क्या भारत की राजनीति पहली बार पूरी तरह ‘हिन्दू-केंद्रित’ हो गई है?

अगर आप 90 के दशक या 2000 के आस-पास की राजनीति को याद करें, तो आपको टीवी पर एक फिक्स नज़ारा याद आएगा।

जैसे ही चुनाव या रमज़ान का महीना पास आता था, दिल्ली से लेकर पटना और लखनऊ तक के नेताओं में एक गज़ब की होड़ मच जाती थी।

होड़ इस बात की कि कौन सबसे बढ़िया जालीदार टोपी पहनकर इफ्तार पार्टी में फोटो खिंचवाएगा। जो नेता जितनी बड़ी इफ्तार पार्टी देता था, उसे उतना ही बड़ा ‘सेक्युलर’ माना जाता था।

मतलब, वो दौर हमारे देश में सेक्युलरिज्म का ‘गोल्ड स्टैण्डर्ड’ हुआ करता था।

लेकिन आज? आज पिक्चर पूरी तरह से बदल चुकी है! जो नेता कल तक इफ्तार की दावतों में बिरयानी खाते दिखते थे, वो आज चुनाव आते ही अपना गोत्र बताने लगते हैं।

माथे पर त्रिपुंड लगाकर, रुद्राक्ष की माला पहनकर कैमरों के सामने गंगा आरती करते हैं। आज़ाद भारत के 7 दशकों के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब राजनीति का ‘सेंटर ऑफ ग्रेविटी’ अल्पसंख्यक तुष्टिकरण से खिसक कर सीधे तौर पर बहुसंख्यक यानी हिन्दू समाज पर आकर टिक गया है।

आज दिल्ली के तख्त का रास्ता किसी इफ्तार पार्टी से नहीं, बल्कि काशी और अयोध्या के गलियारों से होकर गुज़रता है।

इफ्तार की दावतों से सीधे मंदिर की कतारों तक का ऐतिहासिक सफर, कैसे रातों-रात बदल गया भारतीय राजनीति का पूरा सिलेबस

सच कहूं तो राजनीति का ये सिलेबस रातों-रात नहीं बदला है, इसके पीछे हिन्दू समाज की वो खामोश करवट है जिसने अच्छे-अच्छे राजनीतिक महारथियों के कैलकुलेटर फेल कर दिए हैं।

एक समय था जब हमारे देश में हिन्दुओं को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ (taken for granted) लिया जाता था। नेताओं को लगता था की हिन्दू तो बंटा हुआ है, इसे कोई भी झुनझुना पकड़ा दो, ये वोट दे देगा।

असली मेहनत तो सिर्फ उस खास वोट बैंक को खुश करने में करनी है जो थोक के भाव में वोट डालता है।

लेकिन जैसे ही हिन्दुओं को अपनी ताकत का अहसास हुआ, पूरी की पूरी सियासत ने यू-टर्न ले लिया। आज हालत ये है की जो पार्टियां कभी सनातन धर्म को कोसने और उसे पिछड़ा बताने में कोई कसर नहीं छोड़ती थीं, आज उनके बड़े-बड़े रणनीतिकार बंद कमरों में बैठकर इस बात पर माथापच्ची कर रहे हैं की “भाई, पब्लिक को ये कैसे यकीन दिलाएं कि हम भी पक्के हिन्दू हैं?”

ये जो इफ्तार की दावतों से लेकर मंदिर की लंबी कतारों तक का सफर है ना, ये किसी नेता के हृदय परिवर्तन का नतीजा नहीं है। ये विशुद्ध रूप से हिन्दू वोट बैंक के खौफ का नतीजा है, जिसने राजनीति के पूरे व्याकरण को ही पलट कर रख दिया है।

कल तक सनातन से दूरी बनाने वाले आज मंच पर पढ़ रहे हैं हनुमान चालीसा

विपक्ष का ये नया ‘सॉफ्ट हिन्दुत्व’ वाला अवतार आजकल सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है। अब कांग्रेस को ही ले लीजिए।

ये वही पार्टी है जिसकी सरकार ने कभी सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा (Affidavit) देकर कहा था की भगवान राम तो काल्पनिक हैं, उनका कोई ऐतिहासिक प्रमाण ही नहीं है।

लेकिन जैसे ही हवा का रुख बदला, इनके सबसे बड़े नेता राहुल गाँधी रातों-रात ‘जनेऊधारी शिवभक्त’ बन गए! चुनाव आते ही वो कभी कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकल जाते हैं, तो कभी केदारनाथ के दर्शन करते नज़र आते हैं।

और सिर्फ कांग्रेस ही क्यों, दिल्ली वाले अरविंद केजरीवाल का किस्सा तो और भी दिलचस्प है। चुनाव से ठीक पहले वो पंजाब में भरे मंच से पूरी हनुमान चालीसा सुना देते हैं।

फिर अचानक से बुजुर्गों को फ्री में ‘रामलला’ के दर्शन कराने वाली योजनाएं ले आते हैं।

बंगाल में दीदी (ममता बनर्जी) को देख लीजिए, जिन्हें कभी जय श्री राम के नारों से इतनी चिढ़ होती थी की वो कार से उतरकर लोगों को डांटने लगती थीं, उन्ही दीदी ने चुनाव जीतने के लिए मंच से बकायदा ‘चंडी पाठ’ कर दिया।

उधर यूपी में अखिलेश यादव, जिनकी पार्टी का इतिहास रामभक्तों पर गोलियां चलवाने का रहा है, उन्हें भी अचानक भगवान परशुराम की विशाल मूर्तियां लगवाने की याद आ जाती है।

ये सारा तमाशा देखकर एक बात तो एकदम शीशे की तरह साफ हो जाती है- आज के नेताओं को ये बहुत अच्छे से समझ आ गया है की अगर दिल्ली या किसी भी बड़े सूबे की सत्ता चाहिए, तो हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाकर या सनातन का मज़ाक उड़ाकर वो अपनी राजनीतिक दुकान नहीं चला सकते।

वोट बैंक के गणित में अब फेल हो गया तुष्टिकरण का पुराना फॉर्मूला, 80 प्रतिशत को इग्नोर करके दिल्ली जीतने का ख्वाब हुआ चकनाचूर

90 के दशक से लेकर 2014 तक, भारतीय राजनीति में एक अलिखित नियम चलता था जिसे एक्सपर्ट्स ‘माइनॉरिटी वीटो’ (Minority Veto) कहते थे।

मतलब, 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट बैंक जिसके पाले में जाएगा, सरकार उसी की बनेगी। इसी वीटो के चक्कर में तुष्टिकरण (Appeasement) की राजनीति अपने चरम पर थी।

ज़रा याद कीजिए वो पुराना दौर! अगर मुसलमानों से जुड़ा कोई छोटा सा भी मुद्दा उठ जाता था- चाहे वो बाटला हाउस एनकाउंटर पर आंसू बहाना हो, या किसी मौलाना का भड़काऊ बयान हो- ये तमाम सेक्युलर पार्टियां तुरंत माइक लेकर उनकी आवाज़ बन जाती थीं।

उन्हें लगता था की मुसलमानों का पक्ष लेने से उनका ‘मुश्त वोट बैंक’ पक्का हो जाएगा और हिन्दू तो वैसे भी जातियों में बंटा हुआ है, वो कहाँ जाएगा।

लेकिन आज? आज का सीन एकदम उल्टा है भाई! अब हिजाब का विवाद हो, तीन तलाक का मामला हो, रामनवमी पर पथराव की घटना हो, वक्फ बोर्ड का कोई बड़ा बिल हो…

आप देखेंगे की कांग्रेस, सपा, आरजेडी जैसी तमाम पार्टियां अब एकदम चुप करके बैठ जाती हैं। एक अजीब सी स्ट्रैटेजिक चुप्पी (Strategic Silence) छा जाती है विपक्ष के खेमे में।

ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि इन नेताओं की रातों की नींद इस बात से उड़ी हुई है की जैसे ही ये किसी मुस्लिम मुद्दे पर खुलकर बोलेंगे, वैसे ही इनके माथे पर फिर से ‘तुष्टिकरण’ का ठप्पा लग जाएगा।

और ये ठप्पा लगते ही इनका बचा-खुचा हिन्दू वोटर भी भड़क कर इनसे दूर हो जाएगा। 80 प्रतिशत बहुसंख्यक समाज को चिढ़ाकर आप 20 प्रतिशत के दम पर सत्ता नहीं पा सकते, ये बात आज का नेता घोंट कर पी चुका है।

‘हिन्दू वोट बैंक के खौफ’ ने इन सेक्युलर पार्टियों की ज़बान पर ऐसा ताला लगाया है की अब मुस्लिम समुदाय खुद हैरान-परेशान है की उनके वो पुराने ‘हमदर्द’ नेता आखिर गए कहाँ!

जातियों के छोटे-छोटे कुओं से निकलकर समंदर बन रहासनातनी समाज, अगड़े-पिछड़े को छोड़कर एक हो रहा हिन्दू वोटर

दशकों तक हमारे देश में ‘मंडल’ और ‘कमंडल’ की लड़ाई चलती रही। नेताओं ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरे समाज को जातियों के छोटे-छोटे खानों में बांट कर रख दिया था।

कोई सवर्ण था, कोई दलित था, कोई अगड़ा तो कोई पिछड़ा। चुनाव के दिन लोग अक्सर घोषणापत्र (Manifesto) नहीं, बल्कि अपनी जाति वाले उम्मीदवार का नाम खोजते थे।

नेताओं के लिए भी काम बड़ा आसान था- दो-तीन जातियों का गठजोड़ बनाओ, उन्हें आपस में लड़ाओ और सत्ता की मलाई खाओ।

लेकिन आज ग्राउंड रिपोर्ट कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है जब ‘जातिवाद’ की इन पुरानी दीवारों को लांघकर ‘हिन्दुत्व’ की एक विराट और साझा पहचान (Collective Identity) खड़ी हो गई है।

आप खुद सोचिए, जब अयोध्या में 500 सालों के इंतज़ार के बाद भव्य राम मंदिर बनता है या काशी विश्वनाथ कॉरिडोर सजकर तैयार होता है, तो वहां जाने वाला इंसान ये नहीं सोचता की उसकी जाति क्या है।

वो वहां सिर्फ और सिर्फ एक ‘सनातनी’ बनकर खड़ा होता है।

रील वाले युग का ‘अनअपोलोजेटिक’ सनातनी युवा, नई पीढ़ी के माथे का तिलक देखकर कैसे नेता भी खुद को ढाल रहे उसी रंग में

कुछ साल पहले तक इन बड़े-बड़े सियासी महानुभावों को एक बहुत बड़ा भ्रम था।

इन्हें लगता था की ये जो नया 18 से 35 साल का युवा है (Gen-Z और Millennials), ये तो बड़ा मॉडर्न है। इसे धर्म-कर्म, मंदिर से क्या लेना देना? इसे फ्री का इंटरनेट दो, नौकरी का वादा करो, बस काम खत्म।

लेकिन भाई, यहीं पर इन नेताओं से सबसे तगड़ी चूक हो गई। आज का ये जो रील (Reel) बनाने वाला युवा है ना, ये पिछले दौर के ‘सेक्युलर गिल्ट’ (Secular Guilt) में बिल्कुल नहीं जीता।

ये अपनी सनातनी पहचान को लेकर एकदम ‘अनअपोलोजेटिक’ (Unapologetic) है। मतलब, इसे खुद के हिन्दू होने पर कोई झिझक या शर्म नहीं है।

आप इंस्टाग्राम खोल कर देख लीजिए, महाकाल की भस्म आरती, केदारनाथ की यात्रा और राम मंदिर की वाइब (vibe) वाली रील्स से सोशल मीडिया भरा पड़ा है।

इनकी बुलेट और कारों के पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में ‘जय श्री राम’ और ‘महाकाल’ लिखा होता है।

जब इन सियासी पार्टियों के सर्वे करने वालों ने ग्राउंड पर उतरकर देखा की आज का फर्स्ट-टाइम वोटर तो बेखौफ होकर अपनी संस्कृति को फ्लॉन्ट (flaunt) कर रहा है, तो नेताओं को समझ आ गया की अगर इस नई पीढ़ी का वोट चाहिए, तो उन्हें भी इन्हीं के रंग में रंगना पड़ेगा।

इसीलिए अब युवा नेताओं से लेकर पुराने दिग्गज तक, सब के सब सोशल मीडिया पर मंदिर जाने की तस्वीरें पोस्ट करने की रेस में लगे रहते हैं।

राम मंदिर से लेकर महाकाल लोक तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नया दौर, अब केवल सड़कों से नहीं बल्कि विरासत बचाने से मिलता है वोट

आज का जो सनातनी वोटर है ना, वो बहुत स्मार्ट हो चुका है। वो सिर्फ मुफ्त की बिजली, पानी या लैपटॉप के लॉलीपॉप से खुश नहीं होता।

उसे 6-लेन का एक्सप्रेसवे भी चाहिए, और उसी एक्सप्रेसवे से जुड़ा अयोध्या का राम मंदिर और इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी चाहिए।

आज की राजनीति सिर्फ अर्थव्यवस्था (Economy) तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘विकास और विरासत’ के एक ज़बरदस्त संगम पर आ खड़ी हुई है।

उज्जैन का महाकाल लोक देख लीजिए, केदारनाथ का भव्य पुनर्निर्माण देख लीजिए, सोमनाथ मंदिर का विकास या फिर असम में कामाख्या कॉरिडोर…

ये सब क्या है? ये ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ (Cultural Nationalism) का वो नया दौर है जिसने भारत की सोई हुई चेतना को झकझोर कर जगा दिया है।

दशकों तक हमें हमारी ही प्राचीन संस्कृति पर शर्मिंदा होना सिखाया गया। लेकिन अब देश को अपनी प्राचीन पहचान पर शर्म नहीं, बल्कि गर्व है।

आज का वोटर डंके की चोट पर कहता है की जो हमारी विरासत को संवारेगा, दिल्ली के तख्त पर वही बैठेगा। और जो नेता वक्त रहते पब्लिक की इस नब्ज़ को समझ गया, वो आज सिकंदर बना बैठा है।

हिन्दू-केंद्रित राजनीति अब कोई लहर नहीं बल्कि एक नया युग है, आने वाले दशकों तक इसी पिच पर खेलना होगा देश का हर चुनाव

तो भाई, कुल मिलाकर बात ये है की हम भारत की सियासत में जो ये महा-बदलाव देख रहे हैं, ये कोई पानी का बुलबुला नहीं है जो आज है और कल फूट जाएगा।

ये भारत की राजनीति का नया युग है… एक ‘न्यू नॉर्मल’ (New Normal)। 70 सालों तक जिस देश की राजनीति सिर्फ एक खास अल्पसंख्यक वोट बैंक को खुश करने के इर्द-गिर्द घूमती थी, आज उसी देश में 80 प्रतिशत आबादी ने अपनी शर्तों पर राजनीति तय करना शुरू कर दिया है।

अब चाहे कांग्रेस हो, समाजवादी पार्टी हो, आम आदमी पार्टी हो या कल को बनने वाला कोई भी नया गठबंधन… अगर 21वीं सदी के भारत में चुनाव की बैटिंग करनी है, तो पिच हिन्दुत्व की ही होगी।

आप आर्थिक मुद्दे उठा सकते हैं, रोज़गार पर सवाल कर सकते हैं, लेकिन आप सनातन धर्म का अपमान करके या हिन्दू समाज को इग्नोर करके दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचने का ख्वाब नहीं देख सकते।

जो भी नेता या पार्टी इस सनातनी धारा के खिलाफ तैरने की होशियारी दिखाएगा, वो भारत के राजनीतिक नक़्शे से कब और कहाँ गायब हो जाएगा, ये उसे खुद भी पता नहीं चलेगा।

सियासत का पहिया अब पूरी तरह से घूम चुका है, और सच कहें तो… ये तो बस शुरुआत है!

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