शादी के बाद भी ताउम्र ब्रह्मचर्य निभाते रहे, आपातकाल की तानाशाही के खिलाफ आवाज़ उठाकर लोकतंत्र बचाया, लेकिन अनजाने में जातिवादी नेताओं की फौज खड़ी कर जाने वाले लोकनायक ‘जयप्रकाश नारायण’

इतिहास में कुछ नेताओं की कहानी बड़ी अजीब होती है। वो जो सोचते हैं, जो सपना देखते हैं, हकीकत में उसका बिल्कुल उल्टा हो जाता है।

जयप्रकाश नारायण यानी ‘जेपी’ भी एक ऐसे ही फक्कड़ टाइप इंसान थे। जेपी भारतीय राजनीति के वो संत थे जिन्हें ना तो कभी कुर्सी की भूख रही और ना ही लालबत्ती वाली गाड़ियों का शौक।

उनकी नीयत इतनी साफ थी की आज भी उनके नाम पर अच्छे-अच्छे राजनेताओं का सिर झुक जाता है।

लेकिन राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना देखिए। जेपी ने अपनी पूरी जिंदगी जिस ‘जातिविहीन समाज’ (Casteless society) यानी जात-पात से मुक्त भारत का सपना देखा, उसी जेपी के आंदोलन की कोख से ऐसे-ऐसे नेता पैदा हुए जिन्होंने आगे चलकर उत्तर भारत को सबसे भयंकर जातिवाद की आग में झोंक दिया।

जेपी ने सोचा था की वो छात्रों को राजनीति में लाकर देश का एजुकेशन सिस्टम सुधार देंगे, लेकिन उनके उसी फैसले ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था का ऐसा बंटाधार किया की आज तक वहां का एकेडमिक कैलेंडर आईसीयू में पड़ा खांस रहा है।

जेपी एक कमाल के आंदोलनकारी थे। जब वो सड़क पर उतरते थे तो दिल्ली के बड़े-बड़े तख्त हिल जाते थे। लेकिन शायद वो व्यवस्था चलाने वाले कोई दूरदर्शी नहीं थे।

उन्होंने जो चाहा वो कभी नहीं हुआ, और जो नहीं चाहा, वो इतिहास बनकर आज तक हमें भुगतना पड़ रहा है।

छपरा के सिताब दियारा का वो होनहार लड़का जिसने आज़ादी के लिए छोड़ दी थी अपनी पढ़ाई

11 अक्टूबर 1902 को बिहार और यूपी के बॉर्डर पर बसे एक छोटे से गांव ‘सिताब दियारा’ में इस फक्कड़ नेता का जन्म हुआ था।

पिता हरसू दयाल और मां फूल रानी देवी के इस लाडले में बचपन से ही एक अजीब सा विद्रोही कीड़ा था। जेपी पढ़ाई में एकदम अव्वल थे, लेकिन उनका दिमाग हमेशा सिस्टम से पंगा लेने के लिए दौड़ता रहता था।

जब जेपी पटना कॉलेज में पढ़ रहे थे, तब उनकी फाइनल परीक्षा में सिर्फ 20 दिन बचे थे। उसी वक्त देश में अंग्रेज़ों के खिलाफ ‘असहयोग आंदोलन’ (Non-Cooperation Movement) का बिगुल फूंका गया।

लेकिन जेपी 20 दिन पहले ही उस कॉलेज और पढ़ाई को छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े।

पत्नी होकर भी जीवन भर रहे ब्रह्मचारी, कैसे गाँधी जी से प्रभावित पत्नी के लिए JP को बनना पड़ा सन्यासी

जेपी की सार्वजनिक जिंदगी के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन उनकी निजी जिंदगी का एक ऐसा पहलू है जिसे सुनकर आज की पीढ़ी शायद यकीन ही न कर पाए।

बात 1920 की है, जब जेपी की शादी प्रभावती देवी से हुई थी। जेपी उस समय जवान थे, आंखों में बड़े-बड़े सपने थे। शादी के करीब दो साल बाद ही (1922 में) जेपी अपनी उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए।

अब जेपी तो अमेरिका में खेतों और रेस्टोरेंट में काम करते हुए मार्क्सवाद (Marxism) पढ़ रहे थे, और पीछे से प्रभावती महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में रहने लगीं।

गांधी जी हमेशा प्रभावती को अपने पास रखते थे।

गांधी जी ने प्रभावती पर ना जाने क्या जादू कर दिया की उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी ‘ब्रह्मचर्य’ (Celibacy) का पालन करने का एक बहुत ही कठोर प्रण ले लिया।

उन्होंने तय कर लिया कि अब वो अपना पूरा जीवन एक सन्यासिनी की तरह ही गुज़ारेंगी।

इधर, पूरे 7 साल बाद 1929 में जेपी अमेरिका से वापस भारत लौटे। वो एक गरम खून वाले, पक्के मार्क्सवादी युवा बनकर आए थे।

लेकिन जब वो घर पहुंचे, तो उन्हें पता चला की उनकी पत्नी तो महात्मा गाँधी के पास साबरमती आश्रम में रह रही है।

जेपी परेशान हुए, थोड़े आहत भी हुए। इसी उधेड़बुन में जेपी ने सीधे महात्मा गांधी को एक चिट्ठी लिख डाली।

जेपी ने अपनी चिट्ठी में बापू से साफ-साफ अपनी नाराज़गी और दर्द ज़ाहिर किया। उनका दर्द ये था की बापू, आपके आश्रम के प्रभाव में आकर मेरी पत्नी ने ये कैसा अप्राकृतिक प्रण ले लिया है?

जेपी की उम्मीद थी की बापू खुद प्रभावती को समझाएंगे और उन्हें उनकी सामान्य गृहस्थी में वापस लौटाएंगे।

लेकिन दूसरी तरफ से बापू का जवाब भी एकदम ‘गांधीवादी’ अंदाज़ में आया। गांधी जी ने जेपी को बहुत ही सलीके से चिट्ठी लिखकर जवाब दिया की “प्रभावती ने यह ब्रह्मचर्य का प्रण किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर अपनी मर्जी से लिया है।”

बापू ने जेपी को समझाया की एक पति के रूप में उनका अधिकार अपनी जगह है, लेकिन वो प्रभावती को उनके इस आध्यात्मिक फैसले से पीछे हटने के लिए मज़बूर नहीं कर सकते।

लेकिन जेपी, जो वैचारिक रूप से गांधी जी से बिल्कुल अलग सोचते थे, उन्होंने अपनी पत्नी के इस प्रण के आगे बिना कोई कड़वाहट पाले अपना सिर झुका दिया।

उन्होंने प्रभावती के फैसले का पूरा सम्मान किया। बिना किसी संतान की चाहत के, जेपी ने अपनी पूरी जिंदगी अपनी पत्नी के साथ एक सच्चे ‘साथी’ की तरह निकाल दी।

अमेरिका से मार्क्सवादी बनकर लौटे जेपी ने कैसे सत्ता की हर मलाई को मार दी ठोकर

अमेरिका से जो जेपी मार्क्सवाद का चश्मा पहनकर लौटे थे, वो धीरे-धीरे आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े पोस्टर बॉय बन गए। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) का वो किस्सा तो एकदम फिल्मी है।

जब अंग्रेज़ों ने गांधी जी से लेकर नेहरू तक सारे बड़े नेताओं को जेल में ठूंस दिया था, तब जेपी हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद थे।

दीवाली की रात थी, जेल में सब जश्न में डूबे थे। इसी का फायदा उठाकर जेपी और उनके कुछ साथी धोती की रस्सी बनाकर जेल की 17 फीट ऊंची दीवार फांदकर भाग निकले!

इसके बाद जेपी ने अंडरग्राउंड होकर जो ‘आज़ाद दस्ता’ बनाया और अंग्रेज़ों की नाक में जो दम किया, उसने रातों-रात जेपी को पूरे देश के युवाओं का हीरो बना दिया।

लेकिन जेपी की असली महानता आज़ादी के बाद दिखी। आजकल तो भईया कोई वार्ड मेम्बर या प्रधानी का चुनाव जीत जाए, तो अगले दिन सफेद स्कॉर्पियो निकाल लेता है और चार बाउंसर लेकर घूमता है।

सत्ता की मलाई चाटने के लिए लोग किसी भी हद तक गिर जाते हैं। लेकिन जेपी? जेपी वो इंसान थे जिनके लिए पंडित नेहरू ने अपनी कैबिनेट के दरवाज़े खोल कर रखे थे।

नेहरू चाहते थे कि जेपी सरकार में आएं, लेकिन जेपी मुस्कुराए और निकल लिए। उन्हें ना मंत्री बनना था, ना सांसद।

1977 में जब उनके एक इशारे पर इंदिरा गांधी जैसी कद्दावर नेता सत्ता से उखड़ गईं और जनता पार्टी की सरकार बनी, तब जेपी चाहते तो आराम से देश के प्रधानमंत्री बन सकते थे। कोई उन्हें रोकने वाला नहीं था।

लेकिन वो पटना के अपने उसी पुराने और सादे से घर में रहे। उन्होंने सत्ता की हर मलाई को ऐसे ठोकर मारी जैसे रास्ते में पड़े किसी पत्थर को मारते हैं। उन्हें कुर्सी से कोई मोह था ही नहीं, उनका नशा तो सिर्फ सिस्टम को बदलने का था।

“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”, जब एक फक्कड़ नेता ने छेड़ दिया आपातकाल की तानाशाही के खिलाफ बिगुल

बात 70 के दशक की है। देश में इंदिरा गांधी की सत्ता का डंका बज रहा था, लेकिन ज़मीन पर आम आदमी महंगाई, बेरोजगारी और सिस्टम के भयंकर भ्रष्टाचार से त्राहि-त्राहि कर रहा था।

गुजरात से लेकर बिहार तक छात्र सड़कों पर उतरने लगे थे। ऐसे माहौल में देश को एक ऐसे चेहरे की ज़रूरत थी, जिस पर सब आंख मूंदकर भरोसा कर सकें।

और वो चेहरा थे हमारे जेपी, जो उस वक्त राजनीति से संन्यास लेकर विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन में शांति से अपना काम कर रहे थे।

लेकिन जब देश ने आवाज़ दी, तो ये बूढ़ा शेर फिर से मैदान में उतर आया। 1974 में पटना के गांधी मैदान से जेपी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ (Total Revolution) का ऐसा बिगुल फूंका की पूरे देश की हवा ही बदल गई।

रामधारी सिंह दिनकर की वो कविता- “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”- जेपी के आंदोलन का एंथम बन गई। जेपी के एक इशारे पर लाखों युवा और छात्र अपनी जान हथेली पर रखकर सड़कों पर उतर आए थे।

इस आंदोलन का क्लाइमैक्स आया 25 जून 1975 को, दिल्ली के रामलीला मैदान में। जेपी ने वहां एक ऐसी बात कह दी जिसने सीधे दिल्ली के तख्त को हिला दिया।

उन्होंने पुलिस और सेना के जवानों से अपील कर दी कि भाई, सरकार के उन आदेशों को मत मानो जो असंवैधानिक हों और जो तुम्हारे ज़मीर के खिलाफ हों।

बस, सत्ता को तो जैसे इसी बहाने की तलाश थी। रातों-रात इसे ‘बगावत’ का नाम दे दिया गया और देश पर ‘आपातकाल’ (Emergency) की वो खौफनाक कालिख थोप दी गई, जिसने रातों-रात लोकतंत्र का गला घोंट दिया।

जेपी को गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में उनकी तबीयत इतनी बिगड़ गई की उनकी दोनों किडनियां खराब हो गईं। उन्हें डायलिसिस पर आना पड़ा।

आज़ाद भारत में पहली बार कांग्रेस सरकार की हार के मुख्य सूत्रधार

लेकिन इस फक्कड़ नेता का जिगरा तो देखिए यार! मौत बिस्तर के पास खड़ी थी, लेकिन उन्होंने बिस्तर पर लेटे-लेटे वो कर दिखाया जो भारत के इतिहास में किसी चमत्कार से कम नहीं था। उन्होंने देश के पूरे बिखरे हुए विपक्ष को एक छतरी के नीचे ला खड़ा किया।

ज़रा सोचिए, एक तरफ पक्के समाजवादी और दूसरी तरफ आरएसएस (RSS) और जनसंघ वाले! इन दोनों की विचारधाराएं उत्तर और दक्षिण ध्रुव जैसी थीं, लेकिन जेपी ने इन सबको मिलाकर ‘जनता पार्टी’ का वो जादुई प्रयोग कर डाला।

और उसी प्रयोग ने 1977 में देश की सबसे बड़ी तानाशाही को उखाड़ फेंका। चुनाव नतीजों में कांग्रेस बुरी तरह हारी.. खुद इंदिरा गांधी रायबरेली से और संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए।

इस जीत के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में भारत की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

लेकिन इतना बड़ा जनांदोलन खड़ा करने और सरकार बदलने के बावजूद जेपी ने खुद कोई भी सरकारी पद (प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति) स्वीकार नहीं किया।

जात-पात मिटाने चले थे लेकिन अनजाने में ही खड़ी कर दी उत्तर भारत को बांटने वाले नेताओं की पूरी फौज

अब आते हैं इस कहानी के उस सबसे बड़े व्यंग्य पर, जिसे देखकर शायद किस्मत भी कोने में बैठकर हंस रही होगी।

जेपी एक बहुत ही आदर्शवादी इंसान थे। उनका नारा था- “जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो, समाज के नए प्रवाह में नई दिशा मोड़ दो।”

जेपी सच में एक ‘कास्टलेस सोसाइटी’ (जातिविहीन समाज) का सपना देख रहे थे। वो चाहते थे की इंसान की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्म से हो।

उनके इस आह्वान पर हज़ारों युवाओं ने जोश में आकर अपने नाम के आगे से अपना सरनेम (उपनाम) तक हटा लिया था। सब कुछ एकदम ‘यूटोपिया’ (रामराज्य) जैसा लग रहा था।

लेकिन मज़ाक देखिए भईया! जेपी की इस ‘संपूर्ण क्रांति’ की नर्सरी में जो बीज बोए गए, उनसे जो नेता पैदा हुए, उन्होंने आगे चलकर उत्तर भारत को घोर जातिवाद की ऐसी आग में झोंका जिसकी तपिश आज तक महसूस की जाती है।

आप ज़रा उन छात्र नेताओं की लिस्ट देखिए जो जेपी के आंदोलन में सबसे आगे झंडे उठा रहे थे- बिहार में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, शरद यादव, और यूपी में मुलायम सिंह यादव।

जेपी ने इन्हें राजनीति का ककहरा इसलिए पढ़ाया था ताकि ये देश से करप्शन और जात-पात मिटाएंगे। लेकिन जेपी के दुनिया से जाते ही इन चेलों को सत्ता की ऐसी चाट लगी की इन्होंने जेपी के आदर्शों को उसी गंगा में बहा दिया जिसमें वो डुबकी लगाते थे।

इन्हें बहुत जल्दी समझ आ गया की भारत में चुनाव ‘संपूर्ण क्रांति’ के नारों से नहीं, बल्कि जातियों की गुणा-गणित से जीते जाते हैं। फिर दौर आया 90 के दशक का और ‘मंडल कमीशन’ का।

जेपी के इन्हीं ‘आदर्शवादी’ शिष्यों ने यूपी और बिहार को ऐसी खौफनाक राजनीतिक जंग में तब्दील कर दिया की इंसान की पूरी हैसियत ही उसकी जाति बनकर रह गई।

जिस बिहार को जेपी ने नई उम्मीद दी थी, वो उसी बिहार में ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसे नारों और खौफनाक ‘जंगलराज’ में तब्दील हो गया।

जातियों के नाम पर प्राइवेट सेनाएं बन गईं, खून बहने लगा और विकास तो जैसे इन राज्यों से अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर ही निकल लिया।

नेताओं को तो मिल गई मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ‘संपूर्ण क्रांति’ के चक्कर में कैसे बंटाधार हो गया बिहार की शिक्षा का

राजनीति में अक्सर कहा जाता है की जब भी कोई बड़ी क्रांति होती है, तो सबसे पहली और सबसे बड़ी बलि युवाओं की चढ़ाई जाती है।

जेपी आंदोलन के दौरान भी बिल्कुल यही हुआ, लेकिन इसका जो साइड-इफेक्ट निकलकर सामने आया, वो बिहार के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था।

यह वो कड़वा सच है जिसे अक्सर जेपी के ‘महानता वाले आभामंडल’ के नीचे बड़ी चालाकी से खिसका दिया जाता है।

1974 में जब जेपी ने देखा की सरकार टस से मस नहीं हो रही है, तो उन्होंने छात्रों से एक बहुत ही भावुक अपील कर दी। उन्होंने गांधी मैदान से हुंकार भरी की “भईया, एक साल के लिए अपने कॉलेज, अपनी पढ़ाई और अपनी डिग्रियां छोड़ दो। किताबें बंद करो और व्यवस्था बदलने के लिए सड़कों पर आ जाओ।”

अब जेपी की आवाज़ में वो जादू था की युवा खिंचे चले आए। हज़ारों-लाखों छात्रों ने अपनी किताबें किनारे रख दीं, परीक्षाओं का बॉयकाट कर दिया और जेपी के पीछे झंडा उठाकर निकल पड़े।

अब ज़रा यहां फायदा और नुकसान का वो असली कैलकुलेशन समझिए, जो शायद उस वक्त उन जोश से भरे छात्रों को समझ नहीं आया।

जिन गिने-चुने छात्र नेताओं ने इस आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में थामी थी- जैसे लालू यादव, नीतीश कुमार या सुशील मोदी- उनके लिए तो यह आंदोलन एक ‘लॉन्चिंग पैड’ बन गया।

ये लोग जेल गए, लाठियां खाईं, और जब बाहर निकले तो सीधे नेता बनकर निकले। कुछ ही सालों में किसी को विधायक का टिकट मिल गया, कोई सांसद बन गया और आगे चलकर यही लोग मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ गए। इन्होंने तो सत्ता की पूरी मलाई चाट ली।

लेकिन ज़रा उस छात्र के बारे में सोचिए जो किसी दूर-दराज़ गांव से, अपने बाप की ज़मीन गिरवी रखकर पटना पढ़ने आया था। जेपी के एक आह्वान पर उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी।

आंदोलन खत्म होने के बाद जब वो वापस अपनी क्लास में पहुंचा, तो पता चला की उसका करियर तबाह हो चुका है। वो सरकारी नौकरियों के फॉर्म भरने लायक नहीं रहा। उसके हाथ में ना तो क्रांति आई और ना ही नौकरी।

और सबसे बड़ा सत्यानाश तो बिहार के एकेडमिक कैलेंडर का हुआ। इस ‘एक साल की छुट्टी’ और हड़तालों ने बिहार की यूनिवर्सिटीज (जैसे पटना यूनिवर्सिटी या मगध यूनिवर्सिटी) के सेशन का ऐसा कचूमर निकाला की पूरा शिक्षा तंत्र ही पटरी से उतर गया।

तीन साल वाली ग्रेजुएशन की डिग्री पांच-पांच, छह-छह साल में पूरी होने लगी। एक बार जो कैलेंडर लेट हुआ, वो दशकों तक लेट ही चलता रहा। आज भी बिहार का शिक्षा तंत्र इस धक्के से पूरी तरह से उबर नहीं पाया है।

जिन जेपी ने छात्रों को सिस्टम सुधारने के लिए बुलाया था, अनजाने में उन्हीं के आंदोलन ने बिहार की पूरी एक पीढ़ी के छात्रों का भविष्य दांव पर लगा दिया।

नेताओं की तो दाल-रोटी और सत्ता दोनों सेट हो गई, लेकिन आम छात्र आज भी उसी सिस्टम में धक्के खा रहा है, जिसे बदलने के लिए उसने कभी अपनी किताबें छोड़ी थीं।

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