40 साल के सैन्य अनुशासन और सच्ची रामभक्ति का अनोखा संगम, पूर्व एयर मार्शल और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के हीरो ‘जितेंद्र मिश्र’ बने श्री राम मंदिर के पहले CEO

500 सालों के उस लंबे संघर्ष के बाद जब अयोध्या में हमारे रामलला अपने भव्य महल में विराजमान हुए, तो पूरे सनातन समाज की आंखों में खुशी के आंसू थे।

हमने मंदिर तो बना लिया, लेकिन वक्त के साथ ये समझ आने लगा था की इतने विशाल मंदिर और करोड़ों रामभक्तों की असीम आस्था को अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलाया जा सकता। इसे एक ‘प्रोफेशनल और हाई-टेक’ सिस्टम की ज़रूरत थी।

और उसी को लेकर आज 2 सितंबर 2026 का दिन अयोध्या के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अपने इतिहास में पहली बार एक ‘चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर’ (CEO) की नियुक्ति की है।

और ये कुर्सी किसी आम बाबू, सफेदपोश नेता या टाई पहनने वाले कॉर्पोरेट मैनेजर को नहीं मिली है। ये कमान सौंपी गई है भारतीय वायुसेना के उस जांबाज अफसर को, जिसने 40 सालों तक आसमान से दुश्मनों पर राज किया है।

नाम नोट कर लीजिए- रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र (Jeetendra Mishra)। आज से रामलला के दरबार के रक्षक और प्रशासक यही होंगे!

ज़रा सोचिए, एक सैनिक जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी मिलिट्री के कड़े अनुशासन में बिताई हो, जब वो भगवान राम के दरबार का राजकाज संभालेगा, तो वहां का माहौल कैसा होगा!

ट्रस्ट का यह फैसला बता रहा है की अब राम मंदिर में कोई भी लूपहोल (Loophole) बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

श्री राम मंदिर के दानपात्र का वो विवाद जिसकी वजह से पढ़ गयी एक मंदिर में CEO की जरुरत

आखिर राम मंदिर में अचानक एक CEO की ज़रूरत क्यों पड़ गई? चलिए, थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं।

मई-जून 2026 के वो दिन याद हैं आपको? जब अचानक खबर आई की राम मंदिर के दानपात्र में कुछ हेराफेरी हुई है। करोड़ों रामभक्तों की भेंट में कथित तौर पर ‘चढ़ावा चोरी घोटाला’ सामने आया था।

जैसे ही ये खबर मीडिया में आई, तो आपको याद होगा की कैसे वो राम-विरोधी गैंग एकदम सियार की तरह रंगा-बिल्ला बनकर उछलने लगे थे।

जो लोग राम के अस्तित्व को ही नकारते थे, वे अचानक दान के पैसों का हिसाब मांगने लगे। वे सोशल मीडिया पर हिंदू आस्था का मज़ाक उड़ा रहे थे।

लेकिन मामला गंभीर था। यूपी पुलिस की SIT (Special Investigation Team) ने जांच शुरू की। कुछ गिरफ्तारियां हुईं और सिस्टम में बैठे कुछ लोगों की पोल खुली।

इस भारी दबाव के बीच, जिम्मेदारी लेते हुए ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय (Champat Rai) जी और ट्रस्टी अनिल मिश्रा को अपने पदों से इस्तीफा तक देना पड़ा। ये बहुत बड़ा झटका था।

लेकिन खैर, जो होता है अच्छे के लिए ही होता है। ट्रस्ट ने इस घटना पर पर्दा डालने के बजाय इसे सिस्टम को साफ करने का एक मौका बना लिया।

रामभक्तों का भरोसा वापस जीतने और करोड़ों के चढ़ावे को 100% पारदर्शी बनाने के लिए ट्रस्ट ने तय किया की अब ये काम कोई बाबा या नेता नहीं, बल्कि एक एकदम प्रोफेशनल और बेदाग ‘CEO’ करेगा।

आसमान में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र के हाथों में आई रामलला के खजाने की चाबी

अब बात करते हैं उस शेर की, जिसे रामलला के खजाने और प्रशासन की चाबी सौंपी गई है। जब ट्रस्ट ने कहा कि हमें CEO चाहिए, तो उन्हें कोई ऐसा-वैसा आदमी नहीं चाहिए था।

शर्त बहुत कड़ी थी- बंदा ‘सच्चा रामभक्त’ और ‘वैष्णव हिंदू’ होना चाहिए, और साथ ही उसके पास 20 साल का तगड़ा प्रशासनिक अनुभव होना चाहिए।

इसी के चलते एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र का नाम फाइनल हुआ। इनकी प्रोफाइल सुनेंगे तो आपका सीना गर्व से 56 इंच का हो जाएगा।

ये कोई किताबी ज्ञान वाले मैनेजर नहीं हैं। इन्होंने पूरे 40 साल भारतीय वायुसेना (IAF) में रहकर देश की सरहदों की हिफाज़त की है।

आपको ‘ऑपरेशन सिंदूर’ याद है? जी हां, एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र उसी खतरनाक ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के असली हीरो हैं।

वेस्टर्न एयर कमांड के चीफ के तौर पर उन्होंने जिस आक्रामकता और सटीक रणनीति के साथ उस ऑपरेशन को लीड किया था, उसकी मिसालें आज भी सेना में दी जाती हैं।

आसमान से दुश्मनों के बेस कैंप तबाह करने वाला वो दिमाग अब अयोध्या के सिस्टम को दुरुस्त करेगा।

जितेंद्र मिश्र सिर्फ एक कड़क फौजी ही नहीं हैं, बल्कि नियम-धर्म का पालन करने वाले एक कट्टर रामभक्त भी हैं। उनके 40 साल के बेदाग मिलिट्री करियर में उन पर कभी किसी भ्रष्टाचार का एक छोटा सा दाग तक नहीं लगा।

एक तरफ वो फौजी अनुशासन जो पलक झपकते ही दुश्मनों का काम तमाम कर दे, और दूसरी तरफ भगवान राम के चरणों में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाली अटूट आस्था!

सच्ची रामभक्ति और मिलिट्री बैकग्राउंड का ऐसा डेडली कॉम्बिनेशन आपको पूरी दुनिया में कहीं और नहीं मिलेगा।

5585 आवेदनों की छंटनी और AI का महामंथन जिसने ढूंढ निकाला रामलला के दरबार का सबसे योग्य प्रशासक

अब ज़रा इस बात पर गौर करिए की एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र का इस कुर्सी तक पहुंचना कोई आम बात नहीं थी। जब ट्रस्ट ने CEO पद के लिए विज्ञापन निकाला, तो पूरे देश से दिग्गजों की लाइन लग गई।

आंकड़ा सुनेंगे तो आपका दिमाग चकरा जाएगा! पूरे भारत से कुल 5,585 लोगों ने इस पद के लिए अप्लाई किया था।

और ये कोई एरे-गैरे लोग नहीं थे। इनमें बड़े-बड़े रिटायर्ड आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS), सेना के जनरल और कई मल्टीनेशनल कंपनियों के कॉर्पोरेट लीडर्स शामिल थे।

इतने सारे लोगों में से सिर्फ एक को चुनना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था।

ट्रस्ट ने इन 5500 से ज़्यादा फॉर्म्स की माथापच्ची करने के लिए सीधे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीक का ब्रह्मास्त्र निकाल लिया।

बाकायदा 600 नंबर का एक ‘गूगल फॉर्म’ सिस्टम तैयार किया गया। एआई (AI) की मदद से अयोग्य आवेदनों को बाहर किया गया और कड़े पैरामीटर्स पर लोगों को परखा गया।

छंटनी के बाद जो 16-18 धाकड़ नाम बचे, उनका इंटरव्यू लेने के लिए जो कमेटी बैठी थी, उसका भौकाल तो और भी भयंकर था। ये इंटरव्यू किसी आम नेता ने नहीं लिया।

3 सदस्यों की एक ऐसी हाई-प्रोफाइल कमेटी बनाई गई थी जिसके सामने झूठ बोलने की किसी की हिम्मत ही ना हो।

इस कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज प्रमोद कोहली, सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल विष्णु कांत चतुर्वेदी और देश के जाने-माने न्यूक्लियर साइंटिस्ट सुरेश हावरे शामिल थे।

ज़रा सोचिए! कानून का सबसे बड़ा जानकार, सेना का जनरल और एक न्यूक्लियर साइंटिस्ट… जब इन तीनों ने मिलकर इस एलीट लिस्ट का इंटरव्यू लिया होगा, तो वो लेवल क्या रहा होगा!

इसी महामंथन से अमृत की तरह जो एक नाम निकल कर सामने आया, वो था एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र। और आज उनके नाम पर ट्रस्ट ने फाइनल मुहर लगा दी है।

एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र जैसे देश के सच्चे सपूत को यह ज़िम्मेदारी देकर ट्रस्ट ने करोड़ों हिंदुओं का भरोसा फिर से जीत लिया है।

जय श्री राम!

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