आजकल अखबार उठाओ या न्यूज़ चैनल लगाओ, ऐसा लगता है जैसे हम किसी सभ्य समाज में नहीं, बल्कि किसी आदिम युग में जी रहे हैं।
कागज़ों और सरकारी फाइलों में तो हमारे राज्य एकदम ‘सुशासन’ का स्वर्ग बन चुके हैं। वहां महिला सुरक्षा के इतने बड़े-बड़े दावे दर्ज़ हैं की पढ़कर ही इंसान को लगने लगे की इससे सुरक्षित जगह तो दुनिया में कोई है ही नहीं!
लेकिन ज़मीनी हकीकत इन सरकारी फाइलों से बिल्कुल उल्टी और खौफनाक है।
सड़कों पर आज पूरा जंगलराज चल रहा है। आज गली-मोहल्ले का कोई भी सड़कछाप मवाली खुद को संस्कृति का ठेकेदार और ‘मोरल पुलिस’ मान बैठा है।
सबसे बड़ा मज़ाक तो ये है की पहले ये गुंडे सरेआम किसी बेटी की आबरू से खिलवाड़ करते हैं, और फिर उस पूरे जाहिलपना का वीडियो भी रिकॉर्ड कर लेते हैं और सोशल मीडिया पे पोस्ट कर देते हैं।
क्या वाकई हमारे सिस्टम और समाज का ज़मीर इतना मर चुका है की किसी की इज़्ज़त के साथ खेलना अब बस एक ‘वायरल तमाशा’ बनकर रह गया है?
What is happening to our society?
A disturbing video from Jamui, Bihar shows a young girl and boy allegedly being surrounded, harassed and humiliated by a group of men in the name of so-called “moral policing.” The girl is seen desperately trying to get away while being… pic.twitter.com/OE9ttMxkkJ
— The Modern Himachal (@themodernhp) September 21, 2026
जमुई की शर्मनाक घटना जहां स्कूल जाती नाबालिग को गुंडों ने सरेआम घेरा और वीडियो बनाकर बन गए ‘स्वयंभू ठेकेदार’
इसी सितम्बर 19 को जमुई जिले से एक ऐसा वीडियो सामने आया जिसने हर आम इंसान को अंदर तक झकझोर कर रख दिया।
एक मासूम नाबालिग बच्ची अपने एक पुरुष मित्र के साथ कोचिंग से लौट रही थी। अब इस आज़ाद देश में किसी लड़की का अपने दोस्त के साथ सड़क पर चलना कौन सा गुनाह हो गया? लेकिन हमारे समाज के इन ‘स्वयंभू ठेकेदारों’ को ये बात रास नहीं आई।
रास्ते में कुछ मनचलों और गुंडों की एक पूरी भीड़ ने उन्हें बीच सड़क पर घेर लिया। और मज़े की बात देखिए, ये कोई खाकी वर्दी वाले पुलिसकर्मी नहीं थे जो कानून व्यवस्था देख रहे हों।
ये तो वो गली के मवाली थे जिन्हें कानून का रत्ती भर खौफ नहीं था। इन गुंडों ने सरेआम उस बच्ची के दोस्त को लात-घूंसों से बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया। और फिर इन भेड़ियों ने उस अकेली नाबालिग बच्ची को घेर लिया।
सरेआम एक बच्ची के साथ छेड़छाड़ और शारीरिक उत्पीड़न करने की कोशिश की जा रही थी। उसे ज़लील किया जा रहा था। ऊपर से बेशर्मी की हद तो ये थी की वो इस पूरी घटना को वीडियो में रिकॉर्ड कर रहे थे!
इस घटना का वीडियो 21 सितंबर 2026 की देर रात सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद पूरे बिहार में भारी आक्रोश फैल गया।
वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने पोक्सो (POCSO) एक्ट और अन्य संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की। पुलिस ने कुल 8 आरोपियों को गिरफ्तार किया।
मुख्य आरोपी नंदन यादव और उसके साथी हरेराम यादव को पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान पकड़ा। जवाबी कार्रवाई में मुख्य आरोपी नंदन यादव घायल हुआ, जबकि दूसरे आरोपी के पैर में फ्रैक्चर आया।
अब आप ही बताइये जब वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस एक्शन ले, सड़कों पर ऐसे मवालियों का राज चलने लगे और पुलिस का डर न रहे, तो आम आदमी अपनी हिफाज़त के लिए आख़िर जाए तो जाए कहाँ?
जमुई की इस घटना ने साफ कर दिया की बिहार की सड़कों पर कानून का खौफ अब सिर्फ एक मज़ाक बनकर रह गया है।
जमुई की आग ठंडी भी नहीं हुई थी की समस्तीपुर के कर्पूरीग्राम में वही दरिंदगी फिर दोहराई गई

अब कोई सोचेगा की जमुई में इतना बड़ा बवाल कटा है, वीडियो वायरल हुआ है, तो प्रशासन थोड़ा तो चुस्त होगा। गश्त-वश्त बढ़ाई जाएगी।
लेकिन अरे कहाँ! अभी तो जमुई के इस कांड की आग ठीक से ठंडी भी नहीं हुई थी की समस्तीपुर से एक और ऐसा कांड सामने आ गया जिसने इंसानियत का सिर शर्म से झुका दिया।
ये घटना समस्तीपुर के कर्पूरीग्राम थाना क्षेत्र की है। वहां जगतसिंहपुर बांध के पास एक नाबालिग लड़की अपने एक दोस्त के साथ बाइक खड़ी करके बस फोटो खींच रही थी।
फिर वही जमुई वाली स्क्रिप्ट दोहराई गई। वहां कुछ आदमियों का एक झुंड धमकता है। वो आते ही बिना कुछ पूछे-समझे लड़के पर टूट पड़ते हैं, उसे पीट-पीटकर वहां से भगा देते हैं।
इसके बाद जो हुआ, वो सुनकर किसी भी बाप या भाई का खून खौल उठे। उस दरिंदों की भीड़ ने उस अकेली, निहत्थी नाबालिग बच्ची को चारों तरफ से घेर लिया।
वो बच्ची रोते-रोते उनके हाथ जोड़ रही थी, गिड़गिड़ा रही थी की ‘मुझे छोड़ दो भैया’, लेकिन उन भेड़ियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
उन्होंने सरेआम उस बच्ची के बाल खींचे, उसके साथ गंदी बदसलूकी और छेड़छाड़ की, भद्दी-भद्दी गालियां दीं। और हद तो तब हो गई जब इस पूरी घिनौनी हरकत का बाकायदा वीडियो बनाकर मज़े लेते हुए उसे सोशल मीडिया पर डाल दिया गया।
ज़रा इन दरिंदों की उम्र देखिए! जब पुलिस की नींद टूटी (वो भी तब, जब वीडियो इंटरनेट पर आग की तरह फैल गया), तो उन्होंने 4 लोगों को पकड़ा।
इनके नाम हैं- राहुल कुमार (उम्र 19 साल), विकास शर्मा (32 साल), रामबाबू साहनी (38 साल) और अवधेश पासवान (उम्र 46 साल)।
अब बताइए, 46 साल और 38 साल के अधेड़ उम्र के आदमी एक 14-15 साल की बच्ची को घेरकर उसे नोच रहे हैं… क्या इनके घर में खुद की बेटियां नहीं होंगी?
इन्हें ये हक़ किसने दे दिया की ये सड़क पर मोरल पुलिसिंग के नाम पर किसी भी बच्ची की आबरू से खेलें? और सबसे बड़ा सवाल ये है की पुलिस तभी क्यों जागती है जब कोई वीडियो वायरल होता है?
‘रील बनाओगे तो मारे जाओगे’… सत्ता के शिखर से गूंजता ये कैसा अजीबोगरीब ज्ञान
‘रील नहीं बनाता तो पकड़ाता क्या?’
Jamui कांड पर CM Samrat Choudhary का वीडियो वायरल, रील बनाने की बात कर आरोपियों पर बोले – ‘रील नहीं बनाता तो पकड़ाता क्या?’ पूरा सुनिए क्या कहा…
Jamui Case | Bihar Jamui | Samrat Choudhary | #Bihar pic.twitter.com/wHeUWXByqZ
— News Pinch (@TheNewspinch) September 23, 2026
जमुई और समस्तीपुर की इन घटनाओं ने पूरे समाज को हिला कर रख दिया था। आम आदमी को लगा की अब तो सत्ता के शिखर पर बैठे लोग कुछ कड़ा एक्शन लेंगे।
कोई बहुत सख्त संदेश आएगा की “अगर किसी बेटी की तरफ आंख उठाई, तो सीधा एनकाउंटर होगा।”
लेकिन भाई, इसके बाद हमारे सिस्टम की तरफ से जो बयान आया, उसे सुनकर तो किसी का भी माथा ठनक जाए।
सूबे के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी जी कैमरे के सामने आते हैं और इन गुंडों को धमकाने या पुलिस को टाइट करने के बजाय एक अजीबोगरीब प्रवचन देने लगते हैं।
उनका बयान कुछ यूं था- “आजकल रील हीरो बहुत हो गया है… रील बनाओगे तो पकड़े जाओगे… अगर रील नहीं बनाया होता तो पकड़ाता क्या? रील बनाने के चक्कर में मारे जाओगे।”
अब आप ही बताइए, ये सुनकर इंसान हंसे या रोए? मतलब, क्या बिहार में कानून व्यवस्था का संदेश अब सिर्फ इतना रह गया है की “अपराध करो, बस वीडियो मत बनाओ”?
सीएम साहब का यह बयान सुनकर तो ऐसा लगता है जैसे उन्हें इस बात का दुख नहीं है की सड़कों पर बच्चियों के साथ सरेआम बदसलूकी हो रही है, बल्कि उन्हें इस बात की फिक्र है की इन बेवकूफ गुंडों ने वीडियो बनाकर खुद को फंसा लिया!
अगर इन मवालियों ने उस घिनौनी हरकत का वीडियो नहीं बनाया होता, तो क्या वो मासूम बेटियां न्याय के लायक भी नहीं थीं? क्या वो घटना कोई अपराध नहीं मानी जाती?
समाज के इन स्वयंभू ठेकेदारों को किसने अधिकार दिया की वे सड़कों पर निकलें, किसी की भी आबरू से खिलवाड़ करें और फिर आराम से निकल जाएं?
और जब सत्ता के ऊंचे पदों पर बैठे लोग अपराधियों को ‘वीडियो ना बनाने’ की ऐसी अजीबोगरीब नसीहत देने लगें, तो समझ लीजिए की सिस्टम बेटियों की सुरक्षा को लेकर कितना असंवेदनशील और खोखला हो चुका है।
ये बेटियों के दर्द के साथ किया गया सबसे भद्दा मज़ाक है।
समस्तीपुर के ठीक बाद मुजफ्फरपुर से दिल दहला देने वाली घटना, बिहार में लफंगो के हौसले बुलंद और प्रशासन सुस्त
सिस्टम की इसी ढिलाई और नेताओं की इसी बयानबाज़ी का नतीजा है की अपराधियों के हौसले आसमान छू रहे हैं। उन्हें पता है की कुछ भी कर लो, अंत में सिस्टम कोई न कोई बहाना निकालकर उन्हें बचा ही लेगा।
समस्तीपुर की घटना के तुरंत बाद 23 सितंबर को मुजफ्फरपुर के बोचहां (मीनापुर इलाके के पास) से जो खबर आई, उसने एक बार फिर साबित कर दिया की बेटियां बिहार में बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं हैं।
वहां एक आवारा लड़का, जिसका नाम ललित है, पिछले तीन महीनों से तीन नाबालिग बहनों का लगातार पीछा कर रहा था। वो उन्हें आते-जाते परेशान करता था। परिवार परेशान था, बच्चियां डरी हुई थीं।
और फिर 23 सितंबर को उस मनचले ने सारी हदें पार कर दीं। जब वो तीनों मासूम बहनें अपने ही घर के बाहर खेल रही थीं, तब ललित वहां आ धमका।
उसने एक बच्ची को जबरन अपने साथ ले जाने की कोशिश की। लेकिन दाद देनी होगी उन तीनों बहनों की हिम्मत की, की वो डरी नहीं और उन्होंने उस मनचले का डटकर विरोध किया।
अपनी ही चोरी और ऊपर से सीनाजोरी देखिए, जब उस आवारे ने देखा की बच्चियां उसका विरोध कर रही हैं, तो उसने पास पड़ी एक लोहे की रॉड उठाई और उन मासूमों पर हमला कर दिया।
इस हमले में बच्चियों को काफी चोटें आईं और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा। ज़रा सोचिए, एक घर के बाहर खेलती बच्चियों पर दिन-दहाड़े ऐसा हमला हो जाना, किस तरह के ‘सुशासन’ की गवाही देता है?
लेकिन इस पूरी घटना का सबसे शर्मनाक पहलू तो पुलिस की कार्यप्रणाली है। जब पुलिस ने आरोपी ललित को पकड़ा, तो उसके इस खौफनाक अपराध पर सख्त से सख्त केस दर्ज़ करने के बजाय, खाकी वर्दी वालों ने तुरंत अपनी वही पुरानी और घिसी-पिटी थ्योरी गढ़नी शुरू कर दी।
पुलिस वाले राग अलापने लगे की “हो सकता है आरोपी मेंटली डिस्टर्ब हो… मानसिक रूप से बीमार हो।”
क्या पुलिस का काम अपराधियों को सज़ा दिलवाना है या उनके बचाव में मेडिकल सर्टिफिकेट बांटना? पुलिस की इसी लीपापोती ने सड़कों पर इन दरिंदों को खुली छूट दे रखी है।
जब तक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल ना हो तब तक कुंभकरण की नींद सोता है हमारा प्रशासन
समस्तीपुर और जमुई की इन लगातार घटनाओं ने हमारे सिस्टम के एक बहुत ही नासूर बन चुके पैटर्न को बेनकाब कर दिया है।
इस नए पैटर्न का नाम है- ‘वायरल जस्टिस’ (Viral Justice)। आज के दौर में पुलिस की गश्त सड़कों, चौराहों या बांधों पर नहीं होती, बल्कि उनकी गश्त होती है ट्विटर (X), इंस्टाग्राम, और फेसबुक की टाइमलाइन पर।
ज़रा सोचिए, क्या जमुई और समस्तीपुर की उन मासूम बच्चियों को तब न्याय मिलता अगर उन दरिंदों ने खुद अपनी बेवकूफी से वो वीडियो रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर नहीं डाला होता? बिल्कुल नहीं!
अगर वीडियो नहीं होता, तो वो बच्चियां और उनका परिवार थाने के चक्कर काट-काटकर थक जाते, लेकिन उनकी एफआईआर दर्ज़ होना पहाड़ तोड़ने जैसा होता।
आज हमारे देश और खासकर बिहार के सिस्टम का अलिखित नियम ये बन गया है की जब तक आपके अपमान का तमाशा लाखों लोग अपने मोबाइल स्क्रीन पर ना देख लें, जब तक आपके दर्द को लोग शेयर और री-ट्वीट करके ‘ट्रेंड’ ना करवा दें… तब तक पुलिस की कुंभकरण वाली नींद नहीं टूटती।
FIR दर्ज़ करने के लिए अब पेन और कागज़ की नहीं, बल्कि एक ‘वायरल वीडियो’ की ज़रूरत पड़ती है।
लेकिन उन हज़ारों लड़कियों का क्या, जिनके साथ रोज़ सड़कों पर, बाज़ारों में, बसों में ऐसी मोरल पुलिसिंग होती है? जिनके साथ सरेआम बदतमीजी की जाती है, फब्तियां कसी जाती हैं, लेकिन वहां कोई कैमरा मौजूद नहीं होता?
क्या उन गुमनाम बेटियों को न्याय पाने का कोई हक़ नहीं है? क्या वो सिर्फ इसलिए घुट-घुट कर जीने को मजबूर हैं क्योंकि उनका दर्द वायरल नहीं हो पाया? सिस्टम का यह ‘वायरल न्याय’ महिला सुरक्षा के लिए बहुत शर्मनाक है।
अंत में सवाल सिर्फ सत्ता और पुलिस से नहीं है, सवाल इस पूरे समाज से भी है। ये जो सड़कों पर 4-5 की संख्या में झुंड बनाकर घूमने वाले मवाली हैं, इन्हें ये हक़ आखिर किसने दिया है की ये किसी भी लड़की को रोककर उसका चरित्र प्रमाण पत्र (Character Certificate) चेक करें?
किसी भी लड़की का अपने किसी दोस्त, भाई या सहपाठी के साथ बात करना, चलना या कहीं खड़ा होना, इन सड़क छाप ठेकेदारों को कब से चुभने लगा?
ये वो लोग हैं जो खुद दिन भर चौक-चौराहों पर खड़े होकर औरतों को घूरते हैं, लेकिन किसी लड़की को अपने दोस्त के साथ देख लें, तो अचानक से इनके अंदर की ‘संस्कृति’ जाग उठती है।
कागज़ों का सुशासन अब सड़कों पर दम तोड़ चुका है, और अगर अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो शायद कल को कोई भी बेटी घर से बाहर निकलने से पहले सौ बार सोचेगी।
