जिसकी राष्ट्रभक्ति से काँपकर अंग्रेजों ने दे दिया उन्हें ‘देश-निकाला’, ईसाई धर्मांतरण पर रोक लगाकर ‘ओम जय जगदीश हरे’ रचने वाले सनातन रक्षक और स्वतंत्रता सेनानी ‘श्रद्धाराम शर्मा’ जी को जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि

सुबह-सुबह जब आप उठते हैं, तो आस-पास के किसी मंदिर से या शायद आपके अपने ही घर से एक बहुत ही जानी-पहचानी सी आवाज़ आपके कानों में जरूर पड़ती होगी… “ओम जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे..”

बचपन से लेकर आज तक, दिवाली की पूजा हो, सत्यनारायण भगवान की कथा हो, या कोई भी आम दिन… इस आरती के बिना हमारी कोई भी पूजा पूरी नहीं होती।

ये सिर्फ कुछ शब्द नहीं हैं, ये हम करोड़ों हिन्दुओं की रगों में बहने वाली आस्था है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की जिस आरती को गाकर एक सनातनी के दिन की शुरुआत होती है, आखिर वो लिखी किसने थी?

अगर आप 100 हिन्दुओं से ये सवाल पूछेंगे, तो सच कहूं तो 99 लोगों के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। लोग कहेंगे की शायद वेद-पुराणों में लिखी होगी या किसी बहुत पुराने ऋषि-मुनि ने बनाई होगी।

यही हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है भाई! हमें उसी सनातन रक्षक के बारे में नहीं पता जिसने हमें हमारी सबसे बड़ी आरती दी!

आज 30 सितंबर है। आज ही के दिन उस हिन्दू शेर, उद्भट विद्वान और स्वतंत्रता सेनानी का जन्म हुआ था। आज हम उसी गुमनाम योद्धा, पंडित श्रद्धाराम शर्मा (फिल्लौरी) जी की बात करेंगे, जिन्होंने न सिर्फ अंग्रेज़ों की आँखों में आँखें डालकर सनातन का झंडा गाड़ा, बल्कि ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण वाले खेल की भी बखिया उधेड़ दी।

पंजाब में ईसाई मिशनरियों ने बिछाया धर्मांतरण का जाल और उन्हें खदेड़ने जन्मा एक शेर

पंजाब के जालंधर ज़िले में सतलुज नदी के किनारे एक छोटा सा गांव बसा है- फिल्लौर। इसी गांव में 30 सितंबर 1837 को जयदयालु जी नाम के एक ज्योतिषी के घर एक बालक का जन्म हुआ।

पिता ने नाम रखा श्रद्धाराम। घर में बचपन से ही पूजा-पाठ, ज्योतिष और संस्कृत का माहौल था।

श्रद्धाराम जी बचपन से ही इतने कुशाग्र और तेज़ दिमाग वाले थे की जब बच्चे खेल-कूद में लगे होते थे, तब उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, पंजाबी और फारसी जैसी भाषाओं पर गज़ब की पकड़ बना ली थी।

ये बात है 1860 के दशक की। अंग्रेज़ों ने 1857 की क्रांति के बाद पंजाब पर पूरी तरह से अपना शिकंजा कस लिया था। और अंग्रेज़ों के पीछे-पीछे आ गए थे उनके पाले हुए ईसाई मिशनरी और पादरी।

इनका एक ही टूलकिट था- हिन्दुओं को लालच दो, उनके देवी-देवताओं का मज़ाक उड़ाओ और उनका धर्मांतरण (Conversion) कर दो।

पंजाब के गांवों में इन मिशनरियों ने धर्मांतरण का भयंकर जाल बिछा दिया था। गरीब और भोले-भाले हिन्दुओं को ईसाई बनाया जा रहा था।

उस वक्त अच्छे-अच्छे लोगों की जुबान पर ताले लगे हुए थे। कोई अंग्रेज़ों के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। तब मैदान में उतरा यह युवा हिन्दू शेर!

पंडित श्रद्धाराम जी मंदिर के कोने में बैठकर सिर्फ माला जपने वालों में से नहीं थे। वो सड़क पर उतरे। गांव-गांव, गली-गली घूमे।

उन्होंने रामायण, महाभारत और वेदों को अपना हथियार बनाया और ऐसे ओजस्वी, आग उगलने वाले भाषण दिए की मिशनरियों के टेंट खाली पड़ने लगे।

1867-68 का वो दौर था जब उन्होंने डंके की चोट पर ‘सनातन धर्म सभा’ (जिसे हिन्दू सभा भी कहा गया) की नींव रखी। वो गांव के चौराहों पर खड़े होकर अंग्रेज़ पादरियों को खुले शास्त्रार्थ (Open Debate) की चुनौती देते थे।

जब पादरी उनके सामने आते, तो पंडित जी अपने तर्कों और वेदों के ज्ञान से उनकी ऐसी बखिया उधेड़ते थे की उन अंग्रेज़ पादरियों को दुम दबाकर वहां से भागना पड़ता था।

देखते ही देखते पंजाब का हिन्दू समाज जागने लगा और ईसाई धर्मांतरण के उस गंदे मंसूबे पर बहुत बड़ा ब्रेक लग गया।

ओम जय जगदीश हरे का जन्म एक ऐसी महा-आरती जिसने पूरे उत्तर भारत के हिन्दू समाज को एक धागे में पिरो दिया

अब बात करते हैं उस मास्टरस्ट्रोक की, जिसने पंडित जी को हमेशा के लिए अमर कर दिया। ईसाई मिशनरी जब गांव में आते थे, तो वो बहुत ही मधुर धुनों में अपनी प्रार्थनाएं और भजन गाते थे, जिससे लोग उनकी तरफ खिंचने लगते थे।

पंडित जी ने इस साइकोलॉजी को बहुत गहराई से समझा। उन्होंने देखा की हिन्दू समाज बंटा हुआ है। हर मंदिर में अलग-अलग आरतियां गाई जा रही हैं। कोई एक ऐसा सामूहिक प्रार्थना गीत नहीं था जो पूरे हिन्दू समाज को एक सुर में जोड़ सके।

यहीं से जन्म हुआ एक ऐसी महा-आरती का जिसने इतिहास रच दिया। 1870 के आस-पास पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी ने अपनी कलम उठाई और भगवान विष्णु को समर्पित वो अमर शब्द रचे- “ओम जय जगदीश हरे।”

ज़रा इस आरती की भाषा देखिए! इतनी सरल, इतनी मधुर और इतनी रूहानी की कोई अनपढ़ आदमी भी इसे एक बार सुन ले, तो सीधा उसके दिल में उतर जाए।

पंडित जी ने इसमें कोई भारी-भरकम संस्कृत के शब्द नहीं ठूंसे, बल्कि आम जनमानस की ठेठ और मीठी बोली का इस्तेमाल किया।

देखते ही देखते ये आरती एक चमत्कार की तरह पूरे पंजाब और उत्तर भारत के मंदिरों में गूंजने लगी। ये सिर्फ एक गीत नहीं था दोस्त, ये सनातनियों को जोड़ने का एक ऐसा ब्रह्मास्त्र था जिसने ईसाई पादरियों के भजनों को पूरी तरह से धो कर रख दिया।

जब हज़ारों हिन्दू एक साथ हाथ में दीया लेकर, एक सुर में “भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट… क्षण में दूर करे” गाते थे, तो अंग्रेज़ों पर सांप लोट जाते थे।

इस एक आरती ने पूरे उत्तर भारत के हिन्दू समाज को एक धागे में ऐसा पिरोया की आज 150 साल बाद भी वो धागा पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत है।

श्रद्धाराम शर्मा की दहाड़ से कांपने लगी थी ब्रिटिश हुकूमत और घबराहट में रातों-रात दे दिया देश-निकाला

अब जो बात मैं आपको बताने जा रहा हूं, उसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। वामपंथी इतिहासकारों ने हमेशा ये नैरेटिव सेट करने की कोशिश की कि धर्म का काम करने वाले लोग आज़ादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे।

लेकिन पंडित श्रद्धाराम जी ने इस झूठ की धज्जियां उड़ा दी थीं। पंडित जी सिर्फ एक धर्म प्रचारक नहीं थे, उनके सीने में भारत माता के लिए एक धधकता हुआ ज्वालामुखी था।

जब वो महाभारत और गीता पर भाषण देते थे, तो वो सिर्फ कथा नहीं सुनाते थे, बल्कि वो सीधे तौर पर लोगों की रगों में राष्ट्रभक्ति का खून दौड़वाते थे।

वो मंच से डंके की चोट पर कहते थे की ये अंग्रेज़ सिर्फ हमारा धर्म नहीं भ्रष्ट कर रहे हैं, बल्कि ये हमारी आज़ादी, हमारा आत्मसम्मान और हमारी मातृभूमि भी हमसे छीन रहे हैं।

उनके भाषणों में इतनी आग होती थी की पंजाब के युवाओं का खून खौलने लगता था और वो अंग्रेज़ों की आंखों में आंखें डालने लगे थे।

इस सनातन शेर की दहाड़ से ब्रिटिश हुकूमत के पसीने छूटने लगे। अंग्रेज़ों को समझ आ गया था की अगर इसको खुला छोड़ दिया, तो 1857 से भी बड़ा कोई गदर पंजाब की धरती से शुरू हो जाएगा।

घबराहट में आकर, 1865 में अंग्रेज़ सरकार ने पंडित श्रद्धाराम शर्मा पर “सरकार के खिलाफ बगावत भड़काने” (Treason/Sedition) का सीधा आरोप मढ़ दिया।

बिना किसी ठोस सबूत के पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और उन्हें उनके अपने ही शहर ‘फिल्लौर’ और आस-पास के पूरे इलाके से ‘देश-निकाला’ (Exile) दे दिया!

सोचिए ज़रा, अपने ही देश में, अपने ही घर से एक विद्वान को सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि वो अपनी मातृभूमि और अपने धर्म की बात कर रहा था।

लेकिन अंग्रेज़ भूल गए थे की आग को आप जितना दबाओगे, वो उतनी ही भड़केगी। बनवास के इस दौर में भी ये शेर रुका नहीं! उन्होंने अपना बेस बदला, आस-पास के राज्यों और शहरों में गए, और सनातन का झंडा पहले से कहीं ज़्यादा मजबूती से फहराते रहे।

जो अंग्रेज उन्हें विद्रोही मानते थे वही उनकी लिखी किताब पढ़कर अफसर बनने को मजबूर थे

पंडित श्रद्धाराम शर्मा के ज्ञान का सबसे बड़ा भौकाल तो अब सामने आता है! पंडित जी सिर्फ हिन्दी या संस्कृत के विद्वान नहीं थे, बल्कि आधुनिक पंजाबी गद्य (Modern Punjabi Prose) के भी वो ‘पितामह’ माने जाते हैं।

उन्होंने पंजाबी भाषा में ‘सिखां दे राज दी विथिया’ और ‘पंजाबी बात-चीत्’ जैसी ऐसी महान किताबें लिखीं, जिनका कोई तोड़ ही नहीं था।

कमाल की बात देखिए यार! जिस ब्रिटिश हुकूमत ने पंडित श्रद्धाराम शर्मा को खतरनाक विद्रोही मानकर देश-निकाला दे दिया था, जिस अंग्रेज़ सरकार की रातों की नींद उन्होंने हराम कर रखी थी…

उसी अंग्रेज़ सरकार को घुटने टेककर पंडित जी की लिखी किताब “पंजाबी बात-चीत्” को अपने सिविल सेवा (ICS) अधिकारियों के कोर्स में शामिल करना पड़ा!

जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। अंग्रेज़ों ने नियम बना दिया था की जो भी गोरा अंग्रेज़ अफसर लंदन से सिविल सर्विस पास करके आएगा, उसे पंजाब में पोस्टिंग तब तक नहीं मिलेगी, जब तक वो पंडित श्रद्धाराम शर्मा की लिखी “पंजाबी बात-चीत्” का इम्तिहान पास नहीं कर लेता।

इसे कहते हैं बौद्धिक दबदबा (Intellectual Dominance)! एक तरफ अंग्रेज़ उनकी राष्ट्रभक्ति से थर-थर कांपते थे, और दूसरी तरफ उन्हीं की लिखी किताब रटकर अफसर बनने को मजबूर थे।

ये सनातन धर्म के एक सच्चे शेर का ऐसा जलवा था, जिसे अंग्रेज़ भी सलाम करने को मजबूर हो गए।

44 साल की उम्र में देश के लिए खपा दिया जीवन और आज हमारा फर्ज है इस सनातन योद्धा को याद रखना

कहते हैं की जो लोग बहुत जल्दी इस दुनिया को बहुत कुछ दे जाते हैं, भगवान उन्हें जल्दी अपने पास बुला लेता है। 24 जून 1881 को, महज़ 44 साल की उम्र में, पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी ने अपना शरीर त्याग दिया।

ज़रा सोचिए! जिस इंसान ने 44 साल की उम्र में हिन्दी का पहला उपन्यास लिख दिया, आधुनिक पंजाबी गद्य की नींव रख दी, सनातन धर्म सभा खड़ी करके ईसाई पादरियों को पंजाब से खदेड़ दिया, अंग्रेज़ों से लोहा लिया और करोड़ों हिन्दुओं को “ओम जय जगदीश हरे” जैसी अमर आरती दे दी…

अगर वो इंसान 70-80 साल जीता, तो इस देश का, इस सनातन धर्म का इतिहास क्या होता!

अगली बार जब भी आप अपने घर में दीया जलाएं, जब भी आपके कानों में “ओम जय जगदीश हरे” के शब्द पड़ें, तो एक पल के लिए उस शेर श्रद्धाराम शर्मा ‘फिल्लौरी’ जी को ज़रूर याद करें।

अपने बच्चों को बताएं की ये आरती किसने लिखी थी।

Scroll to Top