एक दूर रोंगमेई गाँव की लड़की थी। कोई स्कूल का कागज नहीं, कोई पार्टी नहीं। ब्रिटिश राज एक किशोरी से इतना क्यों डर रहा था?

क्योंकि वह अकेली विद्रोही नहीं थी। उसके पीछे पहाड़ थे, आस्था थी और गाँव की वफादारी थी।

वह सोलह साल की थी। साम्राज्य ने उसे आतंक कहा

सोलह साल की उम्र में ज्यादातर लड़कियाँ घर और खेत के काम में बँधी रहती हैं। गाईडिनल्यु पहाड़ी रास्तों, गाँव की बैठकों और हेराका की पंक्तियों में बँधी थी। अंग्रेज अफसर पहले उसे गंभीर नहीं मानते थे। उनके कागजों में हेराका एक पंथ था, एक जंगली विश्वास था, एक अस्थायी उत्तेजना थी। फिर कर आना बंद हुआ। पोथांग टूटा। दौरे पर आने वाले अफसरों के लिए कुली नहीं मिले। हँसी बंद हुई। फाइल का स्वर बदल गया। अब वह जादूगरनी थी। अब वह आतंक थी।

आतंक शब्द आसान होता है जब सामने कोई शहर, तोपखाना और अखबार न हो। तामेंगलोंग के रोंगमेई इलाके में न रेल थी, न बड़ा अखबार। फिर भी राज ने पाँच सौ रुपये का इनाम घोषित किया और दस साल का घर-कर माफ करने का लालच रखा। शर्त साफ थी। जो गाँव उसे पकड़कर दे, वही इनाम और छूट पाए। गाँवों ने दोनों नहीं लिए। यह इनकार साम्राज्य के लिए जादू से बड़ी बात थी। जादू को हँसाया जा सकता है। वफादारी को फाइल में नहीं भरा जा सकता।

कहानियाँ राइफल से तेज दौड़ीं। लोग “गाईडिनल्यु जल” की बात करते थे। कहते थे, उसके पास गोलियाँ पानी हो जाती हैं। पहाड़ियों के लिए यह विश्वास था। दफ्तर के लिए यह खतरा था। विश्वास लोगों को एक दिशा में खड़ा कर देता है। खतरा अफसर को रात में जगा देता है। दोनों तस्वीरें एक ही लड़की पर टिकी थीं। एक तस्वीर गाँव की थी। दूसरी तस्वीर इंफाल और शिलांग की मेज की थी।

वह अकेली बंदूक लेकर मैदान में नहीं उतरी थी। उसने मणिपुर, नागा पहाड़ियों और उत्तर कछार के जंगली रास्तों पर समुदायों को जोड़ा। धुआँ संकेत बनता था। गाँव छिपने की जगह बनते थे। रिश्ते संदेशवाहक बनते थे। 16 फरवरी 1932 को उत्तर कछार पहाड़ियों में और 18 मार्च 1932 को हांगरुम में उसके लोगों का असम राइफल्स से मुकाबला हुआ। एक तरफ भाले और संख्या थी। दूसरी तरफ राइफल थी। साम्राज्य को यह स्वीकार करना कठिन लगा कि एक किशोरी इन रास्तों को पढ़ सकती है।

अक्टूबर 1932 में उसके अनुयायी पुलोमी में लकड़ी का किला उठाने लगे। किला अधूरा था। कैप्टन मैकडोनाल्ड ने धोखे से काम लिया। 17 अक्टूबर की सुबह सिपाही टूट पड़े। उसे हथकड़ियाँ पहनाई गईं। पैदल कोहिमा ले जाया गया, फिर इंफाल। दस महीने का मुकदमा चला। पॉलिटिकल एजेंट की अदालत ने हत्या और हत्या के दुष्प्रेरण का दोष लगाया और उम्रकैद सुनाई। वह तब भी सोलह साल की थी। ज्यादातर साथियों को फाँसी दी गई या जेल भेज दिया गया।

सजा का कागज एक बात कहता था। असली डर दूसरी बात कहता था। राज एक लड़की को नहीं काट रहा था। वह उस जाल को काट रहा था जो कर नहीं देता था, बोझा नहीं ढोता था और गोरे अफसर को रास्ते का मालिक नहीं मानता था। सोलह साल की उम्र में भी वह अकेली नहीं दिखती थी। उसके पीछे पहाड़ था, आस्था थी और वह वफादारी थी जिसे पाँच सौ रुपये खरीद नहीं सके। इसीलिए साम्राज्य ने उसे बच्ची नहीं कहा। उसने उसे आतंक कहा।

पोथांग, टैक्स और चुपचाप टूटता एक समाज

पहाड़ियों में राज हमेशा तोप की आवाज बनकर नहीं आया। वह रजिस्टर बनकर आया। घर-कर की माँग आई। दौरे पर आने वाले अफसर की सूची आई। पादरी की भाषा आई। एक के बाद एक बोझ इतना धीरे पड़ा कि बाहर से शांति दिखी और भीतर से गाँव टूटने लगा।

पोथांग सबसे साफ बोझ था। गाँव वाले अफसर का सामान ढोते थे। उन्हें खिलाते थे। उन्हें ठहराते थे। बिना मजदूरी के कुली बनते थे। रास्ता उनका था, अनाज उनका था, पीठ उनकी थी। फिर भी आदेश बाहर से आता था। इनकार करने वाले को सजा मिल सकती थी। कर में देरी करने वाले गाँव पर अगले मौसम और जोर पड़ता था। यह लड़ाई जैसी घटना नहीं थी। यह रोजमर्रा की छोटी-छोटी नीची होती इज्जत थी।

घर-कर केवल पैसा नहीं माँगता था। वह यह भी पूछता था कि पहाड़ का मालिक कौन है। जो गाँव समय पर देता, उसे आज्ञाकारी माना जाता। जो रुकता, उसे अवज्ञाकारी लिखा जाता। कागज छोटा होता था। असर लंबा होता था। एक परिवार का अनाज, एक युवा की पीठ और एक मुखिया की इज्जत एक ही सूची में बँध जाते थे।

इसके साथ आस्था पर दबाव बढ़ा। पुराने देवता को पिछड़ा बताया जाने लगा। तिंगकाओ रागवांग की दुनिया को अंधविश्वास कहा जाने लगा। धर्मांतरण के अभियान फैले। गीत, रीति और गाँव का पुराना नियम सम्मान के किनारे सरकने लगे। जो पीढ़ी जंगल और खेत से अपनी पहचान लेती थी, उसे बताया गया कि उसकी पहचान अधूरी है। यह भी चुपचाप टूटन थी। कोई एक दिन का तूफान नहीं। मौसम-दर-मौसम चलने वाली कमी।

गाईडिनल्यु पामेई का जन्म 26 जनवरी 1915 को लोंगकाओ में हुआ। इसी गाँव को नुंगकाओ या लुंगकाओ भी कहा जाता है। यह आज के मणिपुर के तामेंगलोंग में है। वह रोंगमेई नागा थीं। रोंगमेई ज़ेलियांग्रोंग समूह का हिस्सा हैं। ज़ेमे, लियांगमाई और रोंगमेई समुदाय मणिपुर, नागालैंड और असम में फैले हैं। वह आठ भाई-बहनों में पाँचवीं थीं। औपचारिक स्कूल की पढ़ाई नहीं हुई थी।

स्कूल न होना यहाँ कमजोरी की पंक्ति नहीं है। यह उस दुनिया की सच्चाई है जिसमें ज्ञान रास्ते, खेत, रीति और बड़ों की बात से आता था। उसी दुनिया पर कर और पोथांग टूटे। उसी दुनिया पर नई आस्था का दबाव पड़ा। एक किशोरी ने वही दुनिया टूटते देखी। विद्रोह भाषण से पहले इनकार से पैदा हुआ। इनकार इस बात से कि गोरा अफसर रास्ते का मालिक है, अनाज का मालिक है और पूजा का फैसला करने वाला है।

पहाड़ चुप नहीं थे। वे केवल धीरे टूट रहे थे। कर ने जेब काटी। पोथांग ने पीठ झुकाई। धर्मांतरण की भाषा ने नाम काटा। तीनों मिलकर एक समाज को भीतर से खोखला कर रहे थे। हेराका बाद में इसी खोखलेपन के सामने खड़ा हुआ। गाईडिनल्यु उसी जमीन से उठीं जहाँ लोग पहले से थक चुके थे, अपमानित हो चुके थे और फिर भी अपने देवता व अपने गाँव को छोड़ने को तैयार नहीं थे।

वह चचेरा भाई जिसने नागा राज का सपना देखा

लगभग 1927 में गाईडिनल्यु तेरह वर्ष की थीं। औपचारिक स्कूल नहीं था। दुनिया गाँव, खेत, रीति और बड़ों की बात से बनती थी। उसी उम्र में वह अपने चचेरे भाई हैपौ जादोनांग के हेराका से जुड़ीं। यह मुलाकात किसी शहर के मंच की नहीं थी। यह पहाड़ के भीतर एक नई भाषा का जन्म था।

हेराका का अर्थ शुद्ध है। जादोनांग ने इसे केवल पूजा का नया रूप नहीं बनाया। उन्होंने पुरानी आस्था को साफ करने की बात कही। तिंगकाओ रागवांग सर्वोच्च देव थे। अनुयायी उसी के सामने खड़े होते थे। लक्ष्य साफ थे। देशज रीति बचे। ईसाई धर्मांतरण रुके। अन्यायपूर्ण कर और बेगार खत्म हों। पहाड़ अपने नियम से चले। लोग इसे नागा राज या मकाम ग्वांगदी कहते थे। सपना सिंहासन का कम और इज्जत का ज्यादा था।

जादोनांग पहला सार्वजनिक चेहरा बने। अंग्रेज अफसर पहले उन्हें गंभीर नहीं मानते थे। कागजों में हेराका पंथ था, उत्तेजना थी, जंगली विश्वास था। फिर गाँवों ने कर देना बंद किया।

अफसरों के लिए कुली कम पड़े। पोथांग टूटने लगा। हँसी बंद हुई। अब वही पंथ राजद्रोह की तरफ खिसकने लगा।

गाईडिनल्यु इस हलचल की किनारे खड़ी दर्शक नहीं रहीं। हेराका में उन्हें देवी चेराचामदिनल्यु का अवतार माना जाने लगा। आस्था ने उन्हें केवल कार्यकर्ता नहीं बनाया। उसने उन्हें केंद्र बनाया। उनसे जुड़ी पंक्ति थी: हम स्वतंत्र लोग हैं। गोरे आदमी को हम पर राज नहीं करना चाहिए। यह वाक्य भाषण की सजावट नहीं था। यह उस पीढ़ी का सार था जो कर दे रही थी, बोझ ढो रही थी और फिर भी अपनी पहचान छोड़ने को तैयार नहीं थी।

चचेरे भाई और छोटी बहन जैसी यह जोड़ी संगठन की दो जरूरतें पूरी करती थी। जादोनांग ने स्वप्न को भाषा दी। गाईडिनल्यु ने उस भाषा को गाँवों तक पहुँचाया। एक के बिना दूसरा अधूरा रहता। हेराका किनारे की कहानी नहीं था। वह रीढ़ था। बिना साझा देवता के बिखरे ज़ेमे, लियांगमाई और रोंगमेई गाँव एक मोर्चा नहीं बनते। बिना कर और बेगार के गुस्से के आस्था केवल पूजा रह जाती। दोनों मिले, तब आंदोलन चला।

29 अगस्त 1931 को राज ने जादोनांग को इंफाल में फाँसी दी। आरोप राजद्रोह का था और मैतेई व्यापारियों की कथित हत्या का था। फाँसी का हिसाब साफ था। सिर कट जाए तो शरीर गिर जाएगा। अफसरों को लगा हेराका ठंडा पड़ जाएगा। गणना गलत निकली।

सोलह वर्ष की शिष्या ने आध्यात्मिक और सैन्य दोनों बागडोर संभाली। वह नए पैगंबर की प्रतीक्षा में नहीं बैठी। वह उन्हीं रास्तों पर चली जिन पर जादोनांग चले थे। उन्हीं गाँवों से बोली। उसी देवता का नाम लिया। सपना भाई के साथ दफन नहीं हुआ। सपना बहन के हाथ में चला गया।

यही वह क्षण है जहाँ नागा राज की कल्पना व्यक्तिगत नेता से बड़ी साबित हुई। नेता फाँसी पर चढ़ सकता है। माँग तब तक जीवित रहती है जब तक लोग कर, बेगार और अपनी आस्था के अपमान को एक ही चोट मानते रहें। जादोनांग ने वह माँग खोली। गाईडिनल्यु ने उसे आगे बढ़ाया। साम्राज्य ने एक आदमी को काटा। पहाड़ ने एक किशोरी को आगे कर दिया।

उन्होंने सोचा जादोनांग की फाँसी से आग बुझ जाएगी

राज ने जादोनांग को गिरफ्तार किया। 29 अगस्त 1931 को इंफाल में उन्हें राजद्रोह और मैतेई व्यापारियों की कथित हत्या के आरोप में फाँसी दी गई।

अफसरों को लगा आंदोलन ढह जाएगा। फाँसी पर लटकता नेता अक्सर छोटे विद्रोह का अंत होता है। यह विद्रोह नहीं टूटा।

सोलह साल की शिष्या ने आध्यात्मिक और सैन्य दोनों नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया। वह बाहर से नए पैगंबर का इंतजार नहीं करती रही। वह उन्हीं जंगल के रास्तों पर चली और उन्हीं गाँवों से बोली। आग नहीं बुझी। आग ने हाथ बदले।

नेतृत्व का यह हस्तांतरण वह बात थी जिसे साम्राज्य आसानी से स्वीकार नहीं कर पाया। फाँसी हुआ आदमी फाइल में समा जाता है। जीवित लड़की जो उसके लोगों को संभाल ले, वह फाइल में इतनी आसानी से नहीं समाती।

जंगल में एक लड़की, राइफलों वाले साम्राज्य के खिलाफ

गाईडिनल्यु ने मणिपुर, नागा पहाड़ियों और उत्तर कछार के जंगली रास्तों पर आदिवासी समुदायों को संगठित किया। लोग धुएँ के संकेत, छिपने की जगहें और गाँव के जाल इस्तेमाल करते थे। इनाम की घोषणा के बाद भी वफादारी नहीं टूटी।

उनकी शक्तियों का असम राइफल्स से 16 फरवरी 1932 को उत्तर कछार पहाड़ियों में और 18 मार्च 1932 को हांगरुम में मुकाबला हुआ। भाले और संख्या राइफलों से टकराईं।

अंग्रेजों ने उसे जादूगरनी कहा। उसके लोगों ने उसे नेता और पवित्र व्यक्तित्व माना। दोनों तस्वीरें संयोग नहीं थीं। एक तस्वीर शिकार को जायज ठहराती थी। दूसरी तस्वीर बताती थी कि शिकार बार-बार क्यों असफल हो रहा था।

भूगोल ने उसकी मदद की। आस्था ने मदद की। और यह सादी बात भी कि पोथांग झेल चुका गाँव अपनी बेटी को कर माफी के लिए नहीं बेचना चाहता था। कर विद्रोह, पवित्र वफादारी और छापामार देश एक मौसम तक राइफलों से आगे निकल सकते हैं। हमेशा नहीं। लेकिन वे एक साम्राज्य को मजबूर कर सकते हैं कि वह पैसा, आदमी और प्रतिष्ठा एक ऐसी लड़की पर खर्च करे जिसे उसने पहले हल्के में लिया था।

अक्टूबर 1932 में उसके अनुयायियों ने पुलोमी में लकड़ी का किला उठाना शुरू किया। राज ने उसी क्षण खुली लड़ाई का इंतजार छोड़कर धोखे से हमला चुना।

सोलह साल की उम्र में उम्रकैद

असम राइफल्स के कैप्टन मैकडोनाल्ड 17 अक्टूबर 1932 की सुबह टूटे। उसे पकड़ लिया गया। पैदल कोहिमा ले जाया गया, फिर इंफाल में मुकदमा चला।

दस महीने के मुकदमे के बाद पॉलिटिकल एजेंट की अदालत ने उसे हत्या और हत्या के दुष्प्रेरण का दोषी ठहराया और उम्रकैद सुनाई। वह सोलह साल की थी।

1933 से 1947 तक उसे जेल-दर-जेल घुमाया गया ताकि एक जेल मजार न बन जाए: गुवाहाटी, शिलांग, आइजॉल और तुरा। चौदह वर्ष।
जेल में उसने कई भाषाएँ सीखीं, जिनमें मणिपुरी, असमिया, खासी और हिंदुस्तानी शामिल थीं। शरीर बंद था। किंवदंती बढ़ती गई।

बाद में राज्य सचिव ने जल्दी रिहाई से इनकार कर दिया। कहा गया कि छूटी तो फिर उपद्रव उठ सकता है। दूर डेस्क से लिखा यह वाक्य ब्रिटिश भय का साफ सबूत है। राज अभी भी उसे कोठरी के अंदर से नाप रहा था और सोच रहा था कि पहाड़ियाँ फिर उसका जवाब दे सकती हैं।

पहाड़ियों की बेटी

1937 में जवाहरलाल नेहरू शिलांग जेल में उनसे मिले। उन्होंने उसे पहाड़ियों की बेटी कहा और रानी की उपाधि दी। उन्होंने लिखा कि उसने अपने लोगों की स्वतंत्रता का सपना देखा, पहाड़ियों में झंडा उठाया, और भारत को अपनी पहाड़ियों की इस बहादुर संतान का पता भी नहीं था। उन्होंने रिहाई की कोशिश की, ब्रिटिश सांसद लेडी एस्टर के जरिए भी।

रानी की उपाधि किसी राज्याभिषेक से नहीं आई। वह एक आगंतुक से आई जिसने एक राजनीतिक कैदी को स्थानीय अजूबा मानने से इनकार कर दिया। मैदान के कई पाठकों के लिए यही मुलाकात राष्ट्रीय कहानी में उसका पहला प्रवेश है। ज़ेलियांग्रोंग गाँवों के लिए वह किसी आगंतुक के आने से पहले ही नेता थी।

भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 में नेहरू के हस्तक्षेप पर उसे तुरा जेल से रिहा किया गया। देश की आजादी और कैदी की आजादी एक ही साल में आईं। दोनों एक ही चीज नहीं थीं।

आज़ादी आई। शांति नहीं आई

रिहाई का मतलब आराम नहीं था। वह ज़ेलियांग्रोंग कल्याण और हेराका के पुनरुत्थान के लिए काम करती रहीं।

उन्होंने नागा नेशनल काउंसिल की अलगाववादी माँग का विरोध किया। उन्होंने कहा कि वह भारतीय हैं और भारत संघ के भीतर एक ठोस ज़ेलियांग्रोंग प्रशासनिक इकाई चाहती हैं, कोई अलग राष्ट्र नहीं।

कई नागा राष्ट्रवादी और चर्च स्वर हेराका को ईसाई-विरोधी बताकर हमला करते थे और उन्हें बाधा मानते थे। बहस केवल नक्शे की नहीं थी। बहस यह भी थी कि पहाड़ियों का सार्वजनिक चेहरा कौन-सी आस्था बनेगी, और तीन राज्यों में बिखरा एक समुदाय एक प्रशासनिक छत के नीचे रहेगा या एक अलग राजनीतिक परियोजना में खिंच जाएगा।

पूर्वोत्तर के स्वतंत्रता संग्राम के अपने सेनापति थे। वह मैदानी कहानी की फुटनोट नहीं हैं। 1947 के बाद उन्होंने दूसरी लड़ाई लड़ी: अलगाववादी राजनीति के खिलाफ और भारतीय एकता के पक्ष में। यही दूसरी लड़ाई है जिसके कारण कुछ आवाजें बाद में उनके जीवन का छोटा संस्करण पसंद करती हैं, वह संस्करण जो 1947 के जेल द्वार पर खत्म हो जाता है।

वह जंगल से अपने लोगों के लिए निकली, सिंहासन के लिए नहीं

1960 से 1966 तक वह फिर भूमिगत हो गईं। लगभग एक हजार की शक्ति के साथ, जिनमें कुछ पुरानी राइफलें थीं, अपने लोगों और अपनी माँग की रक्षा के लिए। यह दूसरा संघर्ष भारतीय राज्य को विदेशी साम्राज्य मानकर नहीं था।

जनवरी 1966 में, छह भूमिगत वर्षों के बाद और लगभग पचास वर्ष की आयु में, वह भारत सरकार से समझौते के तहत बाहर आईं। कुछ को नागालैंड सशस्त्र पुलिस में लिया गया।

उन्होंने राष्ट्रीय नेताओं से मुलाकात की, जिनमें लाल बहादुर शास्त्री और बाद में इंदिरा गांधी शामिल थे, और ज़ेलियांग्रोंग प्रशासनिक इकाई के लिए ज्ञापन दिए। माँग काफी हद तक अधूरी रही। उनका रुख नहीं बदला: भारत के भीतर गरिमा और एकता।

वह जंगल से सिंहासन पर बैठने नहीं निकलीं। वह इसलिए निकलीं कि उनके लोगों को किसी ऐसे झंडे से न बाँटा जाए जो उनका नहीं था, और किसी ऐसी धर्मांतरण कथा से न मिटाया जाए जो हेराका को हल करने वाली समस्या समझती हो।

कुछ उसे रानी कहकर याद करते हैं, कुछ भुलाना चाहते हैं

कुछ इसलिए याद करते हैं क्योंकि नेहरू ने उसे रानी कहा और स्वतंत्र भारत ने बाद में सम्मान दिया। उन्हें 1972 में ताम्रपत्र स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार, 1982 में पद्म भूषण और 1983 में विवेकानंद सेवा पुरस्कार मिला। 17 फरवरी 1993 को 78 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। बाद में भारत ने उनके सम्मान में डाक टिकट और स्मारक सिक्का जारी किया।

कुछ भुलाना चाहते हैं, या छोटा करना चाहते हैं, क्योंकि हेराका उस सार्वजनिक कहानी में अभी भी बेचैन बैठी है जो या तो सरल राष्ट्रवादी संत चाहती है या सरल नागा अलगाववादी नायक। वह न तो प्रदर्शन की मूर्ति थीं, न विच्छेदवादी। वह आदिवासी नेता थीं जिन्होंने आस्था को संगठन बनाया, औपनिवेशिक कर और बेगार से इनकार किया, चौदह वर्ष जेल काटी, और फिर भारतीय एकता को अलग नक्शे के बदले नहीं बेचा।

पूरी रेखा पकड़ना भूलने से कठिन है। पूरी रेखा पुराने साम्राज्य को भी छोटा दिखाती है और कुछ बाद की राजनीतिक परियोजनाओं को भी।

ज़ेलियांग्रोंग देशज धर्मशास्त्र एक बंद किताब नहीं है। यह ऊँचे देवता का विश्वास है, जिसे पुरानी गाँव-रीति ने भीड़ भरे आकाश की तरह संभाला, और जिसे बीसवीं सदी के सुधार ने शुद्ध करने की कोशिश की। ज़ेलियांग्रोंग तीन सगे समुदाय हैं: ज़ेमे, लियांगमाई और रोंगमेई। ये मणिपुर, नागालैंड और असम में फैले हैं। आज की मुख्य धाराएँ हेराका और तिंगकाओ रागवांग चप्रियाक हैं। दोनों एक ही शिखर नाम पर खड़ी हैं: तिंगकाओ रागवांग, जिसे तिंगवांग भी कहते हैं।

जब इन नामों को “धर्म” की तरह व्यवस्थित नहीं किया गया था, पहाड़ियों में पहले से एक मूल ढाँचा था। बाद के लेखक उसे चराचेंग या पउपाइसे कहते हैं। वह पुरानी दुनिया सृष्टिकर्ता से खाली नहीं थी। वह छोटी शक्तियों से भरी थी, जिन्हें खिलाना, डरना और बाड़ लगाना पड़ता था। सुधार ने ऊँचे देवता को जन्म नहीं दिया। सुधार ने तय किया कि उसके नीचे वालों के साथ क्या करना है।

आकाश का ऊँचा देवता

तिंगकाओ रागवांग का अर्थ है स्वर्गीय देवता, आकाश का देवता, ब्रह्मांड का स्वामी। दोनों सुधार धाराओं के पाठ में वह अनादि-अनंत है। न पिता, न माता। सूरज, चाँद और धरती उसकी इच्छा से बने। उसे सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और शुभ कहा जाता है। वह बुहशिनमेइपु-बुहदमेइपु भी है, आत्मा देने वाला और उसकी रक्षा करने वाला।

गंगमुमेई कामेई का सार, जिसे ज़ेलियांग्रोंग लेखक बार-बार दोहराते हैं, सीधा है। वह स्रष्टा है, जीवन का स्रोत है, समृद्धि और न्याय बाँटने वाला है, भाग्य का शिल्पी है, ज्ञान का मूल है। उसकी इच्छा के बिना कुछ नहीं ठहरता। वह ऊपर तिंगकाओ कैदाई या तिंगकाओ रागवांग कई में रहता है, स्वर्गीय घर में। आत्मा की अंतिम आशा उसी घर तक पहुँचने की है।

यह कोई दूर बैठा घड़ीसाज़ नहीं है। गाँव की भाषा उसे वह मानती है जिसने सपने और आदेश से सिखाया कि घर कैसे उठे, आग कैसे जले, तालाब कैसे खुदे। सृष्टि-कथाएँ जनजाति के हिसाब से बदलती हैं, रीढ़ एक है। ऊँचा देवता काम सौंपता है। स्त्री-पुरुष रूप वाले गढ़ने वाले देवता, रोंगमेई कथाओं में दमपपु और दमपपुई, अन्य कथनों में दिदिम्पु और दिदिम्पुई, उसी आदेश के नीचे संसार और पहले शरीर बनाते हैं। श्वास, बु या बुमांग, तिंगकाओ रागवांग से आती है। आत्मा उसी से निकली है, इसलिए मूल में पवित्र मानी जाती है और आचरण में जवाबदेह रहती है।

पुराना आकाश खाली नहीं था

सुधार से पहले की रीति आमतौर पर बहुदेववादी थी, भले शिखर पर एक सर्वोच्च नाम पहले से हो। पहाड़, जल, आग, मिट्टी और हवा में शक्ति मानी जाती थी। भाई-देवता और स्थानीय आत्माएँ अनुष्ठान माँगती थीं। पाप, जिसे नोन या नुआन कहते हैं, केवल निजी दाग नहीं था। वह गाँव के नियम, रीति-कर्तव्य और नैतिक सीमा का टूटना था। दंड इस जन्म में भी आ सकता था, मृत्यु के बाद मृतक-लोक में भी। भली आत्मा तिंगकाओ कैदाई की ओर चलती है। बुरा कर्म करने वाले पर दंड पड़ता है। कुछ विवरण कर्म के अनुसार पुनर्जन्म या गिरावट की भी बात करते हैं।

पुरानी बलि-व्यवस्था महँगी थी। छोटी शक्तियों को रक्त चढ़ाना अनाज, पशु और समय खा जाता था। पुरोहित-विशेषज्ञ केंद्र में रहता था। जब औपनिवेशिक कर, पोथांग बेगार और ईसाई मिशन एक साथ आए, भीड़ भरा आकाश राजनीतिक समस्या बन गया। जो लोग हर स्थानीय शक्ति को खिलाएँ और दौरे पर आए अफसर को भी खिलाएँ, वे पहले से थके हुए लोग हैं। सुधारकों ने उस थकान को धर्मशास्त्र की गलती की तरह सुना।

हेराका में “शुद्ध” का अर्थ

हेराका ज़ेमे भाषा में शुद्ध है। गाँव की एक व्याख्या अंग्रेज़ी अनुवाद से तेज है। हेरा छोटी देवियाँ-देवता हैं। का का अर्थ है बाड़ लगाना, रोकना, छोड़ना, त्यागना। इसलिए हेराका का अर्थ है: छोटी पूजा और उसकी बलि को बाहर बाँध दो, केवल तिंगवांग की उपासना करो।

इसलिए हेराका के गुरु उसे एकेश्वरवादी कहते हैं, जबकि तिंगकाओ रागवांग चप्रियाक सर्वोच्च देवता के साथ बहुदेववादी बना रहता है। चप्रियाक भाई-देवताओं और रीति-आवाजाही को तिंगकाओ रागवांग के नीचे रखता है। हेराका उस आवाजाही को अशुद्धि मानता है। पवित्रता कोई धुंधला नैतिक भाव नहीं है। वह छोटी भूखी शक्तियों को खिलाने से इनकार है। रक्त बलि चरणों में घटी, और गाईडिनल्यु से जुड़े बाद के हेराका पाठ में अंत में छोड़ दी गई। प्रार्थना, स्तुति और सही जीवन पुरानी सौदेबाजी की जगह लेते हैं।

हेराका प्रचारकों के हिंगदे पाठ नीति को सीढ़ियों में रखते हैं। मानो कि तिंगवांग ने धरती बनाई और वह उसे फिर तोड़ेगा। उसकी स्तुति करो। साफ जीवन जियो। भले की आत्मा उसके राज्य में जाती है। उद्देश्य पुराने त्योहार-पंचांग को सजाना नहीं है। उद्देश्य कई वेदियों को एक में समेटना है।

विद्वान कीमत और लाभ दोनों लिखते हैं। ब्रह्मांड-दृष्टि सरल होती है। ऊँचा देवता वे गुण ले लेता है जो पहले छोटी शक्तियों में बिखरे थे। बलि देने वाला पुरोहित पीछे हटता है, गाँव का बड़ा और प्रचारक आगे आता है। सामाजिक बदलाव सिद्धांत के भीतर सवार रहता है। कुछ लेखक यह भी कहते हैं कि हेराका और चप्रियाक धर्मांतरण से लड़ते हुए भी उस ईसाई और हिंदू संसार के रूप ले बैठे जिनके खिलाफ वे खड़े थे: साफ एकेश्वर, लिखा हुआ उपदेश, परिषद, कलुम कई नाम का उपासना-घर। यह ऐतिहासिक पढ़ाई है, हार की स्वीकृति नहीं। देशज धर्मशास्त्र अक्सर उसी पड़ोसी के सामने तेज होता है जो उसे पिछड़ा कहता है।

इस धर्मशास्त्र में गाईडिनल्यु का स्थान

हैपौ जादोनांग ने मौखिक नियम समेटा, तिंगकाओ रागवांग की उपासना खड़ी की, और शुद्धता को स्वशासन की ओर मोड़ा: नागा राज या मकाम ग्वांगदी। हेराका में गाईडिनल्यु केवल 29 अगस्त 1931 को इंफाल की फाँसी के बाद की उत्तराधिकारी नहीं थीं। उन्हें देवी चेराचामदिनल्यु का अवतार माना गया। उनकी आत्मा से जुड़ी पंक्ति अब भी इस आस्था का राजनीतिक मंत्र है: हम स्वतंत्र लोग हैं। गोरे आदमी को हम पर राज नहीं करना चाहिए।

बाद की हेराका कथा अवतार को संक्षिप्त स्वतंत्रता-संघर्ष विवरण से अधिक खोलती है। चेराचामदिनल्यु को भुबन देवता की पुत्री कहा जाता है, जिसे ज़ेलियांग्रोंग के बीच भेजा गया। अदृश्य साथी नामगिनाई लड़की का मार्ग दिखाती है। भुबन गुफा शिक्षा का स्थान बनती है, जहाँ जादोनांग और गाईडिनल्यु को विधि मिलती है। ये समुदाय की बुलाहट की कहानियाँ हैं। ये बताती हैं कि पहला पैगंबर गिरने के बाद एक किशोरी मंदिर और सेना दोनों क्यों संभाल सकी।

धर्मशास्त्र में अवतार एक काम करता है। वह ऊँचे देवता की इच्छा को लोंगकाओ की जीवित रोंगमेई स्त्री में टिका देता है। जो गाँव इनाम पर उसे नहीं बेचते, वे केवल विद्रोही के प्रति वफादार नहीं हैं। वे एक पवित्र उपस्थिति का सौदा करने से इनकार करते हैं। ब्रिटिश फाइलों ने “गाईडिनल्यु जल” और पानी बनती गोलियों में जादू सुना। हेराका ने धातु के रास्ते में खड़ी देवी सुनी। चमत्कार-भाषा यहाँ भौतिकी का दावा नहीं है। वह रक्षा का धर्मशास्त्र है।

1947 के बाद हेराका पुनरुत्थान में वही पद रहा। देशज आस्था को मिटने से बचाना ज़ेलियांग्रोंग प्रशासनिक इकाई की माँग का किनारा शौक नहीं था। इस धर्मशास्त्र में जिन लोगों के देवता का सार्वजनिक नाम नहीं बचता, वे नक्शे पर गाँव रहते हुए भी आधे बिखर चुके हैं।

दूसरी जीवित धारा

तिंगकाओ रागवांग चप्रियाक, जो बाद में बहुत से रोंगमेई में व्यवस्थित हुआ, हेराका के एकेश्वर का दूसरा उत्तर देता है। चप्रियाक कहता है कि पूर्वज बहुदेववादी थे। तिंगकाओ रागवांग सबसे ऊँचा है, बाकी उसके मंत्री हैं, फेंक देने लायक कचरा नहीं। आत्मा, पाप, स्वर्ग और उपासना-घर बने रहते हैं। विवाद स्मृति का है। क्या पवित्रता मूल एक वेदी की वापसी है, या भरे पुराने आकाश को पतला करना है? दोनों पक्ष एक ही स्रष्टा का दावा करते हैं। फर्क इस बात पर है कि पहाड़ियाँ कभी केवल उसी से प्रार्थना करने के लिए बनी थीं या नहीं।

यह विवाद शास्त्र है, छोटी बहस नहीं। इसी से तय होता है कौन-सी रीति बचेगी, किस पुरोहित के हाथ में अधिकार रहेगा, और मिशन स्कूल से पहले “हम कौन थे” की कौन-सी कथा बच्चों को पढ़ाई जाएगी।

यह धर्मशास्त्र किस काम का है

ज़ेलियांग्रोंग देशज धर्मशास्त्र एक साथ तीन काम करता है।

  • वह एक स्रष्टा का नाम लेता है जो औपनिवेशिक अफसर या धर्मांतरित प्रमाणपत्र पर निर्भर नहीं।
  • वह आत्मा को आकाश के ऊपर घर देता है और धरती पर नैतिक खाता देता है, ताकि गाँव का नियम केवल रिवाज न रहे। वह ब्रह्मांड का नियम बने।
  • हेराका में वह तय करता है कि स्वतंत्रता और उपासना एक ही वाक्य हैं। यदि तिंगवांग ब्रह्मांड का स्वामी है, तो गोरा आदमी रास्ते का स्वामी नहीं। यदि चेराचामदिनल्यु तामेंगलोंग की लड़की में खड़ी है, तो लोग किसी अदालत के लिखे से पहले ही स्वतंत्र हैं।

साम्राज्य ने परिणाम को पहले पंथ कहा, फिर आतंक। चर्च और कुछ नागा राष्ट्रवादी स्वर बाद में हेराका को ईसाई-विरोधी कहते रहे। भीतर का दावा इन नामों से पुराना है। आकाश का स्वामी है। आत्मा उसी से आई है। पवित्रता वह तरीका है जिससे पहाड़ियाँ उसका नाम भीड़ में दबने या बदल दिए जाने से बचाती हैं। गाईडिनल्यु की धार्मिक भूमिका यही थी कि उस स्वामी को ऐसे जीवन में दिखाई दे, जिसे गाँव बेचने को तैयार न हों।

ज़ेलियांग्रोंग रीति नाटक नहीं है जो विश्वास के बाद जोड़ी गई हो। वह तरीका है जिससे साल, फसल, बच्चा, मृतक और गाँव का द्वार तिंगकाओ रागवांग के सामने व्यवस्थित रहते हैं। धारा के हिसाब से रूप बदलते हैं। तिंगकाओ रागवांग चप्रियाक देवताओं, चढ़ावों और रक्त की भरी मेज रखता है। हेराका छोटी पूजा पर बाड़ लगाता है और लंबे सुधार के बाद खाली हाथ प्रार्थना माँगता है। पंचांग फिर भी उसी मिट्टी पर घूमता है।

काम कौन करता है

गाँव की परिषद पेई और उसके बुजुर्ग चंद्रमास से तिथि तय करते हैं और निषेध देखते हैं, जिसे नेहमेई या गेन्ना कहते हैं। पुजारी या पुजारी का काम कर रहा बुजुर्ग स्तोत्र बोलता है। लड़कों और लड़कियों के शयनगृह, खांगचु और लुचु, अदरक और अंडा जमा करते हैं, भोज रखते हैं, नाचते हैं, ढोल बजाते हैं। घर चूल्हे के पत्थर संभालता है, जहाँ पूर्वज और अनाज-देवियाँ खिलाई जाती हैं। रीति यहाँ निजी पूजाघर की आदत नहीं है। वह सार्वजनिक श्रम है।

अदरक पवित्र माना जाता है। कुछ पाठ कहते हैं कि वह निराकार स्रष्टा की उंगलियों का रूप है। अंडा, पवित्र मदिरा या चावल-बीयर ज़ौंगाओ, मांस-पेय का पहला स्वाद ऊपर चढ़ाना, और सूखी लकड़ी रगड़कर निकाली नई आग म्हैरापमेई, बार-बार लौटते हैं। ये काम के औजार हैं।

गान-ङाई, बड़ी सर्द रीति

गान-ङाई सबसे बड़ा जीवित पर्व है। गान सूखी सर्दी है। ङाई उत्सव है। ज़ेमे सगे पर्व को हेगा ङी कहते हैं, लियांगमाई गिन ङी। यह फसल के बाद का पर्व है। कोठार भरे होते हैं। खेत शांत होते हैं। गाँव तिंगकाओ रागवांग की ओर मुड़ता है, मृतकों की ओर, नए साल की ओर। 1947 में सामुदायिक नेताओं ने शुरुआत मेइतई मास वाकचिंग की तेरहवीं तिथि पर बाँधी, दिसंबर या जनवरी में। पर्व पाँच से सात दिन चलता है।

पहली सुबह उत्तर और दक्षिण के गाँव-देवताओं, बाम्बु, की जगह पर अदरक और अंडे से खुलती है। प्रार्थना यह माँगती है कि आगे के दिन झगड़े, बीमारी और टूटे नाच से बचे रहें। तिंगकाओ रागवांग को सुअर चढ़ सकता है। प्लीहा से शकुन पढ़ा जाता है। पवित्र मदिरा पीछे आती है। शयनगृह भोज करते हैं। नई आग काटी जाती है और घर-घर पहुँचाई जाती है। युवा होई के घोष के साथ निकलते हैं, स्पर्धा करते हैं, और बुजुर्गों के नीचे अनुशासन रखते हैं।

पर्व जीवितों और मृतकों दोनों का है। चावल, पेय और सबसे अच्छा हिस्सा ऊँचे देवता को जाता है, फिर अनाज और समृद्धि की देवियों तथा चूल्हे पर पूर्वजों की ओर। बाद के दिन चप्रियाक रीति उत्तर द्वार के बाहर रारेन लौमेई या रालेन लौमेई करती है: सात भाई-देवताओं और गाँव की शक्तियों की पूजा, और कष्ट देने वाली आत्माओं का शमन, प्रिय देवता की तरह नहीं, नुकसान न करने का निवेदन करके। उसके बाद कोई बुजुर्ग मुर्गे के साथ बुकाओमेई कर सकता है, आत्मा का आह्वान, ताकि तिंगकाओ रागवांग गाँव को मृत्यु से थामे। नपकाओमेई भोज में खाए अनाज के बाद धान को वापस बुलाती है।

इसीलिए गान-ङाई एक पूरे धर्मशास्त्र जैसा लगता है, जो एक सप्ताह में पैदल चलता है। अंधेरे के सामने उजाला। भूख के सामने भरा भंडार। खतरे के सामने द्वार। भूल के सामने मृतक का नाम।

बाकी साल

चप्रियाक खेत के चारों ओर मौसमी ङाई रखता है। बीज बोआई, नपकादोई-ङाई। अनाज-देवी की पूजा, गिंकी ङाई। अदरक-शोरबा या संबंधित बसंत रीतियाँ। कटाई से पहले पुकफा ङाई। वर्षा का तुन ङाई। रोटी चखना। कोठार देखना। युद्ध या विजय रीति रिह-ङाई, जिसमें शिकार या लड़ाई से पहले शरीर और मन की शुद्धि लुमथेंगमेई भी रहती है। कान छेदना, नानु-ङाई, पिछले साल जन्मे बच्चों के लिए।

नानु-ङाई जीवन-चक्र का तर्क दिखाती है। पानी सावधानी से लाया जाता है। पुजारी मुर्गा और मुर्गी, संगदाई और संगलौ, अदरक, मदिरा और भात के साथ तिंगकाओ रागवांग तथा गढ़ने वाले जोड़े दमपपु और दमपपुई को चढ़ाता है। ऐसी पहचान के बिना बच्चा स्रष्टा के नीचे पूरी तरह नहीं बैठता। रीति लंबी आयु, वृद्धि और बाद के बड़े कर्तव्य पूरे करने की शक्ति माँगती है।

हेराका अपने मौसमी नाम रखता है: नया साल हेपुमरा, बोआई पर हेलेइंगी, बोआई पूरी होने पर नचांगङी, कटाई पर पुआकपतङी, साल के अंत हेगांगी, और बड़ा भोज अमांग जौलुबी। नए साल की प्रार्थना मंदिर केलुमकी तक जा सकती है, पवित्र जल, पुजारी का उपवास, और पवित्र दिनों में कुछ लोगों को मंदिर से रोकने वाले शुद्धि नियम के साथ।

दोनों धाराओं ने कई पुराने गेन्ना काट दिए हैं जो अब बसे हुए जीवन से नहीं मिलते। दोनों अभी भी पर्व-समय और विपत्ति-समय, पहली बारिश, ओला, आग, भूकंप, को सामुदायिक संयम से बाँधते हैं।

चप्रियाक कैसे पूजता है

चप्रियाक तीन रीतियाँ नाम देता है। नेहमेई छोटी प्रार्थना और काम से विश्राम है। रा-कालुमेई ऊँचे देवता की उपासना है। रा-खांगमेई छोटी शक्तियों का शमन है ताकि जीवितों को कष्ट न दें। भक्त केवल “आउ अपौ तिंगकाओ रागवांग” जप सकता है। या जल चढ़ा सकता है। या नामित रीति कर सकता है: धन बुलाना, धान बुलाना, आत्मा बुलाना, रक्षा रीति। मुकु बानरु और तरांगकाई जैसे बड़े पारिवारिक यज्ञ मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा में सहायक कहे जाते हैं। रविवार और पूर्णिमा पर कलुम कई, उपासना-घर, में जमाव अब ऊँचे देवता को स्थायी सार्वजनिक कमरा देता है। गान-ङाई के बाद भाई-देवताओं को लारेन रौमेई मिलती है। निचला लोक फेंका नहीं जाता। उसे समय-सारणी मिलती है।

हेराका ने वेदी कैसे बदली

हेराका का अर्थ है छोटी देवियों-देवताओं पर बाड़। रीति-परिवर्तन गाईडिनल्यु के लंबे उपदेश में चरणों में चला। पहले बलि केवल तिंगवांग को। फिर कम रक्त। फिर रक्त बहे बिना वध। 11 जनवरी 1990 को उत्तर कछार पहाड़ियों के कपेलो में उन्होंने घोषणा की कि बलि-आहुति की आवश्यकता पूरी हो चुकी, और कहा कि लोग साफ मन-शरीर से, स्तोत्र और प्रार्थना-गीत से पूजा करें। हिंगदे, दैनिक जीवन का नियम, खाली हाथ प्रार्थना, आदर, सत्य, पुनर्जन्म और जलुआ, पूर्णिमा का दिन, माँगता है। प्रार्थना-घर अलग अभयारण्य की तरह बनता है।
इसलिए वही लोग गान-ङाई को पहचान और धन्यवाद के रूप में रख सकते हैं, जबकि हेराका रीति का केंद्र कई मुँह खिलाने से हटकर एक देवता के सामने खड़े होने पर आ जाता है।

ये रीतियाँ क्या कर रही हैं

ज़ेलियांग्रोंग रीति चार दुनियाओं को जोड़ती है। खेती का साल। शयनगृह और पेई। चूल्हे पर पूर्वज। आकाश के ऊपर ऊँचा देवता। अदरक और आग सप्ताह साफ करती हैं। मदिरा और पहला स्वाद इंसानों के खाने से पहले देवता को दाखिल करते हैं। द्वार-रीति खतरे को बाहर रखती है। बाल-रीति नए व्यक्ति को सृष्टि में लिखती है। आत्मा-आह्वान माँगता है कि गाँव से श्वास ढेर होकर न जाए।

चप्रियाक यह काम भरी मेज से करता है। हेराका रक्त और छोटे नाम हटाकर करता है। कोई भी रीति को वैकल्पिक वेश नहीं मानता। तीन राज्यों में फैले लोगों के लिए पर्व नक्शा भी है। जब वाकचिंग में ढोल उठता है, तामेंगलोंग, हाफलोंग और नागा पहाड़ियाँ याद रखती हैं कि वे अभी भी एक ही सभा की तरह खाते, दफनाते और प्रार्थना करते हैं, भले गाईडिनल्यु ने जो प्रशासनिक छत माँगी थी वह अभी बनी नहीं।

रानी गाईडिनल्यु का महत्व यह नहीं है कि एक किशोरी ने भाला उठा लिया। महत्व यह है कि लोंगकाओ की एक रोंगमेई लड़की ने आस्था, कर-इनकार और पहाड़ी वफादारी को एक शक्ति बना दिया जिसे ब्रिटिश राज खरीद नहीं सका, और बाद में उसने भारतीय एकता को अलग झंडे के बदले नहीं बेचा।

उन्होंने पूर्वोत्तर को फुटनोट नहीं, कमान का केंद्र बनाया

मैदानी स्मृति अक्सर 1857, 1920 और 1942 को पूरी कहानी मान लेती है। गाईडिनल्यु की लड़ाई दूसरे घड़ी पर चली। 29 अगस्त 1931 को हैपौ जादोनांग को इंफाल में फाँसी के बाद सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने आध्यात्मिक और सैन्य नेतृत्व संभाला। यही उनका पहला सार्वजनिक अर्थ है। दूर के लोगों का अपना सेनापति था।

हेराका सजावट नहीं, रीढ़ थी

उन्हें केवल स्वतंत्रता सेनानी की फाइल में रखना गलत पढ़ाई है। लगभग 1927 में वे हेराका से जुड़ीं। हेराका का अर्थ शुद्ध है। अनुयायी तिंगकाओ रागवांग की उपासना करते थे। आंदोलन देशज रीति साफ करना, धर्मांतरण रोकना, घर-कर और पोथांग बेगार खत्म करना, और नागा राज या मकाम ग्वांगदी के रूप में स्वशासन सोचना चाहता था। उसी में उन्हें चेराचामदिनल्यु का अवतार माना गया। उनकी आत्मा से जुड़ी पंक्ति राजनीतिक धर्मशास्त्र है: हम स्वतंत्र लोग हैं। गोरे आदमी को हम पर राज नहीं करना चाहिए।

ब्रिटिश फाइलों ने उन्हें जादूगरनी और आतंक कहा। उनके लोगों ने उन्हें पवित्र नेता माना। गाईडिनल्यु जल और पानी बनती गोलियों की कहानियाँ तोपखाने की पुस्तिका नहीं थीं। वे बताती थीं कि निराकार ऊँचा देवता और जीवित लड़की आज्ञा का एक केंद्र कैसे बनी। उस केंद्र के बिना कर-हड़ताल बिखरा गुस्सा रह जाती। उसके साथ बस्तियाँ एक सभा की तरह चलीं।

चौदह वर्ष की जेल ने साबित किया कि राज अभी भी उनसे डरता था

17 अक्टूबर 1932 को पुलोमी में भोर के हमले में पकड़ी गईं, इंफाल में मुकदमा चला, सोलह वर्ष में उम्रकैद हुई। गुवाहाटी, शिलांग, आइजॉल और तुरा की जेलों में घुमाया गया ताकि एक कैद मजार न बन जाए। 1937 में नेहरू शिलांग जेल में मिले, उन्हें पहाड़ियों की बेटी कहा, रानी की उपाधि दी। राज्य सचिव ने जल्दी रिहाई से इनकार किया, कहा कि छूटी तो उपद्रव फिर उठ सकता है। एक वाक्य में औपनिवेशिक महत्व यही है। बंद किशोरी भी उठान लग रही थी।

कोठरी में उन्होंने भाषाएँ सीखीं। शरीर बंद था। किंवदंती बढ़ी। 1947 में नेहरू के हस्तक्षेप पर तुरा से रिहाई हुई। स्वतंत्रता को काम का अंत नहीं माना।

साम्राज्य के बाद उन्होंने एकता चुनी, अलगाव नहीं

कुछ बाद की आवाजें इसी हिस्से को छोटा रखना चाहती हैं। उन्होंने नागा नेशनल काउंसिल की अलगाववादी माँग का विरोध किया। कहा कि वह भारतीय हैं। भारत संघ के भीतर ठोस ज़ेलियांग्रोंग प्रशासनिक इकाई चाहती हैं, अलग राष्ट्र नहीं। चर्च और कुछ नागा राष्ट्रवादी स्वर हेराका को ईसाई-विरोधी कहकर उन्हें बाधा मानते रहे।

1960 से 1966 तक वह फिर भूमिगत हुईं, लगभग एक हजार अनुयायियों के साथ, कुछ पुरानी राइफलों के साथ। यह दूसरा संघर्ष भारत को विदेशी साम्राज्य मानकर नहीं था। जनवरी 1966 में समझौते के तहत बाहर आईं। कुछ नागालैंड सशस्त्र पुलिस में गए। शास्त्री और बाद में इंदिरा गांधी से मुलाकात हुई, ज्ञापन दिए गए। माँगी इकाई काफी हद तक अधूरी रही। रुख नहीं बदला।

1947 के बाद का महत्व इसलिए दोहरा है। पहाड़ियों को उनके देवता से धर्मांतरित नहीं होने देना। पहाड़ियों को भारत के नक्शे से काटकर अलग नहीं होने देना।

आज वह किस बात की याद हैं

1972 में ताम्रपत्र, 1982 में पद्म भूषण, 1983 में विवेकानंद सेवा पुरस्कार मिला। बाद में भारत ने डाक टिकट और सिक्का जारी किया। ये आधिकारिक स्मृति के नाम हैं। पूरा अर्थ नहीं हैं।
टिकाऊ महत्व एक परीक्षा है।

क्या बिना स्कूल प्रमाणपत्र के लोग ऐसा सेनापति पैदा कर सकते हैं जिसे राज्य को शिकार करना पड़े?
क्या पवित्र लड़की की कीमत लगाकर उसे बेचा जा सकता है? 1932 में उत्तर नहीं था।

क्या देशज आस्था मिशन और अलगाववादी राजनीति दोनों के बाद बच सकती है? उन्होंने दूसरा जीवन इसी हां पर लगाया, संघ के भीतर।

क्या पूर्वोत्तर का इतिहास केवल मैदान से लिखा जा सकता है? उनका जीवन कहता है नहीं।

तीन अवस्थाएँ तर्क को थामे रखती हैं। सोलह वर्ष, पुलोमी की हथकड़ियाँ, क्योंकि गाँवों ने उन्हें नहीं बेचा। लगभग पचास वर्ष, हेनिमा के जंगल से निकलना, अपने लोगों के लिए, सिंहासन के लिए नहीं। वृद्ध स्त्री, तीन राज्यों में बिखरे लोगों के लिए अब भी एक छत की माँग। पुरस्कार फाइल बंद करते हैं। वह अधूरी छत फाइल खुली रखती है। साम्राज्य उनसे डरा क्योंकि उन्हें खरीदा नहीं जा सका। स्वतंत्र भारत ने उस न बिकी वफादारी के साथ आई माँग का पूरा उत्तर अभी नहीं दिया।

साम्राज्य उससे डरता था क्योंकि उसे खरीदा नहीं जा सकता था

ब्रिटिश भय राजनीतिक था, रहस्यमय नहीं। कर विद्रोह, पवित्र वफादारी और छापामार भूगोल राइफलों से आगे निकल सकते हैं। जल और गोलियों की कहानियाँ उन लोगों की भाषा थीं जिन्होंने पहले ही पक्ष चुन लिया था। आतंक कहने वाली फाइलें उस प्रशासन की भाषा थीं जिसने रास्तों पर नियंत्रण खो दिया था।

पाँच सौ रुपये का इनाम और दस साल की कर माफी साम्राज्य के आखिरी साधारण औजार थे। गाँवों ने उसे नहीं बेचा। यही असली कहानी है।

उसे सोलह साल की उम्र में पुलोमी की हथकड़ियों में देखो, वह लड़की जिसे पहाड़ियों ने सौदा नहीं माना। उसे लगभग पचास वर्ष की आयु में हेनिमा के जंगल से निकलते देखो, भारत के खिलाफ हारा हुआ विद्रोही नहीं, बल्कि वह नेता जो मणिपुर, नागालैंड और असम में बिखरे लोगों के लिए अब भी एक प्रशासनिक छत माँग रही थी। उसे वृद्ध स्त्री के रूप में देखो जो वही छत माँगती रही।

साम्राज्य उससे डरता था क्योंकि उसे खरीदा नहीं जा सकता था। अधूरी न्याय यह है कि जिन लोगों का उसने नाम लिया, वे अब भी उस ठोस इकाई का इंतजार करते हैं जो उसने माँगी थी। साहस यह है कि लोंगकाओ की एक किशोरी ने एक साम्राज्य को चौदह वर्ष तक एक किंवदंती बंद करने पर लगा दिया, जिसे पहाड़ियाँ पहले ही अपने पास रखने का फैसला कर चुकी थीं।

अंत में पुरस्कारों की सूची नहीं चाहिए। चाहिए तीन चेहरे एक ही स्त्री के। सोलह वर्ष, पुलोमी की हथकड़ियाँ, क्योंकि इनाम और कर-माफी दोनों ठुकरा दिए गए। लगभग पचास वर्ष, हेनिमा के जंगल से निकलना, अनुयायियों के साथ, सिंहासन के लिए नहीं, अपने लोगों की छत के लिए। वृद्ध स्त्री, तीन राज्यों में बिखरे ज़ेलियांग्रोंग के लिए अब भी एक प्रशासनिक इकाई की माँग, संघ के भीतर, अलग झंडे के बिना। ताम्रपत्र, पद्म भूषण और डाक टिकट फाइल बंद करते हैं। अधूरी छत फाइल खुली रखती है। साम्राज्य उनसे डरा क्योंकि गाँवों ने उन्हें नहीं बेचा। स्वतंत्र देश को अब भी उस न बिकी वफादारी का पूरा उत्तर देना बाकी है। याद साहस की है। न्याय अधूरा है। दोनों को एक साथ रखना ही गाईडिनल्यु को ठीक से पढ़ना है।

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