संविधान के ‘मूल ढांचे’ को बचाकर राजनेताओं की मनमानी पर लगाम लगाने वाला वो न्यायिक योद्धा, सत्य की राह पर चलते हुए ‘चीफ जस्टिस’ की कुर्सी कुर्बान करने वाले भारत के अनमोल रत्न जस्टिस ‘हंस राज खन्ना’

साल 1975… हमारे देश के इतिहास का वो पन्ना जिसे याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ज़रा सोचिए उस खौफनाक मंज़र के बारे में।

देश पर रातों-रात आपातकाल (Emergency) थोप दिया गया था। वो एक ऐसा वक्त था जब देश की सांसें सचमुच घुट रही थीं।

अख़बारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई थी, बड़े-बड़े कद्दावर नेताओं को रातों-रात जेल की काल कोठरियों में ठूंस दिया गया था। जो भी सरकार के खिलाफ एक लफ्ज़ बोलता, उसे बिना कोई कारण बताए सीधे सलाखों के पीछे डाल दिया जाता।

ऐसे खौफनाक माहौल में, जब आम आदमी के जीने का अधिकार भी सत्ता के हाथों कुचला जा रहा था, तब देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के एक जज ने अपनी आवाज़ से ऐसा तूफान खड़ा किया जिसने पूरी दुनिया में भारत का सिर फख्र से ऊंचा कर दिया।

यह कहानी है एक ऐसे लौह पुरुष ‘हंस राज खन्ना’ की, जिसने हमें सिखाया की जब बात उसूलों की हो, जब बात देश के संविधान और एक आम हिंदुस्तानी की आज़ादी की हो, तो इंसान को अपनी सबसे प्यारी चीज़ भी मुस्कुराते हुए कुर्बान कर देनी चाहिए।

अमृतसर की गलियों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का सफर और ‘रामकृष्ण डालमिया’ केस जिसने पूरे देश को दिखा दी उनकी धमक

किसी इंसान के अंदर इतनी बेखौफ़ और निडर आग अचानक से पैदा नहीं होती, ये उसे विरासत में मिलती है।

3 जुलाई 1912 को पंजाब के अमृतसर में जन्मे हंस राज खन्ना के खून में ही उसूलों की बगावत दौड़ रही थी। उनके पिता सरब दयाल खन्ना खुद एक बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी और मशहूर वकील थे (जो बाद में अमृतसर के मेयर भी बने)।

मतलब देशभक्ति और कानून की समझ उन्हें अपने घर के आंगन से ही मिली थी।

लाहौर से कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की। बंटवारे का दर्द झेला और फिर अमृतसर आकर अपनी वकालत को ऐसा चमकाया की दूर-दूर तक उनके नाम का डंका बजने लगा।

लेकिन उनकी ज़िंदगी का असली टर्निंग पॉइंट तब आया जब 1952 में वो डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज बने। यहीं से दुनिया को पता चला की हंस राज खन्ना आखिर किस मिट्टी के बने हैं।

किस्सा कुछ यूं है की उनके सामने आज़ाद भारत के सबसे बड़े, सबसे अमीर और रसूखदार उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया का केस आ गया।

डालमिया उस वक्त इतने ताकतवर थे की बड़े-बड़े नेता उनके सामने पानी भरते थे। पैसे और पावर की ऐसी गर्मी थी की कोई जज उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

तरह-तरह के दबाव बनाए गए, लेकिन खन्ना साहब तो खन्ना साहब थे! उन्होंने बिना किसी खौफ के, सबूतों के आधार पर डालमिया को सीधे सज़ा सुना दी।

इस एक फैसले ने पूरे देश के लीगल सिस्टम में हड़कंप मचा दिया। सबको समझ आ गया की यह वो जज है जो ना तो किसी के पैसे से खरीदा जा सकता है और ना ही किसी नेता की पावर से डराया जा सकता है।

उनकी इसी बेदाग़ ईमानदारी और बेखौफ़ फैसलों का ही नतीजा था की 1962 में वो पंजाब हाई कोर्ट के जज बने, फिर दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने, और आख़िरकार सितंबर 1971 में वो दिन भी आ गया जब उन्होंने भारत के सुप्रीम कोर्ट में कदम रखा।

केशवानंद भारती केस का वो निर्णायक वोट जिसने नेताओं की मनमानी पर लगाम लगाकर बचा ली भारत के संविधान की आत्मा

सुप्रीम कोर्ट पहुँचने के बाद उनके सामने ऐसे-ऐसे केस आए जिन्होंने भारत का भविष्य हमेशा के लिए तय कर दिया। साल 1973… भारत के न्यायिक इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे रोमांचक केस- ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’।

इस केस की गंभीरता का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं की इसे सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे बड़ी बेंच बैठी थी, पूरे 13 जजों की बेंच!

सवाल बहुत सीधा लेकिन बेहद खतरनाक था-

“क्या देश की संसद के पास यह पावर है की वो भारत के संविधान में मनचाहा बदलाव कर सके? क्या बहुमत के नशे में चूर कोई सरकार पूरे संविधान को ही पलट कर रख सकती है?”

सुप्रीम कोर्ट के अंदर मानो एक युद्ध चल रहा था। 13 में से 6 जजों का मानना था की हाँ, संसद के पास असीमित पावर है और वो जो चाहे बदल सकती है।

वहीं बाकी 6 जजों का कहना था की नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैच एकदम टाई हो गया था- 6 बनाम 6! अब देश की निगाहें टिकी थीं 13वें जज पर, और वो जज थे जस्टिस हंस राज खन्ना।

उस दिन जस्टिस खन्ना ने अपना वो ऐतिहासिक ‘निर्णायक वोट’ (Deciding Vote) डाला जिसने भारतीय लोकतंत्र को तानाशाही बनने से हमेशा के लिए बचा लिया।

उन्होंने एक ऐसा जादुई और सॉलिड सिद्धांत दिया जिसे आज पूरी दुनिया ‘बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन’ (Basic Structure Doctrine / संविधान का मूल ढांचा) के नाम से जानती है।

उन्होंने अपने फैसले में बहुत ही साफ़ शब्दों में कहा की संसद को संविधान में बदलाव करने का पूरा हक है, लेकिन वो इसके ‘मूल ढांचे’ को छू भी नहीं सकती।

इसे ऐसे समझिए जैसे आप अपने घर के अंदर रंग-रोगन कर सकते हैं, खिड़कियां बदल सकते हैं, लेकिन आप घर की वो बुनियादी नींव नहीं तोड़ सकते जिस पर पूरा घर टिका है।

लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, आम आदमी की आज़ादी और आज़ाद न्यायपालिका- ये हमारे संविधान की नींव हैं!

अगर उस दिन जस्टिस खन्ना ने यह फैसला न दिया होता, तो सोचिए क्या होता? कोई भी सरकार जिसके पास भारी बहुमत होता, वो रातों-रात संविधान बदलकर इस देश को हमेशा के लिए एक तानाशाह देश घोषित कर देती।

जस्टिस खन्ना के उस एक वोट ने नेताओं की मनमानी पर ऐसी लगाम कसी जो आज तक कायम है। उन्होंने अकेले अपने दम पर भारत के संविधान की आत्मा को छिनने से बचा लिया था।

एडीएम जबलपुर केस का वो खौफनाक दौर जब चार जजों ने टेक दिए थे घुटने लेकिन एक लौह पुरुष ने अकेले चुनी असहमति की राह

केशवानंद भारती केस के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया था। और फिर आया साल 1976, यानी आपातकाल (Emergency) का वो चरम दौर जब इंसानियत और आज़ादी दोनों ही इंदिरा गाँधी की कांग्रेस सरकार के पैरों तले कुचले जा रहे थे।

पूरे देश में पुलिस और प्रशासन को खुली छूट दे दी गई थी। रात के अंधेरे में किसी को भी उसके घर से उठाया जाता और बिना कोई कारण बताए जेल में डाल दिया जाता। ना कोई वकील, ना कोई दलील और ना ही कोई अपील।

इसी खौफनाक माहौल के बीच एक केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है, जिसे इतिहास में ‘एडीएम जबलपुर केस’ (या Habeas Corpus Case) के नाम से जाना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ बैठी। देश भर की निगाहें उन पांच जजों पर टिकी थीं। सवाल बहुत ही सीधा लेकिन इंसान की रूह कंपा देने वाला था- “क्या आपातकाल के दौरान सरकार किसी भी नागरिक से उसके ‘जीने और आज़ादी का अधिकार’ (Article 21) छीन सकती है?”

कल्पना कीजिए उस मंज़र की। एक तरफ देश की वो बेबस जनता थी जो न्याय की भीख मांग रही थी, और दूसरी तरफ इंदिरा गाँधी की कांग्रेस सरकार थी जिसके पास बेहिसाब ताकत थी।

लेकिन उस दिन सुप्रीम कोर्ट के अंदर जो हुआ, उसने पूरे देश का दिल तोड़ कर रख दिया। 5 जजों की उस बेंच में से 4 सबसे सीनियर जजों (चीफ जस्टिस ए.एन. रे, एम.एच. बेग, वाई.वी. चंद्रचूड़ और पी.एन. भगवती) ने भारी दबाव के चलते सरकार के आगे घुटने टेक दिए।

इन चार जजों ने फैसला सुनाया की “हाँ, सरकार के पास यह अधिकार है की वह आपातकाल में किसी की भी आज़ादी और जीवन का अधिकार छीन सकती है, और कोर्ट इसमें कोई दखल नहीं दे सकता।”

सोचिए दोस्त, देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी हथियार डाल दिए थे! लेकिन रुको, अभी कहानी में वो ट्विस्ट बाकी था जिसने दुनिया को बता दिया की भारत का ज़मीर अभी मरा नहीं है।

उन 5 जजों की बेंच में एक शेर ऐसा भी था जो अकेला, पूरी चट्टान की तरह खड़ा था। वो थे हमारे जस्टिस हंस राज खन्ना!

उन्होंने अपने उन 4 साथी जजों के फैसले से सीधे तौर पर असहमति (Lone Dissent) जता दी।

उन्होंने इंदिरा सरकार की आंखों में आंखें डालकर अपने फैसले में डंके की चोट पर लिखा-

“संविधान का अनुच्छेद 21 हो या न हो, किसी भी सरकार के पास यह अधिकार नहीं है की वह बिना किसी कानून के अपने ही नागरिक की आज़ादी या उसकी ज़िंदगी छीन सके। सरकार को कोई हक नहीं है की वह इंसान को जानवरों की तरह ट्रीट करे।”

उनका वो ‘असहमति’ वाला फैसला आज भी भारतीय न्यायपालिका का सबसे सुनहरा और पवित्र पन्ना माना जाता है।

उसूलों के लिए मार दी चीफ जस्टिस की कुर्सी पर लात और उनके एक इस्तीफे ने कैसे पूरी दुनिया में बढ़ा दिया भारत का मान

जस्टिस खन्ना कोई नादान नहीं थे। वो बहुत अच्छे से जानते थे की जिस वक्त पूरा सिस्टम सरकार के इशारों पर नाच रहा है, उस वक्त सरकार के खिलाफ इतना बड़ा फैसला देने की उन्हें कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

नियमों के हिसाब से, जनवरी 1977 में जस्टिस खन्ना को भारत का अगला चीफ जस्टिस (Chief Justice of India) बनना था क्योंकि वो सबसे सीनियर जज थे।

एक जज की ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना यही होता है की वो रिटायर होने से पहले देश की सबसे बड़ी अदालत का मुखिया बने। लेकिन सरकार ने उनके उस निडर फैसले की खुन्नस निकाली।

सत्ता ने अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करते हुए पुरानी परंपराओं को तोड़ दिया और जस्टिस खन्ना को दरकिनार करके उनसे जूनियर जज (जस्टिस एम.एच. बेग) को भारत का चीफ जस्टिस बना दिया।

अब कोई आम इंसान होता तो शायद इस बात पर बवाल काटता, मीडिया में बयानबाज़ी करता या रोना-धोना शुरू कर देता।

लेकिन जस्टिस खन्ना ने कोई शिकायत नहीं की। जिस दिन उनके जूनियर को चीफ जस्टिस की कुर्सी पर बिठाया गया, उसी दिन जस्टिस खन्ना ने पूरी गरिमा और शांत भाव के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

उन्होंने अपने उसूलों के लिए देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर लात मार दी थी।

उनके इस एक इस्तीफे ने पूरे देश और दुनिया में भूचाल ला दिया था। रातों-रात वो देश के सबसे बड़े हीरो बन गए।

अमेरिका के सबसे मशहूर अखबार ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ (The New York Times) ने तब जस्टिस खन्ना की तारीफ में एक ऐतिहासिक संपादकीय (Editorial) लिखा था।

अखबार ने लिखा- “अगर भारत में आज़ादी की उम्मीद और लोकतंत्र कभी दोबारा ज़िंदा हो पाया, तो लोग सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हंस राज खन्ना के नाम का एक बड़ा सा स्मारक ज़रूर बनाएंगे।”

सच कहूं तो यार, उनका इस्तीफा देश के हर उस नागरिक के लिए एक उम्मीद बन गया था, जिसे लगने लगा था की अब इस देश में कोई सच्चाई के लिए लड़ने वाला नहीं बचा।

रिटायरमेंट के बाद भी देश ने उन्हें सर आँखों पर बिठाया। 1982 में वो राष्ट्रपति पद के चुनाव में भी खड़े हुए, और 1999 में भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ (Padma Vibhushan) से नवाज़ा।

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