
20+निर्दोष मारे गए |
100+गंभीर रूप से घायल |
73 / 80UP लोकसभा, 2014 |
325UP विधानसभा, 2017 |
इस एपिसोड में
- 01 · यूपी की राजनीति का पुराना दौर
- 02 · 7 मार्च 2006 का वो दर्दनाक मंगलवार
- 03 · लश्कर और हूजी के आतंकी
- 04 · सपा का 2012 चुनावी मेनिफेस्टो
- 05 · मुकदमे वापस लेने का काला फरमान
- 06 · वकीलों का मोर्चा
- 07 · हाईकोर्ट की ऐतिहासिक फटकार
- 08 · मोदी और शाह की नब्ज़
- 09 · 2022 – फांसी की सज़ा
- 10 · जातिवाद की दीवार टूटी
- ◇ पूरी कहानी एक नज़र में
राजनीति की जानकारी रखने वाले धुरंधर अक्सर एक बात बड़ी शान से कहते हैं की उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कोई ऐसा जादू गढ़ दिया है जिसे तोड़ पाना विपक्ष के बस की बात नहीं रही।
ये लोग इसी बात पर माथापच्ची करते रहते हैं की आखिर बीजेपी यूपी जैसे जटिल राज्य में इतनी अजेय कैसे हो गई? लेकिन ज़मीनी हकीकत इन बहसों से कोसों दूर है।
सच तो ये है की बीजेपी की इस बंपर और ऐतिहासिक जीत के पीछे उनके खुद के कैडर से कहीं ज़्यादा बड़ा हाथ इस देश के उस विपक्ष का है, जो सत्ता के नशे और तुष्टिकरण की भूख में यह भूल ही जाता है की वो किस हद तक गिर रहा है।
भारतीय राजनीति का यह एक कड़वा लेकिन सत-प्रतिशत सच है की विपक्ष खुद ही अपने पैरों पर इतनी ज़ोर से कुल्हाड़ी मारता है की बहुसंख्यक समाज और आम राष्ट्रभक्त छिटककर सीधा बीजेपी की शरण में जाने को मजबूर हो जाता है।
यूपी की राजनीति का पुराना दौर
जहाँ चलता था सिर्फ जातिवाद और ‘M-Y’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण
ज़रा यूपी की पुरानी राजनीति को याद कीजिये। एक दौर था जब यहाँ सिर्फ जातिवाद का डंका बजता था। समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने जातियों की ऐसी भयंकर किलेबंदी कर रखी थी की किसी और पार्टी का पनपना नामुमकिन सा लगता था।
समाजवादी पार्टी को अपने ‘M-Y’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर इतना भयंकर गुरूर था की उन्हें लगने लगा था की वो कुछ भी कर लें, हिन्दू समाज तो जातियों में बंटा हुआ है, उनका कोई क्या ही बिगाड़ लेगा।
लेकिन इसी अहंकार के नशे में अखिलेश यादव ने एक ऐसा आत्मघाती कदम उठाया, एक ऐसा खौफनाक ‘सेल्फ-गोल’ किया जिसने यूपी की राजनीति की नींव ही हिला कर रख दी।
वोटबैंक की भूख में समाजवादी पार्टी ने देश की सुरक्षा, आम आदमी की जान और हिन्दुओं की आस्था के साथ सीधा सौदा कर लिया।
जब आप चंद मुस्लिम वोटों की खातिर, खून बहाने वाले खूंखार जिहादियों और आतंकियों को रिहा कराने के लिए अपनी पूरी सरकारी मशीनरी लगा देते हैं, तो आप सिर्फ एक राजनीतिक गलती नहीं करते, आप एक ऐसा पाप करते हैं जिसे देश का कोई भी नागरिक कभी माफ़ नहीं कर सकता।
अखिलेश यादव की इसी ‘आतंकी परस्ती’ और तुष्टिकरण ने यूपी के एक आम सनातनी के मन में ऐसा खौफ और गुस्सा पैदा किया, जिसने जातिवाद की हर दीवार को ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया।
हिन्दू समाज को समझ में आ गया की अगर ये लोग जिहादियों को सरकारी दामाद बना सकते हैं, तो कल को हमारी गर्दनें कटने पर ये तमाशा भी देखेंगे।
इसी रायते ने यूपी में बीजेपी की ऐसी दावत का इंतज़ाम किया, जिसका स्वाद विपक्ष आज तक भुगत रहा है। चलिए, इस ‘समाजवादी पाप’ की पूरी क्रोनोलॉजी को शुरू से समझते हैं, जब आतंकियों ने काशी की धरती को खून से लाल कर दिया था।
7 मार्च 2006 का वो दर्दनाक मंगलवार
जब काशी के संकट मोचन मंदिर में गूंजी निर्दोष हिन्दुओं की चीखें
इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें ऐसी दर्ज़ होती हैं, जिन्हें याद करके आज भी कलेजा कांप उठता है। 7 मार्च 2006 की तारीख भी यूपी और पूरे भारत के इतिहास में एक ऐसा ही काला और खूनी दिन था।
दिन था मंगलवार। हम सब जानते हैं की हिन्दू आस्था में मंगलवार का दिन भगवान हनुमान जी को समर्पित होता है।
और बात जब महादेव की नगरी काशी (वाराणसी) की हो, तो वहां के पवित्र और ऐतिहासिक संकट मोचन हनुमान मंदिर का महत्व शब्दों में बयान ही नहीं किया जा सकता।

उस शाम संकट मोचन मंदिर में श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ा हुआ था। लोग अपने परिवारों, छोटे-छोटे बच्चों और बुजुर्गों के साथ बजरंगबली के दर्शन करने पहुंचे थे।
मंदिर परिसर में घंटे-घड़ियाल बज रहे थे, आरती की तैयारियां चल रही थीं और हर तरफ ‘जय श्री राम’ और ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष हो रहा था। किसी को अंदाज़ा तक नहीं था की उनके बीच मौत का साया मंडरा रहा है।
शाम के करीब 6:15 से 6:30 का वक़्त रहा होगा। मंदिर परिसर के अंदर, जहां अक्सर शादियां और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, एक लावारिस बैग में रखे ‘प्रेशर कुकर’ में भयंकर विस्फोट हुआ।
कुकर के अंदर RDX और अमोनियम नाइट्रेट जैसे घातक विस्फोटक ठूंसे गए थे।
धमाका इतना ज़बरदस्त था की मंदिर की दीवारें दहल उठीं। जो लोग कुछ सेकंड पहले भगवान की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े खड़े थे, उनके चीथड़े उड़ गए।
खून से लथपथ लाशें और पूरे मंदिर परिसर में बिखरी हुई दहसत… चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। लोग अपनों को खून में लथपथ ढूंढ रहे थे।
मंदिर का जो फर्श कुछ देर पहले फूल-मालाओं से महक रहा था, वो बेगुनाह हिन्दुओं के खून से लाल हो चुका था।
मंदिर के बाद आतंकियों ने रेलवे स्टेशन को बनाया निशाना

लेकिन जिहादियों का खूनी खेल यहीं नहीं रुका। संकट मोचन मंदिर में हुए ब्लास्ट के ठीक 15 मिनट के भीतर ही, वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 1 पर एक और भयंकर धमाका हुआ।
शिवगंगा एक्सप्रेस दिल्ली जाने के लिए तैयार खड़ी थी और प्लेटफार्म पर भारी भीड़ थी। यहाँ भी आतंकियों ने कुकर बम का ही इस्तेमाल किया था।
स्टेशन पर भी लाशों का ढेर लग गया। इसके बाद शिवपुर रेलवे क्रॉसिंग के पास भी एक बम मिला, जिसे पुलिस ने समय रहते डिफ्यूज़ कर दिया, वरना तबाही और भी बड़ी होती।
इस खौफनाक आतंकी हमले में 20 से ज्यादा निर्दोष लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी और 100 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल होकर ज़िंदगी भर के लिए अपाहिज हो गए थे।
ये सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं था भाई.. यह सीधे तौर पर हिन्दू आस्था पर किया गया एक जिहादी वार था। आतंकियों ने जानबूझकर मंगलवार का दिन और संकट मोचन मंदिर चुना था ताकि ज़्यादा से ज़्यादा हिन्दुओं का खून बहाया जा सके।
पूरा देश ग़म और गुस्से की आग में जल रहा था। हर कोई बस यही चाहता था की इन खून के प्यासे दरिंदों को पकड़कर बीच चौराहे पर फांसी दी जाए।
लेकिन किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था की कुछ साल बाद, उत्तर प्रदेश की सत्ता पर बैठी एक सरकार इन्हीं हत्यारों को ‘निर्दोष’ बताकर जेल से आज़ाद करने का षड्यंत्र रचेगी।
हिन्दुओं का खून बहाने वाले वो लश्कर और हूजी के आतंकी
जिन्हें यूपी पुलिस ने कड़ी मशक्कत के बाद किया गिरफ्तार
काशी में हुए उन बम धमाकों के बाद पूरा देश गुस्से में उबल रहा था। केंद्र से लेकर राज्य की BSP सरकार तक पर भारी दबाव था। उत्तर प्रदेश पुलिस और स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने इन खूंखार दरिंदों को पकड़ने के लिए दिन-रात एक कर दिया था।
पुलिस के जांबाज़ अफसरों ने अपनी जान की परवाह किये बिना एक-एक सुराग को जोड़ना शुरू किया। जाँच की आंच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, वैसे-वैसे इस पूरी खौफनाक साज़िश के तार सीमा पार बैठे भारत के सबसे बड़े दुश्मनों से जुड़ते चले गए।
जांच में बिल्कुल शीशे की तरह साफ हो गया की संकट मोचन मंदिर और कैंट स्टेशन पर जो खून-खराबा हुआ था, वो किसी लोकल गुंडे का काम नहीं था।
इसके पीछे पाकिस्तान के खूंखार आतंकी संगठन ‘लश्कर-ए-तैयबा’ (LeT) और बांग्लादेश बेस वाले ‘हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी’ (HuJI) का सीधा हाथ था।
ये वो आतंकी संगठन हैं जिनका इकलौता मक़सद भारत में ‘गजवा-ए-हिंद’ का सपना पूरा करना और काफिरों (हिन्दुओं) का नरसंहार करना है।
पुलिस की लगातार दबिश और खून-पसीना बहाने का नतीजा आख़िरकार 5 अप्रैल 2006 को सामने आया।
धमाकों के लगभग एक महीने बाद, यूपी पुलिस की एसटीएफ (STF) ने एक बहुत बड़े ऑपरेशन को अंजाम देते हुए प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) के फूलपुर इलाके से इस पूरे नरसंहार के मास्टरमाइंड को दबोच लिया।
उस मास्टरमाइंड का नाम था- मौलाना वलीउल्लाह खान। इसके साथ ही महकूब अली, फरहान, शाद अली और दो अन्य आतंकियों को गिरफ्तार किया गया।
अब ज़रा इस वलीउल्लाह खान की प्रोफाइल सुनिए। यह कोई भटका हुआ ‘मासूम युवा’ नहीं था जिसे पुलिस ने राह चलते पकड़ लिया हो।
वलीउल्लाह फूलपुर की एक मस्जिद का इमाम था। ज़रा सोचिए! जो व्यक्ति धर्म की आड़ में इमाम की कुर्सी पर बैठा था, वो असल में खून का प्यासा भेड़िया था।
पुलिस रिकॉर्ड्स और चार्जशीट के अनुसार, वलीउल्लाह ही वो मास्टरमाइंड था जिसने बांग्लादेश से आए आतंकियों को पनाह दी थी।
उसी ने इन जिहादियों को इलाहाबाद से बनारस पहुँचाया था। उसी ने संकट मोचन मंदिर की रेकी की थी और यह तय किया था की मंगलवार के दिन ही बम फोड़ना है ताकि मंदिर में सबसे ज़्यादा हिन्दू मारे जाएं।
पुलिस ने वलीउल्लाह और उसके साथियों के पास से भारी मात्रा में RDX, खतरनाक डेटोनेटर, विदेशी हथियार और जिहादी साहित्य बरामद हुआ था।
एसटीएफ ने एकदम लोहे जैसी मज़बूत चार्जशीट (Charge sheet) तैयार की।
वलीउल्लाह ने अपनी जुबान से अपना जुर्म कबूल किया था और पुलिस के पास फॉरेंसिक से लेकर कॉल रिकॉर्ड्स तक के एकदम पुख्ता सबूत मौजूद थे।
देश को लगा की अब तो बस कोर्ट की मुहर लगने की देर है और इन हत्यारों को सीधा फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा।
यूपी पुलिस ने अपना काम पूरी ईमानदारी और जांबाजी से कर दिया था। लेकिन किसी को क्या पता था की कुछ ही सालों बाद, सत्ता की मलाई चाटने के लिए एक राजनीतिक पार्टी पुलिस की इस पूरी मेहनत पर पानी फेरने का खौफनाक प्लान बना रही थी।
सत्ता की भूख और सपा का 2012 चुनावी मेनिफेस्टो
जब अखिलेश यादव ने जिहादियों को रातों-रात बना दिया ‘निर्दोष मुस्लिम युवा’
समय का पहिया घूमा और साल आ गया 2012। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका था। मायावती की सत्ता से बेदखली तय मानी जा रही थी और समाजवादी पार्टी (SP) किसी भी कीमत पर यूपी की गद्दी हथियाने के लिए छटपटा रही थी।
अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का नया चेहरा बनाया गया था। लेकिन अखिलेश और उनके रणनीतिकारों को एक बात बहुत अच्छे से पता थी कि सिर्फ यादवों के वोट से सरकार नहीं बनने वाली। सत्ता तक पहुँचने के लिए ‘मुस्लिम वोटबैंक’ को अपनी मुट्ठी में करना सबसे ज़रूरी था।
और इसी मुस्लिम वोटबैंक को थोक के भाव में हासिल करने के लिए, समाजवादी पार्टी ने एक ऐसा दांव चला जो भारतीय राजनीति के इतिहास का सबसे शर्मनाक, सबसे घटिया और सबसे देश-विरोधी दांव माना जाएगा।
चुनावों से ठीक पहले, समाजवादी पार्टी ने अपना चुनावी घोषणा पत्र (Election Manifesto) जारी किया। आम तौर पर पार्टियां अपने मेनिफेस्टो में बिजली, पानी, सड़क, स्कूल और रोजगार के वादे करती हैं।
लेकिन सपा के इस मेनिफेस्टो में एक ऐसा खतरनाक पन्ना जोड़ा गया था जिसे पढ़कर किसी भी राष्ट्रभक्त का खून खौल उठे।
समाजवादी पार्टी ने डंके की चोट पर यह लिखित वादा किया की अगर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार बनती है, तो आतंकवाद के आरोप में जेलों में बंद “निर्दोष मुस्लिम युवाओं” को तुरंत रिहा कर दिया जाएगा और उन्हें फंसाने वाले पुलिसवालों पर कार्रवाई की जाएगी।
ज़रा इन शब्दों की क्रोनोलॉजी को समझिए भाई! “निर्दोष मुस्लिम युवा”। एक आतंकी जिसने मंदिर में कुकर बम फोड़कर 20 हिन्दुओं के चीथड़े उड़ा दिए, वो समाजवादी पार्टी के लिए रातों-रात एक भटका हुआ ‘निर्दोष मुस्लिम युवा’ बन गया।
ये कौन सा कानून है? ये कौन सा संविधान है जो कहता है की आतंकवाद का भी धर्म होता है? क्या बम के छर्रे किसी का धर्म पूछकर उसकी जान लेते हैं?
अगर कोई आतंकवादी पकड़ा गया है, तो कोर्ट ये तय करेगा ना की वो निर्दोष है या मुजरिम! कोई राजनीतिक पार्टी अपने मेनिफेस्टो में यह कैसे लिख सकती है की हम सत्ता में आते ही एक विशेष धर्म के आरोपियों को छोड़ देंगे?
दुर्भाग्य की सपा के तुष्टिकरण का यह खौफनाक फॉर्मूला उस वक़्त काम कर गया
सपा ने सीधे तौर पर मुसलमानों को यह मैसेज दिया था की- ‘तुम बस हमें वोट देकर गद्दी पर बैठाओ, तुम्हारे लड़के चाहे बम फोड़ें या देश के टुकड़े करें, हम उन्हें बचा लेंगे।’
और ये तुष्टिकरण का फॉर्मूला उस वक़्त काम कर गया। 2012 के चुनावों में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बन गए।
सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही अखिलेश यादव ने अपने उस ‘जिहादी वादे’ को पूरा करने की ठान ली।
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही उन्होंने एक ऐसी खतरनाक और काली फाइल पर हस्ताक्षर करने की तैयारी शुरू कर दी, जिससे न सिर्फ देश की न्याय व्यवस्था का चीरहरण होने वाला था, बल्कि उन 20 बेगुनाह हिन्दुओं की आत्माओं से भी भद्दा मज़ाक होने वाला था जो संकट मोचन मंदिर में मारे गए थे।
सत्ता के मद में चूर अखिलेश यादव भूल गए थे की वो जिस आग से खेल रहे हैं, वो कल उनकी खुद की राजनीतिक विरासत मिटा देगी।
ना संविधान की परवाह और ना ही उन हिन्दुओं के परिवारों के आंसुओं की
अखिलेश सरकार का वो आतंकियों के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस लेने का काला फरमान
2012 में सत्ता की चाबी हाथ में आते ही अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने अपने उस खौफनाक वादे पर काम करना शुरू कर दिया, जिसका ज़िक्र उन्होंने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किया था।
सत्ता का नशा ऐसा था की इन्हें ना तो संविधान की परवाह थी और ना ही उन 20 बेगुनाह हिन्दुओं के परिवारों के आंसुओं की, जो संकट मोचन मंदिर में अपने को खो चुके थे।
अखिलेश सरकार का इकलौता लक्ष्य बस यह साबित करना था की वो मुस्लिम वोटबैंक के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें खूंखार आतंकियों के पैरों में ही क्यों न गिरना पड़े।
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही अखिलेश यादव ने एक ऐसा खेल रचा जिसने देश के पूरे न्याय और प्रशासनिक सिस्टम का सरेआम चीरहरण कर दिया।
2012 के अंत और 2013 की शुरुआत में, उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग (Home Department) से एक ऐसा काला और शर्मनाक लिखित फरमान (Official Order) जारी हुआ, जिसे देखकर पुलिस महकमे और इंटेलिजेंस एजेंसियों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
इस सरकारी फरमान में साफ-साफ लिखा गया था की वाराणसी (संकट मोचन), गोरखपुर, फैजाबाद और लखनऊ की अदालतों में जिन आतंकियों पर बम ब्लास्ट के मुकदमे चल रहे हैं, सरकार उन मुकदमों को वापस लेना चाहती है।
इस लिस्ट में सिर्फ वाराणसी ब्लास्ट का मास्टरमाइंड मौलाना वलीउल्लाह खान ही नहीं था, बल्कि तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद जैसे खूंखार आतंकियों के नाम भी शामिल थे जिन पर सीरियल ब्लास्ट करने के पक्के सबूत थे।
इस फरमान को लागू करने के लिए अखिलेश सरकार के बड़े अधिकारियों ने संबंधित जिलों (वाराणसी, फैजाबाद, गोरखपुर) के जिलाधिकारियों (DMs) और सरकारी वकीलों (Public Prosecutors) पर भयंकर दबाव डाला।
उन्हें सीधा आदेश दिया गया की वे कोर्ट में जाकर इन आतंकियों के खिलाफ चल रहे सारे मुकदमे वापस लेने की अर्जी (Application for Withdrawal) दाखिल करें।
अब ज़रा उस तर्क को सुनिए जो समाजवादी पार्टी ने इन हत्यारों को छोड़ने के लिए कागज़ों पर लिखा था। सरकार की तरफ से कहा गया की इन मुकदमों को “सार्वजनिक सद्भाव (Public Harmony) और न्याय के व्यापक हित में” वापस लिया जा रहा है!
ज़रा सोचिए भाई! कैसा सार्वजनिक सद्भाव? क्या एक पवित्र हनुमान मंदिर में कुकर बम फोड़कर हिन्दुओं को मारने वाले आतंकियों को रिहा करने से समाज में ‘सद्भाव’ आएगा?
क्या 20 लाशों के ऊपर से गुज़रकर आप शांति स्थापित करेंगे? ये सार्वजनिक सद्भाव नहीं था, यह तो खुलेआम आतंकियों को ‘सरकारी दामाद’ बनाकर सरकारी खर्चे पर आज़ाद करने का एक षड्यंत्र था।
जो पुलिस अफसर अपनी जान पर खेलकर इन आतंकियों को RDX के साथ पकड़ कर लाए थे, अखिलेश सरकार का यह फरमान उनके मनोबल को तोड़ने जैसा था।
जब न्याय की चौखट पर पहुंचा तुष्टिकरण का ये गंदा खेल
और वकीलों ने सपा सरकार के खिलाफ खोल दिया मोर्चा
अखिलेश यादव और उनकी पूरी समाजवादी मशीनरी को लगा था की वो सत्ता के दम पर इस काले फरमान को चुपचाप लागू करवा लेंगे और उनके मुस्लिम वोटबैंक के आका खुश हो जाएंगे।
लेकिन देश में अभी भी कुछ ऐसे सच्चे राष्ट्रभक्त ज़िंदा थे जिनकी रगों में पानी नहीं, बल्कि उबाल मारता हुआ खून दौड़ रहा था।
जैसे ही यह खबर बाहर आई की अखिलेश सरकार वलीउल्लाह और उसके आतंकी साथियों को रिहा करवाने जा रही है, पूरे उत्तर प्रदेश का कोहराम मच गया।
और इस विरोध की सबसे पहली और सबसे भयंकर चिंगारी उठी बनारस और इलाहाबाद (प्रयागराज) के वकीलों के बीच से।
आपको बता दें की 2006 में जब वलीउल्लाह को गिरफ्तार किया गया था, तो काशी के वकीलों ने अपने राष्ट्रप्रेम का वो शानदार नमूना पेश किया था जिसे इतिहास कभी नहीं भूलेगा।
बनारस के वकीलों ने एक स्वर में ऐलान कर दिया था की कोई भी वकील इस जिहादी आतंकी का केस नहीं लड़ेगा।
जब पुलिस वलीउल्लाह को कोर्ट में पेश करने लाई थी, तो वकीलों और आम जनता के गुस्से का ऐसा ज्वालामुखी फटा था की पुलिस को वलीउल्लाह को बचाकर वहां से निकालने में पसीने छूट गए थे।
वकीलों ने वलीउल्लाह की सरेआम पिटाई कर दी थी। सुरक्षा कारणों और वकीलों के इसी भयंकर विरोध की वजह से ही बनारस ब्लास्ट का यह केस पहले इलाहाबाद और फिर बाद में गाजियाबाद की सेशंस कोर्ट में ट्रांसफर करना पड़ा था।
अब सोचिए, जिन हत्यारों को बचाने के लिए कोई एक वकील तक खड़ा होने को तैयार नहीं था, उन्हीं हत्यारों को बचाने के लिए पूरी की पूरी उत्तर प्रदेश सरकार खड़ी हो गई!
जैसे ही सरकारी वकीलों ने जिला अदालतों में केस वापसी की अर्जी लगानी शुरू की, देश भर के राष्ट्रभक्त वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
अखिलेश सरकार के इस देश-विरोधी काले आदेश को सीधे चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) की लखनऊ बेंच में जनहित याचिकाएं (PIL) दायर कर दी गईं।

कोर्ट रूम का मंज़र देखने लायक था। एक तरफ वो सच्चे वकील थे जो हाथ में सबूतों की फाइलें लिए 20 बेगुनाह हिन्दुओं के खून का इंसाफ मांग रहे थे।
और दूसरी तरफ अखिलेश सरकार के वो सरकारी वकील थे, जो पसीने से तर-बतर होकर यह साबित करने की झूठी और भद्दी दलीलें दे रहे थे की कैसे इन खूंखार आतंकियों को आज़ाद कर देना ‘जनहित’ में है।
क्या कल बम फोड़ने वालों को पद्म भूषण दोगे…
इलाहाबाद हाई कोर्ट की वो अखिलेश को ऐतिहासिक फटकार जिसकी गूंज आज तक कायम है
जब अखिलेश सरकार अपनी पूरी ताकत लगाकर आतंकियों को आज़ाद करने का पाप कर रही थी, तब न्यायपालिका का वो हंटर चला जिसकी गूंज आज तक भारतीय राजनीति के गलियारों में थरथराती है।
जनहित याचिकाओं (PIL) पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) की लखनऊ बेंच ने समाजवादी सरकार के इस मुस्लिम तुष्टिकरण वाले एजेंडे की ऐसी बखिया उधेड़ी, जिसे देखकर पूरे सपाई इकोसिस्टम के चेहरों पर हवाइयां उड़ गईं।
अदालत का कमरा खचाखच भरा हुआ था। सरकारी वकील अदालत को यह समझाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे की इन ‘निर्दोष मुस्लिम युवकों’ (आतंकियों) को छोड़ना किस तरह से समाज के ‘व्यापक हित’ में है।
लेकिन बेंच पर बैठे न्यायमूर्तियों (विशेषकर जस्टिस आर.के. अग्रवाल की बेंच और संबंधित जजों) ने सरकार के वकीलों को बीच में ही रोकते हुए वो ऐतिहासिक और कड़क सवाल दागा, जिसने अखिलेश यादव के पूरे सियासी करियर पर एक अमिट कालिख पोत दी।
हाई कोर्ट की बेंच ने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए डंके की चोट पर पूछा-
“आज आप राजनीतिक फायदे के लिए इन पर से आतंकवाद के मुकदमे वापस ले रहे हैं, क्या कल को आप इन्हें पद्म भूषण से नवाजेंगे?”
इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ बेंच
वाह! क्या प्रहार था! ये सिर्फ एक सवाल नहीं था, यह देश के हर उस सच्चे नागरिक और राष्ट्रभक्त के दिल की आवाज़ थी जो उस वक़्त घुट-घुट कर सरकार की इस हरकत को देख रहा था।
हाई कोर्ट ने अखिलेश सरकार को आईना दिखाते हुए स्पष्ट किया की किसी मुजरिम पर से मुकदमा वापस लेने का कानून (CrPC की धारा 321) इसलिए नहीं बना है की आप अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए देश के दुश्मनों को सरकारी दामाद बना लें।
अदालत ने बहुत सख्त लहज़े में कहा की क्या इन लोगों ने बम ब्लास्ट करके कोई समाज सेवा की है जो सरकार इन्हें क्लीन चिट बांट रही है?
न्यायाधीशों ने सपा सरकार के लीगल सिस्टम को सरेआम बेनकाब करते हुए कहा की कौन आतंकी है, कौन मुजरिम है और कौन निर्दोष है… यह तय करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ अदालत के पास है।
किसी भी राजनीतिक पार्टी या मुख्यमंत्री को यह हक़ नहीं है की वो यह तय कर ले की बम फोड़ने वाला जिहादी ‘निर्दोष’ है।
अदालत ने अखिलेश सरकार के उस काले फरमान को रद्दी के टुकड़े की तरह फाड़कर फेंक दिया और आतंकियों पर से मुकदमे वापस लेने की अर्जी को सिरे से ख़ारिज कर दिया।
यह समाजवादी पार्टी के लिए एक ऐसा भयंकर मुँह के बल गिरने वाला लम्हा था, जहाँ उनका पूरा ‘सेक्युलर’ पाखंड बीच चौराहे पर खड़ा हो गया था।
उन्हें लगा था की वो चुपचाप आतंकियों को रिहा करवाकर मुसलामानों के मसीहा बन जाएंगे, लेकिन हाई कोर्ट के इस ज़ोरदार तमाचे ने पूरे देश के सामने यह साबित कर दिया की अखिलेश यादव ‘मुस्लिम वोटबैंक’ के लिए इस देश की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था को भी बेच सकते हैं।
मोदी और शाह ने कैसे पकड़ी अखिलेश के इस रायते की नब्ज़
चुनावी रैलियों में बेनकाब कर दिया सपा का आतंकी प्रेम
अब राजनीति में एक नियम है। जब आपका विरोधी खुद अपने हाथों से अपनी राजनीतिक चिता सजा ले, तो एक चतुर रणनीतिकार का काम सिर्फ उस चिता में माचिस की तीली लगाना होता है।
अखिलेश यादव ने ‘आतंकियों को रिहा करने’ का जो भयंकर रायता फैलाया था, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उस रायते को समेट कर अपनी जीत की ऐसी शानदार दावत तैयार की, जिसकी कल्पना विपक्ष ने सपने में भी नहीं की होगी।
2014 के लोकसभा चुनाव सिर पर थे और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जा चुका था। उधर यूपी फतह करने की ज़िम्मेदारी अमित शाह के कंधों पर थी।
मोदी-शाह की इस चाणक्य जोड़ी ने अखिलेश यादव के इस खौफनाक ‘सेल्फ-गोल’ को तुरंत लपक लिया। उन्हें पता था की यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह यूपी के बहुसंख्यक हिन्दू समाज की नब्ज़ है।
जिस हिन्दू समाज को सदियों से जातियों के नाम पर बांटा जा रहा था, उसे एक करने के लिए यह मुद्दा ‘संजीवनी बूटी’ साबित होने वाला था।
नरेंद्र मोदी, अमित शाह और बाद में योगी आदित्यनाथ ने अपनी चुनावी रैलियों में इस मुद्दे को इतनी आक्रामकता और सच्चाई के साथ उठाया की यूपी की जनता के खून में उबाल आ गया।
मोदी जी ने अपनी जनसभाओं में दहाड़ते हुए कहा-
“ज़रा सोचिये भाइयों और बहनों, जो सरकार अपनी सत्ता बचाने के लिए, चंद वोटों की लालच में काशी में बम फोड़ने वाले आतंकियों की रिहाई के लिए रात-दिन एक कर देती है, क्या वो सरकार आपकी बेटियों, आपके मंदिरों और आपकी जान की सुरक्षा कर सकती है?”
नरेंद्र मोदी · 2014 लोकसभा अभियान
ये सीधे यूपी के उस आम आदमी के दिल पर चोट थी जो सपा सरकार के गुंडाराज और तुष्टिकरण से पहले ही त्रस्त था।
अमित शाह ने इस मुद्दे को यूपी के गांव-गांव और चौपालों तक पहुंचा दिया।
उन्होंने जनता से सीधा संवाद किया और कहा की “यह चुनाव सिर्फ सरकार चुनने का नहीं, बल्कि अपने सम्मान की रक्षा करने और इस अपमान का लोकतांत्रिक तरीके से (वोट की चोट से) बदला लेने का चुनाव है।”
एक तरफ अगर किसी आम हिन्दू से कोई छोटी सी भी गलती हो जाए तो यूपी पुलिस उसे घसीटते हुए थाने ले जाती थी, और दूसरी तरफ 20-20 हिन्दुओं को बम से उड़ाने वाले खूंखार जिहादियों को बचाने के लिए खुद मुख्यमंत्री सरकारी वकीलों की फौज खड़ी कर रहे थे।
बीजेपी ने इस पूरे मुद्दे को ‘राष्ट्रवाद बनाम जिहादी तुष्टिकरण’ की लड़ाई में बदल दिया। उन्होंने विपक्ष के उस ‘सेक्युलरिज्म’ के चोले को तार-तार कर दिया, जिसके नीचे आतंकियों से हमदर्दी पल रही थी।
16 साल बाद जब घूमा न्याय का पहिया
और अखिलेश के ‘निर्दोष’ वलीउल्लाह के गले में पड़ गया फांसी का फंदा
इस पूरी कहानी का सबसे शानदार क्लाइमैक्स तो 2022 में आया। कहते हैं ना की भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं!
अखिलेश यादव ने 2012-13 में जिस मास्टरमाइंड मौलाना वलीउल्लाह खान को एक ‘भटका हुआ, मासूम और निर्दोष मुस्लिम युवा’ बताकर उसे जेल से आज़ाद करने के लिए अपनी पूरी सरकार की ताकत झोंक दी थी…
आख़िरकार उसी वलीउल्लाह के पापों का घड़ा 16 साल बाद फूट गया।
तारीख थी 6 जून 2022। गाजियाबाद की स्पेशल सेशंस कोर्ट में इस केस की आख़िरी सुनवाई चल रही थी। (याद रहे, बनारस के वकीलों के विरोध के कारण यह केस गाजियाबाद ट्रांसफर किया गया था)।
जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District Judge) जितेंद्र कुमार सिन्हा की अदालत ने वलीउल्लाह खान के खिलाफ एसटीएफ (STF) द्वारा पेश किए गए सारे सबूतों, फॉरेंसिक रिपोर्ट्स और गवाहियों को बिल्कुल सही पाया।
अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में मास्टरमाइंड वलीउल्लाह खान को संकट मोचन मंदिर और कैंट स्टेशन पर ब्लास्ट कराने, हत्या और देशद्रोह के मामले में दोषी करार दिया।
और सज़ा क्या मिली?
जिस आतंकी के लिए समाजवादी पार्टी ‘सार्वजनिक सद्भाव’ का रोना रो रही थी, अदालत ने उसी आतंकी वलीउल्लाह को दो मामलों में फांसी की सज़ा (Death Penalty) और एक मामले में आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सज़ा सुनाई।
अदालत के इस फैसले ने अखिलेश यादव, उनकी समाजवादी पार्टी और उस पूरे ‘सेक्युलर इकोसिस्टम’ को हमेशा के लिए ध्वस्त कर दिया।
फांसी का यह फैसला सिर्फ वलीउल्लाह के लिए नहीं था.. यह तुष्टिकरण की उस नीच राजनीति के लिए भी एक फांसी का फंदा था जो चंद वोटों के लिए देश की सुरक्षा को दांव पर लगा देती है।
जब गाजियाबाद कोर्ट का यह फैसला आया, तो अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के किसी भी नेता के मुँह से एक शब्द नहीं निकला। सारा विपक्ष ऐसे गूंगा हो गया जैसे उन्हें सांप सूंघ गया हो। वो क्या बोलते? उनके पास देश को मुंह दिखाने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।
अखिलेश के डरावने ‘जिहादी-प्रेम’ ने यूपी में कमजोर कर दी जातिवाद की दीवार
और BJP को बैठे-बिठाये मिल गया एक तगड़ा हिन्दू राष्ट्रवादी वोटबैंक
अगर आप उत्तर प्रदेश की राजनीतिक डेमोग्राफी को गहराई से समझें, तो आपको पता चलेगा की अखिलेश यादव का यह ‘आतंकी बचाव अभियान’ समाजवादी पार्टी के इतिहास की सबसे बड़ी और आत्मघाती भूल साबित हुआ।
अखिलेश को अपने ‘M-Y’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर इतना भयंकर ओवर-कॉन्फिडेंस था की उन्हें लगा, अगर हम खुलेआम आतंकियों को छोड़ भी देंगे, तो हमारा यादव वोटर तो हमारे साथ ही खड़ा रहेगा।
लेकिन यहीं उनसे सबसे बड़ी रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक चूक हो गई। वो भूल गए की हर जाति से पहले एक आम इंसान एक ‘राष्ट्रभक्त’ और एक ‘सनातन धर्मी’ होता है।
जब संकट मोचन मंदिर में हुए खूनी ब्लास्ट के आतंकियों को रिहा कराने के लिए पूरी सपा सरकार सड़कों और अदालतों में बिछ गई, तो इसका असर सिर्फ ब्राह्मणों या ठाकुरों पर नहीं हुआ।
यूपी के एक आम यादव और एक आम पिछड़े वर्ग के नागरिक के मन में भी एक भयंकर डर और खौफ पैदा हो गया।
इन आम लोगों ने सोचा की अगर ये चंद मुस्लिम वोटों के लिए उन जिहादियों को ‘निर्दोष’ बता सकते हैं जिनके हाथों से अभी भी हमारे हिन्दू भाई-बहनों का खून टपक रहा है…
तो कल को अगर हमारे मोहल्ले में कोई दंगा हुआ, या हमारी बहन-बेटियों के साथ कोई अन्याय हुआ, तो ये सरकार क्या हमारी रक्षा करेगी? बिल्कुल नहीं! ये तो उन मुजरिमों के गले में भी फूलमाला डालकर उन्हें आज़ाद कर देगी।
तुष्टिकरण के इसी खौफ और भयंकर गुस्से से आख़िरकार यूपी में एक ‘पोलराइजेशन’ (Polarization) हुआ।
क्या यादव, क्या कुर्मी, और क्या ब्राह्मण… हर वो इंसान जो राष्ट्र और धर्म से प्रेम करता था, उसने समाजवादी पार्टी और उनके सेक्युलर इकोसिस्टम से हमेशा के लिए मुँह मोड़ लिया।
जो हिन्दू वोटबैंक पहले अलग-अलग खेमों में बंटा हुआ था, वो रातों-रात एक होकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कमल के निशान के पीछे एक फौलादी दीवार बनकर खड़ा हो गया।
बीजेपी ने इसी गुस्से को वोट में तब्दील किया। और नतीजा क्या हुआ?
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटों पर ऐसा भयंकर कब्ज़ा किया की विपक्ष के बड़े-बड़े दिग्गजों की ज़मानतें ज़ब्त हो गईं।
समाजवादी पार्टी जो खुद को यूपी का शेर समझती थी, वो महज़ 5 सीटों (वो भी सिर्फ अपने परिवार की सीटों) तक सिमट कर रह गई।
और यही ‘हिन्दू और राष्ट्रवादी लहर’ 2017 के विधानसभा चुनावों में एक सुनामी बन गई, जब यूपी की जनता ने सपा को उखाड़ फेंकते हुए बीजेपी को 325 सीटों का ऐसा प्रचंड बहुमत दिया, जो आज तक एक रिकॉर्ड है।
विपक्ष का ‘रायता’ अब बीजेपी की एक ‘ऐतिहासिक दावत’ में बदल चुका था।
◇ पूरी कहानी एक नज़र में
2006 के खून से 2022 की फांसी तक
| 7 मार्च 2006 | संकट मोचन मंदिर और वाराणसी कैंट पर कुकर बम। 20+ मौतें, 100+ घायल। |
| 5 अप्रैल 2006 | STF ने फूलपुर से मास्टरमाइंड मौलाना वलीउल्लाह खान और साथियों को दबोचा। |
| 2012 मेनिफेस्टो | सपा ने “निर्दोष मुस्लिम युवाओं” की रिहाई का लिखित वादा किया। अखिलेश मुख्यमंत्री बने। |
| 2012-13 | गृह विभाग का फरमान: वाराणसी, गोरखपुर, फैजाबाद, लखनऊ के आतंकी मुकदमे वापस लो। |
| हाईकोर्ट | लखनऊ बेंच ने अर्जी ख़ारिज की – “क्या कल इन्हें पद्म भूषण दोगे?” |
| 2014 / 2017 | BJP: 73/80 लोकसभा, फिर 325 विधानसभा सीटें। |
| 6 जून 2022 | गाजियाबाद सेशंस कोर्ट ने वलीउल्लाह को दो मामलों में फांसी, एक में उम्रकैद। |
सीरीज जारी रहेगी
बीजेपी अजेय नहीं। विपक्ष ही बार-बार अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारता है। अगले एपिसोड में एक और ऐसा सेल्फ-गोल।
