जब चुनाव में धांदली पकड़े जाने पर प्रधानमंत्री ने रातों-रात बदल डाला देश का कानून, आज चुनाव आयोग पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस ने कैसे दशकों तक इस संस्था को रखा अपना गुलाम

आजकल जब भी चुनाव के नतीजे आते हैं या देश में कहीं वोटिंग हो रही होती है, तो आपने टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर एक बहुत ही जाना-पहचाना रोना ज़रूर सुना होगा।

“लोकतंत्र खतरे में है”, “ईवीएम हैक हो गई है”, और सबसे बड़ा आरोप- “चुनाव आयोग तो सरकार की जेब में बैठ गया है!”

ये सारे विलाप उस कांग्रेस पार्टी के नेता दिन-रात करते नज़र आते हैं, जिन्हें चुनाव हारने के बाद अपनी हार से ज्यादा ईवीएम (EVM) में खोट नज़र आता है।

ज़रा सोचिए, जिस पार्टी ने खुद 50 साल तक सत्ता में रहते हुए इस सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था को अपनी ‘जागीर’ बनाकर रखा, जो अपने चहेते अफसरों को चुनाव आयुक्त बनाकर बाद में उन्हें मंत्री पद और राज्यपाल की कुर्सियां बांटती रही..

वो आज किस मुंह से ईमानदारी का सर्टिफिकेट बांट रही है? इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो ऐसे-ऐसे खौफनाक किस्से बाहर आएंगे, जो साबित करते हैं की असल में चुनाव आयोग को ‘गिरवी’ रखने और लोकतंत्र का गला घोंटने का असली मास्टरमाइंड कौन था।

संविधान का वो खुला दरवाज़ा जिसे 50 सालों तक जानबूझकर बंद नहीं किया गया ताकि जी-हुजूरों की एंट्री होती रहे

हमारे संविधान बनाने वालों ने Article 324 में यह साफ़ लिखा था की संसद एक कानून बनाएगी, जिससे यह तय होगा की देश के चुनाव आयुक्तों (Election Commissioners) की नियुक्ति कैसे होगी।

संविधान निर्माताओं को लगा था की आने वाली सरकारें ईमानदारी से एक पारदर्शी कानून बनाएंगी। लेकिन 5 दशक तक देश पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस ने कभी वो कानून बनाया ही नहीं!

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने अपनी किताब में इस सच का पर्दाफाश करते हुए लिखा है की यह दरवाज़ा जानबूझकर खुला छोड़ा गया था।

मकसद बिल्कुल साफ़ था- अगर कोई सख्त कानून बन गया, तो सरकार अपनी मर्ज़ी नहीं चला पाएगी।

इसीलिए बिना किसी कानून या पारदर्शी सिस्टम के, सत्ता में बैठे लोग चुपचाप अपने चहेते, ‘यस बॉस’ (Yes Boss) कहने वाले और रीढ़विहीन नौकरशाहों को चुनाव आयोग की सबसे बड़ी कुर्सी पर बिठाते रहे।

जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में रंगे हाथ पकड़ी गई चोरी तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रातों-रात कानून की किताब ही बदल डाली

अगर आपको लगता है की सत्ता का असली दुरुपयोग क्या होता है, तो 12 जून 1975 की वो ऐतिहासिक तारीख याद कर लीजिए।

ये वो दिन था जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने दिल्ली की सत्ता की नींव हिला दी।

कोर्ट ने अपने फैसले में साफ पाया की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी, सरकारी अफसरों और अपने पद का जमकर गलत इस्तेमाल किया था।

इसी आधार पर कोर्ट ने उनका चुनाव रद्द कर दिया और उन पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर बैन लगा दिया।

अब अगर कोई साधारण और सच्चा लोकतंत्र होता, तो प्रधानमंत्री चुपचाप अपना इस्तीफा सौंप देते। लेकिन यहां तो खेल ही अलग था भाई!

जब चोरी रंगे हाथों पकड़ी गई, तो इस्तीफा देने के बजाय महज़ 13 दिन के भीतर पूरे देश पर आपातकाल (इमरजेंसी) का हंटर चला दिया गया।

विपक्ष के हर बड़े नेता को रातों-रात जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। और हद तो तब पार हो गई जब संविधान में 39वां संशोधन (39th Amendment) कर डाला गया।

इस संशोधन में बकायदा ये लिखवा दिया गया की “प्रधानमंत्री के चुनाव को देश की कोई भी अदालत चुनौती नहीं दे सकती, कोर्ट इसे छू भी नहीं सकता।”

ये तो बिल्कुल वैसी बात हो गई की जब आप मैदान में क्रिकेट का मैच हारने लगें, तो आप अंपायर को ही किडनैप कर लें और सारे नियम अपनी मर्ज़ी से बदल डालें।

गढ़वाल की पहाड़ियों में उतरी पुलिस और जो ईमानदार अफसर नहीं झुका उसके घर भेज दी गई टैक्स की टीम

सत्तातंत्र का अहंकार यहीं नहीं रुका। 1981 का वो मशहूर गढ़वाल उपचुनाव याद है आपको? हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस छोड़कर निर्दलीय मैदान में उतरे थे।

वो जनता को ये साबित करना चाहते थे की असली ताक़त ज़मीन पर उनके पास है, दिल्ली के पास नहीं।

अब इंदिरा गांधी किसी भी कीमत पर बहुगुणा को हराना चाहती थीं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह की किताब के मुताबिक, इस चुनाव को हाइजैक करने के लिए रातों-रात हरियाणा की पुलिस को गढ़वाल के छोटे-छोटे पहाड़ी गांवों में उतार दिया गया!

कमाल की बात देखिए की जिले के डीएम (DM) और पुलिस कप्तान तक को हवा नहीं थी की ये बाहरी पुलिस यहां जंगलों और गांवों में क्या कर रही है।

लेकिन उस वक्त चुनाव आयोग की कुर्सी पर एस.एल. शकधर (S.L. Shakdhar) बैठे थे। वो अफसर नहीं झुका। शकधर ने डंके की चोट पर लिखा की यह बाहरी पुलिस मतदाताओं को डराने और चुनाव में गड़बड़ी (Rigging) करने के लिए भेजी गई थी।

उन्होंने किसी के दबाव में आए बिना सीधे चुनाव रद्द कर दिया। बाद में 1982 में जब चुनाव हुए, तो बहुगुणा जीत गए।

जो ईमानदार अफसर नहीं झुका उसके घर टैक्स वाले भेज दिए गए

लेकिन जो अफसर दिल्ली दरबार के सामने अड़ जाता था, उसका हश्र क्या होता था, ये 1987 के आर.वी.एस. पेरी शास्त्री (R.V.S. Peri Sastri) कांड से समझिए।

1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के बीच भयंकर तनातनी चल रही थी। राजीव गांधी चाहते थे की हरियाणा के विधानसभा चुनाव किसी तरह टाल दिए जाएं ताकि इसका असर राष्ट्रपति चुनाव पर न पड़े।

उन्होंने तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त पेरी शास्त्री को संदेश भिजवाया की भाई, चुनाव आगे बढ़ा दो।

जब पेरी शास्त्री ने दो टूक जवाब देते हुए कहा की चुनाव तो अपने तय समय पर ही होंगे, तो सरकार का ईगो हर्ट हो गया। इसके बदले में राजीव सरकार ने सीधे इस ईमानदार अफसर के पीछे इनकम टैक्स (Income Tax) की पूरी मशीनरी लगा दी।

रातों-रात चुनाव आयोग के मुखिया की पर्सनल प्रॉपर्टी और टैक्स रिटर्न की फाइलें खंगाली जाने लगीं, ताकि कहीं से कोई भी छोटी सी कमी निकालकर उन्हें ब्लैकमेल किया जा सके और उन पर दबाव बनाया जा सके।

ये वो खौफनाक दौर था, जहाँ अगर आप सत्ता के सामने तनकर खड़े हो गए, तो सरकारी एजेंसियां आपके घर का दरवाज़ा तोड़ने पहुंच जाती थीं।

अंपायर को ही पहना दी गई अपनी टीम की जर्सी, रिटायरमेंट के बाद सीधा मंत्री पद और राज्यपाल की कुर्सी का शानदार इनाम

जो अफसर दिल्ली के दरबार के सामने अड़ जाते थे उन्हें डराने के लिए इनकम टैक्स का डंडा था, लेकिन जो अफसर हुक्म बजाते थे, उनके लिए बाकायदा ‘गाजर’ का इंतज़ाम भी था।

वफादारी का इनाम कैसे बांटा जाता था, इसके दो बहुत ही शानदार और ऐतिहासिक उदाहरण हैं- आर.के. त्रिवेदी और एम.एस. गिल।

पहले बात करते हैं आर.के. त्रिवेदी जी की। 1984 के वो चुनाव याद हैं आपको, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में राजीव गांधी को 400 से ज़्यादा सीटों वाली बंपर जीत मिली थी?

उस चुनाव के दौरान त्रिवेदी जी ही मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) थे। वो 31 दिसंबर 1985 को रिटायर हुए। अब कमाल की टाइमिंग देखिए!

रिटायरमेंट के ठीक 26 दिन बाद यानी 26 जनवरी 1986 को राजीव सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से नवाज़ दिया। और बात यहीं खत्म नहीं हुई। ठीक एक महीने बाद, 26 फरवरी 1986 को उन्हें सीधा उठाकर गुजरात का राज्यपाल (Governor) बना दिया गया।

इससे भी बड़ा खेल तो एम.एस. गिल के साथ हुआ। गिल साहब 1996 से लेकर 2001 तक देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। उन्होंने कई चुनाव करवाए।

लेकिन रिटायर होते ही उनके भीतर का कांग्रेसी प्रेम ऐसा जागा की वो सीधे कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। कांग्रेस ने भी वफादारी का कर्ज़ चुकाया।

उन्हें तुरंत राज्यसभा भेजा गया और 2008 में जब मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार चल रही थी, तो उन्हें बाकायदा ‘केंद्रीय खेल मंत्री’ बना दिया गया।

मतलब क्रिकेट की भाषा में कहें तो ये ऐसा ही है की जो अंपायर मैदान में खड़े होकर निष्पक्षता का चोला ओढ़े हुए था, उसने मैच खत्म होते ही एक खास टीम की जर्सी पहनी और सीधा उसी टीम के ड्रेसिंग रूम में जाकर सोफे पर बैठ गया!

इमरजेंसी में जिस दागी अफसर को अयोग्य बताया गया उसी को मनमोहन सरकार ने बना दिया लोकतंत्र का सबसे बड़ा रेफरी

अगर आपको लगता है की एम.एस. गिल का मामला सबसे बड़ा था, तो ज़रा नवीन चावला के इस विवाद को सुनिए। 1975 की इमरजेंसी के दौरान हुए जुल्मों और ज्यादतियों की जांच के लिए ‘शाह आयोग’ (Shah Commission) बनाया गया था।

इस आयोग ने एक अफसर के कारनामों को देखकर अपनी रिपोर्ट में साफ शब्दों में लिखा था की “यह व्यक्ति किसी भी ऐसे सार्वजनिक पद के लायक नहीं है जहाँ निष्पक्षता और इंसाफ की ज़रूरत हो।”

उस अफसर का नाम था- नवीन चावला।

अब लॉजिक तो ये कहता है की जिस अफसर पर शाह आयोग ने इतना बड़ा दाग लगा दिया हो, उसे किसी भी संवेदनशील पद से दूर रखना चाहिए। लेकिन 2005 में यूपीए (मनमोहन) सरकार ने उसी दागी नवीन चावला को उठाकर देश का चुनाव आयुक्त बना दिया।

विवाद तब अपने चरम पर पहुँच गया, जब 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को पूरे 93 पन्नों की एक बहुत ही गंभीर चिट्ठी लिखी।

इस रिपोर्ट में गोपालस्वामी ने नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की थी। आरोप बहुत संगीन थे- गोपालस्वामी ने बताया की नवीन चावला चुनाव आयोग की गुप्त बैठकों से उठकर बीच में ही बाहर जाते हैं और कांग्रेसी नेताओं को खुफिया जानकारी लीक करते हैं।

यही नहीं, जब चुनाव आयोग सोनिया गांधी को कोई नोटिस भेजने की तैयारी करता था, तो चावला उसका खुलकर विरोध करते थे।

लेकिन नतीजा क्या हुआ? कांग्रेस की ही बनाई हुईं राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उस 93 पन्नों की गंभीर रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।

और हद तो तब हो गई जब 2009 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उसी नवीन चावला को देश का चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) बना दिया गया। अंपायर अपनी जेब का था, और 2009 में यूपीए की सरकार दोबारा सत्ता में आ गई।

जरा सोचिये.. जो लोग अपने वफादारों को चुनाव आयोग की कुर्सी से उठाकर सीधे मंत्री की कुर्सी पर बैठाते रहे, वो आज जब टीवी पर बैठकर लोकतंत्र और चुनाव आयोग के बिकने का रोना रोते हैं।

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