दोस्तों आज 11 सितंबर 2026 की तारीख पूरे देश और दुनिया भर में फैले करोड़ों सनातनियों के लिए बेहद खास है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का 76वां जन्मदिन है।
ऊपर से सबसे बढ़िया संयोग यह है की ये वही दौर है जब संघ अपनी स्थापना के 100 गौरवशाली साल यानी अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है।
इस देश में बहुत से लोग नेता बनते हैं, मंत्री बनते हैं, उनके लिए तालियां बजती हैं, लेकिन उन नेताओं की नींव में जो राष्ट्रभक्ति का सीमेंट भरा जाता है, वो काम कोई मौन साधक ही करता है। डॉ. भागवत जी उसी मौन साधना के साक्षात प्रतीक हैं।
11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर में जब उनका जन्म हुआ, तो देशभक्ति उन्हें घुट्टी में ही मिली थी। उनके दादा जी खुद संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के साथी थे और पिता मधुकरराव भागवत गुजरात के जाने-माने प्रचारक रहे।
घर में माहौल ऐसा था जहाँ राष्ट्र सेवा ही सबसे बड़ा धर्म मानी जाती थी। लेकिन भागवत जी की कहानी सिर्फ किसी परंपरा को आगे बढ़ाने की नहीं है.. यह कहानी उस व्यक्तिगत तपस्या और कठोर संकल्प की है, जो एक इंसान को साधारण से असाधारण बनाती है।
आज 76 की उम्र में भी वे साल के 365 दिन लगातार देश-विदेश के दौरे करते हैं, बिना थके रोज़ 16 से 18 घंटे काम करते हैं, और समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए खुद को खपा रहे हैं।
पशु चिकित्सक से लेकर 1975 आपातकाल में राष्ट्र रक्षा के लिए घर त्यागने वाला वो हिन्दू शेर
बहुत से लोग यह जानकर हैरान रह जाते हैं की दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन की कमान संभालने वाला यह संन्यासी दरअसल एक पेशेवर ‘पशु चिकित्सक’ (Veterinary Doctor) है।
उन्होंने नागपुर वेटरनरी कॉलेज (पीकेवी अकोला) से पशु चिकित्सा और पशुपालन में ग्रेजुएशन (B.V.Sc. & A.H.) की डिग्री हासिल की थी। वे पशुओं के दर्द को समझने वाले और उनका इलाज करने वाले एक बेहतरीन डॉक्टर बने।
उस दौर में इस तरह की मेडिकल डिग्री का मतलब था की आपके सामने एक बेहद सुरक्षित, शानदार और गाड़ी-घोड़े वाली ऐशो-आराम की ज़िंदगी बाहें फैलाए खड़ी थी। वो चाहते तो आराम से अपनी ज़िंदगी जी सकते थे।
भागवत जी अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन (M.V.Sc.) की पढ़ाई कर रहे थे और उनका करियर आसमान छूने को तैयार था। लेकिन किस्मत ने उनके लिए कोई और ही रास्ता चुना था।
साल 1975 में देश पर ‘आपातकाल’ (Emergency) का काला साया पड़ा। नागरिकों के बुनियादी अधिकार छीन लिए गए, लोकतंत्र का गला घोंटा गया और संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
ऐसे नाज़ुक मोड़ पर मोहन भागवत जी के भीतर का देशभक्त जाग उठा। उन्होंने एक पल भी गंवाए बिना अपनी पढ़ाई, अपनी मेडिकल डिग्री और डॉक्टर बनने के सारे सुख-आराम को ठोकर मार दी।
वे 1975 में ही संघ के ‘पूर्णकालिक प्रचारक’ बन गए। उस समय प्रचारक बनने का मतलब था जेल जाने का खतरा, पुलिस की लाठियों का डर और अंडरग्राउंड रहकर काम करना।
उन्होंने पुलिस की नज़रों से बचते हुए अकोला और आसपास के इलाकों में लोकतंत्र की बहाली के लिए काम किया। यह वो फैसला था जिसने एक डॉक्टर को समाज के दुख-दर्द का सबसे बड़ा वैद्य बना दिया।
अकोला की तंग गलियों में घूम-घूमकर सरसंघचालक की कुर्सी पाने वाला वो बेदाग और तपस्या से भरा सफर
आपातकाल खत्म होने के बाद उनका असली सांगठनिक जीवन शुरू हुआ। प्रचारक की ज़िंदगी कोई फूलों की सेज नहीं होती।
उन्होंने विदर्भ और अकोला के तपते जंगलों और पिछड़े गांवों में अपनी जवानी खपाई। उस समय आज की तरह गाड़ियां या साधन नहीं थे।
पुरानी साइकिल पर सवार होकर गांव-गांव घूमना, किसी स्वयंसेवक के घर जो भी रूखा-सूखा मिल जाए उसे प्रसाद समझकर खा लेना, और ज़मीन पर दरी बिछाकर सो जाना- यही उनकी दिनचर्या थी।
उन्होंने समाज को बहुत नज़दीक से देखा, गरीबों की पीड़ा को समझा और जातियों में बंटे हिंदू समाज की कमज़ोरियों को अपनी आंखों से परखा।
उनकी अद्भुत सांगठनिक क्षमता और अनुशासन को देखते हुए 1991 में उन्हें संघ का ‘अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख’ बनाया गया। उन्होंने देश भर के लाखों युवाओं में लाठी, व्यायाम, अनुशासन और आत्मरक्षा का नया संचार किया।
इसके बाद 1999 में वे ‘प्रचारक प्रमुख’ बने, जहाँ उन्होंने देश भर के हज़ारों पूर्णकालिक प्रचारकों के अभिभावक और मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
साल 2000 में जब के.एस. सुदर्शन जी सरसंघचालक बने, तो उन्होंने मोहन भागवत जी को संघ का ‘सरकार्यवाह’ (महासचिव) चुना।
सरकार्यवाह का पद संघ में संगठन के मुख्य कार्यकारी का होता है, और भागवत जी ने लगातार 9 सालों तक इस ज़िम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ संभाला।
फिर आया 21 मार्च 2009 का वो ऐतिहासिक दिन। नागपुर में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक चल रही थी।
तत्कालीन सरसंघचालक के.एस. सुदर्शन जी ने अपने गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए जब अपने उत्तराधिकारी के नाम की घोषणा की, तो पूरे देश ने देखा की 58 वर्ष के युवा और ऊर्जावान मोहन भागवत जी को संघ का 6वां सरसंघचालक चुना गया।
वे संघ के इतिहास के सबसे कम उम्र के प्रमुखों में से एक थे। और यहीं से शुरू हुआ संघ का वो नया युग, जिसने परंपराओं की जड़ों को थामे रखते हुए आधुनिक भारत के साथ कदमताल करना शुरू किया।
जात-पात के जहर को मिटाने के लिए दिया ‘एक मंदिर एक कुआं और एक शमशान’ का क्रांतिकारी मंत्र
सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी कमज़ोरी हमेशा से जात-पात और छुआछूत की दीवारें रही हैं, जिन्होंने हमारे समाज को अंदर से खोखला किया।
मोहन भागवत जी ने सरसंघचालक बनते ही इस बुराई की जड़ पर चोट करना शुरू किया। उन्होंने मंचों से भाषणबाज़ी करने के बजाय ज़मीन पर एक ऐसा क्रांतिकारी मंत्र दिया, जिसने सामाजिक क्रांति की नींव रख दी- ‘एक मंदिर, एक कुआं और एक श्मशान’।
उनका सीधा और साफ कहना था की अगर हम सब एक ही भारत माता की संतान हैं, तो फिर पूजा करने, पानी पीने या अंतिम संस्कार में जाति का भेद कैसा?
उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों को आदेश दिया की वे गांव-गांव जाएं और यह सुनिश्चित करें की किसी भी पिछड़े भाई-बहन को गांव के मंदिर में जाने से न रोका जाए।
उन्होंने संतों और धर्माचार्यों को एक मंच पर लाकर वाल्मीकि और वंचित बस्तियों में सहभोज करवाए, और समाज को यह अहसास दिलाया की जब तक हम अपने ही भाइयों को गले नहीं लगाएंगे, तब तक हिंदू समाज कभी सुरक्षित और संगठित नहीं हो सकता।
इसी वैचारिक खुलापन का सबसे बड़ा उदाहरण 2018 में दिल्ली के विज्ञान भवन में देखने को मिला। ‘भविष्य का भारत’ नाम से आयोजित इस तीन दिवसीय संवाद में उन्होंने खुद को विरोधी विचारों के सामने खड़ा किया।
बड़े-बड़े पत्रकारों, विदेशी राजनयिकों और आलोचकों ने जितने तीखे सवाल पूछे, भागवत जी ने चेहरे पर वही शांत मुस्कान लिए उतनी ही शालीनता और तथ्यों के साथ उनके जवाब दिए।
उन्होंने डंके की चोट पर यह बात दुनिया के सामने रखी की भारत में रहने वाले सभी 140 करोड़ लोगों का ‘डीएनए एक है’।
उन्होंने समझाया की हिंदुत्व किसी को बाहर करने या नफरत फैलाने का नाम नहीं है, बल्कि यह हर किसी को अपने भीतर समेटने वाली एक विराट जीवन पद्धति है।
इस एक बयान ने दुनिया भर में हिंदुत्व की परिभाषा को एक नई ऊंचाई और सम्मान दिला दिया।
भारत से निकलकर अमेरिका और लंदन की धरती तक कैसे गूंज रहा है आज मोहन भागवत जी के नेतृत्व में सनातन का डंका
डॉ. मोहन भागवत जी का नेतृत्व सिर्फ भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस भगवा विचारधारा को समंदर पार दुनिया के हर एक कोने तक पहुंचा दिया है।
उनके विज़न ने सिद्ध कर दिया है की ‘हिंदुत्व’ कोई भौगोलिक सीमा का मोहताज नहीं है, बल्कि ये पूरे विश्व के कल्याण का वो इकलौता मंत्र है जिसकी आज पूरी दुनिया को ज़रूरत है।
अगर आपको उनके इस विराट और ग्लोबल विज़न की ताज़ा तस्वीर देखनी है, तो अभी हाल ही में अगस्त और सितंबर 2026 में हुए उनके ऐतिहासिक विदेशी दौरों को देखिए।
अगस्त 2026 में जब सरसंघचालक जी अमेरिका की धरती पर पहुंचे, तो वहां का नज़ारा किसी महाकुंभ से कम नहीं था।
न्यूयॉर्क के विश्व प्रसिद्ध ‘मैडिसन स्क्वायर गार्डन’ में जब वो मंच पर आए, तो वहां बैठे 6000 से ज़्यादा प्रवासी भारतीयों और ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ (HSS) के कार्यकर्ताओं का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
उन्होंने अमेरिका में बैठे उन लाखों सनातनियों को एक बहुत ही स्पष्ट और दिव्य संदेश दिया। उन्होंने कहा की “हिंदू कभी दुनिया जीतने के लिए नहीं निकलता, हिंदू दुनिया को जोड़ने के लिए निकलता है।”
उन्होंने वहां ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) की उस सनातन संस्कृति का डंका बजाया और अमेरिका में रह रहे भारतीयों से आह्वान किया की वो अपनी ‘मातृभूमि’ (भारत) को हमेशा हृदय में रखें, लेकिन अपनी ‘कर्मभूमि’ (अमेरिका) के विकास और वहां के समाज के प्रति भी पूरी वफादारी और ईमानदारी निभाएं।
ये एक सच्चे हिंदू की पहचान है जो जहाँ जाता है, वहां सिर्फ देश-निर्माण करता है।
अमेरिका के बाद, इसी महीने (सितंबर 2026 में) वो लंदन की धरती पर पहुंचे। वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल पूरे होने (शताब्दी वर्ष) के उपलक्ष्य में एक बहुत ही भव्य और ऐतिहासिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था।
लंदन की उस धरती पर खड़े होकर, जहाँ से कभी अंग्रेज़ों ने हमें बांटने की साज़िश रची थी, वहां से डॉ. भागवत जी ने दुनिया को ‘एकता’ का सबसे बड़ा मंत्र दिया।
उन्होंने डंके की चोट पर कहा की “संघ का काम नफरत फैलाना नहीं है, बल्कि हमारा काम ‘शुद्ध सात्विक प्रेम’ और अपनेपन की डोर से पूरे समाज को बांधना है।”
उन्होंने स्पष्ट किया की ‘राष्ट्र’ सिर्फ एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि ये एक सांस्कृतिक पहचान है जो पूरी दुनिया को ये सिखाने की ताकत रखती है की “विविधता प्राकृतिक है, लेकिन उस विविधता के बीच भी एकता ही परम सत्य है।”
विदेशी धरती पर सनातन धर्म का इतना ओजस्वी और स्पष्ट प्रतिनिधित्व शायद ही इतिहास में किसी ने किया हो।
सनातन संस्कृति के ऐसे सच्चे प्रहरी और मां भारती के अनन्य उपासक डॉ. मोहन भागवत जी को उनके 76वें जन्मदिवस पर कोटि-कोटि वंदन और सादर नमन।
