हमारे देश में ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ (Freedom of Speech) का एक गजब का फिल्टर लगा हुआ है। आप समाज के किसी दलित वर्ग के व्यक्ति से थोड़ा हल्का सा विवाद भी करने की हिम्मत कीजिये, फिर देखिये कमाल..
रातों-रात पूरा कानून जाग जाएगा, पुलिस सायरन बजाते हुए आपके घर पहुंच जाएगी और SC/ST Act के जरिये आपकी पूरी ज़िन्दगी बर्बाद करने की स्क्रिप्ट वही पे लिख दी जाएगी।
लेकिन कमाल की बात देखिए की यही सिस्टम तब मोतियाबिंद का शिकार हो जाता है जब निशाना कोई और हो।
अगर आपको आज के दौर में रातों-रात ‘बौद्धिक’, ‘क्रांतिकारी’ और ‘सेक्युलर’ दिखना है, तो इसका एक बहुत ही सेट फॉर्मूला बाज़ार में चल रहा है।
आप माइक पकड़िए और ब्राह्मणों, हिंदू देवी-देवताओं और मंदिरों को चार भद्दी गालियां दे दीजिए। यकीन मानिए, आपको कोई जेल नहीं भेजेगा, बल्कि ये जो ब्राह्मण-विरोधी इकोसिस्टम है ना, ये आपको सिर आंखों पर बिठा लेगा।
हमारे देश के कानून ने मानो गालियां खाने, अपमान सहने और हर मंच पर जलील होने का सारा ठेका सिर्फ एक ही समुदाय- ब्राह्मणों- के नाम पर फिक्स कर दिया है।
इसी कानूनी शून्यता और मोदी सरकार की खामोशी का फायदा उठाकर आज तथाकथित ‘आंदोलनजीवी’ और छात्र नेता खुलेआम ज़हर उगल रहे हैं।
इन्हें अच्छे से पता है की ब्राह्मण समाज को गाली देने पर ना तो कोई एफआईआर (FIR) होने वाली है और ना ही कोई पुलिस आधी रात को इनका दरवाज़ा खटखटाने वाली है।
इसी ढील का नतीजा है की आए दिन कोई न कोई नया नेता उठता है और अपनी कुंठा निकालने के लिए सीधे हिंदू धर्म और ब्राह्मणों पर कीचड़ उछालना शुरू कर देता है।
All brahmins and so-called upper caste people should vote for Neha Bora and Congress.
Neha says :“Pujaris rape women in temples.”
“Women need protection from Brahmins.”
Rahul Gandhi gave her a platform. Is this the kind of leadership and message Congress is giving to UP ? pic.twitter.com/qTDDshX3yD
— S Raghunatha Prabhu, Modi ka Pariwar (@SRaghunathaPra1) November 2, 2026
नेहा बोरा का वो ज़हरीला बयान जिसने ब्राह्मणों, हिन्दू मंदिरों और पुजारियों के चरित्र पर सरेआम उछाला कीचड़
अब इस नए ड्रामे की लीड एक्टर को ही ले लीजिए। नाम है नेहा बोरा। अगर आप जंतर-मंतर पर होने वाले धरना-प्रदर्शनों को करीब से फॉलो करते हैं, तो आपने इस चेहरे को ज़रूर देखा होगा।
दरअसल ये मोहतरमा AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) की नेशनल प्रेसिडेंट हैं। देश में कोई भी मुद्दा हो, चाहे वो नीट (NEET) का प्रोटेस्ट हो या चुनाव आयोग के खिलाफ कोई बवाल, ये पोस्टर गर्ल बनकर माइक पकड़े हमेशा आपको वहां मिल जाएंगी।
हाल ही में इनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। इस वीडियो में मोहतरमा जिस तरह से ज़हर उगल रही हैं, उसे सुनकर किसी भी आम इंसान का खून खौल उठे।
माइक पकड़कर इन्होंने सरेआम मंच से दावा किया की “ब्राह्मणवादी विचारों से ब्राह्मण महिलाएं असुरक्षित हैं।”
ज़रा इस बयान की टाइमिंग और इसके पीछे की नीयत समझिए। ये बात किसी महिला की सच्ची फिक्र या हमदर्दी में नहीं कही गई है।
ये सीधे-सीधे ब्राह्मण समाज की गरिमा को ठेस पहुंचाने, उन्हें नीचा दिखाने और जातियों के बीच नफरत की आग लगाने के लिए बोली गई है।
महिला सुरक्षा तो बस एक बहाना है, असली निशाना तो ब्राह्मण समाज को बेइज़्ज़त करना है।
और बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी! इसके साथ ही इन्होंने हमारे हिंदू मंदिरों और वहां के पुजारियों पर भी बेहद भद्दी और अपमानजनक टिप्पणियां कर डालीं, और कहा की “मंदिरों में पुजारी महिलाओं के साथ दुष्कर्म करते हैं”।
अब यहां एक बहुत ही सीधा और लॉजिकल सवाल खड़ा होता है। क्या किसी और धर्म के मौलवियों या पादरियों पर, या उनकी महिलाओं पर इस तरह का घटिया बयान देने की हिम्मत इन तथाकथित ‘बौद्धिक छात्र नेताओं’ में कभी आती है?
अरे, वहां तो ये एक शब्द बोलने से पहले दस बार सोचते हैं क्योंकि इन्हें पता है की वहां ‘सर तन से जुदा’ वाले नारे लग जाते हैं। लेकिन हिंदुओं और ब्राह्मणों को कुछ भी बोल दो, सब चलता है!
वही पुरानी घिसी पिटी स्क्रिप्ट और श्लोकों का झूठा ज्ञान बांटकर पुजारियों को दुष्कर्मी बताने वाले इस स्लो पॉइजन का इलाज़ जरुरी है
अगर आप नेहा बोरा के उस बयान को ध्यान से सुनेंगे, तो आपको समझ आएगा की ये कोई अचानक मुंह से निकली बात नहीं है।
यह एक ‘स्लो पॉइजन’ है, जिसे जानबूझकर आम जनता के दिमाग में घोला जा रहा है। इनका टूलकिट बहुत सीधा है- एक ही झूठ को बार-बार, हज़ार बार बोलो ताकि वो सच लगने लगे।
ये माइक पर खड़ी होकर ‘शूद्र, पशु, नारी…’ वाले किसी श्लोक का आधा-अधूरा ज्ञान बांटती हैं और कहती हैं की ये ‘मनुस्मृति’ से आया है। सच्चाई तो ये है की इन्हें खुद मनुस्मृति का पहला श्लोक भी नहीं पता होगा।
मज़े की बात देखिए, जो ब्राह्मण समाज दिन-रात माता दुर्गा, सरस्वती और पार्वती की आराधना करता है, जो सुबह-शाम मंदिरों में ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ करता है, उसकी भक्ति इन्हें दिखाई नहीं देती।
जब उसी मनुस्मृति में लिखा है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” (जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं), तो इन लोगों की आंखें अंधी और कान बहरे क्यों हो जाते हैं?
अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर इनका जो मन करता है, ये बकती रहती हैं।
रुचि तिवारी का वो मामला जो इस ब्राह्मण-विरोधी गैंग के दोहरेपन की पोल खोलता है, ब्राह्मण होने के नाम पर सरेआम हुई थी पत्रकार से दरिंदगी
जब ये लोग माइक पर खड़े होकर फेमिनिज़्म और महिला सुरक्षा का ज्ञान बांटते हैं ना, तो इनका पाखंड देखकर हंसी आती है।
अगर आपको इस इकोसिस्टम का असली चेहरा देखना है, तो ज़रा फ्लैशबैक में चलिए।
जो नेहा बोरा आज मंच से ब्राह्मण महिलाओं की तथाकथित ‘चिंता’ में दुबली हुई जा रही हैं, क्या आपको याद है की कुछ समय पहले इन्हीं के छात्र संगठन (AISA और SFI) की हिंसक भीड़ ने रुचि तिवारी नाम की एक महिला पत्रकार के साथ क्या सुलूक किया था?
रुचि तिवारी अपना काम कर रही थीं, लेकिन तभी इन ‘छात्रों’ की भीड़ उन पर भेड़ियों की तरह टूट पड़ी। और जानते हैं उस हमले की वजह क्या थी?
भीड़ में से बाकायदा आवाज़ें आ रही थीं की “ये ब्राह्मण है, इसको पकड़ो!” सोचिए, एक महिला को सिर्फ इसलिए सरेआम नोचा जा रहा था, उसके कपड़े फाड़ने की कोशिश की जा रही थी क्योंकि वो ब्राह्मण थी।
जाति देखकर एक लड़की पर जानलेवा हमला किया गया!
अब मेरा सवाल इन ज्ञान बांटने वाले छात्र नेताओं से है- जब एक ब्राह्मण लड़की को उसकी जाति के नाम पर भीड़ सरेआम नोच रही थी, तब आपकी ये ‘फेमिनिज़्म’ वाली बैटरी कहां डाउन हो गई थी?
तब नेहा बोरा और उनका ये पूरा इकोसिस्टम कौन सी गुफा में छिपकर बैठा था? सच तो ये है की इन्हें महिलाओं की सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है।
इनके लिए महिला भी तभी तक ‘पीड़ित’ है, जब तक वो इनके राजनीतिक एजेंडे में फिट बैठती हो। अगर लड़की ब्राह्मण है, तो इनके लिए वो इंसान ही नहीं है!

दलितों के लिए सख्त SC/ST Act और भारी भरकम मुआवजा, तो क्या ब्राह्मणों को खुलेआम जलील करने का कोई लाइसेंस बंटा हुआ है
अब ज़रा सीधी कानूनी बात कर लेते हैं, क्योंकि असल खेल इसी सिस्टम के पन्नों में उलझा हुआ है।
हमारे देश में अगर कोई इंसान किसी दलित (SC/ST) समाज के व्यक्ति से भूल से भी कोई विवाद कर दे (चाहे उस विवाद की शुरुवात खुद उस दलित व्यक्ति ने ही क्यों ना करी हो), तो क्या होता है?
तुरंत ‘एससी/एसटी एक्ट’ (SC/ST Prevention of Atrocities Act) की गैर-जमानती धाराओं में एफआईआर दर्ज हो जाती है।
पुलिस रातों-रात एक्शन मोड में आती है, गिरफ्तारी होती है, बेल तक नहीं मिलती। और तो और, पीड़ित व्यक्ति को सम्मान और सुरक्षा देने के लिए सरकार की तरफ से लाखों रुपये का मुआवज़ा (Compensation) और तमाम सुख-सुविधाएं दी जाती हैं।
लेकिन अब जरा सिक्के का दूसरा पहलू भी आप देख लीजिये।
एक तरफ दलित समाज के लिए हर छोटी बात पर पूरा संविधान ढाल बनकर खड़ा हो जाता है.. और दूसरी तरफ नेहा बोरा जैसे लोग सरेआम माइक पर खड़े होकर ब्राह्मणों, उनकी महिलाओं और उनके मंदिरों को जातिसूचक गालियां देते हैं..
फिर भी उनके खिलाफ एक पत्ता तक नहीं खड़कता! आखिर क्यों? क्योंकि हमारे महान सिस्टम ने ब्राह्मणों को जातिगत गालियों और नफरत से बचाने के लिए कोई कानून बनाया ही नहीं है।
क्या ब्राह्मण इस देश के नागरिक नहीं हैं? क्या उनके सीने में दिल नहीं धड़कता? क्या ब्राह्मण महिलाओं की कोई गरिमा, कोई मान-सम्मान नहीं है?
ये कैसा न्याय है जहां एक ही देश में गालियां देने वाले की सज़ा इस बात से तय होती है की उसने किस जाति को गाली दी है!
जब कानून में ब्राह्मणों के संरक्षण का कोई प्रावधान ही नहीं है, तो समाज के इन तिलचट्टों को तो खुलेआम बेइज्जत करने का लाइसेंस मिल ही गया ना।
सिस्टम की आंखों में धूल झोंकने का वो पुराना हथकंडा जहां ब्राह्मणवाद का नाम लेकर सीधे तौर पर हिंदू समाज और देवी देवताओं को बनाया जाता है निशाना
ये इकोसिस्टम बहुत शातिर है भाई। जब इनके ज़हरीले बयानों पर पब्लिक भड़कती है और इन पर उंगलियां उठनी शुरू होती हैं, तो ये खुद को बचाने के लिए एक बहुत ही घिसी-पिटी और पुरानी चालाकी का इस्तेमाल करते हैं।
ये बड़ी मासूमियत से कैमरों के सामने आकर कहते हैं- “अरे नहीं नहीं, हम तो ब्राह्मणों को थोड़े ही गाली दे रहे थे, हम तो ‘ब्राह्मणवाद’ (Brahmanical system) का विरोध कर रहे हैं। हमारी लड़ाई तो विचारधारा से है।”
ज़रा रुकिए और इनके इस पाखंड का पर्दाफाश देखिए। जेएनयू (JNU) की दीवारों पर रात के अंधेरे में लाल रंग से लिखा जाता है- “ब्राह्मणों भारत छोड़ो” और “ब्राह्मण तेरी कब्र खुदेगी।”
अब आप ही बताइए, किसी इंसान की कब्र खोदने की बात लिखना या उसे देश से बाहर निकालने की धमकी देना कौन सी ‘विचारधारा’ की लड़ाई है?
ये कोई वैचारिक मतभेद नहीं है, ये सीधे-सीधे एक पूरे समुदाय (ब्राह्मणों) के खिलाफ नफरत (Hate Speech) का ज़हर है।
ये लोग ‘वाद’ (Ism) का मुखौटा पहनकर सीधे इंसान को टारगेट करते हैं। जब रुचि तिवारी नाम की पत्रकार पर भीड़ हमला करती है, तो वो ‘ब्राह्मणवाद’ को नहीं पीट रही होती है, वो एक जीती-जागती ब्राह्मण लड़की के कपड़े फाड़ रही होती है।
‘ब्राह्मणवाद’ का नाम तो सिर्फ पुलिस और कोर्ट की आंखों में धूल झोंकने का एक सेफ गेम है, असली निशाना तो हमेशा हिंदू समाज और वो पुजारी ही होते हैं जो आज भी हमारी संस्कृति को जिंदा रखे हुए हैं।

जो ब्राह्मण बीजेपी का सबसे पक्का कोर वोटर है उसी का सरेआम अपमान करने वालों के खिलाफ मोदी सरकार कोई कड़ा कानून क्यों नहीं लाती
अब आते हैं उस सवाल पर जो सीधे दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक गूंजना चाहिए। यह कोई छुपा हुआ रहस्य नहीं है की आज सत्ता के जिस सिंहासन पर बीजेपी बैठी है, उसकी नींव में सबसे मज़बूत ईंट इसी ब्राह्मण समाज ने रखी है।
ब्राह्मण समाज शुरुआत से ही बीजेपी का सबसे निष्ठावान, अडिग और ‘कोर वोटर’ (Core Voter) रहा है। आंधी आए, तूफान आए या सरकारें गिर जाएं… इस समाज ने बिना कोई शर्त रखे हमेशा बीजेपी की झोली वोटों से भरी है।
तो आज मोदी सरकार से एक सीधा और तार्किक सवाल बनता है- क्या यही आपके सबसे वफादार वोटर का ईनाम है? आप ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा देते हैं..
आप दलितों और पिछड़ों को हर तरह की सुरक्षा, अधिकार और सुविधाएं देते हैं.. लेकिन जब बात आपके ही सबसे भरोसेमंद ‘कोर वोटर’ की आती है, जब आपके ही वोटरों को मंच से सरेआम गालियां दी जाती हैं, उनके देवी-देवताओं पर कीचड़ उछाला जाता है, तब आप ऐसा मौन क्यों साध लेते हैं जैसे आपने कुछ देखा ही न हो?
सरकार की ये खामोशी बहुत चुभती है। अगर इस देश का कानून सच में अंधा है और सबको एक नज़र से देखता है, तो एक ऐसा कड़ा कानून (Blasphemy Law या ब्राह्मण प्रोटेक्शन कानून) क्यों नहीं बनाया जाता, जो हमारे देवी-देवताओं, मंदिरों के पुजारियों और ब्राह्मण समाज को इस रोज़-रोज़ की गालियों से बचा सके?
जब एससी/एसटी एक्ट इतना कड़ा हो सकता है की बिना जांच के गिरफ्तारी हो जाए, तो ब्राह्मणों को सरेआम ज़लील करने वालों पर तुरंत एक्शन लेने का कानून बनाने में सरकार के हाथ क्यों कांपते हैं?
वक्त आ गया है की सरकार इस मीठी नींद से जागे। राजनीति में कोई भी वोटर ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ (Taken for granted) नहीं होता।
अगर आपके सबसे वफादार वोटर का धैर्य टूट गया, अगर लगातार हो रहे इस मानसिक प्रताड़ना के खिलाफ ब्राह्मण समाज विरोध पर उतर आया, तो सिस्टम को इसका बहुत भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
न्याय का तराजू दोनों तरफ बराबर होना चाहिए, वरना वो दिन दूर नहीं जब ये एकतरफा अपमान BJP के लिए बहुत बड़ी मुसीबत बन जायेगा।
