जेल के बाहर कदम रखते ही वापस गिरफ्तार हुए सपा के कद्दावर नेता आज़म खान, कैसे मुश्किल वक्त में अखिलेश यादव ने दूध में गिरी मक्खी की तरह आज़म खान को किया दरकिनार

सियासत की दुनिया भी गज़ब है! यहाँ कब कौन किसका सगा है और कब कौन किसको भगवान भरोसे छोड़ दे, इसका अंदाज़ा लगाना आम आदमी के बस की बात नहीं।

राजनीति में रिश्ते नातों की उम्र बस उतनी ही होती है, जब तक आपका ‘वोटबैंक’ ज़िंदा है। जिस दिन आपके वोटों का मीटर डाउन हुआ, उस दिन आपके अपने ‘सियासी चहीते’ और शार्गिद भी आपको पहचानने से इंकार कर देते हैं।

उत्तर प्रदेश की सियासत में आजकल बिल्कुल यही फिल्म चल रही है, और इस फिल्म के ट्रैजिक हीरो बने हैं समाजवादी पार्टी के सबसे कद्दावर और पुराने नेता-आज़म खान।

कल तक जो आज़म खान समाजवादी पार्टी की आंख का तारा हुआ करते थे, जिनके बिना सपा की कोई चुनावी रैली पूरी नहीं होती थी, आज जब उनके बुरे दिन आए, तो उनके अपनों ने ही उन्हें दूध में गिरी मक्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक दिया।

31 अक्टूबर 2026 की उस शाम जो कुछ भी हुआ, उसने साफ कर दिया की अखिलेश यादव की सपा में अब आज़म खान सिर्फ एक ऐसे एक्सपायर हो चुके मोहरे रह गए हैं, जिसे अब बस दिखावे के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

रामपुर जेल के गेट पर आज़ादी का चंद मिनटों वाला जश्न और सपा ने ही आज़म खान को छोड़ दिया भगवान भरोसे

ज़रा 31 अक्टूबर 2026 की उस शाम के बारे में सुनिए। 11 महीने से ज़्यादा का वक्त रामपुर जेल की काल कोठरी में बिताने के बाद आज़म खान को आज़ादी की एक किरण नज़र आई थी।

जेल के बाहर उनके समर्थक फूल-मालाएं लेकर खड़े थे। सबको लग रहा था की ‘आज़म भाई’ बाहर आएंगे, एक इमोशनल स्पीच देंगे और 2027 के यूपी चुनाव का माहौल सेट हो जाएगा।

लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

जैसे ही 78 साल के इस नेता ने खुली हवा में सांस लेने के लिए जेल के भारी-भरकम लोहे के गेट से बाहर कदम रखा, सामने फूल-मालाओं की जगह प्रवर्तन निदेशालय (ED) की वैन और वर्दीधारी जवान खड़े थे।

आज़म खान ने अभी ठीक से आज़ादी का जश्न मनाना शुरू भी नहीं किया था की उनकी हथकड़ियों का रंग बदल गया। रामपुर जेल से निकलकर वे सीधे ईडी की कस्टडी में चले गए।

और सबसे बड़ा मज़ाक देखिए! जिस नेता ने समाजवादी पार्टी को खड़ा करने में अपनी पूरी जवानी लगा दी, मुलायम सिंह यादव के साथ कदम से कदम मिलाकर चला, उस नेता के दोबारा अरेस्ट होने पर सपा का कोई बड़ा धुरंधर वहां मौजूद नहीं था।

अखिलेश यादव, जो कुछ दिन पहले तक जेल में जाकर ‘आज़म अंकल’ का हालचाल लेने का दिखावा कर रहे थे, एकदम से अंडरग्राउंड हो गए।

इसे कहते हैं सियासत का सबसे कड़वा सच- जब तक तुम काम के हो, तब तक गले का हार, और जब जांच एजेंसियों का डंडा पड़े, तो भाई तुम कौन और हम कौन!

दोहरे पैन कार्ड केस की जमानत और जेल के बाहर 24 CRPF जवानों के साथ खड़ी ईडी की टीम

अब ज़रा उन कागज़ी और कानूनी पचड़ों को भी समझ लीजिए की आखिर उस दिन रामपुर जेल के बाहर हुआ क्या था। दरअसल, मामला ‘दोहरे पैन कार्ड’ (Dual PAN Card) फर्जीवाड़े का था।

29 अक्टूबर 2026 को ही इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में आज़म खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आज़म को बड़ी राहत देते हुए जमानत दे दी थी।

जो 10 साल की सज़ा उन्हें निचली अदालत से मिली थी, उसे हाई कोर्ट ने सस्पेंड कर दिया था।

अब सरकारी कागज़ी कार्यवाही पूरी होने में दो दिन लग गए। 31 अक्टूबर की शाम को रामपुर जेल के अधीक्षक राजेश यादव के पास पूरे 50 मुकदमों में रिहाई का परवाना पहुंचा। कागज़ी कार्रवाई पूरी हुई।

बेटा अब्दुल्ला तो रिहा होकर चुपचाप अपने घर चला गया। लेकिन 78 साल के आज़म खान जैसे ही बाहर निकले, उनका इंतज़ार लखनऊ से आई ईडी की एक स्पेशल टीम और 24 से ज्यादा सीआरपीएफ (CRPF) के जवान कर रहे थे।

रिहाई के महज़ 40 मिनट! जी हाँ, आज़म खान जेल के बाहर सिर्फ 40 मिनट ही रुक पाए थे की ईडी ने उन्हें ‘प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट’ (PMLA) के तहत दोबारा धर दबोचा।

आज़म खान की हालत उस वक्त ऐसी थी की सीने और पेट में दर्द के कारण उन्हें चेकअप के लिए दिल्ली के RML अस्पताल ले जाना पड़ा।

लेकिन कानून की नज़र में कोई बीमार हो या स्वस्थ, जब घोटालों की फाइलें खुलती हैं, तो हिसाब तो देना ही पड़ता है।

पिछले एक साल से सड़कों पर सन्नाटा और अब ईडी के आते ही अखिलेश यादव का अंडरग्राउंड हो जाना

खैर, आज़म खान का गुनाह अपनी जगह है, लेकिन उनके साथ जो सबसे बड़ा खेला हुआ है, वो ईडी ने नहीं, बल्कि उनके अपने ‘सियासी बेटे’ अखिलेश यादव ने किया है।

अगर आप पिछले एक साल का सपा का इतिहास उठाकर देखें, तो आपको समझ आ जाएगा की कैसे एक ज़िंदा नेता को उसकी ही पार्टी लावारिस छोड़ देती है।

याद कीजिए, जब पिछले साल नवंबर में आज़म खान, उनकी पत्नी तंज़ीन फातिमा और बेटे अब्दुल्ला को फर्जी जन्म प्रमाण पत्र मामले में एक साथ 7-7 साल की सज़ा हुई थी, तब समाजवादी पार्टी ने क्या किया था?

जवाब है- बिल्कुल शून्य (Zero)! ये वही समाजवादी पार्टी है जो कभी अपने एक मामूली कार्यकर्ता के लिए पूरे यूपी में चक्का जाम कर देती थी।

लेकिन जब उनके पार्टी का संस्थापक सदस्य (Founding Member) और सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा जेल की काल कोठरी में सड़ रहा था, तब अखिलेश यादव ने पूरे यूपी में एक भी बड़ा धरना-प्रदर्शन नहीं किया।

अखिलेश यादव की ये ‘AC रूम पॉलिटिक्स’ अब किसी से छिपी नहीं है। पिछले 11 महीनों में जब आज़म खान जेल में बीमार पड़े, तब अखिलेश सिर्फ चुनाव के लिए ‘मुस्लिम वोटबैंक’ को छिटकने से रोकने के लिए जेल में एक-आध बार मिलने चले गए।

वो मुलाकात कोई हमदर्दी नहीं थी, बल्कि ओवैसी (AIMIM) और कांग्रेस को ये मैसेज देना था की “मुस्लिम वोट अभी भी मेरी जेब में है।”

लेकिन जैसे ही कानूनी या ज़मीनी लड़ाई की बात आई, अखिलेश ने अपने ‘आज़म अंकल’ को एकदम अकेला छोड़ दिया।

और 31 अक्टूबर को तो अखिलेश ने इस अवसरवादिता (Opportunism) की हद ही पार कर दी। जब आज़म रिहा होने वाले थे, तो सपा वाले ट्विटर पर खुशियां मनाने की तैयारी कर रहे थे।

लेकिन जैसे ही जेल के बाहर ईडी ने एंट्री मारी और शिकंजा कसा, पूरी की पूरी समाजवादी पार्टी ऐसे अंडरग्राउंड हो गई जैसे वो आज़म खान को जानती ही न हो!

अखिलेश ने सड़क पर आकर कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की, कोई आंदोलन नहीं किया, बस अपने कमरे में बैठकर ‘X’ (ट्विटर) पर एक रस्मी पोस्ट डालकर पल्ला झाड़ लिया और उसे ‘बीजेपी की साज़िश’ बता दिया।

इसे कहते हैं सियासत का असली ‘यूज़ एंड थ्रो’ (Use and Throw)। तुम्हारे वोट काम के हैं, लेकिन तुम्हारे संकट से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।

1170 करोड़ के घोटाले का जौहर और किसानों की छिनती ज़मीनें जिसके कारण कसा गया शिकंजा

अब कुछ लोग कहेंगे की “ये तो सरासर राजनीतिक दुश्मनी है, बीजेपी आज़म खान को फंसा रही है।”

लेकिन दोस्त, ज़रा ग्राउंड फैक्ट्स तो चेक कर लो! ये कोई सियासी हवा-हवाई मामला नहीं है, बल्कि एक बहुत ही सॉलिड और पक्का आर्थिक अपराध है, जिसके सुबूत चीख-चीख कर सच बयां कर रहे हैं।

ईडी ने यह गिरफ़्तारी कोई रातों-रात नहीं की है। इसके पीछे 2019 में दर्ज हुई एक ईसीआईआर (ECIR) और यूपी पुलिस की 26 एफआईआर (FIR) का पूरा पुलिंदा है।

असली खेल क्या है? खेल है सत्ता की ताकत का गलत इस्तेमाल और गरीबों की ज़मीनों की लूट।

जब यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और आज़म खान शहरी विकास मंत्री जैसे कद्दावर पद पर बैठे थे, तब उन्होंने अपनी कुर्सी का जो बेज़ा इस्तेमाल किया, ये उसी का नतीजा है।

आरोप है (और जिसके पुख्ता सुबूत ईडी के पास हैं) की आज़म खान ने रामपुर के सिंगनखेड़ा गांव के गरीब और दलित किसानों की कृषि भूमि पर ज़बरन कब्ज़ा कर लिया।

उन किसानों को डरा-धमका कर उनकी पुश्तैनी ज़मीनें छीनी गईं। और तो और, सरकारी खजाने (फंड्स) का पैसा भी डाइवर्ट करके अपने निजी ‘मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट’ और जौहर यूनिवर्सिटी की ईंटों में लगा दिया गया।

ये कोई छोटा-मोटा घोटाला नहीं है भाई! अभी कुछ ही दिन पहले ईडी ने इसी मनी लॉन्ड्रिंग केस में जौहर यूनिवर्सिटी की 1170 करोड़ रुपये की संपत्तियां कुर्क (Attach) की हैं।

1170 करोड़! ज़रा सोचिए, एक तरफ वो गरीब किसान थे जिनकी ज़मीनें छिन गईं और वो सड़कों पर आ गए, और दूसरी तरफ एक कद्दावर मंत्री अपनी एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी खड़ी कर रहा था।

तो जब आप सत्ता के नशे में इतने बड़े पाप करेंगे, तो आज नहीं तो कल ईडी और कानून का फंदा तो गले तक पहुंचेगा ही ना।

‘ये मुसलमान होने की सज़ा है’, 92 मुकदमों को छिपाने के लिए आज़म खान का वही पुराना विक्टिम कार्ड

सियासत में जब किसी नेता के सारे दांव उल्टे पड़ जाते हैं और उसके पास जांच एजेंसियों के सवालों का कोई जवाब नहीं बचता, तो वो अपना सबसे पुराना और आज़माया हुआ हथियार निकालता है- ‘विक्टिम कार्ड’।

और जब बात आज़म खान की हो, तो ये कार्ड धर्म की चाशनी में डूबकर बाहर आता है।

जैसे ही 31 अक्टूबर को ईडी (ED) ने जेल के बाहर से आज़म खान को दबोचा, उन्होंने मीडिया के कैमरों को देखते ही अपना वो पुराना राग अलापना शुरू कर दिया।

उनके मुंह से निकले शब्द कुछ ऐसे थे, “अब क्या रह गया है कहने को? ये मुसलमान होने की सज़ा है। हमारी गलती बस ये थी की एक मुसलमान ने गरीब बच्चों के लिए यूनिवर्सिटी बना दी, यही हमारा जुर्म है और इसी की सज़ा हमें मिल रही है।”

वाह आज़म साहब! मतलब जब आप मंत्री पद की धौंस जमाकर रामपुर के किसानों की ज़मीनें कब्ज़ा रहे थे, तब आप एक ताकतवर सियासतदान थे, और जब ईडी ने उसी ज़मीन के कब्ज़े का हिसाब मांगा, तो आप अचानक से एक ‘बेचारे मुसलमान’ बन गए?

ज़रा हम भी तो पूछें की क्या किसी गरीब किसान की पुश्तैनी ज़मीन लूटना, जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate) में उम्र कम लिखवाकर चुनाव लड़ना और दो-दो पैन कार्ड बनवाकर सरकारी टैक्स की चोरी करना धर्म में जायज़ है?

आप पर ये जो 92 से ज़्यादा क्रिमिनल केस पेंडिंग चल रहे हैं, ये किसी नमाज़ पढ़ने या अज़ान देने की वजह से नहीं लगे हैं। ये केस लगे हैं आपके उस अहंकार और उन आर्थिक घोटालों की वजह से जो आपने सत्ता में रहते हुए किए थे।

जब कोर्ट में आपकी दलीलें हवा हो जाती हैं और वकीलों के पास सुबूत नहीं बचते, तब अपनी चोरी छिपाने के लिए धर्म की चादर ओढ़ लेना अब यूपी की जनता अच्छे से समझ चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट की शरण और डासना जेल की सलाखें, आज़म खान के इस सियासी वनवास का आगे क्या होगा?

अब सवाल ये है की आज़म खान का आगे क्या होगा? क्या ये सियासी वनवास खत्म होगा या सलाखें उनका परमानेंट ठिकाना बन चुकी हैं?

ताज़ा अपडेट्स ये हैं की रविवार (1 नवंबर 2026) को स्पेशल PMLA कोर्ट के जज अवनीश कुमार पांडे ने आज़म खान को 14 दिन की ज्यूडिशियल कस्टडी में गाजियाबाद की डासना जेल भेज दिया है।

78 साल की उम्र में रामपुर से निकलकर सीधे डासना जेल का ये सफर किसी भी इंसान के लिए एक बहुत बड़ा सदमा है।

हारकर आज़म खान के वकीलों ने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है। सोमवार (2 नवंबर 2026) को आज़म खान के वकील निज़ाम पाशा ने सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की बेंच के सामने गुहार लगाई है।

वकील का कहना है की रिहाई के 40 मिनट बाद ही दोबारा गिरफ़्तारी करना सरासर ‘बदले की भावना’ है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लिया है और उम्मीद है की इस हफ्ते के अंत तक इस पर कोई सुनवाई हो सकती है।

लेकिन अंत में एक बात तो साफ है दोस्त! आज़म खान भले ही सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद कर रहे हों, और हो सकता है की उन्हें कुछ राहत मिल भी जाए।

लेकिन उन्हें सबसे बड़ा अन्याय और धोखा सिस्टम से नहीं, बल्कि उस समाजवादी पार्टी से मिला है, जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन खपा दिया।

आज जब वो डासना जेल की सलाखों के पीछे अकेले बैठे होंगे, तो उन्हें शायद ईडी के मुकदमों से ज़्यादा अखिलेश यादव की वो सुविधाजनक खामोशी चुभ रही होगी।

आज़म खान आज यूपी की सियासत के उस मुकाम पर खड़े हैं जहाँ उनके सामने जांच एजेंसियों का पहाड़ है और पीछे मुड़कर देखने पर अपनों की वो खाली कुर्सियां, जो उन्हें ये याद दिला रही हैं की सियासत में जब आपका काम निकल जाता है, तो आपको दूध में गिरी मक्खी की तरह ही दरकिनार कर दिया जाता है।

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