कृषि कानून थोपे
दौर बातचीत नाकाम
किसानों की मौतें
2021 का यू-टर्न
नीचे टाइमलाइन से पूरी कहानी एक नज़र में देखिए। फिर दस अध्यायों में घटनाक्रम पढ़िए। नारंगी बॉक्स मुख्य सबक हैं, नीले बॉक्स पाठक के लिए रुककर सोचने वाले सवाल हैं। मूल भाषा और तथ्य जस के तस रखे गए हैं।
अंदर क्या है
- कोरोना काल में बिना मांगे थोप दिए 3 कृषि कानून
- वो चिंगारी जिसे BJP ने बहुत हलके में ले लिया
- विपक्ष को बैठे बिठाये दे दी ऑक्सीजन
- दुनिया का सबसे लंबा चक्का जाम
- विज्ञान भवन में 11 दौर की नाकाम बातचीत
- 26 जनवरी: लाल किले पर लहूलुहान वर्दी
- राकेश टिकैत के ड्रामे ने कैसे पलटा गेम
- 700 मौतों का ठप्पा और संसद का जवाब
- लखीमपुर खीरी का खौफनाक कांड
- यूपी-पंजाब चुनाव का खौफ, सरकार का सरेंडर
एक नज़र में पूरी टाइमलाइन
| तारीख | क्या हुआ |
|---|---|
| 5 जून 2020 | तीन कृषि अध्यादेश अचानक जारी। देश कोरोना की पहली लहर में बंद था। |
| 17-20 सित 2020 | संसद में ध्वनि मत से बिल पास। सेलेक्ट कमेटी में नहीं भेजे गए। |
| अक्टूबर 2020 | पंजाब में रेल रोको। अकाली दल ने NDA तोड़ा, हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दिया। |
| 25-26 नव 2020 | दिल्ली चलो। शंभू बॉर्डर पर वाटर कैनन। सिंघु-टिकरी पर टेंट सिटी। |
| दिस-जन 2021 | विज्ञान भवन में 11 दौर बातचीत नाकाम। 18 महीने निलंबन का ऑफर भी खारिज। |
| 26 जनवरी 2021 | लाल किले पर उपद्रव। 300+ पुलिसकर्मी घायल। निशान साहिब फहराया गया। |
| 28-29 जन 2021 | राकेश टिकैत का रोना। गाजीपुर बॉर्डर रातों-रात फिर भर गया। |
| 3 अक्टू 2021 | लखीमपुर खीरी कांड। केंद्रीय मंत्री की थार से किसान कुचले गए। |
| 19 नव 2021 | गुरुपर्व पर पीएम मोदी ने तीनों कानून बिना शर्त वापस लिए। |
मास्टरस्ट्रोक सिंड्रोम की शुरुआत
राजनीति में जब किसी पार्टी को लगातार प्रचंड बहुमत मिलने लगता है, तो उसके भीतर एक अजीब सा ‘ओवरकॉन्फिडेंस’ (अति-आत्मविश्वास) घर कर जाता है। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी 303 सीटें जीतकर दोबारा सत्ता में लौटी, तो पार्टी के रणनीतिकारों और सत्ता के गलियारों में बैठे नेताओं को यह मुगालता हो गया की उनका हर फैसला एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ है।
उन्हें लगने लगा की नोटबंदी हो या SC/ST Act को मजबूत करना, अगर उन्होंने कोई फैसला ले लिया, तो जनता आंख बंद करके उस पर मुहर लगा देगी। बस, यहीं से उस ‘मास्टरस्ट्रोक सिंड्रोम’ की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर पार्टी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक घाव तैयार किया।
बीजेपी के इसी अति-आत्मविश्वास का सबसे क्लासिक और ज़मीनी उदाहरण रहा 2020 का ‘किसान आंदोलन’ (Farmers’ Protest)। एक ऐसा मुद्दा जिसने एक बेहद मजबूत, निर्णायक और अजेय दिखने वाली सरकार को सरेआम घुटनों पर ला दिया।
अगर इस पूरे घटनाक्रम का पोस्टमार्टम किया जाये, तो तस्वीर एकदम साफ हो जाती है। बात सिर्फ इस पर नहीं है की वो कृषि कानून (Farm Laws) आर्थिक रूप से सही थे या गलत। बात इस पर है की जिस ‘जल्दबाज़ी’ में इस सुधार को देश पर थोपा गया, उसने बीजेपी की रणनीतिक समझ (Strategic failure) को एक्सपोज़ कर दिया।
कानून सही थे या गलत, यह बहस अलग है। असली सवाल यह है: इतनी जल्दबाज़ी, बिना संवाद, बिना सेलेक्ट कमेटी के थोपना रणनीतिक समझदारी थी या अति-आत्मविश्वास?
1. कैसे और क्यों 2020 के कोरोना काल में BJP ने बिना मांगे थोप दिए 3 कृषि कानून
बिना प्लानिंग वाला बिल लागू करने की क्यों थी जल्दी

याद कीजिए 2020 का वो दौर। देश में कोरोना (COVID-19) की पहली लहर का कहर था। लोग लॉकडाउन में अपने घरों में बंद थे, इकॉनमी ठप्प पड़ी थी और चारों तरफ एक खौफ का माहौल था।
ठीक ऐसे वक्त में, जब पूरा देश अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में लगा था, सरकार 5 जून 2020 को अचानक कृषि सुधारों से जुड़े तीन ‘अध्यादेश’ (Ordinances) लेकर आ गई।
ज़रा एक मिनट रुककर सोचिए
- ऐसी क्या इमरजेंसी आ गई थी? क्या देश में अनाज की कमी हो गई थी?
- क्या रातों-रात दशकों पुराने कृषि सेक्टर के नियमों को बदलने के लिए कोरोना काल ही सबसे मुफीद वक्त था?
एक तटस्थ नज़रिए से देखें तो यह सरकार की पहली और सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी। अध्यादेश (Ordinance) हमेशा आपातकालीन स्थितियों में लाए जाते हैं, न की देश के 60 प्रतिशत हिस्से (कृषि क्षेत्र) के बुनियादी ढांचे को बदलने के लिए।
फिर आता है सितंबर 2020 का महीना, जब इन अध्यादेशों को पक्का कानून बनाने के लिए संसद में पेश किया गया।
- 17 से 20 सितंबर के बीच लोकसभा और राज्यसभा में जो कुछ हुआ, उसने पूरे देश को एक बहुत ही गलत संदेश दिया।
लोकतंत्र में जब कोई इतना बड़ा रिफॉर्म (सुधार) लाया जाता है, तो संसदीय परंपरा कहती है की उसे विपक्ष की मांग पर ‘सेलेक्ट कमेटी’ (Select Committee) या ‘स्टैंडिंग कमेटी’ के पास भेजा जाए, ताकि उस पर बारीकी से बहस हो सके, खामियां सुधारी जा सकें। लेकिन नहीं! सरकार को तो अपना बिना प्लानिंग वाला बिल लागू करने की जल्दी थी।
- राज्यसभा में जब विपक्ष हंगामा कर रहा था, तब बिना किसी प्रॉपर वोटिंग (डिवीजन) के, सिर्फ ‘ध्वनि मत’ (Voice Vote) के जरिए भारी हंगामे और शोर-शराबे के बीच इन बिलों को पास करा लिया गया।
एक आम आदमी यही सोचता है की जब आपके पास नंबर गेम में पूरी ताकत है, तो आपको बहस से भागने की क्या ज़रूरत थी? इस हड़बड़ी ने विपक्ष को और सबसे बढ़कर ज़मीन पर बैठे किसानों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया की “दाल में ज़रूर कुछ काला है।”
बिना किसानों से संवाद के पैदा हुई अविश्वास की खाई जिसने बोए 1 साल लंबे आंदोलन के बीज

बीजेपी की पूरी स्ट्रैटेजी यहीं पर धड़ाम हो गई। सरकार के मंत्री दिन-रात कह रहे थे की ये कानून किसानों की भलाई के लिए हैं, ये उन्हें बिचौलियों से आज़ाद कर देंगे और खेती के लिए गेम-चेंजर साबित होंगे।
ठीक है भाई, मान लिया की आपकी नीयत बहुत अच्छी थी और आप वाकई इस सेक्टर में रिफॉर्म लाना चाहते थे। लेकिन सवाल ये है की जिनके ‘फायदे’ के लिए आप ये सब कर रहे थे, क्या आपने एक बार भी उन्हें कॉन्फिडेंस में लिया?
- बिल का ड्राफ्ट तैयार करने से पहले क्या किसी बड़े किसान संगठन, भारतीय किसान यूनियन (BKU) या यहां तक की अपनी ही पार्टी (बीजेपी) के किसान मोर्चे से कोई व्यापक चर्चा (Consultation) की गई?
ऐसा कुछ नहीं हुआ!
- यह पूरा का पूरा कानून AC कमरों में बैठे उन ब्यूरोक्रेट्स ने तैयार किया था, जिन्हें शायद यह भी नहीं पता होगा की रबी और खरीफ की फसल बोने में ज़मीनी स्तर पर क्या परेशानियां आती हैं।
यही वो बिंदु था जहां से ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ (अविश्वास की खाई) पैदा हुई। आपने धारा 370 हटाने वाला फॉर्मूला खेती पर भी लागू करने की कोशिश की, ये भूलकर की ज़मीन से जुड़ा किसान कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, वह एक सामाजिक और आर्थिक सच्चाई है।
संवाद की इस भयानक कमी (Lack of Communication) ने किसानों के मन में यह खौफ भर दिया की ये कानून उनके भले के लिए नहीं, बल्कि बड़े कॉर्पोरेट घरानों (अंबानी-अडानी) को फायदा पहुंचाने के लिए उन पर ज़बरदस्ती थोपे जा रहे हैं। सरकार ने उन्हें समझाने की बजाय अपनी ताकत का इस्तेमाल करके चुप कराने की कोशिश की। और यहीं से पंजाब और हरियाणा के खेतों में सुलग रही वो चिंगारी भड़कनी शुरू हुई, जिसने आगे चलकर दिल्ली की सड़कों को पूरे एक साल के लिए बंधक बना लिया।
जो दांव बीजेपी ने बहुत सोच-समझकर खेला था, वो अब उनके लिए सबसे बड़ी गले की हड्डी बनने वाला था।
2. वो चिंगारी जिसे BJP ने बहुत हलके में ले लिया
और शुरू हो गया किसानों का खौफनाक आंदोलन

सितंबर 2020 में जब संसद से ये तीनों कानून पास हुए, तो दिल्ली के सत्ता के गलियारों में बैठे रणनीतिकारों को लगा की मामला निपट गया। उनका कैलकुलेशन था की कुछ दिन हल्ला मचेगा और फिर सब शांत हो जाएंगे। लेकिन ज़मीनी हकीकत दिल्ली के कमरों की सोच से कोसों दूर थी। कानून पास होते ही सबसे पहली और भयंकर आग पंजाब और हरियाणा में भड़की।
- अक्टूबर 2020 आते-आते पंजाब के किसानों ने ‘रेल रोको’ आंदोलन शुरू कर दिया। पटरियों पर टेंट गाड़ दिए गए और राज्य का पूरा रेल नेटवर्क ठप्प हो गया।
अगर आप इस सिचुएशन को देखें, तो सरकार के लिए यह पहला और सबसे बड़ा ‘रेड फ्लैग’ (चेतावनी) था। जब किसी राज्य का किसान हफ्तों तक अपना घर-बार छोड़कर पटरियों पर सो रहा हो, तो इसका मतलब है की मामला महज़ ‘विपक्ष की साज़िश’ नहीं है, बल्कि ज़मीन पर एक बहुत गहरा डर और अविश्वास पनप रहा है। लेकिन बीजेपी हाईकमान ने इस चिंगारी को बहुत हल्के में लिया।
सबसे पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने छोड़ दिया साथ और NDA में पढ़ गयी दरार

बीजेपी को अपनी इस राजनीतिक भूल की पहली असली कीमत अपने ही घर में चुकानी पड़ी। शिरोमणि अकाली दल (SAD) कोई मामूली पार्टी नहीं थी; वो एनडीए (NDA) के संस्थापक सदस्यों में से एक थी और दशकों से पंजाब में बीजेपी की सबसे पक्की साथी थी।
जब अकाली दल ने ज़मीन पर किसानों का भयंकर गुस्सा देखा, तो उन्हें समझ आ गया की अगर वो बीजेपी के साथ खड़े रहे तो पंजाब में उनका राजनीतिक वजूद ही खत्म हो जाएगा।
- इसी दबाव में आकर हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और अकाली दल ने बीजेपी से अपना दशकों पुराना गठबंधन तोड़ लिया।
सत्ता के ओवरकॉन्फिडेंस में बैठी बीजेपी के लिए यह एक बहुत बड़ा झटका था। आप ही बताइए, जब कोई ऐसा कानून आप ला रहे हैं जिसका सबसे ज़्यादा असर पंजाब और हरियाणा पर पड़ना है, और उसी पंजाब का आपका सबसे पुराना सहयोगी कह रहा है की ये कानून गलत हैं, तो क्या आपको एक कदम पीछे हटकर सोचना नहीं चाहिए था?
लेकिन सरकार ने इसे भी ‘अकाली दल की मजबूरी’ कहकर टाल दिया।
3. विपक्ष को बैठे बिठाये दे दी ‘ऑक्सीजन’
नैरेटिव को कंट्रोल करने में BJP हुई पूरी तरह विफल
2019 के आम चुनावों में मिली करारी हार के बाद जो विपक्ष (खासकर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी) लगभग वेंटिलेटर पर पड़ा था, इन कृषि कानूनों ने उसे एक नई राजनीतिक ‘संजीवनी’ दे दी।
राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल ने एक बहुत ही ज़हरीला नैरेटिव सेट किया- “ये कानून किसानों के लिए नहीं, बल्कि अंबानी और अडानी के लिए लाए गए हैं। सरकार आपकी ज़मीनें छीनकर बड़े कॉर्पोरेट्स को दे देगी।”
सच कहूं तो यह नैरेटिव इतना मज़बूत और खतरनाक था की बीजेपी का वो विशालकाय ‘आईटी सेल’ और मीडिया मैनेजमेंट, जो पल भर में हवा का रुख मोड़ देने का दावा करता था, वो इसके सामने पूरी तरह से लाचार और पंगु नज़र आया।
बीजेपी के नेता टीवी डिबेट्स में चिल्लाते रहे की ज़मीनें नहीं छिनेंगी, लेकिन तब तक विपक्ष ने गांव-गांव, चौपाल-चौपाल तक यह बात बैठा दी थी की सरकार किसानों को बेच रही है। कम्युनिकेशन और ‘परसेप्शन मैनेजमेंट’ के मोर्चे पर बीजेपी की यह इतनी बड़ी हार थी जिसकी भरपाई वो पूरे एक साल तक नहीं कर पाए।
किसानों का दिल्ली चलो का ऐलान और शंभू बॉर्डर पर सरकार की बड़ी गलती

जब पंजाब में सुनवाई नहीं हुई, तो नवंबर 2020 के आखिर में किसान संगठनों ने ‘दिल्ली चलो’ का नारा दे दिया। 25 और 26 नवंबर को पंजाब और हरियाणा के हज़ारों किसान अपने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में महीनों का राशन भरकर दिल्ली की तरफ निकल पड़े।
अब यहाँ सरकार और प्रशासन की उस गलती पर बात करते हैं जिसने इस पूरे आंदोलन को राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। हरियाणा की खट्टर सरकार ने किसानों को रोकने के लिए अपनी पूरी पुलिस फोर्स लगा दी।
अंबाला के शंभू बॉर्डर और अन्य नेशनल हाईवेज़ पर पुलिस ने ऐसे बैरिकेड्स लगाए जैसे सामने से किसी दुश्मन देश की फौज आ रही हो। सड़कों पर कंटीले तार बिछा दिए गए और बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए।
और फिर वो तस्वीरें सामने आईं, जिन्होंने सरकार की इमेज बहुत ज्यादा ख़राब कर दी। 26 नवंबर की कड़कड़ाती ठंड में जब 70-70 साल के बुज़ुर्ग सिख किसानों पर पुलिस ने ‘वाटर कैनन’ (पानी की बौछारें) और आंसू गैस के गोले दागे, तो पूरा देश सन्न रह गया।
कैमरे पर जो विज़ुअल्स जा रहे थे, वे सरकार के लिए एक भयंकर PR डिज़ास्टर थे। एक तरफ अपना हक मांगने आ रहा ‘अन्नदाता’ था, और दूसरी तरफ उन पर लाठियां और पानी बरसाती एक ‘निर्मम’ सरकार।
- सरकार ने यहीं पर अपनी आधी लड़ाई हार ली थी। जिन किसानों को वो ‘गुमराह’ बता रहे थे, पुलिसिया सख्ती ने उन किसानों को रातों-रात पूरे देश की नज़रों में ‘पीड़ित’ (Victim) और ‘हीरो’ बना दिया।
किसानों ने बैरिकेड्स तोड़ दिए, वाटर कैनन के ट्रकों पर चढ़ गए और सारी पुलिसिया नाकेबंदी को रौंदते हुए दिल्ली के मुहाने (सिंघु और टिकरी बॉर्डर) तक पहुँच गए।
- सरकार का ये बल-प्रयोग वाला दांव पूरी तरह उल्टा पड़ चुका था और अब दिल्ली को अगले एक साल के लिए दुनिया के सबसे बड़े और लंबे चक्का-जाम का गवाह बनना था।
4. दुनिया का सबसे लंबा चक्का जाम
सरकार की किसानों से 11 दौर की बातचीत हुई नाकाम

नवंबर 2020 का आखिर आते-आते जो पंजाब-हरियाणा का किसान दिल्ली के मुहाने पर पहुंचा था, अब उसने वहां अपने तंबू गाड़ दिए थे। सिंघु, टिकरी और गाज़ीपुर बॉर्डर्स रातों-रात टेंट सिटी में तब्दील हो गए। यह कोई एक-दो दिन का धरना नहीं था भाई।
ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को बाकायदा बेडरूम बना दिया गया, सड़कों पर वाशिंग मशीनें लग गईं, पिज़्ज़ा के लंगर चलने लगे और सर्दियों से बचने के लिए गीज़र तक फिट कर लिए गए।
देश की राजधानी, जहां प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बैठता है, उसके सबसे प्रमुख नेशनल हाईवेज़ को पूरे एक साल तक के लिए ब्लॉक कर दिया गया। आम जनता, जिन्हें रोज़ गाज़ियाबाद, नोएडा या सोनीपत से दिल्ली अप-डाउन करना होता था, वो ट्रैफ़िक जाम में घुट-घुट कर पिसती रही। एंबुलेंस को रास्ते नहीं मिल रहे थे, लोकल फैक्ट्रियां बंद होने की कगार पर आ गईं, लेकिन सरकार पूरी तरह से बेबस और मूकदर्शक बनी रही।
पब्लिक परसेप्शन (Public Perception) में यह बात घर करने लगी की जो सरकार बड़े-बड़े फैसले लेने के लिए जानी जाती है, वो अपने ही देश की राजधानी की एक सड़क खाली नहीं करवा पा रही है।
BJP नेताओं की वो बयानबाज़ी जिसने आग में डाला घी
जब ज़मीन पर हालात बेकाबू हो रहे थे, तब सरकार को चाहिए था की वो बर्फ पिघलाने की कोशिश करती। लेकिन बीजेपी के इकोसिस्टम ने ठीक इसका उल्टा किया। आग बुझाने के बजाय पार्टी के नेताओं और प्रवक्ताओं ने इस आग में पेट्रोल उड़ेलने का काम किया।
सोशल मीडिया पर एक ऐसा कैंपेन चलाया गया जिसने किसानों के स्वाभिमान को सीधे ठेस पहुंचाई।
- जसकौर मीणा और अक्षयबर लाल गौड़ जैसे BJP सांसदों ने किसान को रातों-रात “खालिस्तानी”, “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, “माओवादी” और “पाकिस्तानी एजेंट” घोषित कर दिया।
खुद सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने संसद में उन्हें ‘आंदोलनजीवी’ तक कह डाला।
- पॉलिटिकल स्ट्रैटेजी के हिसाब से देखें, तो यह बीजेपी की सबसे भयंकर और आत्मघाती भूल थी। पंजाब और हरियाणा का जाट और सिख समाज वो समाज है, जो देश की सेना में सबसे आगे खड़ा होता है।
जब आप उसी समाज के बुज़ुर्गों को, जिनके बेटे सरहदों पर ड्यूटी दे रहे हैं, ‘देशद्रोही’ या ‘खालिस्तानी’ का टैग दे देते हैं, तो लड़ाई फिर कानूनों की नहीं रह जाती… लड़ाई ‘स्वाभिमान’ की बन जाती है।
इस भाषणबाजी ने किसानों के गुस्से को दस गुना भड़का दिया। जो किसान शायद 15 दिन बाद घर वापस लौटने की सोच भी रहा होगा, वो इन बयानों को सुनकर और ज़्यादा ज़िद पर अड़ गया।
5. विज्ञान भवन में डैमेज कंट्रोल की कोशिश
11 दौर की वो बातचीत जो सिर्फ तारीखें बनकर रह गई

सड़कों पर मचे इस बवाल के बीच सरकार ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश शुरू की। दिसंबर 2020 से लेकर जनवरी 2021 के बीच दिल्ली के विज्ञान भवन में सरकार और किसान नेताओं (संयुक्त किसान मोर्चा) के बीच 11 दौर की बातचीत हुई।
सरकार की तरफ से केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, नरेंद्र सिंह तोमर और सोमप्रकाश मोर्चे पर थे। लेकिन इन मीटिंग्स की जो तस्वीरें बाहर आईं, उसने सरकार की रही-सही साख भी मिट्टी में मिला दी।
- लंच ब्रेक के दौरान किसान नेताओं ने सरकार का पानी तक पीने से इनकार कर दिया। वो अपना लंगर का खाना खुद लाते थे और विज्ञान भवन के फर्श पर बैठकर खाते थे।
यह कोई छोटी बात नहीं थी। यह एक बहुत बड़ा ‘सिंबॉलिक डिफीट’ (प्रतीकात्मक हार) था, जो देश को बता रहा था की किसानों का सरकार पर से रत्ती भर भी भरोसा नहीं बचा है।
सरकार ने मीटिंग्स में किसानों को मनाने के लिए हर संभव कोशिश की। यहां तक की 20 जनवरी 2021 की 10वीं मीटिंग में सरकार इस हद तक झुक गई की उसने इन तीनों कृषि कानूनों को 1.5 साल (18 महीने) तक होल्ड (निलंबित) करने का लिखित ऑफर दे दिया।
- ज़रा सोचिए! जो सरकार कुछ महीने पहले संसद में कह रही थी की ये कानून किसी भी कीमत पर वापस नहीं होंगे और ये मास्टरस्ट्रोक हैं, वही सरकार अब डेढ़ साल तक उन्हें निलंबित करने को तैयार थी।
किसानों की एक पंक्ति
“बिल वापसी नहीं, तो घर वापसी नहीं।”
लेकिन किसान अब सरकार की कमज़ोरी भांप चुके थे। उन्होंने साफ कह दिया- “बिल वापसी नहीं, तो घर वापसी नहीं।” 11 दौर की यह पूरी कवायद पूरी तरह फ्लॉप साबित हुई।
यहां तक की सुप्रीम कोर्ट ने भी बीच-बचाव करते हुए कानूनों पर स्टे लगा दिया और एक कमेटी बना दी, लेकिन किसान संगठनों ने उस कमेटी को भी सिरे से खारिज कर दिया। डेडलॉक (Deadlock) अब ऐसा हो चुका था जिसे तोड़ना लगभग नामुमकिन था।
सरकार हर मोर्चे पर लाचार दिख रही थी और अब बारी थी उस दिन की, जिसने इस देश के इतिहास में एक ऐसा काला पन्ना जोड़ दिया, जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। वो दिन था 26 जनवरी 2021, जब देश का गणतंत्र दिवस लाल किले पर एक खौफनाक और शर्मनाक तमाशे में बदलने वाला था।
6. 26 जनवरी का वो काला दिन जब लाल किले पर लहूलुहान हुई पुलिस की वर्दी
तार-तार हुआ ‘स्टेट’ का इकबाल

26 जनवरी 2021 की वो सुबह, जब पूरा देश टीवी स्क्रीन्स पर राजपथ की परेड और भारत की सैन्य ताकत देख रहा था, तब दिल्ली की सड़कों पर एक ऐसी खौफनाक स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी।
किसान संगठनों ने दिल्ली के रिंग रोड पर एक ‘शांतिपूर्ण’ ट्रैक्टर रैली निकालने की अनुमति मांगी थी। दिल्ली पुलिस ने कई शर्तों और एक तय रूट के साथ उन्हें इजाज़त दे दी। लेकिन जैसे ही परेड खत्म हुई, सड़कों पर जो नज़ारा दिखा, उसने पूरे सिस्टम को सुन्न कर दिया। तय किए गए रूट की धज्जियां उड़ा दी गईं।
- हज़ारों ट्रैक्टरों ने पुलिस के बैरिकेड्स को कागज़ के टुकड़ों की तरह रौंद डाला और मुकरबा चौक से लेकर आईटीओ (ITO) तक दिल्ली की सड़कों पर अराजकता का नंगा नाच शुरू हो गया।
एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर जब आप इस घटना को देखते हैं, तो यह पुलिस या इंटेलिजेंस का फेलियर नहीं था, बल्कि यह सीधे तौर पर सत्ता में बैठे लोगों के ‘डिसीजन मेकिंग’ (निर्णय लेने की क्षमता) का फेलियर था। सरकार इतनी डरी हुई थी की उसने पुलिस के हाथ बांध रखे थे।
दोपहर होते-होते यह उपद्रवी भीड़ दिल्ली के दिल यानी लाल किले (Red Fort) में घुस गई। वही लाल किला जहाँ से देश का प्रधानमंत्री 15 अगस्त को तिरंगा फहराता है, आज वहां उपद्रवियों का कब्ज़ा था। उन्होंने लाल किले की प्राचीर और उसके गुंबदों पर चढ़कर अपना धार्मिक झंडा (‘निशान साहिब’) फहरा दिया।
पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जा रहा था। अपनी जान बचाने के लिए खाकी वर्दी पहने जवानों को लाल किले की 20-20 फुट गहरी खाइयों (Moat) में कूदना पड़ा।
- आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे बवाल में 300 से ज़्यादा पुलिसकर्मी बुरी तरह लहूलुहान और घायल हुए। कई जवान ICU में पहुँच गए।
अब सवाल यह उठता है की क्या सरकार, जिसके पास दुनिया की सबसे बड़ी पैरामिलिट्री फोर्स है, वो लाल किले को खाली नहीं करवा सकती थी? बिल्कुल करवा सकती थी! लेकिन सरकार के हाथ इसलिए कांप रहे थे क्योंकि उन्हें डर था की अगर गोली चली और किसान मारे गए, तो सिख समाज हमेशा के लिए बीजेपी से कट जाएगा। इसी राजनीतिक डर ने ‘लॉ एंड ऑर्डर’ की धज्जियां उड़ने दीं।
कोर वोटर का भड़कता गुस्सा.. ये कैसा मास्टरस्ट्रोक है?
इस घटना ने बीजेपी को सबसे तगड़ा डैमेज कहाँ किया? उनके खुद के वोटर बेस में! जो बीजेपी का ‘कोर और कट्टर समर्थक’ था, वो टीवी पर लाल किले का यह मंज़र देखकर खून के घूंट पी रहा था।
जिस वोटर ने बीजेपी को इसलिए वोट दिया था क्योंकि यह सरकार “कठोर, निर्णायक और राष्ट्रवाद” की बात करती है, उसे आज अपनी ही सरकार दुनिया के सामने बेबस, लाचार और घुटनों पर बैठी हुई नज़र आ रही थी। बीजेपी का वोटर सवाल पूछ रहा था की अगर यही उपद्रव शाहीन बाग वालों ने किया होता, तो क्या सरकार उन्हें लाल किले तक पहुँचने देती?
जब राजधानी में सरेआम पुलिस पिट रही है और सरकार मूकदर्शक बनी रही है, तो फिर इस बहुमत का क्या फायदा? एक ही दिन में पब्लिक के दिमाग में ये सेट हो गया की यह सरकार सिर्फ चुनाव जीतना जानती है, मुश्किल वक्त में फैसले लेना नहीं।
7. किसान संगठन धरना छोड़कर घर लौटने लगे
लेकिन राकेश टिकैत के ड्रामे ने कैसे पलटा गेम

26 जनवरी की इस घटना के बाद लगा की अब आंदोलन खत्म हो जाएगा। खुद आम जनता, जो अब तक किसानों से थोड़ी सहानुभूति रख रही थी, वो भी इस हिंसा के बाद उनके खिलाफ हो गई। कई किसान संगठन डर के मारे धरना छोड़कर घर लौटने लगे।
28 जनवरी 2021 की शाम तक ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर एकदम सन्नाटा छा चुका था। यूपी की योगी सरकार ने मौक़ा देखकर भारी पुलिस फोर्स और पैरामिलिट्री वहां तैनात कर दी। ग़ाज़ियाबाद के डीएम ने रात तक बॉर्डर खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया। बिजली काट दी गई और पानी के टैंकर हटा दिए गए। लग रहा था की बस 2 घंटे में यह पूरा तंबू उखड़ जाएगा और बीजेपी इस संकट से बाहर आ जाएगी।
लेकिन तभी राजनीति के इतिहास का सबसे बड़ा ‘टर्निंग पॉइंट’ आया। भारतीय किसान यूनियन (BKU) के नेता राकेश टिकैत मीडिया के कैमरों के सामने आए और फूट-फूट कर रोने लगे।
- उनका वो डायलॉग- “मेरे किसानों को मारने की साज़िश हो रही है, मैं पानी नहीं पीऊंगा, अब मैं गांव से ही पानी मंगाकर पीऊंगा…”- इस एक घटना ने पूरे गेम को 180 डिग्री पलट दिया।
जो पुलिसिया सख्ती प्रशासन को दिन में दिखानी चाहिए थी, वो उन्होंने रात के अंधेरे में दिखाई, और इसी का फायदा टिकैत ने उठा लिया। उनके उस रोने-धोने का वीडियो कुछ ही मिनटों में पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश (West UP) और हरियाणा के जाट बेल्ट के वॉट्सऐप ग्रुप्स में आग की तरह फैल गया।
जाट समाज ने इसे सीधे अपनी ‘चौधराहट’ और पगड़ी का अपमान मान लिया। जो किसान 26 जनवरी की घटना के बाद घर बैठ गए थे, वो रात के 2 बजे ही अपनी ट्रैक्टर ट्रॉलियां स्टार्ट करके ग़ाज़ीपुर बॉर्डर की तरफ निकल पड़े। अगली सुबह ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर लाखों की भीड़ जमा थी। राकेश टिकैत ने एक मरते हुए आंदोलन में रातों-रात संजीवनी फूंक दी।
बीजेपी जो 28 जनवरी की शाम तक खुद को विनर मान रही थी, वो 29 जनवरी की सुबह फिर से उसी दलदल में खड़ी थी। आंदोलन खत्म होना तो दूर, अब वो पहले से दस गुना ज़्यादा मज़बूत और उग्र हो चुका था।
8. 700 मौतों का ठप्पा और संसद में सरकार का वो जवाब जिसने किसानों के ज़ख्मों पर नमक छिड़क दिया
जब कोई आंदोलन महीनों तक खिंचता है, तो उसकी सबसे बड़ी कीमत उस ज़मीन पर बैठे आम इंसान को चुकानी पड़ती है।
- 2020 की कड़कड़ाती सर्दियों से शुरू हुआ यह आंदोलन दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी, मॉनसून की बारिश और सबसे भयानक कोरोना (COVID-19) की दूसरी लहर को पार कर चुका था।
लेकिन सरकार और किसान, दोनों ही अपनी-अपनी ज़िद पर अड़े थे। एक तरफ सत्ता का ईगो था, तो दूसरी तरफ पगड़ी और ज़मीन का स्वाभिमान। और इन दोनों के बीच जो पिस रहा था, वो था पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी का आम किसान।
- संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे एक साल के आंदोलन में लगभग 700 से ज़्यादा किसानों ने अपनी जान गंवाई।
कोई कड़ाके की ठंड में हार्ट अटैक से मर गया, कोई कोरोना की चपेट में आ गया, तो किसी ने हताश होकर फांसी लगा ली। एक तटस्थ नज़रिए से सोचिए, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए इससे दर्द भरी बात और क्या हो सकती है की उसके अपने ही देश का अन्नदाता अपनी मांगों को लेकर राजधानी की सड़क पर तिल-तिल कर मर रहा हो। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की छवि जो ख़राब हो रही थी, वो एक अलग ही कहानी बयां कर रही थी।
जब मौतों का आंकड़ा 700 के पार पहुंच गया, तो ज़ाहिर सी बात है विपक्ष ने इसे संसद में उठाया। मांग की गई की जान गंवाने वाले किसानों के परिवारों को सरकार मुआवज़ा दे। लेकिन यहां पर सरकार ने एक ऐसी रणनीतिक भूल की, जिसने किसानों के मन में बीजेपी के प्रति हमेशा के लिए नफरत का बीज बो दिया।
- कृषि मंत्रालय ने संसद में लिखित जवाब देते हुए कहा- “हमारे पास किसान आंदोलन में मारे गए लोगों का कोई डेटा (रिकॉर्ड) नहीं है, इसलिए मुआवज़ा देने का सवाल ही नहीं उठता।”
यह जवाब तकनीकी या कानूनी रूप से भले ही सरकार को बचा ले, लेकिन ‘पब्लिक परसेप्शन’ के कोर्ट में इसने सरकार को पूरी तरह से विलेन बना दिया। गांव-देहात में बैठे आम वोटर को यह साफ संदेश गया की इस सत्ता को गरीबों और किसानों की जान की कोई परवाह नहीं है।
9. लखीमपुर खीरी का खौफनाक कांड
जब केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ की गाड़ी ने किसानों को कुचल दिया
अगर सरकार के पास थोड़ी-बहुत नैतिक सत्ता बची भी थी, तो 3 अक्टूबर 2021 को उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में हुए कांड ने उसे भी पूरी तरह से खाक कर दिया।
लखीमपुर खीरी के तिकोनिया इलाके में किसान काले झंडे लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। वो सड़क किनारे पैदल चल रहे थे, तभी पीछे से 100 की स्पीड में आती हुई महिंद्रा थार (Thar) और कुछ अन्य SUV गाड़ियों ने निहत्थे किसानों को बेरहमी से कुचल दिया। इस खौफनाक और दिल दहला देने वाली घटना में 4 किसानों और 1 पत्रकार की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। इसके बाद भड़की हिंसा में 3 और लोग मारे गए।
और सबसे बड़ा बवाल क्या था? वो थार जीप किसी आम आदमी की नहीं थी। वो देश के केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ की थी, और आरोप लगा उनके बेटे आशीष मिश्रा पर, जो कथित तौर पर उस गाड़ी में मौजूद था।
बीजेपी के खिलाफ भड़का सिख-जाट समाज का गुस्सा
इस घटना का डैमेज कंट्रोल देखिए। बीजेपी जो हमेशा दावा करती है की वो अपराधियों को मिट्टी में मिला देती है, इस केस में पूरी तरह से लाचार और बचाव की मुद्रा में आ गई। एक केंद्रीय मंत्री की गाड़ी से किसानों को सरेआम कुचल दिया जाता है, लेकिन ना तो उस मंत्री को पद से हटाया जाता है, और ना ही शुरुआती दिनों में बेटे पर कोई सख्त एक्शन होता है। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार और दखलंदाज़ी के बाद जाकर कहीं आशीष मिश्रा की गिरफ्तारी हो पाती है।
इस एक घटना ने तराई बेल्ट (Terai Belt) और पूरे सिख-जाट समाज में बीजेपी के खिलाफ गुस्से का ऐसा ज्वालामुखी फोड़ दिया जिसे शांत करना अब किसी के बस में नहीं था। लोगों ने सीधा सवाल पूछना शुरू कर दिया की क्या कानून का खौफ सिर्फ विपक्षियों और आम अपराधियों के लिए है? सत्ता में बैठे मंत्रियों के बेटों के लिए सारे कानून माफ हैं?
लखीमपुर खीरी का यह खून सरकार के दामन पर ऐसा दाग बन गया, जिसने पूरे किसान आंदोलन को एक ‘धर्मयुद्ध’ में बदल दिया। अब बात सिर्फ तीन कानूनों की नहीं रह गई थी, अब बात इंसाफ, खून और सत्ता के अहंकार को तोड़ने की बन चुकी थी।
बीजेपी हाईकमान को अब यह समझ में आने लगा था की पानी सिर के ऊपर से गुज़र चुका है और अगर अब भी ज़िद नहीं छोड़ी, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में चीज़ें हाथ से निकल सकती हैं।
10. यूपी-पंजाब चुनाव का खौफ, BJP सरकार का सरेंडर
वो डबल नुकसान जिसने खत्म कर दिया अजय होने का जादू

2021 का नवंबर महीना आते-आते दिल्ली की सत्ता के गलियारों में घबराहट साफ महसूस की जा रही थी। आंदोलन को एक साल पूरा होने वाला था, 700 से ज़्यादा लाशें गिर चुकी थीं, लाल किले पर वर्दी खून से लाल हो चुकी थी और लखीमपुर खीरी के कांड ने रही-सही कसर पूरी कर दी थी।
लेकिन इन सबसे भी बड़ी एक और चीज़ थी जिसने बीजेपी हाईकमान की रातों की नींद उड़ा रखी थी- और वो था चुनावी गणित (Electoral Calculus)।
2022 के शुरुआती महीनों में उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने थे। बीजेपी के आंतरिक सर्वे और ज़मीनी खुफिया रिपोर्ट्स एक बहुत ही डरावनी तस्वीर पेश कर रही थीं। साफ बता दिया गया था की पश्चिमी उत्तर प्रदेश (West UP) के जाट बेल्ट, तराई क्षेत्र और पंजाब में बीजेपी का पूरी तरह से सूपड़ा साफ होने वाला है। लखीमपुर खीरी के बाद तो हालात ऐसे हो गए थे की बीजेपी के विधायक और मंत्री गांवों में घुस तक नहीं पा रहे थे।
कोई भी पार्टी, चाहे वो कितनी भी ‘राष्ट्रवादी’ क्यों न हो, सत्ता गंवानें का रिस्क नहीं ले सकती। यूपी जीतना 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए सबसे ज़रूरी था। बस इसी चुनावी खौफ ने वो काम कर दिखाया जो एक साल की बहस, 11 दौर की मीटिंग्स और सुप्रीम कोर्ट भी नहीं कर पाया था।
19 नवंबर 2021 का वो दिन और प्रधानमंत्री का ऐतिहासिक यू-टर्न
19 नवंबर 2021, गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व (गुरुपर्व) का दिन। सुबह-सुबह अचानक खबर आती है की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को संबोधित करेंगे। टीवी स्क्रीन्स पर पीएम मोदी आते हैं और एक ऐसा ऐलान करते हैं जिसने पूरे देश को चौंका कर रख दिया।
- उन्होंने कहा- “शायद हमारी तपस्या में ही कोई कमी रह गई थी की हम कुछ किसानों को अपनी बात समझा नहीं पाए। मैं आज पूरे देश से क्षमा मांगता हूं… हम तीनों कृषि कानून वापस ले रहे हैं।”
बिना किसी शर्त, बिना किसी बहस और बिना किसी कमेटी के- सीधा सरेंडर! जो पार्टी और उसके मंत्री पिछले एक साल से कह रहे थे की ये कानून एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ हैं और किसी भी कीमत पर वापस नहीं होंगे, वो अचानक बैकफुट पर आ गए।
- सरकार ने इसे ‘बड़प्पन’ और ‘देशहित’ का नाम देने की कोशिश की, लेकिन ज़मीन पर बैठा बच्चा-बच्चा जानता था की यह कोई हृदय परिवर्तन नहीं था, यह सीधे-सीधे उत्तर प्रदेश चुनाव हारने का डर था।
अगर यह सच में किसानों का दर्द देखकर लिया गया फैसला होता, तो 700 मौतें होने का इंतज़ार क्यों किया गया? यह फैसला 6 महीने पहले भी तो लिया जा सकता था?
बीजेपी का वो भयानक सेल्फ-गोल जिसने किए दो बड़े नुकसान
पॉलिटिकल डैमेज कंट्रोल के हिसाब से यह बीजेपी का अब तक का सबसे खराब मैनेजमेंट था। बिल वापस लेकर बीजेपी ने सोचा था की किसान खुश होकर उन्हें वोट देंगे, लेकिन हुआ ठीक इसका उल्टा। इस फैसले से बीजेपी को एक ज़बरदस्त ‘डबल नुकसान’ (Double Loss) झेलना पड़ा।
किसानों और जाट-सिख बेल्ट में बीजेपी को कोई सहानुभूति नहीं मिली। किसानों ने इस वापसी को सरकार का ‘बड़प्पन’ नहीं माना, बल्कि इसे अपनी 700 शहादतों की ‘जीत’ और सत्ता के अहंकार की ‘हार’ माना। उनके मन में यह बात बैठ गई की यह सरकार सिर्फ विद्रोह और वोट की भाषा समझती है।
बीजेपी का वो कोर वोटर, मिडिल क्लास और प्रो-रिफॉर्म वर्ग, जो इन कानूनों के समर्थन में सरकार के साथ खड़ा था, वो पूरी तरह से ठगा सा महसूस करने लगा। उस वोटर ने खुद से सवाल किया: “अगर 300 से ज़्यादा सीटों वाली पूर्ण बहुमत की सरकार एक रिफॉर्म लागू नहीं करवा सकती, तो फिर कौन करवाएगा?”
बीजेपी के समर्थकों को लगा की सरकार ने भीड़तंत्र (Mobocracy) के दबाव में घुटने टेक दिए। अगर शाहीन बाग के बाद किसान आंदोलन भी ऐसे ही सरकार को झुका सकता है, तो फिर 56 इंच के सीने और उस ‘निर्णायक’ (Decisive) नेता वाली छवि का क्या मतलब रह गया?
यह वो राजनीतिक घाव था जिसने बीजेपी की अजेय, अडिग और ‘कभी पीछे न हटने वाली’ ब्रांडिंग को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया।
सत्ता के लिए एक ऐतिहासिक सबक
चाणक्य कहते थे की राजा को कभी भी ऐसा कोई दांव नहीं चलना चाहिए, जिसके वापस लेने पर उसका इक़बाल (Authority) ही खत्म हो जाए। 2020 के इन कृषि कानूनों के पूरे एपिसोड ने यही साबित किया।
अगर सरकार ने इन कानूनों को लाने से पहले किसान यूनियनों से बात की होती, अगर इन्हें संसद की सेलेक्ट कमेटी में भेजा होता.. और अगर समय रहते बर्फ पिघला ली होती… तो शायद आज भारत का कृषि ढांचा बदल चुका होता।
लेकिन सत्ता के अति-आत्मविश्वास ने एक अच्छे-खासे रिफॉर्म को एक भयानक राजनीतिक आपदा में बदल दिया। यह पूरा घटनाक्रम भविष्य की सरकारों के लिए एक केस स्टडी है। यह बताता है की संसद में बहुमत होना आपको कानून पास करने की ताकत तो देता है, लेकिन उसे ज़मीन पर लागू करवाने के लिए आपको ‘जनता के भरोसे’ की ज़रूरत होती है।
