बीजेपी अजेय नहीं विपक्ष ही अनाड़ी है, Episode 9: राहुल गाँधी का मुख्य सलाहकार हिमंत से ज्यादा अपने ‘कुत्ते’ को सम्मान, घुसपैठियों को बचाने की ज़िद, और मूल असमियों से गद्दारी, कांग्रेस के वो महापाप जिससे 2016 में BJP को मिली असम की महाविजय

15 साल
एक मुख्यमंत्री
52 / 78
हिमंत के साथ विधायक
9 जिले
2011 जनगणना
86 / 126
NDA, 2016
26
कांग्रेस, 2016

अध्याय

  1. 2016 में असम में ज़मीनी हकीकत से पूरी तरह कटी कांग्रेस
  2. दशकों तक मुख्यमंत्री रहे ‘तरुण गोगोई’ का अंधा पुत्रमोह
  3. गैर-गंभीर राहुल गांधी और उनके कुत्ते ‘पिद्दी’ का वो ‘बिस्किट’ वाला कांड
  4. 2011 की जनगणना के वो डरावने आंकड़े
  5. घुसपैठियों को अपना वोटबैंक बनाकर बचाने की कांग्रेस की वो ज़िद
  6. कांग्रेस का ‘अली, कुली, और बंगाली’ का वो पुराना तुष्टिकरण फॉर्मूला
  7. सत्ता के नशे में ठुकराए गए अपने अहम क्षेत्रीय साथी
  8. BJP का जाति, माटी और भेटी वाला ऐतिहासिक ब्रह्मास्त्र
  9. BJP के सर्बानंद सोनोवाल के रूप में असमिया स्वाभिमान की वापसी
  10. 2016 के ऐतिहासिक असम विधानसभा चुनाव नतीजे

एक बात तो माननी पड़ेगी, आज भी कई लोग यही सोचते हैं की बीजेपी चुनाव जीतने के लिए कोई जादू करती है। उन्हें लगता है की बस अमित शाह कोई बटन दबाते हैं और पूरे देश की जनता सम्मोहित होकर कमल के निशान पर वोट डाल देती है।

लेकिन रियलिटी इससे बहुत अलग है। सच कहूं तो हकीकत ये है की बीजेपी के जीतने की एक बहुत ही बड़ी वजह वो विपक्ष है जो जोश में आकर होश खो बैठता है, और हर बार ऐसी कोई न कोई भूल कर जाता है जिससे जनता उससे छिटक जाती है।

और फिर BJP को कुछ ज्यादा काम ही नहीं करना पड़ता.. उसे बस विपक्ष के फैलाये रायते को समेटना होता है, और दावत खुद-बा-खुद BJP के पास दौड़ी चली आती है।

इस सीरीज़ के नौवें एपिसोड में हम जिस राज्य की बात करने जा रहे हैं, वो इस थ्योरी का सबसे बड़ा और सबसे क्लासिक सुबूत है- असम!

ज़रा 2016 से पहले के असम और पूर्वोत्तर (North-East) भारत के राजनैतिक इतिहास को याद कीजिए। दशकों तक नॉर्थ-ईस्ट को कांग्रेस की ऐसी बपौती माना जाता था, जहां परिंदा भी बिना गांधी परिवार की मर्ज़ी के पर नहीं मार सकता था।

बीजेपी का हाल तो ये था की असम में वो 10-15 सीटों के लिए भी तरस जाते थे। उनका वोट शेयर इतना कम होता था की कांग्रेस के नेता बीजेपी को कोई सीरियस पॉलिटिकल पार्टी मानते ही नहीं थे।

लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ की 2016 आते-आते असम की पूरी की पूरी ज़मीन ही पलट गई? जिस राज्य में बीजेपी का कोई मजबूत जनाधार नहीं था, वहां उन्होंने पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार कैसे बना ली?

क्या बीजेपी ने कोई जादू कर दिया था? बिल्कुल नहीं! दरअसल, सत्ता का जो भयंकर नशा कांग्रेस के दिमाग में चढ़ चुका था, उसने ही उनके विनाश की पटकथा लिखनी शुरू कर दी थी।

1. 2016 में असम में ज़मीनी हकीकत से पूरी तरह कटी कांग्रेस

कैसे 15 साल की शासक-विरोधी लहर को नज़रअंदाज़ कर खुद मारी अपने पैरो में कुल्हाड़ी

अब थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं और समझते हैं की ज़मीन पर असल में पक क्या रहा था। साल 2001 में तरुण गोगोई असम के मुख्यमंत्री बने थे।

उसके बाद 2006 और 2011 का चुनाव भी कांग्रेस ने बड़े आराम से जीत लिया। लगातार 15 साल तक एक ही पार्टी, एक ही मुख्यमंत्री और एक ही सिस्टम राज्य पर राज कर रहा था।

इंसान की फितरत है यार, जब कोई लगातार 15 साल तक मलाई काटता है, तो उसके अंदर एक सामंती (Feudal) अहंकार आ ही जाता है। तरुण गोगोई और कांग्रेस के आलाकमान के साथ बिल्कुल यही हुआ।

2015 आते-आते असम के अंदर कांग्रेस के खिलाफ एक भयंकर ज्वालामुखी पक रहा था। लगातार तीन टर्म सत्ता में रहने की वजह से पैदा हुई शासक-विरोधी लहर (Anti-incumbency) अपने चरम पर थी।

जिन चाय बागान के मज़दूरों को कांग्रेस अपना फिक्स वोटबैंक मानती थी, उन मज़दूरों की हालत बद से बदतर हो चुकी थी। उन्हें ना तो ठीक से दिहाड़ी मिल रही थी और ना ही मूलभूत सुविधाएं।

उधर, असम का मूल निवासी (Indigenous Assamese) अपनी ज़मीन और अपनी पहचान छिन जाने के डर से कांप रहा था। गुवाहाटी से लेकर डिब्रूगढ़ तक, हर चाय की टपरी और हर मोहल्ले में गोगोई सरकार के खिलाफ गुस्से का उबाल साफ देखा जा सकता था।

लेकिन मज़ाक देखिए! दिल्ली में बैठे सोनिया और राहुल गांधी के दरबारियों ने इस ज़मीनी हकीकत से पूरी तरह आंखें मूंद ली थीं।

और सबसे बड़ी त्रासदी ये थी की कांग्रेस के अंदर जो नेता इस खतरे को भांप चुका था, जो बार-बार चीख-चीख कर कह रहा था की “जनाब हम चुनाव हारने वाले हैं, कुछ करिए,” उसी नेता को कांग्रेस हाईकमान ने बेइज़्ज़त करके घर से बाहर निकाल दिया।

2. दशकों तक मुख्यमंत्री रहे ‘तरुण गोगोई’ का अंधा पुत्रमोह

52 विधायकों के समर्थन वाले असम के चाणक्य को दरकिनार करने की भारी गलती

महाभारत में एक बहुत ही मशहूर प्रसंग है की धृतराष्ट्र का अंधा पुत्रमोह ही पूरे कुरुवंश के विनाश का कारण बना था। अगर आप 2016 के असम चुनाव को करीब से देखेंगे, तो आपको तरुण गोगोई के रूप में बिल्कुल वही किरदार नज़र आएगा।

15 साल राज करने के बाद तरुण गोगोई को लगने लगा था की असम की कुर्सी पर अब सिर्फ उनके खानदान का ही कॉपीराइट है। उन्हें लगने लगा था की जब वो रिटायर होंगे, तो उनकी गद्दी किसी योग्य ज़मीनी नेता को नहीं, बल्कि उनके लाडले बेटे गौरव गोगोई को मिलनी चाहिए।

और यहीं से कांग्रेस ने अपने पैरों पर वो कुल्हाड़ी मारी, जिसका दर्द उन्हें आज तक साल रहा है।

ज़रा उस वक्त के राजनीतिक समीकरणों को समझिए। कांग्रेस के पास उस समय एक ऐसा हीरा था, जिसने 2006 और 2011 में पार्टी को अपने दम पर चुनाव जितवाए थे। वो नेता कोई और नहीं, बल्कि हिमंत बिस्वा सरमा थे। हिमंत सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, वो असम के चप्पे-चप्पे को जानने वाले सबसे बड़े रणनीतिकार, इलेक्शन मैनेजर और मास-मोबिलाइज़र (Mass mobilizer) थे। उन्हें असम की जनता की नब्ज़ पता थी।

लेकिन तरुण गोगोई का पुत्रमोह इतना हावी हो चुका था की उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने बेटे गौरव गोगोई को कलियाबोर सीट से मैदान में उतार दिया और पूरी पार्टी की मशीनरी को अपने बेटे का करियर सेट करने में लगा दिया।

अब जो आदमी दिन-रात पसीना बहाकर पार्टी को ज़िंदा रखे हुए था, ज़ाहिर सी बात है उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचनी ही थी। हिमंत बिस्वा सरमा और तरुण गोगोई के बीच अंदरूनी खींचतान शुरू हो गई।

लोकतंत्र का सीधा सा नियम है की जिसके पास बहुमत है, ताकत उसी के हाथ में होनी चाहिए। डेटा उठाकर देख लीजिए भाई! 2014-15 के दौरान असम विधानसभा में कांग्रेस के पास 78 विधायक थे। और उन 78 में से पूरे 52 विधायकों ने लिखित में हाईकमान को समर्थन पत्र दिया था की वो तरुण गोगोई की जगह हिमंत बिस्वा सरमा को अपना नेता (मुख्यमंत्री) बनाना चाहते हैं।

सोचिए, दो-तिहाई से भी ज़्यादा विधायक एक ज़मीनी नेता के साथ खड़े थे! लेकिन दिल्ली दरबार में बैठे सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने क्या किया?

उन्होंने लोकतंत्र और बहुमत की धज्जियां उड़ाते हुए उन 52 विधायकों की आवाज़ को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। कांग्रेस आलाकमान ने ज़मीनी हकीकत को ठुकराकर तरुण गोगोई और उनके बेटे गौरव गोगोई का ही पक्ष लिया। इन्हें लगा की हिमंत जाएगा तो जाएगा कहाँ, हमारी ही पार्टी का गुलाम बनकर रहेगा। लेकिन यही इनका सबसे बड़ा ओवरकॉन्फिडेंस था।

78 में से 52

लेख के आंकड़े: कांग्रेस के 78 विधायकों में से 52 ने हिमंत बिस्वा सरमा के नाम लिखित समर्थन पत्र दिया। हाईकमान ने उस आवाज़ को दरकिनार किया।

3. गैर-गंभीर राहुल गांधी और उनके कुत्ते ‘पिद्दी’ का वो ‘बिस्किट’ वाला कांड

BJP ने कैसे कांग्रेस से हमेशा के लिए छीन लिया पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा रणनीतिकार

अब आते हैं उस ऐतिहासिक कांड पर, जिसे भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा ‘सेल्फ-गोल’ कहा जाता है। जुलाई 2015 की बात है। हिमंत बिस्वा सरमा असम की गिरती हुई राजनैतिक स्थिति, डेमोग्राफी (Demography) में आ रहे खौफनाक बदलाव और चुनाव हारने की चिंताओं का एक पूरा डॉकेट लेकर दिल्ली पहुंचे।

उनके साथ तरुण गोगोई और कांग्रेस के कुछ अन्य नेता भी राहुल गांधी से मिलने गए थे। हिमंत वहां एक बेहद गंभीर मुद्दे पर बात कर रहे थे। वो समझा रहे थे की ज़मीन पर पार्टी खत्म हो रही है, हमें रणनीति बदलनी होगी।

लेकिन सामने बैठे राहुल गांधी की कोई दिलचस्पी असम की समस्याओं में नहीं थी। वो पूरी मीटिंग के दौरान अपने पालतू कुत्ते ‘पिद्दी’ (Pidi) के साथ खेलने में मस्त थे। हद तो तब हो गई जब उसी वीआईपी टेबल पर चाय और बिस्किट सर्व किए गए। हिमंत ने खुद कई इंटरव्यूज़ में इस खौफनाक सामंती घमंड का पर्दाफाश किया है।

उन्होंने बताया की कुत्ता जिस प्लेट से बिस्किट खा रहा था, राहुल गांधी और बाकी कांग्रेसी दरबारी (जिनमें तरुण गोगोई भी शामिल थे) उसी प्लेट से बिस्किट उठाकर खाने लगे।

जब हिमंत ने इस अमानवीय और अजीब हरकत पर आपत्ति जताई और अपनी बात को जारी रखने की कोशिश की, तो राहुल गांधी ने एक बार भी उनकी तरफ सीरियस होकर नहीं देखा।

वो बस मुस्कुराए और बड़ी ही बेरुखी से सिर्फ एक ही जवाब दिया- “So What?” (तो क्या हुआ?)।

भाई साहब, ये महज़ एक बिस्किट का टुकड़ा नहीं था। ये एक ज़मीनी कार्यकर्ता के मुंह पर फेंका गया वो तमाचा था जो बता रहा था की इस नामदार पार्टी में एक वफादार नेता की हैसियत इनके पालतू कुत्ते से भी कम है।

हिमंत का स्वाभिमान जाग उठा। जो आदमी 52 विधायकों का नेता हो, वो इस राजशाही घमंड को क्यों बर्दाश्त करता? उन्होंने उसी पल तय कर लिया की अब इस पार्टी में एक सेकंड भी रुकना अपनी ज़मीर को मारने जैसा है। अगस्त 2015 में हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

और यहीं पर एंट्री होती है बीजेपी की चाणक्य नीति की। जब कांग्रेस अपने सबसे बड़े इलेक्शन मैनेजर को कुत्ते के बिस्किट खिलाकर बेइज़्ज़त कर रही थी, तब बीजेपी किनारे बैठकर यह पूरा तमाशा देख रही थी।

जैसे ही हिमंत ने कांग्रेस छोड़ी, बीजेपी ने एक पल की भी देरी नहीं की। अमित शाह और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने हिमंत की ज़मीनी पकड़ और उनकी ताकत का पूरा सम्मान किया और उन्हें पूरे गले से लगा लिया।

बीजेपी ने इस ‘कांग्रेसी रायते’ को ऐसे समेटा की कांग्रेस के होश उड़ गए। हिमंत बिस्वा सरमा खाली हाथ बीजेपी में नहीं गए थे। वो अपने साथ अपना पूरा का पूरा कट्टर वोटर बेस, कांग्रेस के 9 कद्दावर विधायक और कांग्रेस के पूरे सांगठनिक ढांचे (Organizational Network) की सबसे गहरी कमज़ोरियां बीजेपी की टेबल पर ले गए।

बीजेपी को एक ऐसा सेनापति मिल गया जिसे असम की हर एक गली का चुनावी गणित पता था। कांग्रेस के घमंड ने खुद अपने हाथों से पूर्वोत्तर के सबसे बड़े चाणक्य को बीजेपी की झोली में डाल दिया था। अब बिसात बिछ चुकी थी और कांग्रेस को उसी के खेल में मात देने के लिए हिमंत और बीजेपी का डेडली कॉम्बिनेशन पूरी तरह तैयार था।

वो एक जवाब

So What?

लेख के मुताबिक: राहुल गांधी ने गंभीर बात बीच में ही काटकर सिर्फ इतना कहा। हिमंत ने उसी पल रुकना बंद करने का फैसला किया।

4. 2011 की जनगणना के वो डरावने आंकड़े

मुस्लिम बहुल जिलों की बढ़ती संख्या जिन्होंने मूल असमियों में भर दिया अपनी पहचान मिटने का डर

किसी भी राज्य या देश का सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है, जब वहां के मूल निवासियों को यह लगने लगे की उनकी ज़मीन, उनकी संस्कृति और उनकी पहचान उनके अपने ही घर में छिनने वाली है।

2016 के असम चुनाव में कोई भी हवा-हवाई मुद्दा काम नहीं कर रहा था, क्योंकि ज़मीन पर ‘अस्तित्व’ की लड़ाई लड़ी जा रही थी। और इस लड़ाई की जड़ में थे 2011 की जनगणना (Census) के वो खौफनाक आंकड़े, जिन्होंने पूरे असमिया समाज की रातों की नींद उड़ा कर रख दी थी।

जब 2011 के सेंसस का डेटा पब्लिक डोमेन में आया, तो जो सच्चाई सामने निकल कर आई, वो किसी भी देशप्रेमी और मूल निवासी का खून सुखाने के लिए काफी थी। असम के कुल 27 जिलों में से 9 ज़िले पूरी तरह मुस्लिम बहुल (Muslim Majority) हो चुके थे। धुबरी, ग्वालपाड़ा, बारपेटा, मोरीगांव, नगांव, करीमगंज, हैलाकांडी, बोंगाईगांव और दरांग… ये वो ज़िले थे जहां जनसांख्यिकी (Demography) पूरी तरह से पलट चुकी थी।

और सबसे डरावनी बात ये थी की यह आबादी कोई प्राकृतिक तरीके से नहीं बढ़ रही थी, बल्कि सीमा पार से हो रही अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ ने इस डेमोग्राफी को एक कैंसर की तरह बदल कर रख दिया था।

ज़रा उस खौफ को महसूस कीजिए जो उस वक्त असम के मूल निवासियों के दिलों में बैठ गया था। अहोम, बोडो, सोनोवाल, कछारी और कोच-राजबोंगशी जैसी सदियों पुरानी जनजातियां, जिनका असम की मिट्टी पर जन्मसिद्ध अधिकार था, वो अचानक अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक (Minority) होने के डर से कांपने लगी थीं।

बॉर्डर के इलाकों में तो हालात इतने भयानक थे कि घुसपैठिए मूल निवासियों की ज़मीनों पर कब्जा कर रहे थे, जंगलों को काट रहे थे और उनके संसाधनों को निगल रहे थे। असमिया समाज को साफ-साफ दिखने लगा था की अगर यह घुसपैठ ऐसे ही चलती रही, तो अगले 10-15 सालों में उनका वजूद ही मिट जाएगा।

‘असमिया’ पहचान सिर्फ इतिहास की किताबों में सिमट कर रह जाएगी। यह कोई राजनीतिक डर नहीं था यार, यह एक सभ्यता के खत्म होने का ‘एग्ज़िस्टेंशियल क्राइसिस’ (Existential Crisis) था।

जनता सड़कों पर न्याय और सुरक्षा मांग रही थी, लेकिन जो पार्टी पिछले 15 सालों से सत्ता के सिंहासन पर बैठी थी, उसका रवैया देखकर असम का हर एक मूल निवासी खून के घूंट पीकर रह गया।

2011 जनगणना, लेख में गिने 9 जिले
नाम लेख से ज्यों के त्यों।

धुबरी ग्वालपाड़ा बारपेटा
मोरीगांव नगांव करीमगंज
हैलाकांडी बोंगाईगांव दरांग

5. घुसपैठियों को अपना वोटबैंक बनाकर बचाने की कांग्रेस की वो ज़िद

पूरा असमिया समाज बागी बन कर चला गया BJP के पास

जब आपके घर में आग लगी हो और आपका मुखिया यह कहने लगे की “अरे कहां है आग, मुझे तो कोई धुआं नज़र नहीं आ रहा,” तो आप क्या करेंगे?

कांग्रेस ने असम की जनता के साथ बिल्कुल यही किया। जब पूरा असम डेमोग्राफी के बदलने से खौफज़दा था, तब कांग्रेस ‘डिनायल मोड’ (Denial Mode) में बैठी थी। दिल्ली से लेकर दिसपुर (असम की राजधानी) तक, कांग्रेस के हर नेता की ज़ुबान पर एक ही रटा-रटाया जवाब था- “असम में कोई घुसपैठ नहीं हो रही है, ये सब बीजेपी का फैलाया हुआ सांप्रदायिक डर है।”

मतलब, सरकारी सेंसस का डेटा कह रहा है की 9 ज़िलों की डेमोग्राफी पूरी तरह बदल चुकी है, ज़मीन पर लोग घुसपैठियों से अपनी ज़मीनें बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस अपने वोटबैंक को बचाने के लिए इतनी अंधी हो चुकी थी की उसने खुलेआम इस खौफनाक सच्चाई को ही झुठला दिया।

जब पत्रकारों ने उनसे AIUDF (बदरुद्दीन अजमल की पार्टी, जिसका मुस्लिम और खासकर अप्रवासी मुसलमानों में बड़ा जनाधार है) के बढ़ते प्रभाव और घुसपैठ को लेकर सवाल पूछा, तो तरुण गोगोई ने कैमरे के सामने बड़ी हिकारत से कहा था-

“Who is Badruddin Ajmal?” (बदरुद्दीन अजमल कौन है?)।

लेकिन यह सिर्फ कैमरे के सामने का दिखावा था। अंदरखाने की सच्चाई ये थी की कांग्रेस को यह बहुत अच्छे से पता था की उनका सबसे बड़ा, सबसे सेफ और सबसे सॉलिड वोटबैंक वही अवैध अप्रवासी और मुस्लिम आबादी है। दशकों से इन घुसपैठियों को राशन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड और सरकारी कागज़ात दिलवाकर कांग्रेस ने इन्हें अपना दामाद बनाकर रखा हुआ था।

चुनाव के वक्त यही वोटबैंक एकमुश्त होकर कांग्रेस का झंडा उठाता था। इसलिए, बदरुद्दीन अजमल और उनके वोटबैंक के प्रति कांग्रेस का रुख हमेशा ‘सॉफ्ट’ रहा। कांग्रेस आलाकमान ने 2016 के चुनावों में भी यही सोचा की हम इस “घुसपैठ” के मुद्दे को सांप्रदायिक बताकर खारिज कर देंगे और अपने उसी फिक्स वोटबैंक के दम पर फिर से सत्ता में आ जाएंगे।

लेकिन यहीं पर उन्होंने असमिया समाज की रग को पहचानने में सबसे बड़ी गलती कर दी। जब आप किसी समाज के अस्तित्व को ही नकार देते हैं, जब आप उनके डर का मज़ाक उड़ाते हैं और उन लोगों को संरक्षण देते हैं जो उनकी ज़मीनें खा रहे हैं, तो वो समाज फिर चुप नहीं बैठता।

कांग्रेस की इस ज़िद और घुसपैठियों से उनके प्रेम ने पूरे के पूरे असमिया और स्थानीय जनजातीय समाज को बागी बना दिया। चाय बागानों से लेकर ब्रह्मपुत्र की घाटियों तक, हर एक स्वदेशी (Indigenous) नागरिक के मन में यह बात पत्थर की लकीर की तरह छप गई की जब तक कांग्रेस सत्ता में है, उनके ‘जाति और माटी’ (पहचान और ज़मीन) सुरक्षित नहीं हैं।

भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने रैलियों में इसी को लेकर बेहद स्पष्ट और कड़े बयान दिए। उन्होंने कहा की-

“हमें असम में सत्ता दीजिए, हम भारत-बांग्लादेश सीमा को इस तरह सील कर देंगे की एक परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा।”

उन्होंने तरुण गोगोई सरकार पर वोट बैंक के लिए सीमा खुली रखने का सीधा आरोप लगाया, जिसने भाजपा के राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा के एजेंडे को धार दी।

कैमरे के सामने का वाक्य

Who is Badruddin Ajmal?

लेख बताता है कि: ये दिखावा था। वोटबैंक अंदरखाने सुरक्षित रखा गया था।

6. कांग्रेस का ‘अली, कुली, और बंगाली’ का वो पुराना तुष्टिकरण फॉर्मूला

कैसे चाय बागान के मज़दूर तंग आ कर चले गए BJP के खेमे में

अगर आप सत्तर के दशक से लेकर 2011 तक की असम की राजनीति का इतिहास खंगालेंगे, तो आपको हर जगह एक ही राजनैतिक फॉर्मूला काम करता हुआ दिखाई देगा। कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों ने असम की सत्ता पर कुंडली मारे रखने के लिए एक बहुत ही शातिर गणित सेट किया हुआ था, जिसे आम बोलचाल में “अली, कुली और बंगाली” का फॉर्मूला कहा जाता था।

कांग्रेस का पूरा का पूरा चुनाव इसी तिकड़ी पर टिका होता था।

‘अली’ का मतलब था मुस्लिम वोटबैंक (जिसमें सबसे बड़ी संख्या उन अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की थी जिन्हें कांग्रेस ने रातों-रात वोटर आईडी और राशन कार्ड बांटकर अपना पक्का दामाद बना लिया था)।
‘कुली’ का मतलब था असम के लाखों चाय बागान मज़दूर (Tea Tribes), जो पीढ़ियों से वहां खून-पसीना बहा रहे थे।
और तीसरा था बंगाली वोटबैंक।

कांग्रेस को लगता था की जब तक यह तिकड़ी उनके साथ है, कोई माई का लाल उन्हें असम की कुर्सी से नहीं हटा सकता। वो हर चुनाव में घुसपैठियों को संरक्षण देने का वादा करते और चाय बागान के मज़दूरों को झूठे लॉलीपॉप थमा कर उनका वोट बटोर लेते। इन नेताओं ने चाय बागान के उन लाखों मज़दूरों को इंसान नहीं, बल्कि अपनी जागीर और ‘वोट डालने वाली मशीन’ समझ लिया था。

ज़रा सोचिए, जो पार्टी 15 साल तक लगातार सत्ता में रही, उसने उन चाय बागान मज़दूरों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी सुधारने के लिए धेला भर काम नहीं किया। मज़दूरों की दिहाड़ी इतनी कम थी की दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब होती थी। बागानों में ना तो ढंग के अस्पताल थे और ना ही बच्चों के लिए स्कूल।

लेकिन कांग्रेस को परवाह क्यों होती? उन्हें तो यकीन था की ये गरीब ‘कुली’ जाएंगे कहां? झक मारकर वोट तो पंजे को ही देंगे।

लेकिन 2016 आते-आते असम के ज़मीनी हालात और राजनैतिक हवा पूरी तरह बदल चुकी थी। कांग्रेस अपनी उसी पुरानी और सड़ी हुई किताब से चुनाव जीतने का सपना देख रही थी, जबकि बीजेपी ने ज़मीन पर उतरकर कांग्रेस के इस फॉर्मूले के परखच्चे उड़ाने शुरू कर दिए थे।

आरएसएस (RSS) और बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने चाय बागानों में जाकर उन मज़दूरों के दर्द को समझा। बीजेपी ने कामाख्या प्रसाद तासा और संजय किशन जैसे उन्हीं के बीच से निकले ज़मीनी नेताओं को आगे किया। चाय बागान के मज़दूरों को पहली बार अहसास हुआ की कोई पार्टी उन्हें ‘कुली’ नहीं, बल्कि सम्मान के साथ ‘टी ट्राइब्स’ (Tea Tribes) बुला रही है।

इसी दौरान केंद्र की मोदी सरकार के ‘जन धन योजना’ ने एक बहुत बड़ा गेम-चेंजर का काम किया। जिन मज़दूरों ने कभी बैंक का दरवाज़ा नहीं देखा था, उनके सीधे बैंक खाते खुलवाए गए ताकि बागान मालिकों और बिचौलियों का भ्रष्टाचार खत्म हो सके।

नतीजा क्या हुआ? कांग्रेस का वो पुराना ‘कुली’ वोटबैंक, जिसे वो अपनी जेब की जागीर समझती थी, उसने कांग्रेस के इस तुष्टिकरण वाले फॉर्मूले को उठाकर सीधे कूड़ेदान में फेंक दिया। चाय बागान के मज़दूरों ने थोक के भाव में बीजेपी को वोट किया। कांग्रेस का वो अजेय माना जाने वाला “अली-कुली-बंगाली” का तिलिस्म एक ही झटके में ज़मींदोज़ हो गया।

अली, कुली, बंगाली
लेख का पुराना फॉर्मूला।

अली कुली बंगाली
मुस्लिम वोटबैंक। लेख के मुताबिक सबसे बड़ी संख्या अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की, जिन्हें राशन कार्ड और वोटर आईडी देकर पक्का वोट बनाया गया। चाय बागान के लाखों मज़दूर, टी ट्राइब्स। 15 साल की सत्ता में दिहाड़ी, अस्पताल और स्कूल नहीं सुधरे। 2016 में यही खेमा कांग्रेस छोड़ गया। तीसरा स्तंभ। कांग्रेस को यकीन था कि यह तिकड़ी साथ रही तो कुर्सी नहीं हिल सकती।

7. सत्ता के नशे में ठुकराए गए अपने अहम क्षेत्रीय साथी

बोडोलैंड में कांग्रेस की वो गलती जिसने उसके ही सहयोगियों को धकेल दिया बीजेपी के पाले में

सत्ता का नशा इंसान को इतना अंधा कर देता है की उसे अपने पुराने, वफादार साथी और ज़मीनी हकीकत बताने वाले लोग भी कीड़े-मकोड़े लगने लगते हैं। असम में कांग्रेस के विनाश की कहानी सिर्फ उनके खुद के ज़मीनी नेताओं के अपमान तक सीमित नहीं थी। इन्होंने अपने उस घमंड में उन क्षेत्रीय दलों को भी दरकिनार किया, जिनके बिना असम की सत्ता में वापसी करना नामुमकिन था।

असम की राजनीति में बोडोलैंड (Bodoland) का इलाका एक ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाता है। वहां बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (BPF) का दबदबा है, जिसके मुखिया हाग्रामा मोहिलारी हैं। हाग्रामा मोहिलारी वो नेता हैं जिन्होंने 2006 और 2011 के विधानसभा चुनावों में तरुण गोगोई और कांग्रेस की डूबती नैया को पार लगाया था। बीपीएफ कांग्रेस की एक बेहद पुरानी और भरोसेमंद सहयोगी पार्टी थी।

लेकिन 2016 का चुनाव आते-आते तरुण गोगोई और कांग्रेस आलाकमान का अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। जब हाग्रामा मोहिलारी ने बोडोलैंड के विकास, वहां के फंड्स और अपनी राजनैतिक मांगों को लेकर कांग्रेस से बात करनी चाही, तो कांग्रेस ने उन्हें पूरी तरह से इग्नोर कर दिया। गोगोई को लगा की बीपीएफ एक छोटी सी क्षेत्रीय पार्टी है, वो हमारे बिना कहां जाएगी? दिल्ली दरबार ने मोहिलारी को बिल्कुल वैसे ही ट्रीट किया, जैसे उन्होंने हिमंत बिस्वा सरमा को किया था।

और यहीं पर कांग्रेस से सबसे बड़ी चूक हो गई, क्योंकि वो भूल गए थे की अब उनका सामना लुटियंस की राजनीति से नहीं, बल्कि बीजेपी की चाणक्य नीति से है। हिमंत बिस्वा सरमा, जो कुछ ही महीने पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए थे, उन्हें कांग्रेस की रग-रग पता थी। हिमंत जानते थे की बीपीएफ को अपने पाले में लाना कांग्रेस की रीढ़ की हड्डी तोड़ने के बराबर है।

जनवरी 2016 में, चुनाव से ठीक पहले, बीजेपी ने वो मास्टरस्ट्रोक खेला जिसने कांग्रेस के होश फाख्ता कर दिए। बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व और हिमंत बिस्वा सरमा ने हाग्रामा मोहिलारी से मुलाकात की, बोडोलैंड की चिंताओं को गंभीरता से सुना और उन्हें पूरा सम्मान देते हुए बीपीएफ (BPF) के साथ एक धमाकेदार ‘प्री-पोल अलायंस’ (चुनाव पूर्व गठबंधन) का ऐलान कर दिया।

भाई साहब, इस एक अलायंस ने चुनाव शुरू होने से पहले ही कांग्रेस की हार की स्क्रिप्ट फाइनल कर दी थी। बीपीएफ के एनडीए (NDA) में आते ही बोडोलैंड इलाके की लगभग 12 से 16 सीटें सीधे-सीधे बीजेपी गठबंधन की झोली में जाकर गिर गईं।

कांग्रेस हाथ मलती रह गई। जिस सहयोगी को वो कल तक धौंस दिखा रहे थे, उसने चुनाव में कांग्रेस को ऐसा धोबिया पछाड़ दिया की बोडोलैंड के इलाके से कांग्रेस का लगभग सूपड़ा ही साफ हो गया। कांग्रेस के घमंड ने न सिर्फ उनके खुद के वोटबैंक को तबाह कर दिया था, बल्कि उनके बचे-खुचे सहयोगियों को भी बीजेपी के पाले में धकेल दिया था।

गठबंधन का पलड़ा

BPF
हाग्रामा मोहिलारी। 2006 और 2011 में साथ। 2016 में इग्नोर।
जनवरी 2016
चुनाव से ठीक पहले NDA के साथ प्री-पोल अलायंस।
12 से 16
लेख के मुताबिक बोडोलैंड की सीटें गठबंधन की झोली में।

8. BJP का जाति, माटी और भेटी वाला ऐतिहासिक ब्रह्मास्त्र

पूरा असमिया हिंदू समाज रातों-रात हो गया एकजुट

जब आपका दुश्मन अपने ही घमंड में अंधा होकर गलतियों पर गलतियां कर रहा हो, तो आपको बस एक सही नब्ज़ पकड़नी होती है। कांग्रेस अपने “अली, कुली, बंगाली” के उसी फॉर्मूले और घुसपैठियों के प्रेम में फंसी हुई थी। उधर बीजेपी और हिमंत बिस्वा सरमा की चाणक्य नीति ने असम के ज़मीनी दर्द को बहुत गहराई से समझ लिया था।

बीजेपी को पता था की असम का मूल निवासी आज सड़क, बिजली या पानी के लिए नहीं रो रहा है। वो रो रहा है अपने अस्तित्व के लिए। उसे डर है की जो ज़मीन उसके पुरखों की है, वो चंद सालों में अवैध बांग्लादेशियों के कब्ज़े में चली जाएगी।

और इसी खौफ, इसी दर्द और इसी सुलगते हुए स्वाभिमान को आवाज़ देने के लिए बीजेपी ने 2016 के चुनाव में एक ऐसा नारा दिया, जो महज़ एक राजनीतिक स्लोगन नहीं, बल्कि पूरे असमिया समाज का ‘वॉर-क्राई’ (युद्धघोष) बन गया।

वो नारा था- “जाति, माटी और भेटी”।

इस एक लाइन ने पूरे असम की राजनीति में भूचाल ला दिया। ‘जाति’ का मतलब था असम की स्वदेशी पहचान, ‘माटी’ का मतलब था पुरखों की ज़मीन और ‘भेटी’ का मतलब था उनका घर या आधार।

बीजेपी ने सीधे तौर पर असम के अहोम, सोनोवाल, बोडो, कोच-राजबोंगशी और तमाम जनजातियों की आंखों में आंखें डालकर कहा की अगर इस बार तुम नहीं जागे, तो कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल का गठजोड़ तुम्हारी ‘जाति, माटी और भेटी’ तीनों को घुसपैठियों के हाथों नीलाम कर देगा।

यह कोई हवा-हवाई बात नहीं थी। ज़मीन पर कांग्रेस के राज में बिल्कुल यही हो रहा था। इस नारे ने एक जादू की तरह काम किया। जो असमिया हिंदू समाज पहले अलग-अलग खेमों में बंटा हुआ था, वो रातों-रात अपनी सभ्यता को बचाने के लिए एक झंडे के नीचे एकजुट (Consolidate) हो गया।

और बीजेपी सिर्फ नारे देकर नहीं रुकी। कांग्रेस के घमंड का फायदा उठाते हुए बीजेपी ने एक और मास्टरस्ट्रोक खेला। असमिया राष्ट्रवाद और स्वाभिमान की असली उपज मानी जाने वाली पार्टी ‘असम गण परिषद’ (AGP) के साथ बीजेपी ने ऐतिहासिक चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया।

AGP वही पार्टी है जो 80 के दशक के ऐतिहासिक ‘असम आंदोलन’ (Assam Agitation) की कोख से निकली थी। कांग्रेस हमेशा AGP को कमज़ोर करने की फिराक में रहती थी। लेकिन बीजेपी ने बड़ा दिल दिखाते हुए AGP को साथ लिया, जिससे असम का स्वदेशी वोट बंटने से 100 प्रतिशत बच गया। अब ज़मीन पर एनडीए (NDA) का एक ऐसा भयंकर तूफ़ान खड़ा हो चुका था, जिसे रोकना कांग्रेस के बस की बात नहीं थी।

युद्धघोष

जाति, माटी और भेटी

जाति
स्वदेशी पहचान
माटी
पुरखों की ज़मीन
भेटी
घर, आधार

9. BJP के सर्बानंद सोनोवाल के रूप में असमिया स्वाभिमान की वापसी

घुसपैठियों के रक्षकों की ताबूत में आखरी कील

कांग्रेस की एक बहुत पुरानी बीमारी रही है- ‘हाईकमान कल्चर’ (High Command Culture)। दिल्ली में बैठे सोनिया और राहुल गांधी के दरबारी ही तय करते थे की किस राज्य का मुख्यमंत्री कौन बनेगा। पैराशूट से नेताओं को उतारना कांग्रेस की पुरानी आदत है। 2016 के असम चुनाव में भी कांग्रेस इसी गफलत में थी की तरुण गोगोई और उनके बेटे गौरव गोगोई के चेहरे पर वो चुनाव निकाल ले जाएंगे।

लेकिन बीजेपी ने यहाँ कांग्रेस की इस बीमारी पर ऐसा हथौड़ा मारा की कांग्रेस के पास कोई जवाब ही नहीं बचा। बीजेपी ने दिल्ली से कोई चेहरा नहीं थोपा, बल्कि असम की माटी के ही एक ऐसे लाल को अपना मुख्यमंत्री पद का चेहरा (CM Face) घोषित कर दिया, जिसे पूरा असम ‘जातीय नायक’ (समुदाय का हीरो) मानकर पूजता था। वो चेहरा थे- सर्बानंद सोनोवाल।

अब आप पूछेंगे की सर्बानंद सोनोवाल में ऐसा क्या खास था जिसने कांग्रेस के पसीने छुड़ा दिए? इसके लिए आपको थोड़ा इतिहास में जाना होगा और कांग्रेस के एक और काले सच को समझना होगा।

अस्सी के दशक में इंदिरा गांधी और कांग्रेस सरकार ने असम में घुसपैठियों को बचाने के लिए एक बेहद काला और खौफनाक कानून थोपा था- IMDT Act (Illegal Migrants Determination by Tribunals Act, 1983)।

पूरे देश में अवैध नागरिकों को पहचानने का कानून ‘फॉरेनर्स एक्ट’ (Foreigners Act) के तहत चलता था, जिसमें खुद को भारतीय साबित करने का ज़िम्मा उस संदिग्ध घुसपैठिए का होता था। लेकिन कांग्रेस ने सिर्फ अपने मुस्लिम और बांग्लादेशी वोटबैंक को बचाने के लिए असम में ये IMDT एक्ट लागू कर दिया। इस काले कानून के तहत खुद को हिंदुस्तानी साबित करने का ज़िम्मा घुसपैठिए का नहीं, बल्कि शिकायत करने वाले का होता था!

मतलब अगर मैं कहूं की मेरे पड़ोस में कोई अवैध बांग्लादेशी आकर बस गया है, तो मुझे सबूत देना पड़ता था की वो विदेशी है। इस नामुमकिन शर्त की वजह से असम में घुसपैठियों की बाढ़ आ गई और उन्हें डिपोर्ट करना लगभग असंभव हो गया।

सर्बानंद सोनोवाल वो अकेले योद्धा थे, जिन्होंने कांग्रेस के इस काले कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सालों तक एक बेहद लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई लड़ी। और आखिरकार साल 2005 में, सोनोवाल की याचिकाओं और पुख्ता सबूतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के इस घुसपैठिया-प्रेमी ‘IMDT Act’ को असंवैधानिक घोषित करके रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।

इसी ऐतिहासिक जीत के कारण असम का बच्चा-बच्चा सर्बानंद सोनोवाल को ‘जातीय नायक’ कहता है। बीजेपी ने उसी जातीय नायक को अपना सेनापति बनाकर मैदान में उतार दिया।

अब लड़ाई बिल्कुल साफ हो चुकी थी। एक तरफ वो कांग्रेस थी जिसने घुसपैठियों को बचाने के लिए काले कानून बनाए, और दूसरी तरफ बीजेपी का वो जातीय नायक था जिसने उस काले कानून को फाड़कर असम की रक्षा की थी। सोनोवाल की साफ-सुथरी छवि, ‘जाति माटी भेटी’ का नारा, हिमंत बिस्वा सरमा का आक्रामक इलेक्शन मैनेजमेंट, और एजीपी-बीपीएफ का गठबंधन… कांग्रेस के अहंकार ने अपने ही खिलाफ एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार कर दिया था, जिसे तोड़ने की बस की अब उनके किसी दरबारी में नहीं थी।

दो कानून, एक लड़ाई

Foreigners Act
लेख: संदिग्ध को खुद को भारतीय साबित करना होता था।
IMDT Act, 1983
लेख: असम में सबूत का बोझ शिकायतकर्ता पर डाल दिया गया। 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया।

10. 2016 के ऐतिहासिक असम विधानसभा चुनाव नतीजे

BJP ने उखाड़ फेंके कांग्रेस के तंबू और पहली बार असम में बनायी सरकार

जब कोई सरकार ज़मीन से कट जाती है और सिर्फ दरबारियों की चापलूसी के सहारे चुनाव जीतने का घमंड पाल लेती है, तो जनता उसका वो हश्र करती है जो सदियों तक इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों में दर्ज हो जाता है।

19 मई 2016… ये वो तारीख थी जब असम विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने वाले थे। जैसे ही सुबह 8 बजे ईवीएम (EVM) खुलनी शुरू हुईं, कांग्रेस के इन तमाम रणनीतिकारों को दिन में तारे नज़र आ गए।

असम की 126 सीटों वाली विधानसभा में उस दिन जो सुनामी आई, उसने 15 साल पुराने गोगोई साम्राज्य के तंबू ऐसे उखाड़े की उन्हें भागने का रास्ता तक नहीं मिला। असम के मूल निवासियों का वो गुस्सा, जो सालों से सीने में सुलग रहा था, उस दिन ईवीएम के बटनों पर आग बनकर बरसा।

126 सीटों में से बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) गठबंधन ने पूरे 86 सीटों पर एकतरफा कब्ज़ा कर लिया और इतिहास में पहली बार असम में पूर्ण बहुमत हासिल किया। इस ऐतिहासिक जीत में बीजेपी ने अकेले अपने दम पर 60 सीटें जीतीं (जिनका कभी असम में खाता खुलना भी भारी होता था)। उनके सहयोगी दल, जिन्हें कांग्रेस ने अपनी सत्ता के नशे में धौंस दिखाकर भगा दिया था, उन्होंने भी गज़ब का प्रदर्शन किया।

असम गण परिषद (AGP) ने 14 सीटें और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (BPF) ने 12 सीटें जीतकर कांग्रेस का बोडोलैंड और असमिया बेल्ट से पूरी तरह सूपड़ा साफ कर दिया। चुनाव जीतने के बाद सोनोवाल असम के मुख्यमंत्री बने।

अब ज़रा कांग्रेस का हश्र देखिए। 15 साल तक एकछत्र राज करने वाली, 122 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली वो कांग्रेस महज़ 26 सीटों पर सिमट कर रह गई! 2011 में जिस कांग्रेस के पास 78 सीटें थीं, वो अपनी एक-तिहाई सीटें भी नहीं बचा पाई। बदरुद्दीन अजमल की AIUDF, जिसे कांग्रेस ने अंदरखाने शह दे रखी थी, वो भी 13 सीटों पर ही अटक गई।

तरुण गोगोई की कैबिनेट के बड़े-बड़े मंत्री, जो अपने इलाकों में सामंती राजाओं की तरह बर्ताव करते थे, वो ताश के पत्तों की तरह ढह गए। गौतम रॉय, शरत बरकटोकी, प्रद्युत बोरदोलोई जैसे कांग्रेस के वो दिग्गज जिन्हें लगता था की उन्हें कोई हरा नहीं सकता, उन्हें असम की जनता ने उनके ही गढ़ में धूल चटा दी।

तरुण गोगोई भले ही अपनी सीट बचा ले गए, लेकिन जिस पुत्रमोह में अंधे होकर उन्होंने अपने बेटे गौरव गोगोई को पूरी पार्टी पर थोपने की कोशिश की थी, असम की जनता ने उस ‘वंशवाद’ को सिरे से खारिज कर दिया। हिमंत बिस्वा सरमा ने अपने इलेक्शन मैनेजमेंट का वो ज़लवा दिखाया की कांग्रेस का एक-एक बूथ लेवल का वर्कर भी बीजेपी के पाले में खड़ा नज़र आया।

असम के लोगों ने साफ संदेश दे दिया था की उन्हें दिल्ली से थोपा गया कोई नामदार नहीं चाहिए, उन्हें अपना ‘जातीय नायक’ सर्बानंद सोनोवाल और अपना ज़मीनी नेता हिमंत चाहिए। आज जब कांग्रेस के नेता बैठकर सोचते होंगे, तो उन्हें ज़रूर समझ आता होगा की राजनीति में ज़मीनी हकीकत को ठुकराने की कीमत क्या होती है।

विपक्ष आज भी अगर बीजेपी की अजेय होने की थ्योरी का रोना रोता है, तो उन्हें एक बार आइने में खुद की गलतियों को देखना चाहिए। बीजेपी का काम तो सिर्फ विपक्ष के फैलाए हुए इसी रायते को समेटना है, और यकीन मानिए, इस काम में बीजेपी से बेहतर कोई नहीं है!

19 मई 2016, लेख के नतीजे
126 सीटों वाली विधानसभा। आंकड़े लेख से।

NDA 86
BJP 60
AGP 14
BPF 12
कांग्रेस 26
AIUDF 13

2011 में कांग्रेस के पास 78 सीटें थीं। 2016 में 26 पर सिमटीं।

आइना

लेख का आखिरी दावा यही है। जो बात पढ़ने में बैठ गई हो, उस पर निशान लगाइए। नया तथ्य नहीं, सिर्फ आपकी पढ़त।

  • ☐ बीजेपी ने जादू नहीं किया। कांग्रेस ने खुद पैर पर कुल्हाड़ी मारी।
  • ☐ 52 विधायकों की आवाज़ हाईकमान ने रद्दी की टोकरी में डाल दी।
  • ☐ पिद्दी वाले बिस्किट कांड के बाद हिमंत कांग्रेस छोड़कर निकल गए।
  • ☐ घुसपैठ से इनकार और अली-कुली-बंगाली फॉर्मूला, दोनों टूट गए।
  • ☐ 19 मई 2016 को NDA ने 86 सीटें लीं। कांग्रेस 26 पर सिमटी।
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