आज 3 नवंबर है। आज राजपूताना की धरती पर जन्मे उस शूरवीर की जयंती है जिसने दुनिया को ये बता दिया था की हिंदू राजा सिर्फ रणभूमि में तलवारें चलाना ही नहीं जानते, बल्कि आसमान में ग्रहों और तारों को नापना भी जानते हैं।
हम बात कर रहे हैं सनातनी गौरव, महान वैज्ञानिक, अद्भुत आर्किटेक्ट और जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह (द्वितीय) की।
अक्सर जब भी राजपूताना के इतिहास की बात होती है, तो लोगों के दिमाग में सीधे ढाल, तलवार, घोड़े और युद्ध के मैदान की तस्वीरें आने लगती हैं।
और ये सच भी है, शौर्य तो हमारे खून में है!
लेकिन महाराजा सवाई जयसिंह का रुतबा एकदम अलग लेवल का था। ज़रा सोचिए, 18वीं सदी का वो दौर, जब पूरी दुनिया अभी ठीक से विज्ञान का ककहरा भी नहीं सीख पाई थी, तब हमारा ये हिंदू सम्राट महलों में बैठकर ब्रह्मांड के नक्शे बना रहा था।
एक हाथ में राजपूताना की चमकती हुई तलवार और दूसरे हाथ में खगोल विज्ञान (Astronomy) के बड़े-बड़े चार्ट्स… ऐसा डेडली कॉम्बिनेशन शायद ही हिंदुस्तान के इतिहास में किसी और राजा का रहा हो।
आज जब हम देश में ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने की बात करते हैं ना, तो हमें याद रखना चाहिए की इस महान राजा ने आज से 300 साल पहले ही देश की पहली स्मार्ट सिटी ज़मीन पर उतार दी थी।
तो चलिए, आज इनकी जयंती पर इनके कारनामों का कच्चा-चिट्ठा खोलते हैं।

11 साल की उम्र में औरंगजेब की बोलती बंद करने वाला वो बच्चा जिसे खुद मुगलों ने दी थी ‘सवाई’ की उपाधि
कहावत है ना की पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। 3 नवंबर 1688 को आमेर में जन्मे इस बच्चे का असली नाम विजय सिंह था।
बात साल 1699 की है। उस वक़्त दिल्ली की गद्दी पर क्रूर मुग़ल शासक औरंगज़ेब बैठा था। वही औरंगज़ेब जिसके नाम से अच्छे-अच्छे राजाओं की रूह कांप जाती थी।
महज़ 11 साल का ये लड़का अपने पिता बिशन सिंह के साथ औरंगज़ेब के दरबार में पहुँचा था। अब औरंगज़ेब ठहरा चालाक आदमी, उसने सोचा की इस बच्चे को थोड़ा डराया जाए।
औरंगज़ेब ने अचानक आगे बढ़कर इस 11 साल के लड़के के दोनों हाथ बहुत ज़ोर से कसकर पकड़ लिए। और फिर एकदम तीखी आवाज़ में पूछा- “बोल, अब तू क्या करेगा? तेरे दोनों हाथ तो मेरे कब्ज़े में हैं!”
बड़े-बड़े मुग़ल सिपहसालारों को लगा की ये बच्चा अब डर के मारे रोने लगेगा या माफ़ी मांगेगा। लेकिन भाई, वो राजपूताना का खून था!
इस 11 साल के बच्चे ने ज़रा भी खौफ खाए बिना ऐसा जवाब दिया की पूरे दरबार की बोलती बंद हो गई।
जयसिंह ने मुस्कुराते हुए कहा- “हुज़ूर! जब एक आदमी किसी औरत का एक हाथ पकड़ता है, तो ज़िंदगी भर उसकी हिफाज़त करने का वचन देता है। आज तो खुद हिंदुस्तान के बादशाह ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए हैं, अब मुझे किस बात का डर?”
इस हाज़िरजवाबी और तेज़ दिमाग को देखकर औरंगज़ेब सन्न रह गया। वो समझ गया की ये लड़का कोई मामूली इंसान नहीं है।
उसी भरे दरबार में औरंगज़ेब ने माना की यह बच्चा अपने दादा (मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम) से भी ‘सवा गुना’ ज़्यादा चालाक, होशियार और ताक़तवर है।
बस इसी दिन औरंगज़ेब ने उन्हें ‘सवाई’ की उपाधि दे दी। और तभी से जयपुर के राजघराने में हर राजा के नाम के आगे शान से ‘सवाई’ लगाया जाने लगा।

वास्तु शास्त्र और ग्रिड सिस्टम का वो मास्टरमाइंड जिसने उबड़ खाबड़ ज़मीन पर खड़ी कर दी देश की पहली स्मार्ट सिटी ‘जयपुर’
अब आते हैं उस चमत्कार पर, जिसका लोहा आज भी दुनिया के बड़े-बड़े सिविल इंजीनियर मानते हैं। वक़्त बीतता गया और जयसिंह बड़े हुए।
आमेर की पहाड़ियों पर आबादी लगातार बढ़ रही थी और पानी की भयंकर किल्लत होने लगी थी। तब 1727 में सवाई जयसिंह ने फैसला किया की वो एक ऐसा नया शहर बसाएंगे जो पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बनेगा।
18 नवंबर 1727… यही वो ऐतिहासिक तारीख थी जब जयपुर शहर की नींव रखी गई। जयसिंह ने इस शहर का डिज़ाइन बनाने के लिए पूरे देश से छंटनी की और आख़िरकार बंगाल के एक बेहद शानदार आर्किटेक्ट विद्याधर भट्टाचार्य को अपना मुख्य नगर नियोजक (City Planner) चुना।
जयसिंह खुद वास्तु शास्त्र, गणित और शिल्प शास्त्र के बहुत तगड़े जानकार थे। उन्होंने और विद्याधर ने मिलकर एक ऐसा डिज़ाइन तैयार किया जिसने उबड़-खाबड़ ज़मीन को एक जन्नत में बदल दिया।
आजकल जो हम विदेशों में ग्रिड सिस्टम (Grid System) वाली सड़कें देखते हैं ना, वो सवाई जयसिंह ने 300 साल पहले ही बना दी थीं!
जयपुर भारत का पहला ऐसा शहर था जिसे बाकायदा हिंदू वास्तु शास्त्र के हिसाब से डिज़ाइन किया गया था। पूरे शहर को 9 चौकोर ब्लॉक्स में बांटा गया, जो ब्रह्मांड के नौ ग्रहों (Navagraha) के प्रतीक थे।
दो ब्लॉक में महल और सरकारी इमारतें थीं, बाकी सात ब्लॉक आम जनता के लिए रखे गए।
और सड़कों का विज़न तो पूछिए ही मत! उस ज़माने में जब लोग बैलगाड़ियों और घोड़ों पर चलते थे, तब जयसिंह ने शहर की मुख्य सड़कों की चौड़ाई पूरे 111 फीट रखी थी!
उन्हें पता था की आने वाले समय में शहर बढ़ेगा और ट्रैफिक भी। हर सड़क एक-दूसरे को एकदम 90 डिग्री (Right angle) पर काटती थी।
शहर का जो ड्रेनेज और सीवरेज सिस्टम 18वीं सदी में जयपुर के अंदर बिछाया गया था ना, वो आज बारिश में डूब जाने वाले दिल्ली और मुंबई जैसे तथाकथित मॉडर्न शहरों को सीधे-सीधे आइना दिखाता है।
जयपुर कोई ईंट और पत्थर का शहर नहीं था, यह सवाई जयसिंह के उस विज़न का जीता-जागता सुबूत था जिसमें विज्ञान, हिंदू वास्तु शास्त्र और जनता की सहूलियत का सबसे गज़ब का संगम था।

जब यूरोप दूरबीन से खेल रहा था तब पत्थर के यंत्रों से ग्रहों की सटीक चाल नापने वाले जयसिंह ने बनवा दिए 5 जंतर मंतर
अब ज़रा विज्ञान और स्पेस (Space) की बात कर लेते हैं। अक्सर हमें ये पट्टी पढ़ाई जाती है की साइंस और एस्ट्रोनॉमी तो सब यूरोप और पश्चिम वालों की देन है।
लेकिन भाई, जब यूरोप वाले अपनी छोटी-छोटी दूरबीनों से आसमान में तारे ढूंढ रहे थे ना, तब हमारा ये हिंदू सम्राट धरती पर पत्थर के ऐसे विशाल यंत्र बना रहा था जो ग्रहों की चाल को सेकंड्स में नाप लेते थे!
सवाई जयसिंह को खगोल विज्ञान (Astronomy) का ऐसा भयंकर चस्का था की उन्होंने हिंदू, इस्लामिक और यूरोपीय खगोलशास्त्र की सारी मोटी-मोटी किताबें घोट कर पी ली थीं।
उन्होंने सिर्फ किताबें ही नहीं पढ़ीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पूरे 5 ‘जंतर-मंतर’ (Astronomical Observatories) खड़े कर दिए!
ये वेधशालाएं उन्होंने जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, मथुरा और बनारस (वाराणसी) में बनवाईं। आज भी जब आप जयपुर का जंतर-मंतर देखने जाएंगे, तो आपका दिमाग सुन्न हो जाएगा।
वहां का ‘सम्राट यंत्र’ दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्यघड़ी (Sundial) है। आज के इस डिजिटल घड़ियों वाले ज़माने में भी वो पत्थर का यंत्र सूरज की परछाई से जो समय बताता है, वो 2 सेकंड तक एकदम सटीक होता है!
यूनेस्को (UNESCO) ने ऐसे ही उसे ‘वर्ल्ड हेरिटेज साइट’ नहीं घोषित कर दिया।
इतना ही नहीं, इस महान राजा ने यूनान के मशहूर वैज्ञानिक टॉलेमी (Ptolemy) और यूक्लिड (Euclid) की भारी-भरकम किताबों का बाकायदा संस्कृत में अनुवाद करवाया ताकि हमारे देश के विद्वान भी उसे पढ़ सकें।
तारों और ग्रहों की सटीक पोजीशन पता करने के लिए जयसिंह ने अपनी रिसर्च से एक पूरी टेबल तैयार की थी, जिसे इतिहास में ‘जिज़-ए-मुहम्मद शाही’ (Zij-i-Muhammad Shahi) कहा जाता है। मतलब, सोचिए वो आदमी किस लेवल का जीनियस था!
हिंदुओं से जजिया कर हटवाने और अश्वमेध यज्ञ करवाने वाले सनातन के असल रक्षक
सवाई जयसिंह सिर्फ एक वैज्ञानिक या आर्किटेक्ट नहीं थे, बल्कि जब बात धर्म और संस्कृति की आती थी, तो वो एक बेहद कट्टर और पक्के सनातनी थे।
उस दौर में मुगलों का राज कमज़ोर ज़रूर हो रहा था, लेकिन उनका घमंड अभी भी सातवें आसमान पर था। हिंदुओं को अपने ही तीर्थ स्थानों पर जाने के लिए ‘जज़िया कर’ (Pilgrim Tax) देना पड़ता था।
ये बात जयसिंह को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं थी।
उन्होंने मुग़ल दरबार में अपने रसूख और कूटनीति का ऐसा तगड़ा चाबुक चलाया की बादशाह को घुटनों पर आना पड़ा। जयसिंह के भारी दबाव के चलते ही मुगलों को हिंदुओं पर लगने वाले उस ज़लील करने वाले जज़िया कर को हमेशा के लिए हटाना पड़ा।
और तो और, सदियों से भारत की धरती पर कोई बड़ा वैदिक यज्ञ नहीं हुआ था। हिंदू राजाओं ने अपनी इस प्राचीन परंपरा को लगभग भुला ही दिया था।
लेकिन सवाई जयसिंह ने इस सनातनी गौरव को दोबारा ज़िंदा किया। वो भारत के इतिहास के आख़िरी महान हिंदू सम्राट थे जिन्होंने साल 1734 में पूरे विधि-विधान से ‘अश्वमेध यज्ञ’ और ‘वाजपेय यज्ञ’ करवाया था।
खैर, आज 3 नवंबर को जब हम अपने प्राचीन विज्ञान पर गर्व करते हैं, तो हमें इस महान सनातनी वैज्ञानिक राजा को ज़रूर याद करना चाहिए।
एक ऐसा राजा जिसने अपनी तलवार से दुश्मनों का सिर झुकाया, अपनी कूटनीति से साम्राज्य बढ़ाया, अपने विज्ञान से अंतरिक्ष नापा और अपने धर्म से सनातन की पताका फहराई…
ऐसे महान जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह को आज उनकी जयंती पर पूरा देश, पूरा सनातनी समाज, पूरे गर्व के साथ नमन करता है।
