आपातकाल में काटी 19 महीने की जेल, राजस्थान में नारू रोग को किया खत्म, ‘अंत्योदय’ से करोड़ों गरीबों का जीवन बदलने वाले और राजस्थान को पहली गैर-कांग्रेसी सरकार देने वाले ‘बाबोसा भैरों सिंह शेखावत’

राजपुताने की उस तपती हुई रेत ने इतिहास में एक से बढ़कर एक शूरवीर, योद्धा और नेता देखे हैं। राजस्थान की सियासत भी कभी किसी एक के इर्द-गिर्द नहीं घूमी।

लेकिन जब बात आवाम के दिलों पर राज करने की आती है ना, तो एक नाम ऐसा है जिसके सामने सत्ता, पार्टी, विपक्ष और यहाँ तक की उनके धुर विरोधी भी नतमस्तक हो जाते थे।

ये वो नाम है जिसे जनता ने किसी नेता की तरह नहीं, बल्कि अपने घर के मुखिया की तरह पूजा और प्यार से उनके नाम के आगे लगा दिया- ‘बाबोसा’ (पिता तुल्य)।

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं राजस्थान के इकलौते ‘सिंह’ और देश के 11वें उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत जी की।

आजकल के नेताओं को देखिए, ज़रा सी कुर्सी क्या मिल जाती है, उनका ज़मीन पर पैर ही नहीं टिकता। 10-15 गाड़ियों का काफिला और फुल भौकाल!

लेकिन बाबोसा की कहानी बिल्कुल अलग थी। उनकी सियासत की जड़ें महलों से नहीं, बल्कि सीकर के एक छोटे से गांव की धूल-मिट्टी से निकली थीं।

उनका पूरा सफर किसी ऐसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह है जिसमें सस्पेंस है, इमोशन है, बगावत है और राजनीति की वो ‘क्लासिकल चाणक्य नीति’ है जिसने बड़े-बड़ों के पसीने छुड़ा दिए थे।

चलिए, आज इतिहास के पन्नों से उस राजनेता की कहानी निकालते हैं जिसने 6 अलग-अलग सीटों से चुनाव लड़ा और जीता, जिसने राम मंदिर के लिए अपनी सरकार कुर्बान कर दी, और जो अपनी आख़िरी सांस तक सियासत का ‘अजातशत्रु’ बना रहा।

खाकी वर्दी की पक्की नौकरी को छोड़कर जब एक थानेदार ने रखा सियासत के अखाड़े में कदम

23 अक्टूबर 1923… सीकर ज़िले का खाचरियावास गांव। एक साधारण से किसान परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। उम्र अभी खेलने-कूदने की थी की सिर से पिता का साया उठ गया।

घर की माली हालत ऐसी की कॉलेज की पढ़ाई भी बीच में ही छोड़नी पड़ गई। घर चलाने के लिए और परिवार का पेट पालने के लिए शेखावत जी ने पुलिस महकमे में नौकरी कर ली।

अपनी मेहनत और कड़क मिज़ाज के दम पर वो जल्द ही प्रमोट होकर सब-इंस्पेक्टर (थानेदार) बन गए। अब ज़रा उस ज़माने की बात सोचिए।

1940-50 के दशक में एक ‘थानेदार’ की क्या धाक हुआ करती थी! इलाके में थानेदार साहब की जीप दिख जाए तो लोगों की बोलती बंद हो जाती थी।

एकदम सेटल्ड नौकरी, पक्की सरकारी तनख्वाह और फुल इज़्ज़त। कोई आम आदमी होता तो चुपचाप अपनी नौकरी करता, रिटायर होता और पेंशन के मज़े लेता।

लेकिन शेखावत जी के अंदर का राजनेता तो कुछ और ही खुराफ़ात सोच रहा था! 1952 का साल आ रहा था। आज़ाद भारत के पहले आम चुनाव होने वाले थे।

देश में लोकतंत्र की नई-नई हवा बह रही थी। बाबोसा को लगा की यार, इस खाकी वर्दी में रहकर मैं सिर्फ चंद मुज़रिमों को पकड़ सकता हूँ, लेकिन अगर सच में इस सिस्टम को सुधारना है और अवाम का भला करना है, तो इस कुएं से बाहर निकलना पड़ेगा।

बस फिर क्या था! उन्होंने अपनी उस पक्की और भौकाली सरकारी नौकरी एक झटके में छोड़ दी। पुलिस महकमे से इस्तीफ़ा दिया और भारतीय जनसंघ (जो आज की बीजेपी है) का झंडा उठाकर चुनाव के मैदान में कूद पड़े।

लोग उस वक्त उन्हें पागल समझ रहे थे की “कैसा आदमी है, अच्छी-भली थानेदारी छोड़कर नेतागिरी के दलदल में धंस रहा है।”

लेकिन 1952 में जब उन्होंने सीकर की दांता रामगढ़ सीट से अपना पहला चुनाव लड़ा और जीतकर विधानसभा पहुंचे, तो उन तंज कसने वालों के मुँह पर हमेशा के लिए ताला लग गया।

एक थानेदार अब राजस्थान का वो उभरता हुआ सितारा बन चुका था, जिसकी चमक से आगे चलकर पूरी कांग्रेस पार्टी की आँखें चौंधियाने वाली थीं।

जागीरदारी प्रथा का खुलकर किया विरोध और अपनों से बगावत करके बन गए गरीब किसानों के मसीहा

ये बात 1950 के दशक के आस-पास की ही है। राजस्थान में उस समय ‘जागीरदारी प्रथा’ (ज़मींदारी) को ख़त्म करने की बात चल रही थी।

जागीरदारी प्रथा का मतलब था की ज़मीन का पूरा मालिकाना हक़ कुछ चुनिंदा बड़े लोगों (जागीरदारों) के पास होता था और आम किसान उनके खेतों में सिर्फ मज़दूरी करता था।

अब यहाँ पेंच ये था की राजस्थान के ज़्यादातर बड़े जागीरदार खुद राजपूत समाज से आते थे। और भैरों सिंह शेखावत भी राजपूत थे!

राजनीति का सीधा सा गणित कहता था की शेखावत जी को अपने समाज के बड़े और रसूखदार जागीरदारों का साथ देना चाहिए था, आख़िर वही तो उनका ‘कोर वोटबैंक’ थे।

लेकिन बाबोसा ने यहाँ वो रिस्क लिया जो अच्छे-अच्छे नेताओं के बस की बात नहीं। उन्होंने डंके की चोट पर ‘जागीरदारी प्रथा’ का विरोध किया और उन ग़रीब, बेज़मीन किसानों के हक़ में खड़े हो गए जो सदियों से पिस रहे थे।

उन्हें मालूम था की इस फैसले से उनके अपने समाज के कई बड़े लोग और रसूखदार नेता उनसे भयंकर नाराज़ हो जाएंगे। और हुए भी! खूब बगावत हुई, ताने सुनने को मिले। लेकिन शेखावत जी टस से मस नहीं हुए।

उन्होंने साफ़ कर दिया की कोई भी प्रथा जो गरीब का हक़ मारती हो, वो उन्हें बर्दाश्त नहीं। उनके इस एक स्टैंड ने राजस्थान की राजनीति में भूचाल ला दिया।

जो किसान और मज़दूर कल तक उन्हें सिर्फ एक ‘राजपूत नेता’ समझते थे, वो आज उन्हें अपना मसीहा मानने लगे। इसी फैसले ने उन्हें किसी एक जाति के खांचे से निकालकर पूरे राजस्थान की ‘कौम का नेता’ बना दिया।

आपातकाल में वो 19 महीने की काल कोठरी जिसने एक आम राजनेता को तपाकर कुंदन बना दिया

सियासत में हर बड़े नेता की एक ‘अग्निपरीक्षा’ ज़रूर होती है। शेखावत जी के जीवन में यह परीक्षा लेकर आया साल 1975।

जी हाँ, वही मनहूस साल जब दिल्ली के तख़्त पर बैठी इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरे देश पर इमरजेंसी (आपातकाल) थोप दी थी।

लोकतंत्र का सरेआम गला घोंटा जा रहा था। बड़े-बड़े नेताओं की बोलती बंद थी। जो आवाज़ उठाता, उसे रातों-रात गायब करके जेल में डाल दिया जाता था।

ऐसे खौफनाक माहौल में भी राजस्थान का ये ‘सिंह’ खामोश नहीं बैठा। उन्होंने इंदिरा सरकार की इस तानाशाही के ख़िलाफ़ खुलकर मोर्चा खोल दिया। सत्ता के कानों में जब शेखावत जी की बगावत की आवाज़ पहुंची, तो दिल्ली से सीधा फरमान आया- “गिरफ्तार कर लो!”

इमरजेंसी के उसी काले दौर में पुलिस ने उन्हें उठाया और सीधे हरियाणा की रोहतक जेल में ले जाकर ठूंस दिया। ये कोई आम जेल की सज़ा नहीं थी यार। उस वक्त मीसा (MISA) क़ानून के तहत जेल में बंद राजनीतिक कैदियों के साथ कैसा सुलूक होता था, ये किसी से छिपा नहीं है।

शेखावत जी पूरे 19 महीने तक उस रोहतक जेल की काल कोठरी में बंद रहे। दिल्ली में बैठे सिस्टम को लगा था की ये नया-नवेला जनसंघी नेता जेल की यातनाएं देखकर टूट जाएगा, माफ़ी मांग लेगा या फिर सियासत छोड़कर घर बैठ जाएगा।

लेकिन उन्हें क्या पता था की वो एक जननेता को आग में तपाकर ‘सोना’ नहीं, बल्कि ‘कुंदन’ बना रहे हैं!

जेल की उस तन्हाई और संघर्ष ने बाबोसा के इरादों को फौलाद बना दिया था। जब 1977 में इमरजेंसी हटी और भैरों सिंह शेखावत 19 महीने बाद जेल से बाहर आए, तो नज़ारा देखने लायक था।

उनका स्वागत करने के लिए, उनकी बस एक झलक पाने के लिए राजस्थान की सड़कों पर अवाम का ऐसा सैलाब उमड़ा था जिसे देखकर कांग्रेस के बड़े-बड़े सूरमाओं के पसीने छूट गए थे।

अब वो सिर्फ एक विधायक या विपक्ष के नेता नहीं रहे थे… वो राजस्थान की उम्मीद बन चुके थे। और इसी उम्मीद ने 1977 के चुनावों में वो तूफ़ान खड़ा किया जिसने सत्ता के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़कर रख दिए।

कांग्रेस का बरसों पुराना किला ढहाकर जब बाबोसा ने रचा इतिहास और वर्ल्ड बैंक ने भी किया सलाम

1977 का वो साल राजस्थान की राजनीति में एक ऐसा सियासी भूकंप लेकर आया, जिसके झटके दिल्ली तक महसूस किए गए।

आज़ादी के बाद से राजस्थान में कांग्रेस एक ऐसे मठाधीश की तरह बैठी थी जिसे लगता था की उन्हें सत्ता से कोई उखाड़ ही नहीं सकता। लेकिन इमरजेंसी के बाद जनता के अंदर जो गुस्सा खदबदा रहा था, उसे शेखावत जी ने एक भयंकर सुनामी में बदल दिया।

नतीजा? चुनाव हुए और कांग्रेस का बरसों पुराना अजेय किला ताश के पत्तों की तरह ढह गया। भैरों सिंह शेखावत ने वो कर दिखाया जो उस वक़्त नामुमकिन सा लगता था।

उन्होंने राजस्थान में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई और खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज़ हुए।

बाबोसा ने कुर्सी पर बैठते ही एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला, जिसकी गूंज सीधा अमेरिका के वाशिंगटन तक पहुंची। उन्होंने लागू की अपनी मशहूर ‘अंत्योदय योजना’।

ये कोई आज के ज़माने वाली ‘फ्री-फ्री’ रेवड़ी बाँटने वाली स्कीम नहीं थी। अंत्योदय का सीधा सा मतलब था- ‘समाज की आख़िरी पंक्ति में खड़े आख़िरी इंसान का उदय’।

शेखावत जी ने अफसरों को सख्त आर्डर दिया की गांव के उन सबसे ग़रीब परिवारों को ढूंढो जिनके पास ना ज़मीन है, ना रोजगार है और ना कोई सहारा। सरकार उनके दरवाज़े पर जाएगी और उन्हें रोज़गार, लोन या ज़मीन देकर अपने पैरों पर खड़ा करेगी।

इस योजना ने इतना तगड़ा काम किया की इसकी चर्चा पूरी दुनिया में होने लगी। मज़ा तो तब आया जब विश्व बैंक (World Bank) के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट मैकनामारा (Robert McNamara) खुद इस योजना को देखने राजस्थान के धूल भरे गांवों में पहुँच गए।

आम तौर पर नेता वर्ल्ड बैंक के सामने लोन मांगने जाते हैं, लेकिन यहाँ वर्ल्ड बैंक का सबसे बड़ा बॉस खुद बाबोसा के विज़न को समझने और सीखने आया था!

मैकनामारा ने ग्लोबल लेवल पर इस योजना की जमकर तारीफ की और कहा की “ग़रीबी मिटाने का जो फॉर्मूला राजस्थान ने निकाला है, वो पूरी दुनिया के विकासशील देशों को अपनाना चाहिए।” ये था बाबोसा का असली भौकाल!

गंदे पानी से होने वाले खौफनाक ‘नारू रोग’ का राजस्थान के गांवों से नामोनिशान मिटाने वाला वो भगीरथ प्रयास

अगर आपको लगता है की एक राजनेता का काम सिर्फ चुनाव जीतना और भाषण देना होता है, तो ज़रा बाबोसा के एडमिनिस्ट्रेटिव कंट्रोल का ये किस्सा सुनिए।

1980 के दशक के आस-पास राजस्थान के गांवों में एक बहुत ही खौफनाक बीमारी का आतंक था, जिसे ‘नारू रोग’ (Guineaworm) कहते थे।

गांवों में लोग अक्सर पुरानी बावड़ियों (Stepwells) या जोहड़ का गंदा पानी पीते थे। इस पानी में मौजूद कीटाणु शरीर में जाते थे और फिर इंसानों के हाथ, पैर या जोड़ों से लंबे-लंबे सफेद धागे जैसे कीड़े चमड़ी फाड़कर बाहर निकलते थे।

इंसान तड़पता रहता था, विकलांग हो जाता था।

शेखावत जी ने जब इस दर्द को देखा, तो उन्होंने कसम खा ली की जब तक इस ‘नारू रोग’ का नामोनिशान नहीं मिटा दूंगा, चैन से नहीं बैठूंगा।

उन्होंने अपनी पूरी सरकारी मशीनरी को इस काम में झोंक दिया। पुलिस, प्रशासन, डॉक्टर… सबको एक ही टारगेट दिया गया- “मुझे बावड़ियां साफ़ चाहिए!”

बाबोसा ने गांव-गांव में पीने के पानी के लिए पक्की टंकियां बनवाईं, हैंडपंप लगवाए और पुरानी बावड़ियों को बंद करवाया या उन्हें पूरी तरह से साफ़ करवाया।

वो खुद मॉनिटरिंग करते थे की किस गांव में काम हुआ और कहाँ अफसर मक्कारी कर रहे हैं। उनके इस भगीरथ प्रयास का ही नतीजा था की कुछ ही सालों के अंदर राजस्थान से इस खौफनाक और लाइलाज ‘नारू रोग’ का हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा हो गया।

आज के नेता तो मुफ्त बिजली और पानी का लालच देकर वोट बटोरते हैं, लेकिन शेखावत जी ने एक पूरी की पूरी पीढ़ी को विकलांग होने से बचा लिया था।

कांग्रेस दिल्ली में मिठाई बांटती रह गई और इधर शेखावत जी ने निर्दलियों के साथ मिलकर रातों-रात पलट दी सत्ता की बाज़ी

खैर, अच्छे काम अपनी जगह, लेकिन सियासत तो आख़िर सियासत है ना! और यहाँ जो ‘चाणक्य नीति’ बाबोसा ने दिखाई, उसने कांग्रेस के बड़े-बड़े धुरंधरों को दिन में तारे दिखा दिए थे।

ये किस्सा है 1993 का। हुआ यूँ की 1992 में जब अयोध्या में बाबरी ढांचा गिरा, तो राम मंदिर के नाम पर दिल्ली में बैठी कांग्रेस सरकार (नरसिम्हा राव) ने पूरे देश की बीजेपी सरकारों को रातों-रात बर्खास्त कर दिया।

इसमें राजस्थान की शेखावत सरकार भी शामिल थी। बाबोसा ने उफ़ तक नहीं की। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा की “राम जी के काज के लिए एक क्या, सौ सरकारें कुर्बान हैं!”

इसके बाद 1993 में फिर से चुनाव हुए। अब यहाँ एक भयंकर ट्विस्ट आ गया। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी तो बनी, लेकिन पूर्ण बहुमत के जादुई आंकड़े से कुछ सीटें दूर रह गई।

उधर राजस्थान के राजभवन में जो राज्यपाल बैठे थे (बलिराम भगत), उन्हें कांग्रेस का बेहद करीबी माना जाता था।

दिल्ली में कांग्रेसी खेमे में जश्न शुरू हो गया। लड्डू बंटने लगे की “अरे बीजेपी को तो बहुमत मिला ही नहीं, अब तो हमारे गवर्नर साहब कांग्रेस को ही सरकार बनाने का न्यौता देंगे।” उन्हें लगा की बाबोसा तो अब गेम से बाहर हो गए हैं।

लेकिन दिल्ली वालों को ये नहीं पता था की वो राजस्थान के सबसे बड़े सियासी ‘जादूगर’ से पंगा ले रहे हैं। शेखावत जी की एक सबसे बड़ी खासियत थी- उनकी व्यक्तिगत दोस्ती।

उनके रिश्ते हर पार्टी के नेताओं और निर्दलियों से इतने गहरे थे की लोग उनके लिए जान छिड़कते थे।

जब रात को कांग्रेस दिल्ली में जश्न मना रही थी, तब इधर जयपुर में बाबोसा ने अपना फ़ोन घुमाया। रातों-रात उन्होंने दर्जनों निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में खड़ा कर लिया।

अगले दिन सुबह-सुबह जब कांग्रेस वाले अपनी लिस्ट लेकर राजभवन पहुँचने की तैयारी कर रहे थे, तब तक शेखावत जी ने अपने समर्थित विधायकों की पूरी बारात राजभवन के गेट पर खड़ी कर दी!

उन्होंने टेबल पर वो जादुई आंकड़ा ऐसा पटका की गवर्नर साहब के भी पसीने छूट गए। चाहकर भी कोई उन्हें सरकार बनाने से रोक नहीं पाया।

कांग्रेस मुंह ताकती रह गई और 1993 में बाबोसा ने तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। ये वो जोड़-तोड़ और सियासी जादूगरी थी, जिसे आज भी राजनीति के पन्नों में एक मास्टरक्लास की तरह पढ़ाया जाता है।

जिसके सियासी दुश्मन भी हुआ करते थे पक्के दोस्त, और उपराष्ट्रपति बनकर जब दिल्ली के तख्त पर बैठी राजस्थान की शान

आजकल की राजनीति का तो क्या ही कहना! टीवी डिबेट्स में नेता एक-दूसरे के खून के प्यासे नज़र आते हैं, ट्विटर पर एक-दूसरे को ब्लॉक कर देते हैं और मौका मिले तो सामने वाले की शक्ल भी ना देखें।

लेकिन जब हम शेखावत जी के दौर को देखते हैं, तो लगता है की यार वो राजनीति की कोई और ही दुनिया थी।

बाबोसा एक कट्टर जनसंघी थे। वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के उसूलों पर चलते थे। उनकी विचारधारा बिल्कुल पक्की थी, लेकिन मज़े की बात ये थी की राजनीति में उनका कोई दुश्मन नहीं था! वो भारतीय राजनीति के असली ‘अजातशत्रु’ थे।

आप उनकी दोस्ती के किस्से सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे। देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर एक धुर समाजवादी नेता थे, जिनका जनसंघ या बीजेपी की विचारधारा से छत्तीसे का आंकड़ा था।

लेकिन व्यक्तिगत ज़िंदगी में चंद्रशेखर और बाबोसा इतने पक्के दोस्त थे की लोग इनकी दोस्ती की कसमें खाते थे। दिल्ली के लुटियंस ज़ोन में जब भी ये दोनों दिग्गज मिलते, तो विचारधारा की दीवारें टूट जाती थीं।

और तो और, खुद कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज नेता और वामपंथी धुरंधर भी शेखावत जी का इतना सम्मान करते थे की कई बार अपनी ही पार्टी में फंसने पर वो छुप-छुप कर बाबोसा से राजनीतिक सलाह लेने उनके घर पहुँच जाते थे।

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जैसे शांत और गंभीर नेता भी शेखावत जी के मुरीद थे। सबको पता था की अगर शेखावत जी ने ज़ुबान दे दी, तो फिर चाहे आसमान गिर पड़े, वो अपनी बात से नहीं पलटेंगे।

वो सियासत के अखाड़े में लड़ते ज़रूर पूरी ताक़त से थे, लेकिन लड़ाई ख़त्म होने के बाद वो अपने विरोधी के कंधे पर हाथ रखकर उसे चाय पिलाने का माद्दा भी रखते थे।

एक युग का अंत और बाबोसा की वो लेगेसी जो कभी नहीं मिटेगी

शेखावत जी की राजनीतिक ताक़त का सबसे बड़ा सबूत ये है की उन्होंने अपने पूरे करियर में राजस्थान की 6 अलग-अलग विधानसभा सीटों- दांता रामगढ़, श्रीमाधोपुर, किशनपोल, छबड़ा, निम्बाहेड़ा और बाली से चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज़ की।

ज़रा सोचिए! आजकल के नेता अपनी एक पुश्तैनी सीट छोड़ने में कांप जाते हैं की कहीं हार न जाएं। लेकिन बाबोसा? बाबोसा तो राजस्थान के नक्शे पर उंगली रखकर जहाँ से खड़े हो जाते थे, जनता वहीं से उन्हें सिर आँखों पर बिठाकर विधानसभा भेज देती थी।

15 मई 2010… ये वो मनहूस दिन था जब 86 साल की उम्र में इस सियासी शूरवीर ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

उस दिन राजस्थान का ऐसा कोई गांव, ऐसी कोई ढाणी या ऐसा कोई घर नहीं था जहाँ लोगों की आँखें नम न हुई हों। लोगों को ऐसा लगा जैसे उनके घर का सबसे बड़ा बुज़ुर्ग, उनके ‘बाबोसा’ उन्हें छोड़कर चले गए हैं।

आज जब हम राजस्थान की राजनीति को देखते हैं, तो कई नए नेता आते हैं, कई सरकारें बनती और गिरती हैं।

लेकिन जब भी बात उसूलों की राजनीति, गज़ब के विज़न और जनता के साथ सीधे जुड़ाव की आती है, तो भैरों सिंह शेखावत के कद का कोई दूसरा नेता दूर-दूर तक नज़र नहीं आता।

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