सीने पर खाई अंग्रेजों की लाठियां, हिंदी को पहनाया राजभाषा का ताज, किसानों को जमींदारों से आज़ाद कराने वाले और रियासतों का विलय करने वाले UP के पहले CM और भारत रत्न ‘पंडित गोविंद वल्लभ पंत’

आज के दौर की राजनीति देखते हैं तो क्या नज़र आता है? कुर्सी की रेस, PR का खेल, और अखबारों के फ्रंट पेज पर छपने की होड़।

लेकिन कभी सुकून से बैठकर ज़रा उस दौर के बारे में सोचिए जब राजनीति का मतलब सत्ता की मलाई खाना नहीं, बल्कि फांसी के फंदे से झूलने के लिए तैयार रहना होता था।

उस दौर में कुछ ऐसे फौलादी नेता हुए, जिन्होंने कुर्सी से प्यार नहीं किया, बल्कि कुर्सियां खुद उनका इंतज़ार करती थीं।

ऐसे ही एक विशाल और रसूखदार नेता थे पंडित गोविंद वल्लभ पंत।

वो शख्स जिसने आधुनिक उत्तर प्रदेश की नींव रखी, जिसने सदियों पुरानी ज़मींदारी को उखाड़ फेंका और जिसने हिंदुस्तान को ‘हिंदी’ के रूप में उसकी राजभाषा का असली सम्मान दिलाया।

उनकी 6 फुट की लंबी कद-काठी, भारी-भरकम आवाज़ और वो रौबदार मूंछें देखकर ही अच्छे-अच्छे ब्रिटिश अफसरों के पसीने छूट जाते थे।

आज जब हम यूपी के विकास और भारत की अखंडता की बात करते हैं, तो पंत जी के बिना ये इतिहास पूरा ही नहीं हो सकता।

चलिए, आज हिमालय की वादियों से निकले इस फौलादी नायक के उस ऐतिहासिक सफर पर चलते हैं, जो आज के हर राजनेता के लिए एक खुली किताब की तरह है।

पहाड़ों की माटी से निकला वो फौलादी नेता जिसका नाम सुनकर अंग्रेजी हुकूमत के छूट जाते थे पसीने

10 सितंबर 1887 की बात है। देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले का एक बहुत ही छोटा और शांत सा गांव है- खूंट। इसी गांव में एक साधारण से ब्राह्मण परिवार (मनोरथ पंत और माता गोबिंदी बाई) के घर एक बच्चे ने जन्म लिया।

बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ गया, तो उनकी परवरिश उनके नाना बद्रीदत्त जोशी जी ने की। नाना जी खुद ब्रिटिश सरकार में एक अधिकारी थे, इसलिए बचपन से ही पंत जी ने कानून, समाज और प्रशासन की बारीकियों को बहुत करीब से देखा और समझा।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से कानून (Law) की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने काशीपुर और नैनीताल में अपनी वकालत शुरू की। उस दौर में वकील होना बहुत बड़ी बात होती थी।

वो चाहते तो आराम से खूब पैसा छाप सकते थे, अंग्रेजों की जी-हुज़ूरी करके कोई बड़ी कुर्सी पा सकते थे। लेकिन पहाड़ की उस माटी में पल-बढ़कर जवान हुए इस नौजवान के खून में तो कुछ और ही उबल रहा था।

उन्होंने अपना वो काला कोट पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेजों को उन्हीं के बनाए हुए कानूनों के जाल में फंसाने के लिए पहना था।

‘कुली बेगार’ के खिलाफ पहाड़ का पहला बड़ा विद्रोह और वकील गोविंद वल्लभ पंत की अंग्रेजों को सीधी चुनौती

आप सोच रहे होंगे की पंत जी रातों-रात इतने बड़े नेशनल लीडर कैसे बन गए? तो इसकी शुरुआत हुई थी पहाड़ों के उस सबसे बड़े और सबसे पहले जन-आंदोलन से, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी।

उस समय अंग्रेजों ने उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल इलाकों में एक बहुत ही घटिया और अमानवीय प्रथा चला रखी थी, जिसे ‘कुली बेगार’ (Kuli Begar) कहा जाता था।

इसका मतलब था की जब भी कोई गोरा अफसर या ब्रिटिश सेना का कोई काफिला पहाड़ों से गुज़रता, तो गांव के गरीब किसानों और स्थानीय लोगों को ज़बरदस्ती उनका भारी-भरकम सामान और टेंट ढोना पड़ता था।

और मज़ाक देखिए, इस अमानवीय मेहनत का उन्हें एक पैसा तक नहीं दिया जाता था! अगर कोई बीमार है या किसी के घर में शादी है, तो भी उसे बेगार करनी ही पड़ती थी।

पंत जी ने इस ज़ुल्म को अपनी आंखों से देखा था। उनका खून खौल उठा। उन्होंने तय किया की इन गोरे साहबों को इनकी असली हैसियत दिखानी ही पड़ेगी।

1916 में उन्होंने पंडित बद्री दत्त पांडे और अन्य स्थानीय नेताओं के साथ मिलकर ‘कुमाऊं परिषद’ की स्थापना की। पंत जी ने गांव-गांव जाकर लोगों को जगाना शुरू किया।

उन्होंने पहाड़ के सीधे-सादे लोगों को समझाया की “ये हमारा पहाड़ है, ये हमारी ज़मीन है, तो हम इन अंग्रेजों की गुलामी बिना पैसे के क्यों करें?”

उनके कानूनी दिमाग और ज़बरदस्त लीडरशिप का ही नतीजा था की 1921 आते-आते यह आंदोलन एक भयंकर तूफ़ान बन गया।

बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर हज़ारों लोगों ने कुली बेगार के रजिस्टर नदी में बहा दिए। हालात ऐसे बन गए की अंग्रेजों को समझ आ गया की अगर अब ज़बरदस्ती की, तो ये पहाड़ी लोग उन्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे।

आखिरकार ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और कुली बेगार की इस कलंकित प्रथा को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। यह पंत जी की पहली सबसे बड़ी राजनैतिक और सामाजिक जीत थी।

जब काकोरी के वीरों का केस लड़ने के लिए कोर्ट रूम में खड़े हुए पंत जी और ब्रिटिश जजों की कर दी बोलती बंद

कुली बेगार आंदोलन के बाद पंडित पंत जी का नाम पूरे हिंदुस्तान के नेताओं और क्रांतिकारियों की ज़बान पर आ गया था।

लेकिन उनके लीगल करियर और देशभक्ति का सबसे बड़ा इम्तिहान तब हुआ, जब 1925 में हिंदुस्तान के इतिहास की सबसे धड़कनें रोक देने वाली घटना हुई- ‘काकोरी कांड’ (Kakori Train Action)।

राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह जैसे भारत मां के सच्चे सपूतों ने लखनऊ के पास काकोरी में ब्रिटिश खजाने से भरी ट्रेन को लूट लिया था।

यह कोई चोरी नहीं थी, यह अंग्रेजों के ही पैसे से हथियार खरीदकर उन्हें देश से भगाने का एक जज़्बा था। लेकिन जब अंग्रेज पुलिस ने इन क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया, तो ब्रिटिश हुकूमत बुरी तरह बौखलाई हुई थी।

उन्होंने तय कर लिया था की इन लड़कों को किसी भी कीमत पर फांसी के फंदे पर लटकाना है।

उस वक्त दहशत इतनी भयंकर थी की कोई भी आम वकील इन क्रांतिकारियों का केस लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। जो भी आगे आता, ब्रिटिश सरकार उसका लाइसेंस रद्द करने या उसे जेल में डालने की धमकी दे देती।

तभी उस सन्नाटे को चीरते हुए पंडित गोविंद वल्लभ पंत आगे आए। उन्होंने परवाह नहीं की कि इसका अंजाम क्या होगा। वे चंद्रभानु गुप्त और मोहनलाल सक्सेना जैसे वकीलों की टीम के साथ काकोरी के उन वीरों का बचाव करने के लिए अदालत में उतर गए।

कोर्ट रूम का वो नज़ारा सच में किसी फिल्म से कम नहीं था। ब्रिटिश जज पहले से ही फांसी की सज़ा मन में तय करके बैठे थे, लेकिन पंत जी ने अदालत में जो लीगल बहस (Cross-examination) की, उसने उन गोरे जजों के भी पसीने छुड़ा दिए।

पंत जी ने ब्रिटिश कानूनों की ही धज्जियां उड़ाते हुए साबित करने की कोशिश की कि इन युवाओं ने कोई व्यक्तिगत अपराध नहीं किया है, बल्कि ये तो राजनैतिक बंदी हैं। उनके हर एक लीगल पॉइंट पर अदालत में सन्नाटा छा जाता था।

भले ही अंग्रेजी हुकूमत की उस बहरी और पक्षपाती अदालत ने बिस्मिल और अशफाक जैसे हमारे वीरों को फांसी की सज़ा सुना दी हो, लेकिन पंत जी ने पूरे देश को यह दिखा दिया की भारतीय वकील अंग्रेजों की आंखों में आंखें डालकर उन्हें उन्हीं के कोर्ट में बेनकाब कर सकता है।

इस घटना के बाद पंडित गोविंद वल्लभ पंत पूरे संयुक्त प्रांत (यूपी) और भारत के सबसे सम्मानित नेताओं की कतार में सबसे आगे खड़े हो गए थे।

लखनऊ में साइमन कमीशन का विरोध और नेहरू को बचाने के लिए अपने सीने पर झेली अंग्रेजों की बेरहम लाठियां

वकालत और कोर्ट रूम की बहस अपनी जगह है, लेकिन जब बात सड़क पर उतरकर अंग्रेजों की बंदूकों और लाठियों का सामना करने की आती है, तो अच्छे-अच्छों के पैर कांप जाते हैं।

लेकिन पहाड़ में पले-बढ़े पंत जी का सीना वाकई किसी चट्टान से कम नहीं था। 1928 का वो साल हिंदुस्तान के इतिहास में एक बड़े भूचाल का साल था।

अंग्रेजों ने भारत के लिए कानून बनाने के वास्ते ‘साइमन कमीशन’ भारत भेजा था, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। पूरे देश का खून खौल रहा था और हर तरफ एक ही नारा गूंज रहा था- “साइमन गो बैक!”

नवंबर 1928 में यह कमीशन लखनऊ पहुंचने वाला था। पंडित जवाहरलाल नेहरू और गोविंद वल्लभ पंत के नेतृत्व में वहां एक विशाल और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया।

हज़ारों की भीड़ काले झंडे लेकर सड़क पर उतरी हुई थी। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत बुरी तरह बौखलाई हुई थी। उन्हें किसी भी तरह इस भीड़ को कुचलना था।

जैसे ही प्रदर्शनकारियों का जत्था आगे बढ़ा, ब्रिटिश घुड़सवार पुलिस ने बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर एक बेहद खौफनाक और बेरहम लाठीचार्ज कर दिया।

अंग्रेज पुलिस वालों का मुख्य निशाना उस वक्त पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। घोड़े पर सवार एक गोरे अफसर ने नेहरू जी को निशाना बनाकर लाठी उठाई।

और तभी… उस अफरा-तफरी और चीख-पुकार के बीच 6 फुट लंबा एक फौलादी इंसान नेहरू जी के आगे ढाल बनकर खड़ा हो गया। वो और कोई नहीं, पंडित गोविंद वल्लभ पंत थे।

उन्होंने नेहरू जी को अपने मजबूत कंधों के पीछे छिपा लिया और अंग्रेजों की वो भारी-भरकम और लोहे की नोक वाली लाठियां सीधे पंत जी के सिर, पीठ और कंधों पर बरसने लगीं।

एक, दो, दस… ना जाने कितनी लाठियां उन्होंने अपने नंगे शरीर पर झेलीं, लेकिन वो चट्टान की तरह अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिले। उन्होंने उफ़ तक नहीं की।

इस अमानवीय लाठीचार्ज में उन्हें इतनी गहरी और गंभीर चोटें आईं की उनके नर्वस सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचा। इसी चोट की वजह से उन्हें ज़िंदगी भर के लिए एक शारीरिक कंपन (Tremor) की बीमारी हो गई, जिसमें उनकी गर्दन हमेशा हल्की-हल्की हिलती रहती थी।

लेकिन भाईसाहब, अंग्रेजों की लाठियां उनके शरीर को तो कंपा सकती थीं, लेकिन उनके उस फौलादी हौसले और देशभक्ति को वो एक रत्ती भी नहीं डिगा पाईं।

यह कंपन उनके लिए कोई बीमारी नहीं, बल्कि देश के लिए खाई गई चोटों का वो मेडल था जिसे उन्होंने ताउम्र गर्व के साथ पहना।

आज़ाद यूपी के पहले मुख्यमंत्री बने और सदियों पुरानी जमींदारी प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंका

जब देश आज़ाद हुआ, तो सबसे बड़ी चुनौती थी उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और जटिल राज्य को संभालना। यह कोई मामूली काम नहीं था।

यूपी तब भी देश की राजनीति का दिल हुआ करता था। 1937 में ही जब प्रांतीय चुनाव हुए थे, तब पंत जी की काबिलियत देखकर उन्हें संयुक्त प्रांत (United Provinces) का प्रीमियर (मुख्यमंत्री) बनाया गया था।

और जब भारत आज़ाद हुआ, तो बिना किसी शक और सवाल के 1950 में उन्हें उत्तर प्रदेश (UP) का पहला मुख्यमंत्री चुना गया।

कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने जो सबसे पहला और सबसे धाकड़ काम किया, वह था ‘ज़मींदारी उन्मूलन कानून’ (Zamindari Abolition Act 1950)।

ज़रा उस दौर की कल्पना कीजिए। अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए ज़मींदारी प्रथा को इतना मज़बूत कर दिया था की ये ज़मींदार किसी राजा से कम नहीं होते थे।

गरीब किसानों की पीढ़ियां इन ज़मींदारों के खेतों में खून-पसीना एक कर देती थीं, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ कर्ज़, कोड़े और ग़रीबी मिलती थी।

ज़मीन जोतने वाला किसान अपनी ही ज़मीन पर एक गुलाम की तरह जी रहा था। इन ज़मींदारों का रसूख इतना तगड़ा था की बड़े-बड़े नेता भी इनसे पंगा लेने से घबराते थे क्योंकि चुनाव में पैसा और बाहुबल इन्हीं का चलता था।

लेकिन यूपी की गद्दी पर कोई आम नेता नहीं, बल्कि पंडित गोविंद वल्लभ पंत बैठे थे। उन्होंने साफ कर दिया की आज़ाद भारत में अब किसानों का कोई शोषण नहीं होगा।

तमाम विरोधों, धमकियों और राजनीतिक दबावों को दरकिनार करते हुए पंत जी ने ज़मींदारी प्रथा को हमेशा के लिए गैर-कानूनी घोषित कर दिया।

दुनिया के कई देशों (जैसे रूस या चीन) में जब ज़मींदारी खत्म की गई, तो वहां भयंकर खून-खराबा हुआ, लाखों लोग मारे गए।

लेकिन पंत जी का ये मास्टरस्ट्रोक ही था की यूपी में बिना एक बूंद खून बहाए, बिना किसी बड़ी हिंसा के, इस सदियों पुराने कलंक को मिटा दिया गया।

रातों-रात लाखों गरीब और भूमिहीन किसानों को सीधे उस ज़मीन का मालिकाना हक मिल गया, जिस पर उनके पुरखे पीढ़ियों से पसीना बहा रहे थे।

कैसे इस पहाड़ के बब्बर शेर ने रियासतों का विलय कर भारत को एक धागे में पिरो दिया

और उनके कूटनीतिक दिमाग का जलवा सिर्फ यहीं नहीं रुका। आज जो उत्तर प्रदेश का पूरा नक्शा आप देखते हैं, वो आसानी से ऐसा नहीं बना था।

यूपी के भीतर तब बनारस, रामपुर और टिहरी-गढ़वाल जैसी कई ताकतवर रियासतें थीं, जिनके अपने राजा और नवाब थे। इन रियासतों को यूपी में मिलाना एक बहुत बड़ी सिरदर्दी थी।

लेकिन पंत जी ने अपनी शांत कूटनीति (Diplomacy) और प्रशासनिक पकड़ के ज़रिए इन सभी रियासतों का उत्तर प्रदेश में एकदम स्मूथ विलय (Integration) करवा दिया। न कोई दंगा हुआ, न कोई बगावत।

एक तरफ किसानों को ज़मीन दिलाई और दूसरी तरफ यूपी का भौगोलिक एकीकरण किया। सच कहूं तो, आधुनिक और अखंड उत्तर प्रदेश के असली शिल्पकार पंडित गोविंद वल्लभ पंत ही थे।

देश के गृह मंत्री का वो सबसे बड़ा फैसला जिसने भारत के राज्यों का नक्शा खींचा

उत्तर प्रदेश को अपने पैरों पर खड़ा करने के बाद पंत जी का कद इतना बड़ा हो चुका था की दिल्ली की सत्ता उनके बिना अधूरी लगने लगी थी।

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी ये बात बहुत अच्छी तरह जानते थे की सरदार वल्लभभाई पटेल के जाने के बाद गृह मंत्रालय (Home Ministry) में जो भारीपन और सूनापन आया है, उसे सिर्फ एक ही इंसान भर सकता है- और वो थे गोविंद वल्लभ पंत।

1955 में उन्हें यूपी के मुख्यमंत्री की कुर्सी से दिल्ली बुलाकर सीधे देश का गृह मंत्री (Home Minister of India) बना दिया गया।

लेकिन ये ताज कांटों से भरा था। दिल्ली आते ही उनके सामने आज़ाद भारत की सबसे खतरनाक और पेचीदा चुनौती खड़ी थी- देश के राज्यों का पुनर्गठन (States Reorganisation Act 1956)।

ज़रा उस वक़्त के हालात समझिए। पूरे देश में भाषा के आधार पर अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर आग लगी हुई थी। कहीं दंगे हो रहे थे, तो कहीं नेता आमरण अनशन पर बैठे थे।

दक्षिण भारत से लेकर उत्तर तक एक ऐसा भूचाल आया हुआ था की लग रहा था कहीं देश फिर से टुकड़ों में न बंट जाए। लेकिन पंत जी का दिमाग जितना शांत था, उनके फैसले उतने ही पैने और अचूक थे।

उन्होंने इस पूरे विवाद को अपने हाथ में लिया, राज्यों के नेताओं के साथ अनगिनत मीटिंग्स कीं और अपनी ज़बरदस्त प्रशासनिक सूझबूझ से भारत के राज्यों का एक नया नक्शा खींच दिया।

ये उनकी ही कूटनीति थी की भाषा के आधार पर भारत के राज्यों का सफलतापूर्वक पुनर्गठन हो पाया और देश टूटने से बच गया।

कैसे जमीन-आसमान एक करके पंडित गोविन्द बल्लभ पंत ने हिंदी को दिलाया राजभाषा का सम्मान

और बात जब भाषा की आती है, तो पंत जी का वो ज़बरदस्त संघर्ष याद आता है जिसके बिना आज शायद हम और आप सरकारी दफ्तरों में सिर्फ अंग्रेज़ी ही रट रहे होते।

पंत जी की रग-रग में हिंदुस्तान की माटी बसती थी। उनका बहुत ही साफ मानना था की आज़ाद तो हम हो गए हैं, लेकिन अगर हमारी अपनी कोई राष्ट्रभाषा या राजभाषा नहीं होगी, तो मानसिक रूप से हम उम्र भर अंग्रेजों के ही गुलाम रहेंगे।

संविधान में यह लिखा गया था की 1965 तक अंग्रेज़ी का इस्तेमाल चलेगा, लेकिन उसके बाद देश की भाषा क्या होगी? इस सवाल को लेकर दिल्ली में बैठे अंग्रेज़-परस्त बाबू हिंदी को दफनाने की पूरी तैयारी कर चुके थे।

लेकिन गृह मंत्री की कुर्सी पर पंत जी बैठे थे। उन्होंने 1957 में अपनी अध्यक्षता में एक बेहद पावरफुल ‘राजभाषा संसदीय समिति’ (Parliamentary Committee on Official Language) का गठन किया।

इस कमेटी के कंधों पर भारत की भाषा का भविष्य तय करने की ज़िम्मेदारी थी। पंत जी ने सिर्फ कागज़ी बातें नहीं कीं, बल्कि ग्राउंड पर उतरकर काम किया।

उन्होंने ठान लिया था की केंद्र सरकार का सारा कामकाज धीरे-धीरे अंग्रेज़ी से हटाकर हिंदी में शिफ्ट करना ही होगा।

ये रास्ता बिल्कुल आसान नहीं था! दक्षिण भारत के राज्यों से भयंकर विरोध उठने लगा था। कई नेता अंग्रेज़ी को ही हमेशा के लिए देश पर थोपना चाहते थे।

लेकिन यहाँ पंत जी के उसी शांत और अचूक कूटनीतिक दिमाग ने काम किया। उन्होंने सूझबूझ से बीच का रास्ता निकाला।

उन्होंने साफ किया की हम दक्षिण या पूर्व की किसी भी क्षेत्रीय भाषा (Regional Language) का हक़ नहीं मार रहे हैं, लेकिन कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदुस्तान को जोड़ने वाली एक ‘संपर्क भाषा’ तो चाहिए ना, और वो ताकत सिर्फ और सिर्फ हिंदी में है।

उन्होंने सरकारी कर्मचारियों के लिए बाकायदा ‘हिंदी ट्रेनिंग’ की क्लासेस शुरू करवाई।

सरकारी कानूनों, गैजेट्स और मैनुअल्स का हिंदी में अनुवाद (Translation) शुरू हुआ। उन्होंने यह भी तय करवाया की देश की सबसे बड़ी परीक्षा यानी सिविल सर्विसेज (UPSC) के एग्जाम में हिंदी को उसकी हक़ की जगह मिलेगी और अदालतों में हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाएगा।

आज अगर संसद से लेकर सरकारी दफ्तरों के साइनबोर्ड और फाइलों पर हिंदी शान से खड़ी है, तो वो पंडित गोविंद वल्लभ पंत जी की उसी ज़िद और उनके उस अड़ियल विज़न का नतीजा है!

भारत रत्न का वो सच्चा हकदार जिसका जीवन आज की राजनीति के लिए एक ऐसी किताब है जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए

देश के लिए इतनी लंबी, बेदाग और निस्वार्थ सेवा का इतिहास आपको आज की राजनीति में दूर-दूर तक ढूंढने से नहीं मिलेगा। एक ऐसा नेता जिस पर अपने पूरे राजनीतिक जीवन में भ्रष्टाचार का एक भी धब्बा नहीं लगा।

एक ऐसा इंसान जो कुर्सी के पीछे नहीं भागा, बल्कि कुर्सियां जिसके पीछे-पीछे चलती थीं। अपनी जान की बाज़ी लगाकर क्रांतिकारियों को बचाना, सीने पर लाठियां खाना और फिर देश की तकदीर बदलना- यह किसी आम इंसान के बस की बात नहीं थी।

उनके इसी निस्वार्थ देशप्रेम, अदम्य साहस और भारत के निर्माण में दिए गए उनके अमूल्य योगदान को सिर आंखों पर बिठाते हुए, साल 1957 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ (Bharat Ratna) से नवाज़ा।

वो सच में इस सम्मान के सबसे सच्चे और असली हक़दार थे।

7 मार्च 1961 को इस महान स्वतंत्रता सेनानी और आधुनिक भारत के शिल्पकार ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। जब उनका निधन हुआ, तो पूरे देश में एक ऐसा सन्नाटा छा गया था जैसे हिंदुस्तान ने अपना एक मज़बूत कंधा खो दिया हो।

आज जब हम चौराहों पर नेताओं की बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स देखते हैं और टीवी पर रोज़ नई राजनीतिक नौटंकियां देखते हैं, तो दिल यही कहता है की काश! आज के ये नेता पंडित गोविंद वल्लभ पंत जी के जीवन का एक पन्ना ही सही से पढ़ लेते।

उन्होंने हमें सिखाया की सत्ता का मतलब जनता पर राज करना नहीं, बल्कि जनता के हक़ के लिए ज़मींदारों से लड़ जाना होता है। उन्होंने सिखाया की अगर आपकी नीयत साफ है, तो आप बिना खून की एक बूंद बहाए भी सदियों पुरानी व्यवस्थाओं को उखाड़ कर फेंक सकते हैं।

पंडित गोविंद वल्लभ पंत जी का नाम सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज़ एक नाम नहीं है, वो हिंदुस्तान के माथे पर चमकता हुआ वो स्वाभिमान है, जो आने वाली अनगिनत पीढ़ियों को ये याद दिलाता रहेगा की देशभक्ति का असली मतलब क्या होता है।

शत-शत नमन ऐसे भारत रत्न को!

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