मंचों से राहुल गाँधी के ‘नारी न्याय’ और महिला सम्मान के लंबे-चौड़े भाषण, और सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रेगनेंट महिला पत्रकार को धक्का देकर गिराया, विरोध-प्रदर्शन की आड़ में कांग्रेस की हिंसक गुंडई

कैमरे के सामने सजी-धजी टी-शर्ट पहनकर ‘मोहब्बत की दुकान’ खोलना और ‘Smash the Patriarchy’ (पितृसत्ता को उखाड़ फेंकने) के लंबे-चौड़े भाषण देना कितना आसान होता है ना?

सच में, महिला अधिकारों पर ज्ञान बांटना और असल जिंदगी में एक महिला का सम्मान करना, इन दोनों बातों में ज़मीन-आसमान का फर्क है।

12 अक्टूबर 2026 का दिन इस देश की राजनीति में एक ऐसे काले धब्बे की तरह दर्ज़ हो गया है, जिसने ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ के नारे का पूरा तिलिस्म चंद सेकंडों में चकनाचूर कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर, जहाँ पूरे देश को न्याय मिलने की उम्मीद होती है, ठीक उसी दरवाज़े पर एक गर्भवती महिला पत्रकार के साथ जो सलूक किया गया, उसने संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दीं।

और यह किसी और ने नहीं, बल्कि खुद उस पार्टी के सर्वेसर्वा ने किया जो दिन-रात संविधान और अधिकारों की दुहाई देते नहीं थकते।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर कांग्रेस का ‘SIR प्रोटेस्ट’ का वो ड्रामा जहाँ एक आम इंसान की कोई हैसियत नहीं

कहानी शुरू होती है 12 अक्टूबर 2026 से। नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के ठीक बाहर इंडिया गठबंधन का एक भारी-भरकम ‘SIR प्रोटेस्ट’ चल रहा था।

निशाना था चुनाव आयोग और विशेषकर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार। माहौल एकदम टाइट था।

कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज नेता- राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार इस मोर्चे में शामिल थे। अब जहाँ इतने बड़े-बड़े चेहरे हों, वहां दरबारियों और सिक्योरिटी वालों का भौकाल तो अपने चरम पर होगा ही!

ज़रा सोचकर देखिए इस मोर्चे का नज़ारा। एक तरफ ये नेता लोकतंत्र बचाने और आम आदमी की आवाज़ उठाने का दावा कर रहे थे, और दूसरी तरफ इस मार्च में आम जनता और अपना काम कर रहे पत्रकारों को ऐसे ट्रीट किया जा रहा था जैसे वो कोई कीड़े-मकौड़े हों।

इनके VIP मार्च में किसी साधारण इंसान के लिए कोई जगह नहीं थी। सिक्योरिटी का ऐसा घेरा और धक्का-मुक्की चल रही थी की जैसे कोई राजा अपनी प्रजा के बीच से गुज़र रहा हो और बाकी सब उनकी राह के रोड़े हों।

मज़ेदार बात तो यह है की जो नेता माइक पकड़कर कहते हैं की वो ‘आम आदमी’ के साथ खड़े हैं, उन्हीं की सिक्योरिटी आम आदमियों को धक्के मारकर सड़क से हटा रही थी।

और इसी अफरातफरी, इसी वीआईपी घमंड और इसी ‘राजशाही’ वाले माहौल के बीच वो शर्मनाक घटना घटी, जिसने चंद सेकंड में इन तमाम खोखले नारों की हवा निकाल कर रख दी।

एक ऐसा पल जिसने दिखा दिया की इनके लिए महिला सम्मान सिर्फ चुनाव के मैनिफेस्टो में छापने वाला एक शब्द है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

खबर लेने गई 3 महीने की गर्भवती पत्रकार को राहुल गाँधी ने ज़मीन पर पटका

अब आते हैं उस हिस्से पर जो किसी भी संवेदनशील इंसान को विचलित कर दे। उस भीड़भाड़ में ‘वन इंडिया’ (One India) न्यूज़ पोर्टल की एक जर्नलिस्ट अपना काम कर रही थीं। इनका नाम है ऋचा पाराशर।

ऋचा 3 महीने की गर्भवती (Pregnant) हैं। एक कामकाजी महिला, जो इस अवस्था में भी अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से निभा रही थी, वो न्यूज़ बाइट लेने के लिए इन नेताओं के करीब पहुँचने की कोशिश करती है।

अब ऋचा के साथ जो हुआ, वो किसी डरावने सपने से कम नहीं था। ऋचा बस राहुल गांधी का एक स्टेटमेंट लेने की कोशिश कर रही थीं।

अचानक राहुल गांधी ने बहुत ही सख्त एक्सप्रेशन के साथ ऋचा का हाथ पकड़ा, उन्हें एक झटके में अपनी तरफ खींचा और ज़ोर से पीछे की तरफ धक्का दे दिया गया।

ज़रा उस मंज़र की कल्पना कीजिए। एक 3 महीने की गर्भवती महिला को इतनी बेरहमी से धक्का दिया जाता है की वो सुप्रीम कोर्ट की सीढ़ियों पर सीधे पेट के बल गिरती है।

और बात यहीं ख़त्म नहीं होती! जब वो गिरती है, तो पीछे से उनका कैमरामैन भी उन्ही के ऊपर गिर पड़ता है और फिर भीड़ के चार-पांच लोग उस बेचारी महिला के ऊपर गिर जाते हैं।

ऋचा के हाथों में गहरी चोटें आईं, उनके घुटनों की हड्डियां छिल गईं और जिस आईफोन से वो अपना काम कर रही थीं, वो टूटकर सड़क पर बिखर गया।

लेकिन फोन के शीशे से ज़्यादा तो उस दिन वो ‘तिलिस्म’ टूट गया जो बरसों से करोड़ों रुपये खर्च करके बनाया गया था।

क्या यही है वो सम्मान? क्या यही है वो आज़ादी और सुरक्षा जो कांग्रेस इस देश की महिलाओं को देना चाहती है? आप एक वर्किंग जर्नलिस्ट को, वो भी ऐसी हालत में, सरेआम ज़मीन पर पटक देते हैं और आपके माथे पर शिकन तक नहीं आती!

अगर ‘स्मैश द पैट्रिआर्की’ का मतलब महिलाओं को ऐसे सड़कों पर धक्के मारना है, तो सच में हमें ऐसे खोखले महिला-सशक्तिकरण से भगवान ही बचाए।

दर्द से तड़पती महिला को उठाने के बजाय दरबारी लगाते रहे ‘राहुल गांधी ज़िंदाबाद’ के नारे

अगर आपको लगता है की ऋचा पाराशर के ज़मीन पर गिरने के बाद कहानी ख़त्म हो गई, तो आप इस सिस्टम की संवेदनहीनता का अंदाज़ा ही नहीं लगा पाए हैं।

एक सामान्य इंसान की फितरत क्या होती है? अगर राह चलते किसी से अनजाने में भी कोई टकरा कर गिर जाए, तो इंसान रुकता है, हाथ बढ़ाता है और पूछता है कि “भाई, चोट तो नहीं लगी?”

लेकिन यहाँ तो बात ही अलग थी। यहाँ ‘इंसानियत’ से ज़्यादा ‘पॉलिटिकल माइलेज’ ज़रूरी था।

जब ऋचा सीढ़ियों पर पेट के बल गिरीं और दर्द से तड़प रही थीं, तब राहुल गांधी ने एक बार भी मुड़कर देखना मुनासिब नहीं समझा।

वो ऐसे आगे बढ़ गए जैसे रास्ते से कोई पत्थर ठोकर मारकर किनारे किया हो। लेकिन सबसे खौफनाक नज़ारा तो उनके आस-पास मौजूद उन दरबारियों और चमचों का था।

जब ऋचा ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया, तो इन समर्थकों ने उन्हें उठाने के बजाय उन पर ही चिल्लाना शुरू कर दिया।

वो बदतमीज़ी से पूछ रहे थे की “तुम हो कौन?” कमाल है ना! उस बेचारी के हाथ में वन इंडिया (One India) का इतना बड़ा माइक और गले में प्रेस का आईडी कार्ड लटक रहा था, फिर भी ये पूछ रहे थे की तुम कौन हो!

और जब ऋचा ने अपनी आवाज़ उठाने की कोशिश की, तो जानते हैं इन दरबारियों ने क्या किया? अपनी चोरी और बेशर्मी को छुपाने के लिए इन्होंने ऋचा को घेर लिया और ज़ोर-ज़ोर से ‘राहुल गांधी ज़िंदाबाद’ के नारे लगाने लगे।

ताकि उस महिला की चीखें और दर्द इन नारों के शोर में दब जाए। ये है इनकी असली ‘मोहब्बत की दुकान’। एक गर्भवती महिला ज़मीन पर तड़प रही है और ये लोग अपने नेता की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं।

क्या गज़ब का इकोसिस्टम पाला है भाई! इनकी नज़रों में अपने नेता का झूठा ईगो एक महिला की जान और सम्मान से कहीं ज़्यादा कीमती है।

रात के अंधेरे में बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेश भाटिया ने कराया ऋचा को अस्पताल में एडमिट

इस वीआईपी ड्रामे के बाद ऋचा बेचारी किसी तरह उठकर अपने राजेंद्र नगर ऑफिस पहुँचीं। दर्द इतना भयंकर था की हालत बिगड़ती जा रही थी।

रात के करीब साढ़े आठ बज चुके थे। तब ऋचा की बहन ने दिल्ली बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेश भाटिया से संपर्क किया और मदद की गुहार लगाई।

अब देखिए, जो लोग दिन-रात लोकतंत्र बचाने निकले थे वो तो धक्का देकर निकल गए, और मदद के लिए वो आए जिन्हें ये दिन-रात कोसते हैं।

राजेश भाटिया और उनके स्थानीय विधायक उमंग बजाज ने बिना एक सेकंड की देरी किए तुरंत ऋचा को नज़दीकी अस्पताल पहुँचाया।

और अस्पताल पहुँचने के बाद जो हकीकत सामने आई, वो किसी को भी डरा दे। डॉक्टर ने जब अल्ट्रासाउंड और पूरा चेकअप किया, तो पता चला की सीधे पेट के बल गिरने और ऊपर से भारी धक्का लगने की वजह से ऋचा की प्रेग्नेंसी में कॉम्प्लिकेशन (Medical Complications) आ गई है।

स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें तुरंत अस्पताल में एडमिट कर लिया।

अब एक सीधा सा सवाल है- ज़रा सोचिए, अगर उस दिन उस अजन्मे बच्चे को कुछ हो जाता, तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेता?

क्या वो चमचे जो ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे, वो इसकी भरपाई करते? या वो नेता जो ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ का नारा देते हैं, वो आगे आकर कहते की हाँ, हमारे वीआईपी घमंड की वजह से एक बच्चे की जान पर बन आई?

बिल्कुल नहीं! ये लोग तो अगले दिन किसी और धरने पर बैठकर टीवी कैमरों के सामने नया प्रवचन दे रहे होते।

जब अपने ही मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को धक्के मारकर किनारे कर दिया तो एक पत्रकार किस खेत की मूली है

अगर आपको लग रहा है की राहुल गांधी की सिक्योरिटी या उनके रवैये का शिकार सिर्फ आम जनता या पत्रकार ही होते हैं, तो आप बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं।

इनका ये वीआईपी घमंड अपनों के लिए भी उतना ही तगड़ा है। इस प्रोटेस्ट का एक और वीडियो इंटरनेट पर आग लगा रहा है, जिसे देखकर आप हैरान हो जायेंगे।

उसी 12 अक्टूबर वाले मार्च की फुटेज में साफ़ दिख रहा है की राहुल गांधी आगे बढ़ रहे हैं और उनके रास्ते में कर्नाटक के सिटिंग मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार (DK Shivakumar) आ जाते हैं।

तो राहुल गांधी उन्हें ऐसे धक्के मारकर किनारे कर देते हैं जैसे वो कोई अनजान राहगीर हों। भाई साहब, वो एक राज्य के चुने हुए मुख्यमंत्री हैं! कोई वार्ड मेंबर नहीं!

कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने बिल्कुल सही नब्ज़ पकड़ी है। उन्होंने इसे ‘कन्नड़ अस्मिता का अपमान’ बताया है।

सोचिए, एक मुख्यमंत्री जो अपने राज्य में बॉस है, वो दिल्ली आकर राहुल गांधी के दरबार में धक्के खा रहा है और चुपचाप बर्दाश्त भी कर रहा है।

जब राहुल गांधी के सामने उनके ही एक सिटिंग मुख्यमंत्री की ये औकात रह गई है, तो फिर ऋचा पाराशर जैसी आम जर्नलिस्ट किस खेत की मूली है?

जब ये अपनों को ज़मीन दिखा सकते हैं, तो एक पत्रकार को सीढ़ियों पर पटकना इनके लिए कौन सी बड़ी बात है?

गलती तुम्हारी है तुम काम पर क्यों गई… शर्मिंदा होने के बजाय उल्टे पत्रकार पर ही सवाल उठा रहा कांग्रेसी इकोसिस्टम

और अंत में, इस पूरे ड्रामे का सबसे घिनौना हिस्सा! किसी भी सभ्य समाज में अगर ऐसी घटना होती है, तो ज़िम्मेदार इंसान सबसे पहले आगे आकर माफ़ी मांगता है।

लेकिन इस वामपंथी और कांग्रेसी इकोसिस्टम के डिक्शनरी में ‘सॉरी’ शब्द है ही नहीं। अपनी गलती मानना तो दूर, इस पूरे गैंग ने सोशल मीडिया पर ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ (Victim Blaming) का ऐसा गंदा खेल शुरू कर दिया है की सुनकर आपको उबकाई आ जाए।

माफ़ी मांगने के बजाय इनके तमाम दरबारी प्रवक्ता इंटरनेट पर ये नैरेटिव चला रहे हैं की “अगर वो 3 महीने की प्रेग्नेंट थी, तो उसे उस भीड़भाड़ वाले प्रोटेस्ट में जाने की ज़रूरत ही क्या थी? वो घर पर क्यों नहीं बैठी?”

वाह रे मेरे ज्ञानियो, वाह! क्या गज़ब का दोगलापन है! यही वो लोग हैं जो विदेशी अख़बारों में ‘वर्किंग वुमन राइट्स’ (कामकाजी महिलाओं के अधिकार) पर बड़े-बड़े ओपिनियन पीस लिखते हैं।

यही वो गैंग है जो कहता है की प्रेग्नेंसी कोई बीमारी नहीं है और महिलाओं को काम करने से नहीं रोकना चाहिए। लेकिन जब वही प्रेग्नेंट महिला अपना काम करते हुए इनके ‘सुप्रीम लीडर’ के धक्के का शिकार हो जाती है, तो ये उसे ज्ञान देने लगते हैं की “तुम घर पर क्यों नहीं रहीं?”

मतलब जब तुम्हारे मन की हो, तो महिला आज़ाद है, और जब तुम्हारे नेता का पर्दाफाश हो जाए, तो महिला ही दोषी है? यही है इनका असली ‘स्मैश द पैट्रिआर्की’ मॉडल।

ये घटना उस पूरे पाखंडी इकोसिस्टम का पर्दाफाश करता है, जो कैमरे के सामने तो महिलाओं के सम्मान की चादर ओढ़ लेता है, लेकिन हकीकत में सत्ता और वीआईपी कल्चर के नशे में इतना चूर है कीउसे सड़क पर तड़पती एक गर्भवती महिला की चीख भी सुनाई नहीं देती।

देश के युवाओं और महिलाओं को अब इस ‘कथनी और करनी’ के अंतर को समझना ही होगा। क्योंकि अगर आज आप इन फर्जी नारों के झांसे में आ गए, तो कल सड़कों पर धक्के खाने की बारी आपकी भी हो सकती है।

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