इस्तीफे के दूसरे दिन विपक्ष ने वाक्य काट दिया। आईएएस दिव्या मित्तल को मजबूर किया गया। ईमानदार अधिकारी को निकाला गया। 2023 का नल, 2023 का तबादला, 2026 का पत्र: एक ही साजिश।
फाइल इतनी साफ नहीं।
30 अगस्त 2023 को लहुरिया दाह में जल पूजन हुआ। 1 सितंबर को तबादला हुआ। 4 सितंबर को प्रतीक्षा सूची और टूटी पाइप। 30 अगस्त 2026 को उन्होंने खुद लिखा: स्वैच्छिक, परिवार, आईएएस एक अध्याय। कांग्रेस और सपा ने दबाव पढ़ा। उन्होंने न पुष्टि की, न खंडन।
यह लेख उस दबाव को नकारता नहीं। उसे नापता है। मजबूर शब्द आसान है। जिले का समय कठिन है।
अधिकारी के सिर पर काँपता हाथ
मिर्जापुर की एक पहाड़ी पर एक बुजुर्ग महिला पहली बार नल का पानी देखती है।वह भाषण नहीं देती। किसी योजना का शुक्रिया नहीं अदा करती। कैमरा नहीं खोजती। काँपते हाथ उठाती है, जिलाधिकारी के सिर पर रखती है, और आशीर्वाद देती है।
दिव्या मित्तल लहुरिया दाह से यही छवि लेकर निकलीं। पाइपलाइन नहीं। पंप हाउस नहीं। वह फाइल नहीं जिसे इंजीनियर कभी–कभी असंभव के करीब लिख देते थे। एक मौन आशीर्वाद। एक ऐसी महिला का, जिसने पानी के पहाड़ चढ़ने का इंतजार गणतंत्र से भी लंबा किया था।
इस छवि को थोड़ी देर थामे रहिए।
अब 30 अगस्त 2026 पर जाइए। वही अधिकारी एक नोट जारी करती हैं। तेरह वर्ष बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा से स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया है। उम्र बयालीस वर्ष। दो बेटियाँ हैं। अभी–अभी उस परीक्षा की तैयारी पर एक किताब छपी है, जिस परीक्षा ने उन्हें कभी इस जीवन में लाया था। लिखती हैं कि उन्होंने सोचा था वे कुछ देने आई हैं। लिखती हैं कि यह सोचकर वे मूर्ख थीं। लिखती हैं कि कर्ज और गहराता गया।
आशीर्वाद और विदाई के बीच तीन वर्ष हैं। यह एक ही बदले की कहानी नहीं है। इन्हें एक ही साजिश में मत बाँधिए। ये दोनों दृश्य साथ इसलिए बैठते हैं क्योंकि अधिकारी ने खुद इन्हें एक ही विदाई–नोट में रखा। जैसे पहाड़ी और इस्तीफा एक ही खाते के दो स्तंभ हों।
जीवनी शुरू होने से पहले पाठक को यही दूरी महसूस होनी चाहिए।

लंदन में वेतन था। गाँव में सवाल था।
लहुरिया दाह से पहले दिव्या मित्तल की कहानी एक और दूरी की कहानी है। पहाड़ी और नल के बीच की दूरी नहीं। देश और करियर के बीच की दूरी। जिस अधिकारी ने बाद में लिखा कि उन्होंने सोचा था वे कुछ देने आई हैं, वह पहले वह इंसान थीं जिसे बाहर सब कुछ मिल चुका लगता था।
गाँव का सवाल मिर्जापुर में पैदा नहीं हुआ। वह लंदन में पैदा हुआ। तब वह सवाल किसी फाइल का नहीं था। एक बेचैनी था। एक अधूरापन था जिसे तनख्वाह नहीं भरती थी।

आईआईटी, आईआईएम, फिर लंदन वाला घेरा
दिव्या मित्तल का जन्म 23 नवंबर 1983 को हुआ। दिल्ली की साधारण परिस्थितियों में पली–बढ़ीं। परिवार की जड़ें हरियाणा के रेवाड़ी से भी जुड़ी हैं। साधारण घर का मतलब यह नहीं कि महत्वाकांक्षा साधारण थी। भारतीय मध्य वर्ग की सबसे परिचित सीढ़ी उन्होंने चढ़ी: परीक्षा, परिसर, फिर दुनिया।
आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग फिजिक्स पढ़ीं। 2001 से 2005 तक। विभाग में आगे रहीं। फिर आईआईएम बैंगलोर से एमबीए किया। 2005 से 2007 तक। वहाँ भी मेरिट की पंक्ति में जगह बनी। ये दोनों नाम भारत में अब भी एक पूरा वाक्य होते हैं। परिवार को बताने के लिए और स्पष्टीकरण की जरूरत नहीं पड़ती। लड़की पहुँच गई।
उसके बाद का रास्ता वही था जिसे भारतीय परिसर आज भी सफलता कहते हैं। लंदन। जेपी मॉर्गन। अप्रैल 2007 से जुलाई 2008 तक असोसिएट। काम जटिल डेरिवेटिव्स का था। बड़ी रकम के पोर्टफोलियो। बचाव और जोखिम का गणित। ऐसी तनख्वाह जिससे साधारण बचपन बंद अध्याय लगने लगे। ऐसी शहर की रोशनी जिससे दिल्ली की संकरी शुरुआत दूर की स्मृति लगे।
कागज पर कहानी पूरी थी। विदेशी करियर। आर्थिक राहत। वैश्विक नागरिक वाला जीवन। कई सहपाठी यहीं रुक जाते हैं। रुकना गलत भी नहीं होता। जो मिला है, वह आसानी से नहीं मिलता।मित्तल बाद में खुद लिखती हैं कि “सब कुछ” पा लेने पर भी कुछ अधूरा रहा। देश से दूर रहना बेचैन करता था। शिक्षा, आत्मविश्वास, दुनिया में सिर उठाकर चलने की क्षमता: इन सबको उन्होंने इस मिट्टी का कर्ज कहा। कर्ज चुकाना था। चाहते थीं कि उन ईंटों पर उनके हाथ के निशान हों, जिनसे वह भारत बनेगा जिसे उन्होंने छोड़ा था।
यह वाक्य बाद के विदाई–नोट का है। लेकिन सवाल उसी समय का है जब लंदन में वेतन समय पर आता था और मन समय पर नहीं बैठता था। गाँव तब कोई खास गाँव नहीं था। गाँव एक दिशा थी। एक सवाल था कि हाथ के निशान कहाँ लगेंगे: किसी बैंक की शीट पर, या किसी ऐसी जगह पर जहाँ फाइल के पीछे इंसान खड़ा हो।
वे लौटीं।
दूसरी बार परीक्षा इसलिए दी
वापसी रोमांटिक तस्वीर नहीं थी। सिविल सेवा की तैयारी श्रम है। कोचिंग की भीड़ है। पाठ्यक्रम का पहाड़ है। उन्होंने बाद में कहा कि औपचारिक कोचिंग के बिना तैयारी की। पहला प्रयास 2012 में हुआ। परीक्षा चली। भारतीय पुलिस सेवा के लिए चयन हुआ।कई परिवार यहीं राहत महसूस करते। आईपीएस भी सेवा है। वर्दी है। सम्मान है। राज्य की ताकत का एक सिरा है। मित्तल के लिए वह सिरा काफी नहीं था। लक्ष्य प्रशासनिक सेवा थी। फाइल, जिला, विकास, और उस जगह पर खड़ा होना जहाँ योजना कागज से निकलकर कुएँ और टैंकर तक जाती है। पुलिस सेवा उन्होंने इसलिए नहीं ठुकराई कि वह छोटी थी। इसलिए ठुकराई कि वह वह कुर्सी नहीं थी जिसके लिए वे लौटी थीं।
2013 में फिर बैठीं। अखिल भारतीय रैंक 68 आई। 2 सितंबर 2013 को उत्तर प्रदेश कैडर में आईएएस जॉइन किया। उत्तर प्रदेश संयोग नहीं लगता। देश का सबसे बड़ा प्रशासनिक मैदान। सबसे अधिक फाइलें। सबसे अधिक दबाव। सबसे अधिक गाँव। जो अधिकारी यहाँ मैदान सीख ले, वह राज्य की असली भाषा सीख लेता है।
लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी में प्रशिक्षण चला। वहाँ उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अशोक बंबावाले पुरस्कार मिला। पुरस्कार का मतलब सिर्फ प्रमाण पत्र नहीं होता। प्रशिक्षण के उन दो वर्षों में अधिकारी यह भी सीखती है कि राज्य उसे क्या बनाना चाहता है, और वह राज्य को क्या जवाब देना चाहती है। मित्तल उस कक्षा में आगे रहीं।
विवाह गगनदीप सिंह से हुआ, जो पूर्व नौकरशाह हैं। दोनों आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बैंगलोर के पूर्व छात्र रहे। दो बेटियाँ हैं। घर और सेवा साथ चलते रहे। बाद में जब 2026 में इस्तीफे की व्याख्या परिवार और प्राथमिकताओं से की गई, तो यह विवरण अचानक नहीं लगता। दो बेटियाँ, दो करियर, और एक राज्य जो अधिकारी से पूरा समय माँगता है: यह समीकरण सालों तक चल सकता है। हमेशा नहीं चलता।
जून 2026 में उन्होंने यूपीएससी तैयारी की पुस्तक द क्राफ्टेड जीनियस प्रकाशित की। प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार, तीनों चरणों का व्यावहारिक नक्शा। पहली पीढ़ी के ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए एक मुफ्त मोबाइल ऐप भी बनाया। ये काम इस्तीफे के बाद की सजावट नहीं हैं। कुर्सी रहते हुए भी वे वही काम करती रहीं जो लंदन वाले सवाल का दूसरा रूप था: परीक्षा उन लोगों को सिखाना जो उसकी भाषा में बड़े नहीं हुए। जिनके घर में आईएएस कोई रिश्तेदार नहीं, कोई नक्शा नहीं, केवल एक अफवाह है कि मेहनत से कुर्सी मिलती है।
लंदन का वेतन एक उत्तर था। गाँव का सवाल यह था कि ज्ञान किसके काम आएगा।
बरेली और संत कबीर नगर के शांत वर्ष
शुरुआती वर्ष सिनेमाई नहीं थे। एक युवा अधिकारी का सामान्य श्रम था। यह सीखना कि राज्य असल में कैसे चलता है। भाषण से नहीं। दौरे से नहीं। उन फाइलों से जो समय पर नहीं चलतीं, उन कर्मचारियों से जो थके होते हैं, उन शिकायतों से जो बार–बार उसी पन्ने पर लौटती हैं।
सीतापुर के सिधौली में उपखंड मजिस्ट्रेट रहीं। फिर मेरठ में। उपखंड वह जगह है जहाँ राज्य का चेहरा सबसे पास आता है। जमीन का विवाद। राशन की शिकायत। थाने और तहसील के बीच की दरार। यहीं पता चलता है कि आदेश लिखना और आदेश पहुँचाना दो अलग काम हैं।
बीच में नीति आयोग में सहायक सचिव का छोटा कार्यकाल रहा। दिल्ली की वह इमारत जहाँ योजनाएँ बड़े नक्शे पर बनती हैं। वहाँ नागरिक–केंद्रित निगरानी पर विचार रखे। प्रधानमंत्री के सामने प्रस्तुति का मौका भी मिला। केंद्र की भाषा और जिले की भाषा में फर्क यहीं दिखता है। केंद्र संकेतक माँगता है। जिला सुबह की कतार माँगता है।
गोंडा में मुख्य विकास अधिकारी रहीं। कानपुर में उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम की संयुक्त प्रबंध निदेशक। उद्योग, भूमि, निवेश, फाइलें जो गाँव से दूर लगती हैं लेकिन रोजगार के सपने से जुड़ी होती हैं। यह करियर का मध्य भाग है। लोग इसे बायोडाटा में पढ़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। अधिकारी यहीं हाथ गर्म करती है।
2019 से 2020 तक बरेली विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष रहीं। करीब उन्नीस महीने। प्राधिकरण तब घाटे में चल रहा था। पंजाब नेशनल बैंक का करीब 32 करोड़ रुपये का संस्थागत ऋण सिर पर था। ब्याज पर ब्याज। वेतन निकालने के लिए और कर्ज। रामगंगा नगर जैसी आवासीय योजना में कब्जों का जाल। 2002 की भूमि अधिग्रहण वाली एक पुरानी गाँठ, जिसमें किसानों का मुआवजा अटका हुआ बताया गया।
मित्तल के कार्यकाल में ऋण चुकाया गया। संस्था को डिफॉल्ट से बचाया गया। बाद में प्राधिकरण ने लाभ की बात भी की। ऐसा काम शायद ही ट्रेंड करता है। कोई नल नहीं खुलता। कोई पहाड़ी नहीं चढ़ती। बैलेंस–शीट संभलती है। अवैध निर्माण पर कार्रवाई होती है। कोरोना के महीनों में समन्वय चलता है। यही काम बताता है कि अधिकारी भीड़ के साथ बैठ सकती है या नहीं, और आँकड़ों के साथ भी। लंदन का डेरिवेटिव वाला दिमाग यहीं काम आया होगा: जोखिम देखना, घाटा नापना, संस्था को डूबने से पहले खींचना।
फिर जिला आया। सितंबर 2020 से सितंबर 2022 तक संत कबीर नगर की जिलाधिकारी रहीं। पूर्वी उत्तर प्रदेश का छोटा जिला। अयोध्या मंडल। कम सुर्खियाँ। ज्यादा रोजमर्रा। दो वर्ष का यह कार्यकाल उनके सार्वजनिक चेहरे का शांत हिस्सा है। बाद में जिले के लोग कार्यकाल याद करते दिखे। दूरदराज की जनसुनवाई, योजनाओं को सीधे बताना, सोशल मीडिया पर फरियाद का जवाब: शैली यहीं पकड़ में आने लगी। अभी वह शैली विवाद नहीं बनी थी। अभी वह काम करने का तरीका थी।
संत कबीर नगर ने उन्हें जिला सिखाया। मिर्जापुर ने उन्हें दृश्य बनाया।
सितंबर 2022 में मिर्जापुर का कार्यभार संभाला। विंध्याचल की छाया। पर्यटन और खदान। सूखे की पुरानी स्मृति। हलिया की पहाड़ियाँ। एक वर्ष बाद जब वे जिले से निकलीं, तो सड़क पर फूल थे और लखनऊ में कुर्सी नहीं थी।
लेकिन वह अंत अभी दूर था। उससे पहले एक गाँव था जिसे टैंकर से पहचाना जाता था, और एक अधिकारी थी जिसके पास लंदन का वेतन नहीं रह गया था, केवल वह सवाल रह गया था जिसके लिए वे लौटी थीं।
जहाँ पानी टैंकर से आता था, बेटियाँ शादी से नहीं आती थीं
मिर्जापुर मुख्यालय से करीब उनचास किलोमीटर। मध्य प्रदेश की सीमा के पास। हलिया ब्लॉक की पथरीली पहाड़ी। फाइलों और अखबारों में नाम कई तरह से लिखा गया: लहुरिया देह, लहुरियादह, लहुरिया दाह। इस वाक्य के बाद इसे लहुरिया दाह ही कहिए।
गाँव देवहर पंचायत की हद में आता है। आबादी की खबरें 1,200 से 2,000 के बीच चलती हैं। कोल, धरकार, यादव, पाल, केशरवानी। मिश्रित बस्ती। आखिर में करीब 125 घरों तक नल पहुँचा। उससे पहले गाँव की पहचान नल से नहीं थी। टैंकर से थी।
जमीन अर्ध–शुष्क है। मैदान से उठी हुई है। ऊँचाई की एक रिपोर्ट करीब 450 मीटर की बात करती है। काम का भूजल लगभग नहीं। कुआँ है तो कमजोर। झरना या छोटा जलाशय गर्मी में बैठ जाता है। बरसात में थोड़ी राहत। बाकी साल राज्य एक ट्रक बनकर आता है।
आजादी के करीब पचहत्तर वर्षों तक भरोसेमंद पाइप वाला पीने का पानी नहीं था। यह वाक्य दोहराने लायक इसलिए है क्योंकि भारत में नल अब सामान्य लगने लगा है। कई गाँवों में हर घर जल का बोर्ड लग चुका है। लहुरिया दाह उस सामान्य से बाहर था। पहाड़ ने उसे योजना के नक्शे से काट रखा था।
असफल पुरानी फाइल
प्रधान कौशलेंद्र गुप्ता ने बाद में कहा कि गाँव का सालाना बजट पानी पर चला जाता था। पच्चीस–तीस वर्षों से टैंकर ही मुख्य सहारा थे। इससे पहले करीब 4.87 करोड़ रुपये की एक परियोजना चली। काम बीच में रुक गया। नियोजन टूटा। पाइप अधूरी रह गई। पैसा लग गया। पानी नहीं आया।
यह भारत की परिचित त्रासदी है। योजना की घोषणा हो जाती है। निधि निकल आती है। ठेका चल पड़ता है। फिर भूगोल सामने आता है। चट्टान। लिफ्ट। बिजली। रखरखाव। फाइल बंद हो जाती है। अगला अधिकारी पुरानी असफलता को चेतावनी मान लेता है। गाँव इंतजार करता रहता है।
जल जीवन मिशन के सामान्य नक्शे में गाँव को पहले जगह भी नहीं मिली थी। मिशन का वादा हर ग्रामीण घर तक नल का है। पहाड़ी बस्ती उस वादे की सहज इकाई नहीं लगती। इंजीनियर लिफ्ट और भूगोल को लगभग असंभव मानते थे। असंभव यहाँ कविता नहीं थी। लागत का तर्क था। पानी नीचे है। घर ऊपर हैं। बीच में सोलह किलोमीटर और पत्थर है। गुरुत्वाकर्षण दुश्मन है। डीजल दोस्त है, महंगा दोस्त।
गाँव कनेक्शन की पानी यात्रा ने 2022 में इसी टैंकर–गाँव को दर्ज किया था। रिपोर्ट ने प्रशासन का ध्यान खींचा। मित्तल सितंबर 2022 में जिलाधिकारी बनीं। दौरा हुआ। कुआँ ठीक कराने की शुरुआत हुई। फिर बड़ी फाइल खुली।
लेकिन बड़ी फाइल से पहले रोज का जीवन छोटा और कठोर था।
बाल्टी के लिए आधार
पानी का राशन चलता था। अक्सर प्रति व्यक्ति पंद्रह से तीस लीटर। पीना, पकाना, नहाना, कपड़ा धोना: सब उसी माप में। टैंकर आने पर कतार लगती थी। वितरण पर झगड़े होते थे। गर्मी में झगड़े तेज हो जाते थे। गाँव का दिन टैंकर के समय से बँटता था।
आधार कार्ड से टैंकर का पानी जारी होता था। इस वाक्य को एक बार और पढ़िए। पहचान पत्र वह औजार बन गया था जिससे राज्य यह तय करता था कि किसे कितना पानी मिलेगा। डिजिटल भारत का एक उलटा चेहरा। जहाँ आधार घर का दरवाजा खोलता है, वहाँ उसने बाल्टी का हक बाँटा।
महिलाएँ और बच्चे दूर स्रोत तक जाते थे। झरना करीब एक किलोमीटर भी हो सकता था। गर्मी में वह भी सूख जाता। कपड़े, बर्तन, मवेशी: सबके लिए अलग हिसाब। पशुओं को नल का पानी हमेशा नहीं दिया जा सकता। इसलिए बाद में कृत्रिम तालाब और वर्षा जल संग्रह की बात भी उठी। पहले तो इंसान ही तरसता था।
छिहत्तर वर्षीय अंजरिया यादव बाद में राजमार्ग किनारे बेटे की चाय की दुकान पर बैठी बताती हैं कि नल से बहता पानी उन्होंने पहली बार देखा। उनके जैसे कई लोगों के लिए पानी कोई सुविधा नहीं था। मौसम था। भाग्य था। लड़ाई थी।
मित्तल ने बाद में लिखा कि पहली बार गाँव गईं तो अपनी बोतल से पानी पीने का मन नहीं हुआ। सामने वे लोग थे जिनके पास वही बोतल भी निश्चित नहीं थी। अधिकारी की बोतल एक छोटी शर्म बन गई। शर्म कभी–कभी फाइल खोलती है।
पहाड़ी ने साधारण योजनाओं को क्यों हराया
साधारण योजना समतल गाँव के लिए बनती है। नलकूप गाड़ो। टंकी खड़ी करो। पाइप बिछाओ। गुरुत्वाकर्षण मदद करे तो और अच्छा। लहुरिया दाह में गुरुत्वाकर्षण उलटा काम करता है। पानी को चढ़ाना है, गिराना नहीं।भूजल नहीं के बराबर। इसलिए स्थानीय कुआँ समाधान नहीं, केवल राहत है। सतही जल दूर है। अदवा बांध से लाना है। बीच में पंप हाउस चाहिए। बिजली चाहिए। बिजली न रहे तो डीजल चाहिए। एयर वाल्व चाहिए। हर जोड़ एक जोखिम है। पहाड़ की चट्टान खुदाई को महंगा बनाती है। रखरखाव को नाजुक बनाती है।
इसीलिए पुरानी परियोजना अधूरी रह गई। इसीलिए मिशन के सामान्य खाके में गाँव फिट नहीं बैठा। इसीलिए इंजीनियरों की भाषा में शब्द आता रहा: असंभव।
पानी की कमी केवल प्यास नहीं पैदा करती। सामाजिक सजा पैदा करती है। परिवार इस गाँव में बेटियाँ ब्याहने से हिचकते थे। जो गाँव पानी का वादा नहीं कर सकता, वह बहू के जीवन का वादा भी नहीं कर सकता। आसपास की लड़कियाँ पहाड़ी देखकर मना कर देती थीं। रिश्ता टूटता था पानी पर। यह वाक्य आँकड़े से भारी है। नल न होना शादी का नक्शा बदल देता है। गाँव युवा नहीं रह पाता। घर अधूरे रह जाते हैं।
गर्मी पहाड़ी को राशन कार्ड बना देती थी। आदमी नहीं, लीटर गिने जाते थे। बच्चे स्कूल से पहले बाल्टी देखते थे। औरतें दिन का बड़ा हिस्सा पानी में खो देती थीं। प्रधान का पत्र सांसद और मंत्री तक गया, बाद की रिपोर्टों के अनुसार। वादे आए। पानी नहीं आया।
सितंबर 2022 के बाद मित्तल गाँव गईं। उन्होंने “असंभव” वाली फाइल ठुकरा दी।
यहीं कहानी मुड़ती है। जिलाधिकारी बंद फाइल मानकर तकनीकी रूप से सही रह सकती है। पुरानी असफलता ढाल बन सकती है। वह फाइल फिर खोल भी सकती है। तब उस चढ़ाई की जिम्मेदारी भी उसी की हो जाती है, जो सार्वजनिक रूप से असफल हो सकती है। लागत बढ़ेगी। समय लगेगा। यदि पानी न आए तो आलोचना उसी के नाम पर लगेगी। यदि आए, तो श्रेय किसका होगा: यह प्रश्न अभी दूर था। पहले पहाड़ चढ़ना था।
सोलह किलोमीटर ऊपर
समतल गाँव में पानी अक्सर खुद बहकर आता है। नलकूप गाड़ो, टंकी भरें, ढलान से छोड़ दें। लहुरिया दाह उलटा मामला था। पानी नीचे था। घर ऊपर थे। गुरुत्वाकर्षण दुश्मन था।
मित्तल ने फाइल अकेले नहीं खोली। जल निगम, जल जीवन मिशन और हर घर जल के अधिकारी आए। नमामि गंगे के कर्मी आए। मुख्य विकास अधिकारी आए। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भूभौतिकविद आए। टीम ने पथरीली सतह देखी। पुरानी परियोजना ने जो अधूरा छोड़ा था, उसका कुछ ढाँचा बचा। उसी पर नया लिफ्ट डिजाइन बैठा।
लिफ्ट यहाँ कविता नहीं है। मशीन है। पानी को गिराना नहीं, चढ़ाना है। बाल्टी की तरह, बस पंप से, और सोलह किलोमीटर तक।
पानी की सीढ़ी
स्रोत गाँव का कुआँ नहीं था। सतही जल था। जल निगम के पंप ऑपरेटर नमन सिंह ने रास्ता साफ बताया।
अदवा बांध से पानी लिया गया। वह गलरा पंप हाउस पहुँचा। फिर ड्रमंडगंज पंप हाउस पहुँचा। वहाँ से लिफ्ट मशीनें उसे करीब सोलह किलोमीटर ऊपर धकेलती हैं। लहुरिया दाह और पड़ोसी भैंसोड़ बलाई उसी लाइन से जुड़े।यह एक छलांग नहीं, सीढ़ी है। सोचिए मंजिलों वाली इमारत। लिफ्ट एक बार में छत तक नहीं जाती। मंजिल दर मंजिल चढ़ती है। गलरा पहली मंजिल है। ड्रमंडगंज दूसरी। हर पंप थके पानी को फिर पकड़ता है और थोड़ा और ऊँचा भेजता है। पहाड़ी पर एक ही पंप अक्सर काफी नहीं पड़ता। दबाव बीच में टूट जाता है। इसलिए स्टेज बनते हैं।
पंप पानी पर दबाव डालता है। पाइप बंद नली है। दबाव पानी को ढलान के खिलाफ धकेलता है। जितनी ऊँचाई और दूरी ज्यादा, उतना दबाव चाहिए। उतनी ऊर्जा चाहिए। यहाँ ऊर्जा दो रूपों में आई: बिजली, जब ग्रिड चला; डीजल, जब बिजली बैठी। पहाड़ी लाइन बिजली के बिना जीवित नहीं रहती। पाइप अकेली योजना नहीं है। पंप का दिल चलना चाहिए।
लंबी चढ़ाई वाली पाइप में हवा फँसती है। ऊँचे मोड़ पर हवा का गोला प्रवाह रोक सकता है, जैसे नली में फँसी हवा बाल्टी नहीं भरने देती। एयर वाल्व उसी हवा का दरवाजा है। वही बिंदु कमजोर भी होता है। बाद में पाइप इसी एयर वाल्व के पास टूटी। संवेदनशील जोड़ वही होता है जहाँ रखरखाव वाला आदमी खड़ा होता है, या तोड़ने वाला औजार लगाता है।
लागत की खबरें 8 करोड़ से 10 करोड़ रुपये से ऊपर तक थीं। एक अधिकारी ने बाद में करीब 10.8 करोड़ की बात कही। मित्तल के समय स्वीकृति की एक चर्चा 8 करोड़ की भी रही। आँकड़े रिपोर्ट के अनुसार बदलते हैं। भौतिकी नहीं बदलती। पानी को बार–बार उठाना था। पत्थर और ऊँचाई के खिलाफ।
केवल नल काफी नहीं माना गया। गाँव का एकमात्र कुआँ वर्षा जल संग्रह के लिए जोड़ा गया। जानवरों के लिए कृत्रिम तालाब बना, क्योंकि नल का पानी हमेशा पशुओं को नहीं दिया जा सकता। पीने का इंतजाम अलग। मवेशी का इंतजाम अलग। पूरा गाँव एक टोंटी पर नहीं टिकाया गया।
काम अप्रैल–मई 2023 के आसपास तेजी से चला। करीब नौ महीने बाद 29-30 अगस्त 2023 के आसपास घरों तक पाइप का पानी पहुँचा। लिफ्ट पंपों का प्रबंधन जल जीवन मिशन के नीचे रखा गया। कागज पर मालिक मिल गया। मैदान में मालिक वही रहता है जो रोज पंप हाउस का दरवाजा खोलता है।
असंभव सिर्फ एक राय है
मित्तल ने बाद में लिखा कि मिर्जापुर ने उन्हें सिखाया कि “असंभव” तथ्य नहीं, राय है। पंक्ति पोस्टर जैसी लगती है। उस पहाड़ी पर यह कार्य आदेश था।
इंजीनियरों की पुरानी राय लागत की राय थी। पानी नीचे है। घर ऊपर हैं। बीच में चट्टान है। डीजल महंगा दोस्त है। पुरानी 4.87 करोड़ की फाइल उसी राय पर बंद हुई। नई टीम ने राय बदली, भूगोल नहीं। भूगोल वही रहा। डिजाइन बदला। स्टेज बने। पुराना अधूरा ढाँचा काम आया। अलग प्रस्ताव सरकार को गया। मंजूरी आई।
लिफ्ट और डीजल वाली लाइन स्मारक नहीं होती। मशीन होती है, जिसे मालिक चाहिए। पंप बैठते हैं। बिजली जाती है। डीजल खत्म होता है। एयर वाल्व टूटता है। परियोजना की सफलता सच थी। उसकी नाजुकता भी सच थी। दोनों एक साथ सत्य हो सकते हैं।
नौ महीने की चढ़ाई का मतलब यह नहीं कि पानी हमेशा ऊपर रहेगा। मतलब केवल इतना है कि एक बार चढ़ाया जा सकता है। ऊपर रखना रोज का काम है। वह काम अभी शुरू भी नहीं हुआ था जब समारोह लग गया।
30 अगस्त 2023 को उन्होंने छोटा जल पूजन कराया और खुद बहता नल खोला।
असंभव सिर्फ एक राय है
मित्तल ने बाद में लिखा कि मिर्जापुर ने उन्हें सिखाया कि “असंभव” तथ्य नहीं, राय है। पंक्ति पोस्टर जैसी लगती है। उस पहाड़ी पर यह कार्य आदेश था।
लिफ्ट और डीजल वाली लाइन स्मारक नहीं होती। मशीन होती है, जिसे मालिक चाहिए। पंप बैठते हैं। बिजली जाती है। डीजल खत्म होता है। लंबी चढ़ाई वाली पाइप पर एयर वाल्व एक कमजोर बिंदु है, जिसे औजार वाला कोई भी खोज सकता है। परियोजना की सफलता सच थी। उसकी नाजुकता भी सच थी। दोनों एक साथ सत्य हो सकते हैं।
30 अगस्त 2023 को उन्होंने छोटा जल पूजन कराया और खुद बहता नल खोला।
नल उन्होंने खुद खोला
उन्होंने लिखा कि आज हृदय भरा हुआ है। लहुरिया दाह में पानी बह रहा है, और लोगों की आँखों से भी। आजादी के पचहत्तर वर्षों बाद भी गाँव के लोगों के पास पानी नहीं था। पहली बार जब वे वहाँ गईं, तो उन लोगों के सामने अपनी बोतल से पानी पीने का मन नहीं हुआ जिनके पास कुछ नहीं था।
वह पोस्ट उस दिन का सार्वजनिक रिकॉर्ड है। वही दस्तावेज बाद में प्रोटोकॉल की शिकायत बना।
समारोह छोटा था। पूजा उन्होंने की। नल उन्होंने खोला। ग्रामीणों ने घर के पास वह पानी देखा जो कभी था ही नहीं। तब छिहत्तर वर्षीय अंजरिया यादव ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि गाँव में नल से पानी बहता उन्होंने पहली बार देखा। औरों की तरह उन्होंने योजना का नहीं, अधिकारी का नाम लिया।
फ्लैगशिप योजनाओं में यह नामकरण राजनीतिक रूप से महंगा पड़ता है। हर घर जल प्रधानमंत्री का मिशन है और मुख्यमंत्री की डिलीवरी का दावा। जिलाधिकारी का काम लागू करना है। मंच, स्थानीय संस्कृति के पाठ में, उन लोगों का है जो चुनाव लड़ते हैं।
दो दिन बाद फाइल चली।
चार तारीखें जो चुप नहीं बैठतीं
- 30 अगस्त 2023: पहाड़ी तक पानी पहुँचा, जल पूजन हुआ।
- 1 सितंबर 2023: जिलाधिकारी का तबादला हुआ।
- 4 सितंबर 2023: प्रतीक्षा सूची में डाली गईं; ऊपर जाती पाइपलाइन एयर वाल्व के पास टूटी।
- 30 अगस्त 2026: आईएएस से स्वैच्छिक इस्तीफे की घोषणा।
आभार से पहले प्रोटोकॉल आ गया
1 सितंबर 2023 को उनका तबादला हो गया।
स्थानीय भाजपा नेता विपुल सिंह, जो तब पार्टी के जिला उपाध्यक्ष थे, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा। द इंडियन एक्सप्रेस को दिया गया उनका सार्वजनिक तर्क सीधा था। योजना लागू करना जिलाधिकारी का काम है। उद्घाटन सरकार और जनप्रतिनिधियों का है।
उन्होंने कहा, “लहुरिया गाँव में सालों से पानी की समस्या है, टैंकर लगाने पड़ते हैं। हर घर जल योजना के तहत प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की योजना से गाँव तक पानी पहुँचा। योजना लागू करवाना और गाँवों तक पानी पहुँचाना जिलाधिकारी की जिम्मेदारी है। लेकिन उद्घाटन सरकार की ओर से किसी को करना चाहिए। यही प्रोटोकॉल है, संस्कृति भी है। स्थानीय विधायक, सांसद और अन्य लोगों को आमंत्रित नहीं किया गया। अगर ऐसा होता है तो बुरा लगता है।”
उस शिकायत में “संस्कृति” शब्द को धीरे पढ़िए। इसका मतलब उस पहाड़ी गाँव की संस्कृति नहीं था जहाँ आधार कार्ड पर पानी बँटता था। इसका मतलब यह था कि कैमरा और भीड़ आने पर नल के पास कौन खड़ा होगा। फ्लैगशिप योजना में श्रेय फुटनोट नहीं होता। मंच का मतलब ही श्रेय होता है।
अलग रिपोर्टिंग में, दप्रिंट ने सरकारी सूत्रों का हवाला देते हुए लिखा कि मिर्जापुर में उनका अपना दल (सोनेलाल) की सांसद और तत्कालीन राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल से मतभेद रहा, और पटेल के पति, उत्तर प्रदेश मंत्री आशीष पटेल से भी। सूत्रों ने कहा कि पूजा में पटेल को आमंत्रित नहीं किया गया। यह सरकारी सूत्रों पर आधारित समकालीन रिपोर्टिंग है। अदालती निष्कर्ष नहीं है। इसे उसी रूप में पढ़िए।
तबादले के लिए आरोप पत्र की जरूरत नहीं पड़ी। कोई दायर भी नहीं हुआ। भारतीय जिले में तबादला ऐसा औजार है जो फैसले के बिना चलता है। यह नियमित भी हो सकता है। सजा भी हो सकता है। बाहर से दोनों अक्सर एक जैसे दिखते हैं। अधिकारी बस हटा दी जाती है।
उस शिकायत में संस्कृति का मतलब
संसदीय व्यवस्था में प्रोटोकॉल छोटी बात नहीं है। जनप्रतिनिधि सरकारी काम में मेहमान नहीं होते। संविधान मतदाता और फाइल के बीच उन्हें ही रखता है। जो जिलाधिकारी स्थानीय विधायक और सांसद के बिना नल खोलती है, उस पर हमेशा यह आरोप लग सकता है कि उसने वह राजनीतिक उपहार ले लिया जो उसका नहीं था।
सिक्के का दूसरा पहलू भी सत्य है। पचहत्तर वर्ष प्रतीक्षा करने वाला गाँव नल को प्रोटोकॉल का आयोजन नहीं मानता। वह उसे पानी मानता है। जब दोनों पाठ टकराते हैं, आमतौर पर फाइल जीतती है। इस बार फाइल दो दिन में जीत गई।
सड़क पर पंखुड़ियाँ, लखनऊ में कुर्सी नहीं
मिर्जापुर के लोगों ने भावुक विदाई दी। फूलों की वर्षा हुई। रोती अधिकारी का वीडियो दूर तक चला। उन्होंने कहा कि जिले में जो स्नेह मिला, उसे शब्दों में कहा नहीं जा सकता। तबादले पर जो आँसू गिरे, हर आँसू के साथ उनका आँसू भी रहेगा।
4 सितंबर 2023 से वे प्रतीक्षा सूची में थीं। उत्तर प्रदेश की प्रतीक्षा सूची एक ऐसा कमरा है जिसमें जनता को दिखने वाली कुर्सी नहीं होती। अधिकारी सेवा में रहती है। वेतन मिलता है। जिला नहीं होता। जनसुनवाई नहीं होती। किसी जगह की अपनी फाइल नहीं होती। नया आदेश आने तक बैठी रहती है।
मित्तल 4 सितंबर 2023 से 1 फरवरी 2024 तक बैठी रहीं। करीब पाँच महीने। फिर उत्तर प्रदेश ग्रामीण सड़क विकास एजेंसी की मुख्य कार्य अधिकारी बनीं। जुलाई 2024 में देवरिया की जिलाधिकारी बनीं। मई 2026 में लखनऊ राजस्व विभाग में विशेष सचिव बनाई गईं।
करियर 2023 में खत्म नहीं हुआ। यह बात जरूरी है। जो 2026 के इस्तीफे को 2023 के तबादले का सिद्ध बदला बता दे, वह रिकॉर्ड से ज्यादा साफ कहानी लिख रहा है। उन्होंने तीन और वर्ष सेवा की। एक और जिला चलाया। सचिवालय गईं। किताब छापी। तब गईं।
छह दिन का पानी
4 सितंबर 2023 के आसपास, उद्घाटन के कुछ दिन बाद और प्रतीक्षा सूची वाले उसी सप्ताह, लंबी चढ़ाई वाली लाइन पर एयर वाल्व के पास पाइपलाइन तोड़ दी गई। समकालीन रिपोर्टों ने तोड़ने वालों को “असामाजिक तत्व” कहा। गाँव कनेक्शन ने ग्रामीणों की बात दर्ज की कि कुछ ही दिनों में वे फिर टैंकर पर लौट आए।
तब सैंतालीस वर्षीय हीरालाल यादव ने कहा, “कुछ गुंडों ने पाइप तोड़ दी और हम फिर टैंकर के पानी पर आ गए। बहुत दुख होता है। जैसे नल से पानी मिलने की खुशी बहुत छोटी रह गई।”
तब चौंतीस वर्षीय राम कृष्ण यादव ने कहा, “जिस डीएम ने सप्लाई का उद्घाटन किया था, उन्हें हटा दिया गया। उन्हें हमारी जद्दोजहद पता थी। अब क्या होगा पता नहीं। गाँव में लोग चिंतित हैं। डर है कि फिर टैंकर पर ही जीना पड़ेगा।”
तब पैंतालीस वर्षीय श्याम काली ने कहा कि काश मित्तल फिर डीएम बनकर लौट आएँ। “जैसे ही वे जिले से गईं, हमारा पानी बंद हो गया।”
अधिकारियों ने कहा कि पाइप ठीक कर दी गई, लेकिन बिजली, डीजल और लिफ्ट की दिक्कतों से पूरी शुरुआत देर से हुई। नमामि गंगे से जुड़े अतिरिक्त जिलाधिकारी ने व्यवधान स्वीकार किया। गाँव की ऊँचाई, भूजल की कमी और दूर के सतही जल पर निर्भरता का जिक्र किया। प्रधान कौशलेंद्र गुप्ता ने अगली जिलाधिकारी को पत्र लिखकर सप्लाई फिर शुरू करने की माँग की। उन्होंने कहा कि सोलह किलोमीटर की लाइन काटी गई, फिर ठीक हुई, लेकिन पानी अभी नहीं लौटा।यह दावा कि कट राजनीतिक प्रभाव में कराया गया, आरोप है, सिद्ध निष्कर्ष नहीं। किसी सार्वजनिक जाँच ने अदालत में नामित दोषी साबित नहीं किया। दर्ज तथ्य काफी है, और किसी साजिश से ज्यादा ठंडा है: नौ महीने की परियोजना उसी सप्ताह नाजुक पड़ गई जिस सप्ताह उसे मालिक समझने वाली अधिकारी हटा दी गई।
डीएम के जाने के बाद पाइपलाइन का मालिक कौन?
पहाड़ी पर पाइप से पानी रिबन नहीं होता। गुरुत्वाकर्षण से रोज का तर्क होता है। किसी को डीजल पहुँचाना होता है। पंप हाउस अंधेरा हो तो किसी को फोन उठाना होता है। एयर वाल्व को सार्वजनिक संपत्ति मानना होता है, निजी निशाना नहीं।
जब वह कोई हाल ही में तबादला हुई जिलाधिकारी हो, मालिकाना पतला पड़ जाता है। अगले अधिकारी के पास सौ और फाइलें होती हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधि लाइन को अपना सकते हैं, या नहीं भी। गाँव के पास छह दिन चला नल रह जाता है, और एक अधिकारी की याद जो निकलते समय रोई थी।
बाद की रिपोर्टिंग, 2024 में और फिर 2026 में जब इस्तीफे के बाद पत्रकार पहाड़ी पर लौटे, यह संकेत देती है कि घरों तक नल पहुँचे और ग्रामीण काम को अब भी उनका ही बताते रहे। सितंबर 2023 के बाद लाइन बिना टूटे चली या नहीं, यह अलग तकनीकी प्रश्न है। पहले सप्ताह ने सरल बात साबित की। मालिक न हो तो लिफ्ट लाइन जल्दी मर जाती है।
एक अध्याय, पूरी जिंदगी नहीं
फिर देवरिया आया। इस्तीफे के नोट में उन्होंने लिखा कि देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा रहना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। माँ विंध्यवासिनी के आशीर्वाद और लोगों के भरोसे का श्रेय दिया। लिखा कि नौकरी की असली शांति उस परिवार की आँखों में दिखी जिसे पहली बार जमीन का हक मिला, उस दिव्यांग व्यक्ति में जिसे गरिमा मिली, और उस किसान में जिसके खेत तक पानी पहुँचा।
30 अगस्त 2026 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
नोट को धीरे पढ़िए क्योंकि यह आरोप पत्र नहीं है, घोषणा पत्र भी नहीं है। लिखा कि सोचा था कुछ देने आई हैं। खुद को मूर्ख कहा इस सोच के लिए। कहा कि सबसे अधिक पाया, और कर्ज और बढ़ा। हर सरकारी फाइल के पीछे एक इंसान होता है। उसकी गरिमा बचाना ही न्याय है।
उसी नोट में वे फिर पहाड़ी पर लौटीं।
लहुरिया दाह की बुजुर्ग माँ ने कुछ नहीं कहा। काँपते हाथों से सिर छुआ। पद छूट सकता है। वह स्पर्श नहीं छूटेगा।
बाद में साक्षात्कारों में कहा कि निर्णय सोच–समझकर और निजी था। परिवार, प्राथमिकताएँ और अन्य रुचियाँ कारण थीं। कोई एक अचानक झटका नहीं। कहा कि आईएएस जिंदगी का एक अध्याय है, पूरी जिंदगी नहीं। भविष्य पर तब बोलेंगी जब समय आएगा। राजनीतिक प्रवेश की अटकलें घंटों में चल पड़ीं। उन्होंने पुष्टि भी नहीं की, खंडन भी नहीं किया। एक भाजपा स्वर ने दावा किया कि उनकी मुलाकात राहुल गांधी से हुई है और वे चुनाव लड़ेंगी। यह दावा उन्होंने प्रमाणित नहीं किया। जब तक वे खुद न बोलें, इसे शोर मानिए।
कांग्रेस ने इस्तीफे को गंभीर बताया। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को पत्र लिखा। ईमानदार अधिकारियों पर दबाव की बात कही। 2017 के बाद कई आईएएस अधिकारियों के इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का जिक्र किया। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मौके का उपयोग भाजपा सरकार पर तबादलों, टेंडरों, कमीशन और अधिकारियों पर दबाव का हमला करने में किया। उन्होंने राज्य की प्रशासनिक संस्कृति के खिलाफ लंबी सूची रखी। ये बयान रिकॉर्ड में रहने चाहिए। लेख पर हावी नहीं होने चाहिए। अधिकारी का जाना विपक्ष के पूरे मामले का स्वत: प्रमाण नहीं बन जाता। सरकार की चुप्पी भी यह प्रमाण नहीं कि कुछ गलत नहीं था।
सितंबर 2026 की शुरुआत तक इस्तीफे को राज्य सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय वाले औपचारिक रास्ते से गुजरना बाकी था। एक्स पर विदाई लिखना फाइल बंद होना नहीं है।
नल के पास खड़ा होने का हक किसका?
यह मामला सिर्फ एक अधिकारी का नहीं है। यह इस बारे में है कि भारतीय राज्य श्रेय, तबादला और सार्वजनिक वस्तु का मालिकाना कैसे बाँटता है।
फ्लैगशिप योजनाओं के भीतर श्रेय की राजनीति
जल जीवन मिशन और हर घर जल दिखने के लिए बने हैं। जिस गाँव में नल कभी नहीं था, वहाँ का नल वह तस्वीर है जिसे केंद्र और राज्य दोनों चाहते हैं। जो जिलाधिकारी चढ़ाई संभव कराए, वह समस्या बन जाती है यदि चेहरा भी वही बन जाए। लागू करना उसका काम है। उद्घाटन, स्थानीय राजनीतिक पाठ में, उसका काम नहीं। विपुल सिंह ने यह बात खोलकर कही। ज्यादातर व्यवस्थाएँ इसे केवल सोचती हैं।
जब अधिकारी जल पूजन करती है, वह सिर्फ पानी पर प्रार्थना नहीं कर रही होती। वह उस जगह खड़ी होती है जहाँ विधायक और सांसद खड़े होना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश में यह अपेक्षा छोटी शिष्टाचार नहीं है। पार्टियाँ इसी से केंद्रीय योजना को स्थानीय आभार में बदलती हैं।
तबादला ऐसा औजार जिसे आरोप पत्र नहीं चाहिए
दो दिन बाद का तबादला कदाचार का निष्कर्ष नहीं माँगता। केवल आदेश माँगता है। यही उसकी शक्ति है, यही खतरा। अधिकारी सबक जल्दी सीख लेते हैं। काम करो। तस्वीर मत अपनी करो। गाँव में उन लोगों से अधिक प्रिय मत बनो जो वहाँ वोट माँगेंगे।उसके बाद की प्रतीक्षा सूची ज्यादा शांत थी, और कुछ अर्थों में ज्यादा शिक्षा देने वाली। पाँच महीने बिना कुर्सी के बैठना सार्वजनिक डाँट से अलग नागरिकशास्त्र सिखाता है। आईआईटी–आईआईएम अधिकारी को बताता है कि सार्वजनिक भलाई के बाद खाली डायरी भी आ सकती है।
मालिक न हो तो लिफ्ट–डीजल लाइन क्यों मर जाती है
लहुरिया दाह रखरखाव की राजनीति का अध्ययन है। इंजीनियरिंग कठिन थी। पंपों को जीवित रखने की राजनीति शायद और कठिन है। जो लाइन डीजल और लिफ्ट पर टिकी हो, वह विदाई वीडियो पर नहीं जीती। उसे बजट चाहिए, ड्यूटी रोस्टर चाहिए, और ऐसा स्थानीय नेता चाहिए जो पानी का दावा करे, न कि लाने वाले को सजा दे।
सार्वजनिक भलाई के बाद प्रतीक्षा सूची आने पर आईआईटी–आईआईएम अधिकारी क्या सीखते हैं
मित्तल की पीढ़ी को अक्सर नई सिविल सेवा कहा जाता है: निजी क्षेत्र की चमक, बेहतर डिग्री, सोशल मीडिया, मापने योग्य डिलीवरी का स्वाद। पहाड़ी ने इसी शैली को पुरस्कृत किया। प्रोटोकॉल की शिकायत ने उसी दृश्यता को दंडित किया जो उसके साथ आई।
सबक यह नहीं कि प्रतिभाशाली अधिकारी पहाड़ चढ़ना बंद कर दें। सबक यह है कि भारतीय जिला अब भी दो घड़ियों पर चलता है। एक घड़ी नापती है कि पानी पहुँचा या नहीं। दूसरी नापती है कि पहुँचने पर किसे बुलाया गया। इस मामले में दूसरी घड़ी तेज चली।
क्या सिद्ध है / क्या आरोप है / उन्होंने खुद क्या कहा
सिद्ध: अदवा बांध से नई लिफ्ट व्यवस्था के बाद 29-30 अगस्त 2023 के आसपास लहुरिया दाह तक पाइप का पानी पहुँचा। 30 अगस्त को मित्तल ने जल पूजन कराया और नल खोला। 1 सितंबर को तबादला हुआ। 4 सितंबर 2023 से प्रतीक्षा सूची में रहीं। उसी सप्ताह एयर वाल्व के पास पाइपलाइन टूटी। ग्रामीणों ने टैंकर की वापसी बताई। बाद में ग्रामीण सड़क एजेंसी की सीईओ, देवरिया डीएम और राजस्व विभाग में विशेष सचिव रहीं। 30 अगस्त 2026 को स्वैच्छिक इस्तीफे की घोषणा की।
आरोप: तबादला इसलिए सजा था कि स्थानीय सांसद, विधायक और मंत्रियों को आमंत्रित नहीं किया गया। अनुप्रिया पटेल और आशीष पटेल से मतभेद ने तबादला कराया। पाइप कट राजनीतिक प्रभाव में हुआ। 2026 का इस्तीफा जबरदस्ती था, या 2023 की देर से आई कीमत था, या विपक्ष से चुनाव लड़ने की तैयारी था। इनमें से कोई बात अदालती निष्कर्ष नहीं है।
उन्होंने खुद कहा: इस्तीफा स्वैच्छिक, सोचा–समझा और निजी था। परिवार और अन्य रुचियाँ मायने रखती थीं। आईएएस एक अध्याय है, पूरी जिंदगी नहीं। मिर्जापुर ने सिखाया कि असंभव एक राय है। देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा रहना कर्तव्य है। बुजुर्ग महिला का स्पर्श पद से लंबा रहेगा। भविष्य पर तब बोलेंगी जब समय आएगा।एयर वाल्व पंप हाउस की सजावट नहीं है। वह पाइप को साँस लेने देता है। बिना उसके लिफ्ट लाइन दम घोंट सकती है, या फट सकती है।
पानी के साथ हवा क्यों घुसती है
पंप जब चालू होता है, नली पहले पूरी भरी नहीं होती। अंदर हवा रहती है। पंप बंद हो तो पानी पीछे सरकता है, ऊँचे मोड़ पर खाली जेब बनती है। लीक से भी हवा घुसती है।
हवा पानी से हल्की है। चढ़ाई वाली पाइप में वह ऊपर जाकर इकट्ठा हो जाती है। वहाँ एक गोला बनता है। पानी को रास्ता नहीं मिलता। नली में फँसी हवा जैसी बात, जिससे बाल्टी नहीं भरती।
पहाड़ी लाइन में यह गोला और खतरनाक है। 16 किलोमीटर ऊपर जाते पानी को हर मोड़ पर हवा का झटका लग सकता है।
वाल्व तीन काम करता है
ग्रामीण पेयजल और लिफ्ट योजनाओं में एयर वाल्व आमतौर पर डबल एक्टिंग होता है। तीन काम एक पिटारी में।
- हवा निकालना, जब पंप चालू हो
लाइन भर रही हो तो बड़ी हवा बाहर निकलती है। वाल्व का बड़ा मुँह खुलता है। पानी पहुँचे तो फ्लोट उठता है, मुँह बंद होता है। पानी बाहर नहीं गिरता, हवा निकल चुकी होती है।
- छोटी–छोटी जेबें निकालना, जब लाइन चल रही हो
चलते प्रवाह में भी हवा घुलती रहती है। छोटे छेद से धीरे निकलती है। नहीं निकली तो दबाव अस्थिर होता है। नल काँपता है। पंप को ज्यादा मेहनत पड़ती है।
- हवा अंदर लेना, जब पंप रुके
पंप बंद होते ही पानी नीचे दौड़ सकता है। पाइप में खालीपन बनता है। बाहर का दबाव पाइप को पिचकाने लगता है। वाल्व तब हवा अंदर खींचता है। पाइप को कुचलने से बचाता है।
तीसरा काम कम लोग जानते हैं। लोग सोचते हैं वाल्व सिर्फ हवा बाहर फेंकता है। वह हवा अंदर भी लेता है। पंप हाउस की सुरक्षा का एक सिरा यही है।
पंप हाउस में कहाँ बैठता है
पंप हाउस के कमरे में मोटर के बगल में हमेशा नहीं होता। जगह ऊँचाई तय करती है।
- पंप के आउटलेट के पास: स्टार्ट पर फँसी हवा तुरंत निकले
- राइजिंग मेन के ऊँचे मोड़ों पर: चढ़ाई के शिखर जहाँ हवा इकट्ठा होती है
- लाइन के लंबे अंतराल पर: ताकि कोई खंड बंद न हो
लहुरिया दाह की खबरों में टूटन एयर वाल्व के पास बताई गई। यानी वाल्व पंप हाउस के गेट के अंदर ही हो, जरूरी नहीं। वह 16 किलोमीटर वाली चढ़ाई के किसी ऊँचे बिंदु पर था। वहीं रखरखाव वाला आदमी पहुँचता है। वहीं औजार लगाना आसान है।
नहीं हो तो क्या होता है
हवा न निकली तो:
- पानी रुकता है, नल सूखता है, पंप चलता रहता है
- मोटर गर्म होती है, क्योंकि वह दबाव बना रही होती है लेकिन प्रवाह नहीं
- अचानक हवा निकले तो पानी का हथौड़ा लगता है। अंग्रेजी में वाटर हैमर। पाइप को झटका, जोड़ ढीले, कभी फटन
हवा अंदर न आई तो:
- पंप बंद होते ही पाइप पिचक सकती है
- नॉन–रिटर्न वाल्व और मोटर पर उलटा बोझ पड़ता है
इसलिए एयर वाल्व सस्ता हिस्सा है, सस्ता नहीं माना जाना चाहिए। पूरी लिफ्ट लाइन का फेफड़ा है।
सितंबर 2023 वाला पाठ
4 सितंबर 2023 को लाइन एयर वाल्व के पास टूटी। रिपोर्टों ने तोड़ने वालों को असामाजिक तत्व कहा। सिद्ध षड्यंत्र नहीं। सिद्ध यह है कि नाजुक बिंदु वही था जहाँ हवा का दरवाजा लगा था।
पंप हाउस का दिल मोटर है। पाइप का फेफड़ा एयर वाल्व है। दिल चले और फेफड़ा बंद हो, पानी पहाड़ पर नहीं टिकता। लहुरिया दाह में छह दिन बाद यही हुआ। पंप की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई थी। हवा के दरवाजे की कहानी शुरू हुई।
दिव्या मित्तल इसलिए चर्चा में हैं कि उनकी कहानी केवल एक आईएएस के इस्तीफे की नहीं है। वह भारतीय जिले के तीन सवालों को एक साथ खोलती है: काम कौन करता है, श्रेय किसका होता है, और सार्वजनिक वस्तु का मालिक कौन रह जाता है।
वह कौन हैं, संक्षेप में
2013 बैच, उत्तर प्रदेश कैडर। आईआईटी दिल्ली, आईआईएम बैंगलोर, लंदन में जेपी मॉर्गन। 2012 में आईपीएस बनीं, 2013 में फिर परीक्षा देकर आईएएस। मिर्जापुर डीएम (2022-23), फिर प्रतीक्षा सूची, ग्रामीण सड़क एजेंसी, देवरिया डीएम, राजस्व विभाग में विशेष सचिव। 30 अगस्त 2026 को तेरह वर्ष बाद स्वैच्छिक इस्तीफे की घोषणा।
महत्व बायोडाटा से नहीं आता। मिर्जापुर के एक पहाड़ी गाँव से आता है।
क्यों मायने रखती हैं
डिलिवरी का चेहरा
लहुरिया दाह में आजादी के करीब 75 वर्ष बाद पाइप का पानी पहुँचा। टैंकर, आधार पर राशन, ब्याह में हिचक: यही रोजमर्रा थी। नौ महीने में अदवा बांध से गलरा और ड्रमंडगंज होते हुए करीब 16 किलोमीटर की लिफ्ट बनी। इंजीनियरिंग “असंभव” कह चुकी थी। पानी आया। करीब 125 घर जुड़े। लोग योजना का नहीं, डीएम का नाम लेने लगे।
श्रेय की राजनीति
30 अगस्त 2023 को जल पूजन, नल उन्होंने खुद खोला। 1 सितंबर को तबादला। स्थानीय भाजपा नेता विपुल सिंह का तर्क था: लागू करना डीएम का काम, उद्घाटन सरकार और जनप्रतिनिधियों का। विधायक–सांसद नहीं बुलाए गए, यह “प्रोटोकॉल और संस्कृति” टूटी। दप्रिंट के सरकारी सूत्र अनुप्रिया पटेल खेमे से मतभेद भी बताते हैं। सिद्ध अदालती सजा नहीं। सिद्ध समय है: पानी के दो दिन बाद अधिकारी हटीं।
फ्लैगशिप योजना में नल तस्वीर है। जो अधिकारी तस्वीर में आ जाए, वह व्यवस्था को असहज कर देता है। मित्तल की प्रासंगिकता यही तनाव है।
तबादला बिना आरोप पत्र
भारतीय जिले में तबादला फैसले के बिना चलता है। पाँच महीने प्रतीक्षा सूची। कोई चार्जशीट नहीं। पाठ अधिकारियों के लिए साफ है: काम करो, तस्वीर मत अपनी करो। आईआईटी–आईआईएम वाली नई पीढ़ी के लिए यह विशेष रूप से तीखा सबक है। मापने योग्य डिलिवरी का स्वाद और मंच का अनुशासन एक साथ नहीं चलते।
रखरखाव की सच्चाई
उसी सप्ताह पाइप एयर वाल्व के पास टूटी। गाँव फिर टैंकर पर। राजनीतिक आदेश सिद्ध नहीं। सिद्ध यह है कि लिफ्ट–डीजल लाइन मालिक के बिना जल्दी मरती है। मित्तल की कहानी केवल “अच्छी अधिकारी गई” नहीं। यह है कि सार्वजनिक वस्तु उद्घाटन से नहीं, रोज के पंप से जीती है।
इस्तीफा, सबूत नहीं नारा
2026 का जाना 2023 का सिद्ध बदला नहीं। बीच में देवरिया और सचिवालय भी है। उन्होंने खुद कहा: स्वैच्छिक, परिवार और प्राथमिकताएँ, आईएएस एक अध्याय। कांग्रेस और सपा ने दबाव और ईमानदार अधिकारियों का मुद्दा बनाया। अटकलें राजनीतिक प्रवेश तक गईं। उन्होंने न पुष्टि की, न खंडन। महत्व यह है कि व्यवस्था इस्तीफे को तुरंत अपनी कहानी बना लेती है। अधिकारी की भाषा अलग रही: फाइल के पीछे इंसान, पहाड़ी महिला का स्पर्श, पद से बड़ा ऋण।
क्या नहीं बनाना चाहिए
उन्हें न तो सिद्ध पीड़ित संत बनाइए, न बागी नायक। प्रोटोकॉल की शिकायत संसदीय व्यवस्था में बेबुनियाद भी नहीं है। जनप्रतिनिधि मंच चाहते हैं, यह लोकतंत्र का हिस्सा है। उलटा पाठ भी सच है: पचहत्तर वर्ष से प्यासा गाँव नल को मंच नहीं, पानी मानता है।
उनकी असली सिग्निफिकेंस इसी टकराव में है। राज्य दो घड़ियों पर चलता है। एक नापती है पानी पहुँचा या नहीं। दूसरी नापती है नल के पास कौन खड़ा था। दूसरी घड़ी तेज चली। पहली घड़ी का काम, लिफ्ट लाइन, मालिक के जाते ही काँपा।
एक वाक्य में: दिव्या मित्तल उस बिंदु की कहानी हैं जहाँ क्षेत्र की डिलिवरी, चुनावी श्रेय और रखरखाव की राजनीति एक नल पर मिलती हैं।
मिर्जापुर की जल–समस्या एक योजना की असफलता नहीं है। दो भूगोल, एक मिशन, और रखरखाव की कमजोरी का योग है। नल लग जाना और पानी आना यहाँ एक ही बात नहीं रहे।
दो जिले एक नाम में
उत्तर में गंगा का मैदान है। दक्षिण और दक्षिण–पूर्व में विंध्य पठार, कगार, चट्टान, पतली मिट्टी। क्षेत्रफल करीब 4,521 वर्ग किलोमीटर। जलवायु अर्ध–शुष्क। बारिश लगभग 1,100 मिमी, उसका करीब 90 प्रतिशत मानसून में। जिला सूखा–प्रवण सूची में भी है, और गंगा किनारे बाढ़ भी खाता है।
इसी फाँक से सारी अवसंरचना फटती है।
मैदानी पट्टी में जलभृत बेहतर हैं, नलकूप चलते हैं, गुरुत्वाकर्षण वाली योजना बन सकती है। पहाड़ी पट्टी में भूजल दरारों और अपक्षयित चट्टान की कृपा पर है। हैंडपंप गर्मी में बैठते हैं। पाइप को चढ़ाना पड़ता है। डीजल और बिजली योजना का हिस्सा बन जाते हैं, ऐड–ऑन नहीं। हलिया, मड़िहान, पहाड़ी, राजगढ़, पटेहरा, सीखड़ यही दूसरा मिर्जापुर हैं। लहुरिया दाह उसका तीखा उदाहरण था, अपवाद नहीं।
भूजल क्षमता के एक अध्ययन में जिले का करीब 5 प्रतिशत क्षेत्र कमजोर जोन में आया, करीब 30 प्रतिशत मध्यम। अच्छी क्षमता मैदान में सिमटी है। पहाड़ी गाँव उसी नक्शे के किनारे रहते हैं।
आधिकारिक आकलन (2021-22 आधार) के अनुसार वार्षिक निकासी योग्य भूजल करीब 55,342 हेक्टेयर–मीटर, निकासी करीब 34,820। कई ब्लॉक सुरक्षित दिखते हैं, कुछ अर्ध–संकट और संकट में हैं, एक अति–दोहित भी दर्ज है। औसत जिला “सुरक्षित” लग सकता है। ब्लॉक और गाँव का अनुभव अलग होता है। पठार पर रिचार्ज कम, अपवाह तेज, खनन और ब्लास्टिंग से दरारें बिगड़ती हैं।
चट्टान, खदान, और बर्बाद जलभृत
मिर्जापुर का बलुआ पत्थर (चुनार पत्थर) अर्थव्यवस्था है और जल का शत्रु भी। खदानें अक्सर जलभृत चीर देती हैं। निकलता पानी पंप करके फेंक दिया जाता है, ताकि पत्थर निकले। आसपास के कुएँ और बोरवेल सूखते हैं। मड़िहान और पadari क्षेत्र की रिपोर्टों में यही शिकायत है: ब्लास्टिंग से घरों में दरार, हैंडपंप सूखे, गर्मी में टैंकर। कुछ गाँवों में 60-70 फुट के बोर गर्मियों से पहले बैठ जाते हैं, लोग 300 फुट तक जाते हैं। यह पेयजल योजना का डिजाइन दोष नहीं। यह भूमि–उपयोग का दोष है। जितना जल निगम पाइप बिछाए, खदान अगर जलभृत खाली कर दे तो स्रोत ही मर जाता है। पहाड़ी गाँव तब बाध्य होते हैं दूर के बांध या सतही जल पर: अदवा, अह्रौरा, जरगो, ऊपरी खजुरी। स्रोत लंबा हुआ कि लिफ्ट, बिजली और रखरखाव तीनों महंगे हो गए।
बाढ़ और प्यास साथ–साथ
अगस्त 2025 में गंगा चुनार–सदर में खतरे के पार गई। सैकड़ों गाँव डूबे। उसी जिले को सूखा–प्रवण कहा जाता है। बारिश घटी हो, फिर भी बाढ़ आती है क्योंकि पठार नंगा है, खदानें अपवाह बढ़ाती हैं, बांध अचानक छोड़ते हैं, नालियाँ जाम हैं।
परिणाम उलटा लगता है, तर्क सीधा है। मानसून का पानी रुकता नहीं, जमीन में जाता नहीं। गर्मी में कुआँ खाली। बरसात में घर में पानी। पेयजल अवसंरचना दोनों मौसम में हारती है: बाढ़ पंप हाउस और बिजली काटती है, गर्मी स्रोत सुखाती है।
मिशन का आँकड़ा, मैदान का नल
2022 में जिले में पाइप कनेक्शन 10 प्रतिशत से नीचे थे। अब जल जीवन मिशन के डैशबोर्ड पर घरेलू नल कनेक्शन 98 प्रतिशत के आसपास बताए गए। लागत की चर्चा करीब 1,953 करोड़ रुपये की रही। ओवरहेड टैंक और पाइपलाइन के भौतिक लक्ष्य लगभग पूरे दिखते हैं।
फिर भी 2026 की गर्मी में स्थानीय अखबार लिख रहे थे: 274 ओवरहेड टैंकों में करीब 30 प्रतिशत बिजली न होने से शोपीस; एक लाख से अधिक परिवार प्रभावित; 150 से ज्यादा गाँव टैंकर पर; झींगुरा जैसे गाँवों में नल छह महीने सूखे; हलिया के मजरों और मुसहर बस्तियों तक पाइप नहीं पहुँची।
फर्क समझिए। कनेक्शन लोहे की टोटी है। कार्यात्मक आपूर्ति रोज का पानी है। मिर्जापुर में पहला आँकड़ा चमकता है, दूसरा बिजली, डीजल, फिल्टर प्लांट और ऑपरेटर पर टिका है। मुख्य फिल्टर प्लांट की लाइन कटी कि कई ब्लॉक एक साथ सूखे।
पहाड़ी योजना और कठिन है। गुरुत्वाकर्षण मदद नहीं करता। अदवा–गलरा–ड्रमंडगंज वाली सीढ़ी चाहिए। पंप रुका, एयर वाल्व टूटा, नल खत्म। लहुरिया दाह ने 2023 में यही छह दिन में दिखा दिया। 2025-26 की रिपोर्टों में भैंसोड़ बलाई जैसी बस्तियों में फिर अनियमित आपूर्ति की शिकायत रही।
पानी आने पर भी बीमारी
पाइप लगने के बाद भी डायरिया के मामले गाँवों से आते रहे। एक विश्लेषण में 2023 में 123 और 2024 में 192 मरीज सरकारी आँकड़ों में दर्ज हुए। पुराने अध्ययन जिले के ट्यूबवेलों में आर्सेनिक की बात करते रहे। मिशन ने फ्लोराइड प्रभावित 47 गाँव चिह्नित किए, अधिकांश को पाइप योजना से ढकने का दावा है।
यहाँ चुनौती मात्रा के बाद गुणवत्ता की है। सतही जल का उपचार, पाइप में रिसाव, सूखी लाइन में गंदगी का खिंचाव, अनियमित क्लोरीनीकरण। टोटी लगना पेयजल सुरक्षा नहीं है। जाँच, लैब और निरंतर प्रवाह चाहिए। सूखा नल सैनिटरी खतरा भी है: दबाव न हो तो दूषित पानी अंदर आ सकता है।
सामाजिक नक्शा अवसंरचना का नक्शा है
मुख्य राजस्व गाँव तक पाइप आ जाती है। मजरा, पहाड़ की ढलान, मुसहर–हरिजन बस्ती छूट जाती है। हलिया की 2026 रिपोर्टें यही कहती हैं: दस घर, पंद्रह घर, स्कूल के पास की बस्ती। टैंकर का ठेका घाटे में बताया गया: खर्च करीब 600 रुपये, भुगतान 385। वैकल्पिक व्यवस्था भी टिकती नहीं।
पुरानी सामाजिक सजा बनी रहती है। पानी न हो तो रिश्ता न हो। लहुरिया दाह की वह शिकायत जिले की पहाड़ी संस्कृति का हिस्सा रही, एक गाँव की कथा नहीं।
असल बाधाएँ, एक सूची में
- भूगोल: विंध्य की चट्टान, कम रिचार्ज, ऊँचाई पर शून्य स्थानीय स्रोत।
- दोहरी आपदा: बाढ़ और सूखा एक ही कैलेंडर में।
- खनन: जलभृत का पंप–आउट, धूल, बोर का मरना।
- ऊर्जा: ओवरहेड टैंक और लिफ्ट पंप बिजली के बिना लोहे के स्तंभ हैं।
- ओ एंड एम: ठेकेदार बिछाकर निकलता है। पंचायत और जल निगम के बीच मालिक धुंधला।
- गुणवत्ता: आर्सेनिक–फ्लोराइड का इतिहास, सतही जल पर निर्भरता, अनियमित उपचार।
- समानता: मजरा और कमजोर बस्तियाँ मुख्य योजना के किनारे।
- राजनीति: उद्घाटन का मंच तेज, रखरखाव की कुर्सी धीमी। लहुरिया दाह का तबादला इसी जिले की प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा था।
क्या काम आता है
नया नल समतल गाँव का उत्तर है, पहाड़ी का नहीं। यहाँ चाहिए:
- स्रोत का संरक्षण: खदानों से जलभृत की लूट बंद, रिचार्ज और तालाब
- ऊर्जा की रीढ़: सोलर पंप जहाँ ग्रिड काँपे, डीजल केवल बैकअप
- लिफ्ट लाइन का मालिक: ऑपरेटर, एयर वाल्व, सर्ज सुरक्षा, रोज का लॉग
- कार्यक्षमता का माप: कनेक्शन नहीं, महीने के घंटे पानी
- अंतिम बस्ती तक शाखा लाइन
- बाढ़ वाले मैदान में पंप हाउस की ऊँचाई और निकासी
मिर्जापुर की चुनौती यह नहीं कि राज्य ने पाइप नहीं बिछाई। चुनौती यह है कि चट्टान, खदान, बिजली और रखरखाव ने पाइप को मौसमी सजावट बना दिया। लहुरिया दाह ने चढ़ाई सिखाई। 2026 की गर्मी ने याद दिलाया कि चढ़ाया हुआ पानी रोज की बिजली के बिना पहाड़ पर नहीं ठहरता।
वह सपना जिसे उन्होंने इस्तीफा नहीं देने दिया
बुजुर्ग महिला के पास लौटिए।
इस कहानी में वही एक तथ्य है जिसे प्रोटोकॉल की जरूरत नहीं। उसने नहीं पूछा कि मंच पर कौन होना चाहिए था। लखनऊ को पत्र नहीं लिखा। पानी देखा और सामने खड़े व्यक्ति को आशीर्वाद दिया।
क्या अधिकारी के स्मृति बन जाने के बाद लहुरिया दाह ने पानी रखा? पहले सप्ताह में नहीं। पाइप टूटा। टैंकर लौटे। अधिकारियों ने मरम्मत, बिजली और डीजल की बात की। बाद के वर्षों में जब पत्रकार लौटे, ग्रामीण अब भी मित्तल का नाम लेते रहे, और घरों के नल गाँव की सच्चाई जैसे बताए गए। ईमानदार उत्तर मिश्रित है, जैसा रखरखाव की कहानियों में होता है। सार्वजनिक भलाई अधिकारी के बिना भी जी सकती है। उसके बिना भूखी भी रह सकती है।
30 अगस्त 2026 को उन्होंने लिखा कि लोकसेवक वाला अध्याय समाप्त हो रहा है, लेकिन देश की मिट्टी ने जो सपना दिया वह नहीं मरेगा। ईंटों पर हाथ के निशान चाहिए थे। गईं तो सिर पर आशीर्वाद था, और 2023 के रिकॉर्ड में कहीं एक शिकायती पत्र था इस बारे में कि नल के पास खड़े होने दिया किसे जाना चाहिए था।
आशीर्वाद को निमंत्रण की जरूरत नहीं थी। शिकायत को थी। पहाड़ी और विदाई के बीच पूरी दूरी यही है।
मजबूर किया गया: यह वाक्य अदालत का नहीं, सभा का है। स्वैच्छिक: यह वाक्य उनके कागज का है। दोनों को एक साथ रखिए। तबादला दो दिन बाद हुआ। आरोप पत्र नहीं बना। प्रतीक्षा सूची पाँच महीने चली। तीन वर्ष और सेवा हुई। फिर पत्र आया।
जबरदस्ती सिद्ध करनी हो तो तारीख कम पड़ती हैं। संस्कृति सिद्ध करनी हो तो तारीख काफी हैं। भारतीय जिले में अधिकारी को गिराने के लिए सजा की जरूरत नहीं। मंच खाली करना काफी है।
गाँव पर लौटिए। आशीर्वाद बचा या शिकायत। धारा बची या टैंकर। मजबूर शब्द दिल्ली में मर जाएगा। नल पहाड़ पर फैसला करेगा।
