दोस्तों आजकल अगर रात के अंधेरे में आपके घर में कोई चोर घुस आए ना, तो भूलकर भी उसे पकड़ने, शोर मचाने या पुलिस को बुलाने की गलती मत करना।
मेरी मानो तो चुपचाप उठना, उसे सोफे पर बड़ी इज़्ज़त से बैठाना, पूछना की भाई साहब चाय-वाय पिएंगे या ठंडा लाऊं? उसे 56 भोग खिलाना और घर की तिजोरी की चाबियाँ खुद अपने हाथों से उसे सौंप देना।
और हाँ, जब वो अपना काम करके (यानी आपका घर लूटकर) वापस जाने लगे, तो उसे शॉल ओढ़ाकर दरवाज़े तक विदा भी करके आना।
आप सोच रहे होंगे की मैं ये कैसी उल्टी-सीधी और बेतुकी बातें कर रहा हूँ? पर सच कहूँ तो, आज के हमारे सिस्टम और न्याय व्यवस्था को देखते हुए यही सबसे ‘सेफ’ तरीका बचा है।
क्योंकि अगर आपने उस चोर को रंगे हाथों पकड़ने की हिम्मत दिखा दी, तो इस बात की पूरी गारंटी है की अगले दिन आप खुद हथकड़ियां पहने सलाखों के पीछे खड़े होंगे और वो चोर थाने से छूटकर आज़ाद हवा में आप पर हँस रहा होगा।
ऐसा लग रहा है ना की ये किसी कॉमेडी फिल्म की कहानी है? लेकिन नहीं दोस्त, ये हरियाणा में हुई एकदम सच्ची घटना है, जिसने इस देश के आम आदमी का कानून नाम की चिड़िया से ही भरोसा उठा दिया है।
SC/ST कानून, जो समाज के दबे-कुचले लोगों की रक्षा के लिए बनाया गया था, वो आज ‘लीगल आतंकवाद’ और वसूली का सबसे बड़ा टूल कैसे बन चुका है, पलवल की इस घटना ने उसकी पूरी पोल खोल कर रख दी है।
घर में आए चोरी करने वाले चोरों ने ही लगा दिया Sc St Act pic.twitter.com/0PS1eZJEGs
— कल्पना श्रीवास्तव 🇮🇳 (@Lawyer_Kalpana) September 26, 2026
पलवल (हरियाणा) के बंचारी गांव की वो रात जब रंगे हाथों पकड़ा गया एक चोर
अब आपको बताते हैं की आखिर ये पूरा तमाशा शुरू कहाँ से हुआ। घटना हरियाणा के पलवल ज़िले के होडल क्षेत्र में पड़ने वाले बंचारी गांव की है।
बाकी आम दिनों की तरह ही गांव का एक परिवार रात को अपने घर में आराम से सो रहा था। आधी रात का वक़्त था और चारों तरफ घुप्प अंधेरा। तभी एक युवक चोरी के इरादे से दबे पाँव उनके घर में घुसता है।
अब ज़ाहिर सी बात है, खटपट होगी तो घर वालों की नींद तो खुलेगी ही। परिवार वालों की आँख खुल गई। उन्होंने घबराने या छुपने की बजाय हिम्मत दिखाई और उस चोर को वहीं रंगे हाथों दबोच लिया।
अब ऐसे मामलों में अक्सर होता क्या है? पब्लिक का गुस्सा फूटता है और लोग चोर की मार-मारकर हड्डियां तोड़ देते हैं। लेकिन इस परिवार ने ऐसा कुछ नहीं किया।
उन्होंने कानून अपने हाथ में नहीं लिया। एक बहुत ही ज़िम्मेदार और अच्छे नागरिक की तरह उन्होंने तुरंत पुलिस को फोन मिलाया, पुलिस मौके पर आई और परिवार ने उस चोर को उनके हवाले कर दिया।
थाने में बाकायदा चोरी की शिकायत दर्ज़ कराई गई।
यहाँ तक की कहानी सुनकर आपको लग रहा होगा की वाह, कितना अच्छा सिस्टम है! चोर पकड़ा गया, पुलिस ले गई, बात खत्म! लेकिन पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त। असली खेल तो थाने पहुँचने के बाद शुरू हुआ।
चोरी पकड़ी गई तो निकाल लिया विक्टिम कार्ड और दो दिन बाद ठोक दिया झूठा SC/ST Act
पुलिस थाने जाने के ठीक दो दिन बाद इस कहानी में एक ऐसा ट्विस्ट आया, जिसने पूरे पुलिस महकमे और कानून व्यवस्था का सरेआम मज़ाक बना दिया।
वो कहावत सुनी है ना आपने- ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’? बंचारी गांव के इस केस में तो चोर ने कोतवाल को डांटा ही नहीं, बल्कि सीधा मकान मालिक की ही गर्दन नाप दी।
उस पकड़े गए चोर (जो दलित समुदाय से आता है) ने अपने बचाव के लिए एक ऐसा लीगल हैक (Legal hack) निकाला जिसे सुनकर बड़े-बड़े वकीलों का भी माथा ठनक जाए।
उसने उल्टे उसी मकान मालिक और उसके परिवार पर SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट के तहत एक भयंकर मुकदमा ठोक दिया!
चोर और उसके पीछे खड़े कुछ लोकल कांग्रेस लीडरों ने मिलकर एक ऐसी मनगढ़ंत कहानी रची जो किसी फ्लॉप फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी थी।
उसने पुलिस को एक एप्लीकेशन दी और बोला- “साहब, मैं तो रात को बहुत ज़्यादा नशे में था। मुझे होश ही नहीं था और मैं गलती से भटककर इनके घर में घुस गया था। मैं कोई चोरी-वोरी नहीं कर रहा था। लेकिन इन लोगों ने मुझे पकड़ा, मुझे भयंकर जातिसूचक गालियां दीं, मुझे पटक-पटक कर पीटा और फिर हंसिया (दरांती) लेकर मेरी गर्दन काटने की धमकी दी!”
मतलब हद है नौटंकी की! ज़रा कॉमन सेंस लगाइए। जिस परिवार ने आधी रात को अपने घर में एक अनजान आदमी को पकड़ा हो और खुद पुलिस को फोन करके बुलाया हो, क्या वो पुलिस के आने का इंतज़ार करेगा या बैठकर उसे जातिसूचक गालियां देगा और दरांती से गर्दन काटेगा?
अगर गर्दन काटनी ही थी तो पुलिस को फोन क्यों करते? लेकिन हमारे सिस्टम का अंधापन देखिए, पुलिस ने बिना किसी ठोस सबूत के उस मकान मालिक पर SC/ST एक्ट की संगीन धाराओं में FIR दर्ज़ कर ली!
10 लाख की फिरौती और सरकारी दामाद बनकर घूमता चोर, दर-दर भटक रहा पीड़ित परिवार
अब ये पूरा मामला सिर्फ एक झूठे मुकदमे का नहीं रहा, बल्कि ये सीधा-सीधा वसूली और ब्लैकमेलिंग का नंगा नाच बन चुका है।
ग्राउंड रिपोर्ट्स से जो बातें छनकर आ रही हैं, वो सच में डराने वाली हैं। बताया जा रहा है की अब उस चोर का गैंग और उसके कुछ हिमायती उस पीड़ित परिवार पर दबाव बना रहे हैं।
बात आ गई है ‘सेटलमेंट’ पर। खुलेआम धमकियाँ मिल रही हैं की “चुपचाप 10 लाख रुपये निकालो और दे दो, तब जाकर हम ये SC/ST एक्ट वाला केस वापस लेंगे, वरना सड़ते रहना पूरी उम्र जेल में।”
अब आप इस देश के कानून की विडंबना देखिए। वो आदमी जो रात के अंधेरे में किसी के घर में चोरी करने घुसा था, वो आज एकदम ‘सरकारी दामाद’ की तरह सीना चौड़ा करके बाहर घूम रहा है।
शायद उसे लग रहा है की अब तो वो 10 लाख का मुआवज़ा लेकर ही मानेगा। और वो बेचारा परिवार? जिसके घर में चोरी हुई, जिसने एक अपराधी को पकड़कर पुलिस को दिया, वो परिवार आज गिरफ़्तारी की लटकती तलवार के खौफ में जी रहा है।
वो दर-दर वकीलों के चक्कर काट रहे हैं, थानों में मिन्नतें कर रहे हैं की भाई हमें झूठे केस में जेल मत भेजना।
इस भयंकर अन्याय के खिलाफ अब बंचारी और आस-पास के गाँवों का खून खौल उठा है। लोगों के सब्र का बांध टूट चुका है।
पूरे गांव ने मिलकर एक विशाल महापंचायत बुलाई है। पंचायत में हज़ारों की भीड़ जमा हुई और सबने एक सुर में पुलिस और प्रशासन से सवाल पूछा की “हमारी सुरक्षा का क्या? अगर आज हम चुप बैठ गए, तो कल को हर चोर, हर गुंडा यही तरीका आज़माएगा। अपराध करो, और अगर पकड़े जाओ तो सामने वाले पर SC/ST एक्ट लगा दो!”
गांव वालों ने प्रशासन को साफ़ अल्टीमेटम दे दिया है की अगर इस झूठी एफआईआर को तुरंत रद्द नहीं किया गया और परिवार को परेशान करना बंद नहीं हुआ, तो पूरा इलाका सड़कों पर उतर आएगा।
यहाँ सवाल किसी एक गांव या एक परिवार का नहीं है भाई! सवाल ये है की आख़िर ऐसा सिस्टम बन ही कैसे गया जहाँ एक अपराधी खुद को ‘पीड़ित’ बताकर असली पीड़ितों को ही सलाखों के पीछे धकेलने की ताक़त रखता है?
पालने में झूलते 1 साल के बच्चे पर भी लगा दिया SC/ST एक्ट! मतलब अब तो हद ही हो गयी
अगर आपको लग रहा है की पलवल के उस चोर वाला मामला इस कानून के दुरुपयोग की सबसे बड़ी इंतहा है, तो थोड़ा दिल थाम कर बैठिए।
क्योंकि हमारे सिस्टम का अंधापन सिर्फ चोरों तक सीमित नहीं है, अब ये पालने में खेलते मासूम बच्चों तक पहुँच चुका है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ का एक ऐसा ही सनसनीखेज़ मामला सामने आया है, जिसे सुनकर आप अपना सिर दीवार में मार लेंगे।
एक FIR दर्ज होती है, जिसमें किसी पुरानी खुन्नस को निकालने के लिए पूरे के पूरे परिवार को लपेटते हुए 28 लोगों पर SC/ST Act ठोक दिया जाता।
लेकिन असली झटका तब लगता है जब आप उस लिस्ट का 28वां नाम पढ़ते हैं। वो 28वां नाम किसका था? एक 1 साल के दूधमुंहे बच्चे का! जी हाँ, बिल्कुल सही सुना आपने।
एक साल का वो बच्चा जो शायद अभी ठीक से अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पाता, जो अभी ‘मम्मा-पापा’ भी ठीक से नहीं बोल पाता, उस पर SC/ST एक्ट के तहत ‘अत्याचार’ करने और ‘जातिसूचक गालियां’ देने का भयंकर मुकदमा ठोक दिया गया।
एक साल का बच्चा कैसे किसी का उत्पीड़न कर सकता है भाई? क्या वो पालने से उठकर गया और उसने किसी को गालियां दीं?
सबसे ज्यादा गुस्सा तो तब आता है जब आप पुलिस की कार्यप्रणाली को देखते हैं। मतलब थाने में कुर्सी तोड़ रहे उस अफसर की बुद्धि का क्या लेवल रहा होगा?
क्या उसे इतनी सी भी अकल नहीं आई की भाई, मैं जिस एफआईआर पर अपनी मुहर लगा रहा हूँ, उसमें एक साल के बच्चे का नाम है?
बिना कोई प्राइमरी जांच किए केस दर्ज कर लिया गया! ये घटना पूरी दुनिया को बता रही है की SC/ST एक्ट के तहत होने वाले मुकदमों में अब न्याय की कोई जगह नहीं बची है।
सुप्रीम कोर्ट खुद कह चुका है की यह एक्ट ‘ब्लैकमेलिंग’ का हथियार बन गया है फिर क्यों सो रही हैं सरकारें
अब आप कहेंगे की ये तो मैं हवा में बातें कर रहा हूँ। तो चलिए, हवा में बात नहीं करते हैं, देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की बात कर लेते हैं।
जो बात आज पलवल के गांव वाले कह रहे हैं, वही बात सुप्रीम कोर्ट के बड़े-बड़े जज सालों से कह रहे हैं।
साल 2018 में जस्टिस ए.के. गोयल और यू.यू. ललित की बेंच ने बहुत ही कड़े शब्दों में कहा था की इस एक्ट का इस्तेमाल अब “निर्दोष नागरिकों को ब्लैकमेल करने और अपनी पुरानी निजी दुश्मनी निकालने” के लिए किया जा रहा है।
कोर्ट ने साफ़ चेतावनी दी थी की जो कानून हाशिए पर खड़े लोगों को सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था, वह आज “शोषण का चार्टर” (Charter of exploitation) बन चुका है।
हाल ही में 2025-26 के कई मामलों में भी अदालतों ने यही चिंता ज़ाहिर की है की इस एक्ट में बिना जांच के जो तुरंत एफआईआर (FIR) और गिरफ़्तारी का डर है, वो समाज में एक भयंकर दरार और खौफ पैदा कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट को ये धांधली साफ़ दिखाई दे रही है। जजों को समझ आ रहा है की कैसे निर्दोष लोगों को जेल भेजा जा रहा है। लेकिन हमारी सरकारें? वो एकदम गांधारी की तरह आँखों पर पट्टी बांधे बैठी हैं।
क्यों? क्योंकि उन्हें ‘न्याय’ से कोई मतलब नहीं है, उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनी वोट बैंक की रोटियां सेंकनी हैं। राजनेताओं को लगता है की अगर उन्होंने इस कानून के दुरुपयोग पर लगाम लगाने की थोड़ी सी भी कोशिश की, तो एक बड़ा वोट बैंक उनके हाथ से खिसक जाएगा।
वोट बैंक के इसी लालच ने पूरे समाज को झूठे मुकदमों की आग में झोंक दिया है।
NCRB के आँकड़े खुद बता रहे हैं झूठे मुकदमों का सच
चलिए, अगर आपको किसी की बात पर यकीन नहीं है, तो सरकारी डेटा देख लीजिए। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की लेटेस्ट रिपोर्ट्स उठाकर देख लीजिए।
NCRB का डेटा साफ़ बताता है की हर साल SC/ST एक्ट के तहत दर्ज़ होने वाले हज़ारों मामले अंत में “झूठे (False), तथ्य की गलती (Mistake of fact) या फिर आपसी सिविल विवाद” के रूप में बंद कर दिए जाते हैं।
आपको जानकर हैरानी होगी की करीब 14 से 15 प्रतिशत मामले तो पुलिस की जांच में ही पूरी तरह से फर्जी साबित हो जाते हैं।
और इससे भी डरावना सच है इस एक्ट का ‘कनविक्शन रेट’ (Conviction Rate) यानी सज़ा की दर। आपको पता है इस एक्ट के तहत सज़ा कितने लोगों को होती है?
बमुश्किल 32 से 34 प्रतिशत मामलों में! जी हाँ! अपना दिमाग लगाइए। अगर सज़ा सिर्फ 34% मामलों में हो रही है, तो बाकी के 66% मामलों का क्या हुआ?
वो बाकी के मामले कोर्ट में इसलिए औंधे मुंह गिर जाते हैं क्योंकि या तो उनके पीछे कोई सबूत ही नहीं होता, या फिर वो विशुद्ध रूप से फिरौती और वसूली के लिए लिखवाए गए होते हैं।
आधे से ज़्यादा मामलों में तो आरोपी खुद को जेल से बचाने के लिए बाहर ही लाखों रुपये देकर ‘कम्प्रोमाइज़’ (सेटलमेंट) कर लेता है।
पलवल के इस चोर का गैंग भी तो यही कर रहा है ना? 10 लाख रुपये मांग रहा है। तो क्या ये न्याय की लड़ाई है? बिल्कुल नहीं! ये एक बहुत बड़ा ऑर्गेनाइज़्ड वसूली का धंधा बन चुका है, जिसे सरकार का लीगल प्रोटेक्शन मिला हुआ है।
