हमारे देश के इतिहास की किताबों में एक बहुत बड़ी दिक्कत है। पन्ने पलटते जाइए, आपको बस गिने-चुने नाम और उनके दिए गए भाषण ही मिलेंगे।
हमारी जो आज़ादी की कहानी हमें रटाई जाती है, उसे पढ़कर ऐसा लगता है जैसे हमें आज़ादी चंद लोगों की अपीलों और शांति वार्ताओं से मिल गई। लेकिन क्या सच में ऐसा था? बिल्कुल नहीं!
असली आज़ादी तो उन वतन के आशिक़ों ने दिलाई है, जो अपनी जवानी और अपना पूरा जीवन सात समंदर पार दर-दर की ठोकरें खाने में लुटा बैठे।
जिनका ना कोई घर बचा, ना कोई ठिकाना। ये वो गुमनाम नायक हैं जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, और बदले में इस एहसान फरामोश सिस्टम ने उन्हें क्या दिया? सिर्फ गुमनामी, तिरस्कार और फटी हुई जूतियां।
आज हम एक ऐसे ही भारत के लाल की बात करेंगे। बात हो रही है महान क्रांतिकारी, गदर पार्टी के संस्थापक और मेक्सिको में हरित क्रांति लाने वाले पांडुरंग सदाशिव खानखोजे की।

वतन की मिट्टी से मीलों दूर एक देशप्रेमी की कहानी जिसे इतिहास की किताबों ने कभी जगह नहीं दी
महाराष्ट्र के वर्धा का नाम आते ही लोगों को गांधी जी का आश्रम याद आ जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं की इसी वर्धा की मिट्टी में 7 नवंबर 1884 को एक ऐसा लड़का पैदा हुआ था, जिसकी रगों में खून से ज्यादा अंग्रेज़ों के खिलाफ बगावत दौड़ती थी।
वो लड़का था पांडुरंग सदाशिव खानखोजे।
बचपन से ही इस लड़के के भीतर एक अलग सी आग जलती थी। जब गली-मोहल्ले के बच्चे खेल-कूद में मस्त रहते थे, तब पांडुरंग विदेशी कपड़ों की होली जला रहे होते थे।
लेकिन उनकी ज़िंदगी का असली टर्निंग पॉइंट तब आया, जब वो उस दौर के सबसे बड़े और प्रखर नेता बाल गंगाधर तिलक के संपर्क में आए। तिलक जी उस समय युवाओं के दिलों की धड़कन थे।
खानखोजे उनके मुरीद बन गए। तिलक जी ने उस जवान लड़के की आंखों में वो आग देख ली थी। उन्होंने पांडुरंग के कंधे पर हाथ रखकर एक ऐसा गुरुमंत्र दिया जिसने इतिहास का रुख मोड़ दिया।
तिलक जी ने समझाया की “देख भाई, सिर्फ लाठी-डंडों और नारों से ये गोरे इस देश को छोड़कर नहीं भागेंगे। अगर इन्हें सच में उखाड़ फेंकना है, तो तुम्हें विदेश जाना होगा। वहां जाकर आधुनिक हथियारों की बनावट समझो, नई सैन्य रणनीति (Military Strategy) की ट्रेनिंग लो और फिर देश लौटकर एक फौज खड़ी करो।”
बस, एक सच्चे आशिक़ को और क्या चाहिए था! उन्होंने अपना झोला उठाया और आज़ादी का वो मुसाफिर हमेशा-हमेशा के लिए अपनी जन्मभूमि से मीलों दूर एक ऐसे सफर पर निकल पड़ा।
जापान से लेकर अमेरिका तक दर दर की ठोकरें और होटलों में झूठे बर्तन धोकर खड़ी कर दी गदर पार्टी

देश से निकलने के बाद उनका सबसे पहला पड़ाव था जापान। साल था 1906। वो सैन्य ट्रेनिंग लेने की उम्मीद में बंबई से पानी के जहाज़ में बैठकर जापान पहुँच तो गए, लेकिन वहां हालात कुछ ठीक नहीं लगे।
चीनी और जापानी क्रांतिकारियों से मुलाकातें तो हुईं, पर जो ठोस सैन्य मदद वो चाहते थे, वो वहां नहीं मिल रही थी।
अब सवाल ये था की जाएं तो जाएं कहां? बिना ट्रेनिंग लिए खाली हाथ लौटना उन्हें मंज़ूर नहीं था। तो उन्होंने फैसला किया की अमेरिका चलेंगे। सैन फ्रांसिस्को का टिकट कटाया और प्रशांत महासागर से अमेरिका पहुँच गए।
लेकिन अमेरिका कोई स्वर्ग थोड़े ही था! एक साधारण सा भारतीय लड़का, जिसकी जेब में फूटी कौड़ी नहीं है, वो वहां कैसे सर्वाइव करेगा?
अपनी पढ़ाई और क्रांति का खर्च निकालने के लिए इस पढ़े-लिखे लड़के ने होटलों में मज़दूरी की। गोरे लोगों के जूठे बर्तन धोए। अस्पतालों के वार्ड साफ किए, फर्श पर झाड़ू लगाई और लकड़हारे का काम तक किया।
खून-पसीने की इसी मज़दूरी से पैसे बचाकर उन्होंने वाशिंगटन स्टेट कॉलेज में एग्रीकल्चर (कृषि) की पढ़ाई शुरू की। लेकिन उनका असली मक़सद खेती करना नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों की नींद हराम करना था।
अमेरिका के उसी प्रशांत तट पर पढ़ाई करते हुए उनकी मुलाकात लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना और कांशीराम जैसे दिग्गज क्रांतिकारियों से हुई।
इन पागलों ने मिलकर वहां एक ऐसी पार्टी की नींव रखी जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दीं- ‘गदर पार्टी’।
इसका एक ही मेनिफेस्टो था- हथियार उठाओ और अंग्रेज़ों को भारत से भगाओ। अमेरिका में बैठे हज़ारों भारतीय मज़दूरों और छात्रों के सीने में इन लोगों ने आज़ादी की आग लगा दी।
और आप सोच रहे होंगे की ये लोग बस बैठकर बातें करते थे? जी नहीं! कैलिफोर्निया के माउंट तमालपाइस (Mount Tamalpais) के घने जंगलों में खानखोजे ने बाकायदा एक ‘सीक्रेट मिलिट्री कैंप’ बना डाला था।
दिन में ये लोग कॉलेज में पढ़ते थे या बर्तन धोते थे, और रात के अंधेरे में उन जंगलों में जाकर भारतीयों को बंदूकें चलाना, बम बनाना और युद्ध की रणनीति सिखाते थे।
पहले विश्व युद्ध का वो खौफनाक मास्टरप्लान जब खानखोजे ने जर्मनी के साथ मिलकर बलूचिस्तान के रास्ते अंग्रेजों को उखाड़ने की रची साज़िश
गदर पार्टी का काम ज़ोरों पर था, तभी 1914 में दुनिया में एक ऐसा भूचाल आया जिसने खानखोजे को उनका सबसे बड़ा मौका दे दिया- पहला विश्व युद्ध (World War I)।
अंग्रेज़ इस युद्ध में बुरी तरह उलझ गए थे। खानखोजे समझ गए की दुश्मन का दुश्मन हमारा दोस्त होता है। ब्रिटेन का सबसे बड़ा दुश्मन उस वक़्त जर्मनी था।
खानखोजे तुरंत यूरोप के लिए निकल पड़े और जर्मनी पहुँच गए। जर्मनी की सरकार भी यही चाहती थी की भारत में विद्रोह हो जाए ताकि ब्रिटिश सेना कमज़ोर पड़ जाए। जर्मनों ने हथियारों और पैसों से इन क्रांतिकारियों की मदद करनी शुरू कर दी।
यहीं से बना वो खौफनाक मास्टरप्लान! प्लान ये था की मिडिल ईस्ट (खासकर ईरान और बलूचिस्तान बॉर्डर) के रास्ते भारत पर हमला किया जाएगा।
खानखोजे अपनी जान हथेली पर रखकर जंगी जहाज़ों और रेगिस्तानों का सफर करते हुए ईरान और बलूचिस्तान के बॉर्डर पर पहुँच गए।
उनका मिशन बहुत सीधा और बेहद खतरनाक था। मिडिल ईस्ट में ब्रिटिश सेना की तरफ से हज़ारों भारतीय सैनिक लड़ रहे थे।
खानखोजे का काम था भेष बदलकर उन भारतीय सैनिकों के कैंपों में जाना, उन्हें आज़ादी का वास्ता देकर भड़काना और ब्रिटिश अफसरों के खिलाफ बगावत करवाना।
प्लान ये था की जब ये सैनिक बगावत कर देंगे, तो स्थानीय बलूच कबीलों के साथ मिलकर एक बहुत बड़ी फौज बनाई जाएगी और बलूचिस्तान के रास्ते सीधे भारत में घुसकर अंग्रेज़ों को काट डाला जाएगा।
लेकिन बदकिस्मती से किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। गदर पार्टी के अंदर ही मौजूद कुछ गद्दारों और जासूसों की वजह से यह पूरा ‘द ग्रेट मिडिल ईस्ट प्लान’ लीक हो गया।
अंग्रेज़ों को भनक लग गई। उन्होंने भारतीय सैनिकों को वहाँ से हटा दिया और पूरे इलाके में खानखोजे को ज़िंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए अपनी खुफिया एजेंसियां पीछे छोड़ दीं।
अब खानखोजे चारों तरफ से घिर चुके थे। ब्रिटिश जासूस कुत्ते की तरह उन्हें सूंघते हुए ईरान तक पहुँच गए थे।
लेकिन वो भी मिट्टी के कच्चे नहीं थे। भेस बदलने में माहिर खानखोजे ने ईरान के खानाबदोश कबीलों की मदद ली। कभी वो फकीर बनते, कभी व्यापारी।
छिपते-छिपाते और मौत को कई बार चकमा देकर वो ईरान से पेरिस पहुँचे और आख़िरकार 1920 के आसपास किसी तरह भागकर मेक्सिको की ज़मीन पर जा उतरे।
ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें ‘बेहद खतरनाक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी’ घोषित कर दिया था, जिसके भारत लौटने पर पूरी तरह से पाबंदी थी।
रात में बंदूकें साफ करने वाला बागी खानखोजे जब मेक्सिको में बना मसीहा और वहां ला दी हरित क्रांति

अंग्रेज़ों की आंखों में धूल झोंककर जब खानखोजे मेक्सिको पहुंचे, तो उनकी ज़िंदगी का एक बिल्कुल नया अध्याय शुरू हुआ।
जो इंसान कल तक कैलिफोर्निया के जंगलों में आज़ादी के लिए गोलियां चलाता था, जो रात के अंधेरे में अपनी बंदूकें साफ करता था, अब उसी इंसान ने अपने हाथों में मिट्टी और बीज उठा लिए थे।
मेक्सिको में ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों का डर तो था, लेकिन खानखोजे ने अपनी पहचान छुपाई और वहां के ‘नेशनल स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर’ (जिसे आज चापिंगो यूनिवर्सिटी कहा जाता है) में प्रोफेसर की नौकरी जवाइन कर ली।
ये वो दौर था जब मेक्सिको खुद बहुत भयंकर भुखमरी और गरीबी से जूझ रहा था। वहां के किसानों के पास उगाने को कुछ खास नहीं था।
खानखोजे तो बचपन से ही गरीबों का दर्द समझते थे। उन्होंने अमेरिका में एग्रीकल्चर पढ़ा ही इसलिए था ताकि आज़ाद भारत के किसानों की मदद कर सकें।
लेकिन जब तक भारत आज़ाद नहीं होता, तब तक उन्होंने मेक्सिको की धरती को ही अपनी कर्मभूमि बना लिया। उन्होंने वहां की लैब और खेतों में दिन-रात एक कर दिया।
अपनी रिसर्च से उन्होंने मक्के (Corn) और गेहूं की ऐसी बेहतरीन और नई हाई-यील्डिंग (High-yielding) किस्में विकसित कीं, जो कम पानी और खराब मौसम में भी बंपर पैदावार देती थीं।
इस एक हिंदुस्तानी ने पूरे मेक्सिको की किस्मत पलट कर रख दी! वहां भुखमरी खत्म हो गई और खेतों में लहलहाती फसलें आ गईं।
वहां के किसान उन्हें भगवान की तरह पूजने लगे।
उनकी महानता का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं की मेक्सिको के दुनिया के सबसे मशहूर चित्रकार ‘डिएगो रिवेरा’ (Diego Rivera) ने अपनी एक ऐतिहासिक पेंटिंग ‘अवर ब्रेड’ (El Pan Nuestro) बनाई।
इस पेंटिंग में उन्होंने दुनिया भर के मज़दूरों और किसानों के बीच एक मेज़ पर खानखोजे को मुखिया की तरह बैठकर रोटी बांटते हुए दिखाया।
सात समंदर पार एक देश हमारे लाल को सिर-आंखों पर बिठा रहा था, और इधर हमारा अपना देश? चलिए आगे का दर्दनाक सच भी सुन लीजिए।
आज़ादी के बाद भी अपने ही देश में बैन रहने का दर्द और सब कुछ बेचकर हमेशा के लिए वतन वापसी
1947 का वो दिन आ गया जिसका खानखोजे ने अपनी पूरी उम्र इंतज़ार किया था। भारत आज़ाद हो गया!
मेक्सिको में बैठे इस बूढ़े होते शेर की आंखों में खुशी के आंसू थे। उन्हें लगा की अब वो शान से अपनी मातृभूमि लौटेंगे। लेकिन ज़रा इस नए आज़ाद सिस्टम की बेमानी को तो देखिये!
अंग्रेज़ तो चले गए, लेकिन अपने पीछे जो ‘काले अंग्रेज़’ और बाबूशाही छोड़ गए, उन्होंने खानखोजे को भारत का वीज़ा ही नहीं दिया। क्यों? क्योंकि अंग्रेज़ों की फाइलों में ये आशिक़ अभी भी ‘खतरनाक इंटरनेशनल टेररिस्ट’ था!
सालों तक वो मेक्सिको से खत लिखते रहे, मिन्नतें करते रहे। आख़िरकार, बहुत जद्दोजहद और अपीलों के बाद 1955 में उन्हें भारत लौटने की इजाज़त मिली।
“मुझे बस एक एग्रीकल्चर लैब दे दो ताकि भारत के काम आ सकूं”, सिस्टम की ऐसी बेरुखी जिसने इस महान लाल को जीते जी मार डाला
जब खानखोजे अपनी बेल्जियम की पत्नी जीन एलेक्जेंड्रिन सिंडिक और दो बेटियों के साथ भारत आए, तो उन्हें कोई मंत्री पद, कोई बंगला या कोई पेंशन नहीं चाहिए थी।
उन्होंने तत्कालीन नेहरू सरकार और सिस्टम के आगे बस एक छोटी सी मांग रखी- “मुझे बस एक एग्रीकल्चर लैब दे दो और कुछ ज़मीन दे दो। जो हरित क्रांति मैं मेक्सिको में लाया हूँ, वही मक्के और गेहूं की फसल मैं अपने भारत के गरीब किसानों के लिए उगाना चाहता हूँ।”
लेकिन हमारी बाबूशाही और राजनीति का अहंकार तो देखिए! एक इंसान जिसने देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, उसे उसी के देश के अफसरों ने लावारिसों की तरह दरकिनार कर दिया।
उन्हें कोई लैब नहीं दी गई, कोई पद नहीं दिया गया और वो सम्मान तो बिल्कुल नहीं जिसके वो हक़दार थे।
इस तिरस्कार ने उस पहाड़ जैसे मजबूत इंसान को अंदर तक तोड़ कर रख दिया।
सालों बाद, जब वो गुमनामी की ज़िंदगी जी रहे थे, तो दिल्ली के किसी बाबू को शायद फाइल देखकर उन पर तरस आ गया। उसने एहसान जताते हुए खानखोजे को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ वाली पेंशन का एक चेक भिजवा दिया।
खानखोजे ने वो चेक उसी लिफाफे में वापस डाल कर सिस्टम के मुंह पर दे मारा और एक लाइन लिख दी- “ये पैसा मुझ पर नहीं, इस देश के विकास पर लगाइए।”
जीते जी गुमनामी में मौत और 55 साल बाद मेक्सिको में लगी मूर्ति
सिस्टम की इस भयानक बेरुखी और उपेक्षा के बीच, 18 जनवरी 1967 को नागपुर के एक छोटे से घर में इस मुसाफिर का सफर हमेशा के लिए खामोश हो गया।
एक महान क्रांतिकारी, दुनिया का एक महान कृषि वैज्ञानिक और भारत मां का एक सच्चा लाल बिना किसी राजकीय सम्मान के इस दुनिया से चला गया।
लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती दोस्त। इस कहानी का क्लाइमैक्स आपको 2022 में लेकर जाएगा।
अगस्त 2022 में, आज़ादी के अमृत महोत्सव के शोर के बीच, भारत के लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने पांडुरंग खानखोजे की एक प्रतिमा (Statue) का अनावरण किया।
बहुत अच्छी बात है, लेकिन रुकिए… क्या ये मूर्ति दिल्ली के किसी बड़े चौराहे पर लगी? क्या ये वर्धा या नागपुर में किसी भव्य स्मारक में लगी?
जी नहीं! ये मूर्ति भारत में नहीं, बल्कि यहाँ से 14,000 किलोमीटर दूर मेक्सिको की उसी ‘चापिंगो यूनिवर्सिटी’ में जाकर लगाई गई!
वाह रे हमारा सिस्टम! जो इंसान अपना सब कुछ बेचकर, अपनी नागरिकता छोड़कर अपनी मिट्टी के लिए वापस आया था, उसे तुम उसके जीते-जी एक छोटी सी लैब नहीं दे पाए।
मरने के बाद भी उसे अपने ही देश में एक ढंग का स्मारक नसीब नहीं हुआ। और आख़िरकार 55 साल बाद भी तुम्हें अगर उसकी मूर्ति लगानी पड़ी, तो वो भी सात समंदर पार मेक्सिको में जाकर!
क्योंकि मेक्सिको आज भी उन्हें अपना भगवान मानता है, जबकि हम आज भी उन्हें अपनी फाइलों में सिर्फ एक नाम से ज़्यादा कुछ नहीं समझते।
