पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स और टीवी रिपोर्टर अक्सर बोलते रहते रहते हैं की बीजेपी का चुनाव जीतने का मैनेजमेंट इतना तगड़ा है की उन्हें कोई हरा ही नहीं सकता।
लोगों ने दिमाग में ये बात बैठा ली है की शायद अमित शाह और मोदी जी के पास कोई जादुई छड़ी है जिसे घुमाते ही रातों-रात जनता वोट डाल देती है। पर सच कहूँ तो भाई, ऐसा कुछ नहीं है!
बीजेपी कोई अजेय या सुपर-स्ट्रॉन्ग पार्टी नहीं है जो कभी हार ना सके। हकीकत तो ये है की बीजेपी इसलिए यूपी जैसे राज्य में 70-70 सीटें जीत जाती है क्योंकि विपक्ष खुद अपने हाथों से अपनी नाव डुबो देता है।
बीजेपी बस किनारे खड़ी होकर इंतज़ार करती है की कब ये पार्टियां कोई भारी गलती करेंगे या अपने किसी एक ‘ख़ास वोटबैंक’ को खुश करने के चक्कर में हिन्दुओं की पीठ में छुरा घोंपेंगी, और फिर बीजेपी उसी गुस्से को समेट कर अपनी जीत का महल खड़ा कर लेती है।
अगर आपको मेरी बात पर यकीन नहीं है, तो चलिए आपको 2013 के यूपी में वापस ले चलता हूँ। उस समय अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) सत्ता में थी।
कवाल कांड की चिंगारी और सपा सरकार का वो एकतरफा मुस्लिम-प्रेम जिसने बोए नफरत के बीज और बीजेपी को दे दिया यूपी फतह करने का पहला बड़ा हथियार

उस साल मुजफ्फरनगर में सपा सरकार ने ‘तुष्टिकरण’ का एक ऐसा खौफनाक खेल खेला था, जिसने जाटों, गुर्जरों, दलितों और पिछड़ों को अपनी-अपनी जातियां भूलकर एक कट्टर ‘हिन्दू’ बनने पर मजबूर कर दिया।
इस पूरी खूनी कहानी की शुरुआत होती है 27 अगस्त 2013 से। मुजफ्फरनगर का एक गांव है- कवाल। इसी कवाल गांव में एक बहन से छेड़छाड़ की घटना ने ऐसा बारूद बिछाया की पूरा पश्चिमी यूपी धू-धू कर जल उठा।
हुआ ये था की गांव की एक जाट हिन्दू लड़की के साथ शाहनवाज़ नाम के एक लड़के ने सरेआम छेड़छाड़ कर दी। अब ज़ाहिर सी बात है, जब बात घर की बहन-बेटी की इज़्ज़त पर आएगी तो कोई भाई चुप तो बैठेगा नहीं।
लड़की के दो भाई थे- सचिन और गौरव। दोनों का खून खौल उठा और उन्होंने जाकर शाहनवाज़ को बीच बाज़ार में घेर लिया। कहा-सुनी इतनी बढ़ी की हाथापाई हो गई और उस लड़ाई में शाहनवाज़ की मौत हो गई।
अब इसके बाद जो हुआ, वो रोंगटे खड़े कर देने वाला था। शाहनवाज़ की मौत की खबर फैलते ही उस इलाके में मुस्लिम समुदाय की भारी भीड़ हथियारों के साथ सड़कों पर उतर आई।
उन्होंने सचिन और गौरव को भागने का मौका तक नहीं दिया। उस खूंखार भीड़ ने दोनों निहत्थे भाइयों को सरेआम सड़क पर घेरकर पीट-पीटकर मार डाला।
वो दोनों तड़पते रहे, जान की भीख मांगते रहे, लेकिन लिंचिंग करने वाली उस भीड़ के सिर पर खून सवार था।
अगर सरकार और प्रशासन ईमानदार होता, तो बात शायद वहीं रुक जाती। पुलिस दोनों तरफ के आरोपियों पर निष्पक्ष कार्रवाई करती।
लेकिन नहीं! यहाँ तो कुर्सी पर समाजवादी पार्टी बैठी थी, जिसे हर हाल में अपना ‘M-Y’ (मुस्लिम-यादव) वोटबैंक बचाना था। कवाल में सचिन और गौरव की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी की प्रशासन ने एकतरफा कार्रवाई शुरू कर दी।
मृत लड़कों के परिवार वालों को ही प्रताड़ित किया जाने लगा और लिंचिंग करने वाले मुस्लिम हत्यारों को बचाने का खेल चालू हो गया।
यहीं से एंट्री होती है बीजेपी की। जब स्थानीय हिन्दुओं को लगा की अपनी ही बहन-बेटी की इज़्ज़त बचाने वाले बेटों को मार दिया गया और ऊपर से सरकार मुज़रिमों को ही दामाद बनाकर पाल रही है, तो उनका धैर्य जवाब दे गया।
स्थानीय बीजेपी नेताओं, खासकर स्व. हुकुम सिंह और अन्य ज़मीनी कार्यकर्ताओं ने तुरंत इस नब्ज़ को पकड़ा।
बीजेपी ने खुलेआम सड़कों पर उतरकर हिन्दू समाज को यह कड़वा सच याद दिलाया की “इस सेक्युलर सरकार में तुम्हारे खून की कोई कीमत नहीं है, और अगर तुम आज नहीं जागे, तो कल तुम्हारे घरों की भी यही हालत होगी।”
विपक्ष के बोए हुए इसी नफरत के बीज ने बीजेपी को यूपी फतह करने का वो पहला और सबसे धारदार हथियार थमा दिया, जिसकी काट सपा के पास कभी थी ही नहीं।
आज़म खान ने मुस्लिम आरोपियों को छुड़ाने के लिए बाँध दिए पुलिस के हाथ, मुजफ्फरनगर में हिन्दुओं को अनाथ छोड़ने की सपा की इस भूल को बीजेपी ने बना लिया अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा

सचिन और गौरव की लिंचिंग के बाद पश्चिमी यूपी का माहौल किसी बारूद के ढेर जैसा हो गया था। जाट समुदाय का खून उबल रहा था।
लोगों की मांग बस इतनी थी की जिन गुंडों ने सरेआम दिन-दहाड़े दो भाइयों को मार डाला है, उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाला जाए।
अगर पुलिस उस वक्त अपना काम ईमानदारी से कर लेती, तो मुजफ्फरनगर की वो खूनी आग वहीं बुझ जाती। लेकिन जब सत्ता में बैठे नेता खुद पुलिस के हाथ बांध दें और उन्हें अपनी ‘कठपुतली’ बना लें, तो फिर दंगे होते नहीं हैं भाई, दंगे करवाए जाते हैं!
अखिलेश यादव की उस सरकार में आज़म खान का क्या रुतबा था, ये बात पूरे यूपी का बच्चा-बच्चा जानता है।
आज़म खान सिर्फ एक कैबिनेट मंत्री नहीं थे, बल्कि वो समाजवादी पार्टी के अघोषित ‘सुपर सीएम’ थे और सबसे बड़ी बात… उस वक्त मुजफ्फरनगर के ‘प्रभारी मंत्री’ (Minister-in-charge) आज़म खान ही थे!
पूरा का पूरा ज़िला प्रशासन सीधे आज़म खान को रिपोर्ट करता था। मुजफ्फरनगर दंगे में पुलिस की जो खामोशी थी और जो एकतरफा कार्रवाई हुई, वो सीधे तौर पर आज़म खान के भयंकर दबाव का नतीजा थी।
ज़रा ग्राउंड की हकीकत और तारीखों को समझिए। 27 अगस्त को कवाल कांड होता है। मुजफ्फरनगर के तत्कालीन एसएसपी (SSP) मंज़िल सैनी और डीएम (DM) सुरेंद्र सिंह एक्शन में आते हैं।
ये दोनों बहुत कड़क और ईमानदार अफसर माने जाते थे। मंज़िल सैनी और सुरेंद्र सिंह ने बिना किसी राजनीतिक दबाव में आए सचिन और गौरव की हत्या में शामिल 8 मुस्लिम आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया।
लेकिन भाई, ये इंसाफ आज़म खान और समाजवादी पार्टी को कैसे हज़म होता? उनका सबसे बड़ा ‘M’ (मुस्लिम) वोटबैंक नाराज़ हो रहा था। रातों-रात लखनऊ से फोन घनघनाने लगे।
आज़म खान का ऐसा खौफनाक दबाव प्रशासन पर पड़ा की पुलिस को उन गिरफ्तार किए गए मुस्लिम हत्यारों को आज़ाद करना पड़ गया। और बात सिर्फ हत्यारों को छोड़ने तक सीमित नहीं थी।
जिन ईमानदार अफसरों (SSP मंज़िल सैनी और DM सुरेंद्र सिंह) ने कानून का पालन करने की जुर्रत की थी, उन्हें आज़म खान के इशारे पर कवाल कांड के महज़ 48 घंटों के भीतर मुजफ्फरनगर से रातों-रात ट्रांसफर कर दिया गया!
ज़रा सोचिए! जिन गुंडों ने दो हिन्दू लड़कों को सरेआम पीट-पीटकर मार डाला, उन्हें पुलिस गिरफ्तार भी करती है, लेकिन हिन्दुओं से नफरत और सत्ता के नशे में चूर मंत्री उन्हें रिहा करवा देता है और ईमानदार अफसरों को ज़िले से बाहर फेंक दिया जाता है। इस एक घटना ने आग में घी डालने का काम किया।
इस बात का पक्का सबूत भी देश के सामने आया। सितंबर 2013 में ‘आजतक’ और ‘हेडलाइंस टुडे’ न्यूज़ चैनलों ने मुजफ्फरनगर दंगों पर एक ऐसा खौफनाक स्टिंग ऑपरेशन (Sting Operation) किया जिसने पूरी समाजवादी सरकार की चूलें हिला कर रख दीं।
इस खुफिया कैमरे वाले स्टिंग में मुजफ्फरनगर के फुगाना और बुढ़ाना थानों के कई बड़े पुलिस अफसर खुद अपने मुंह से सच उगलते हुए पकड़े गए।
पुलिस वालों ने कैमरे पर अपनी बेबसी ज़ाहिर करते हुए कबूल किया की-
“हमने आरोपियों को पकड़ लिया था, लेकिन आज़म खान और लखनऊ से ऐसा भयंकर दबाव आया की हमें उन्हें छोड़ना पड़ा। ऊपर से साफ़ निर्देश थे की एक खास समुदाय के खिलाफ कोई सख्ती नहीं करनी है।”
ज़रा सोचिए यार! जिन गुंडों ने दो हिन्दू लड़कों को सरेआम पीट-पीटकर मार डाला, उन्हें पुलिस गिरफ्तार भी करती है, लेकिन हिन्दुओं से नफरत और वोटबैंक के लालच में सत्ता के नशे में चूर नेता फोन करके उन्हें रिहा करवा देते हैं!
डीएसपी अरुण सिरोही और एसएचओ ओमवीर सिरोही जैसे पुलिस अधिकारियों को सिर्फ इसलिए लाइन हाज़िर कर दिया गया क्योंकि उन्होंने दंगाइयों पर सख्ती बरतने की हिम्मत दिखाई थी (हालांकि बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार के इस फैसले पर तगड़ा स्टे लगा दिया था)।
प्रशासन के इस सौतेले और घोर हिन्दू-विरोधी रवैये ने जाटों और स्थानीय हिन्दुओं को यह एहसास दिला दिया की इस सिस्टम में वो पूरी तरह से अनाथ हो चुके हैं। उनका कोई माई-बाप नहीं है।
अब आप खुद सोचिए, क्या बीजेपी इस मौके को ऐसे ही हाथ से जाने देती? बिल्कुल नहीं! उस समय यूपी के चुनाव प्रभारी थे बीजेपी के चाणक्य- अमित शाह।
शाह बहुत अच्छी तरह जानते थे की यूपी की जनता अब सपा के इस पाखंड से आजिज़ आ चुकी है। बीजेपी ने इस स्टिंग ऑपरेशन और प्रशासन के तुष्टिकरण को पूरे प्रदेश में आग की तरह फैला दिया।
बीजेपी के नेताओं ने गांव-गांव जाकर चौपालें लगाईं और जनता से सीधा सवाल किया- “क्या आप ऐसी सरकार चाहते हैं जो आपके बेटों के हत्यारों को सिर्फ इसलिए छोड़ दे क्योंकि वो एक खास धर्म के हैं?”
अमित शाह ने इस मुद्दे को महज़ ‘लॉ एंड ऑर्डर’ (Law and Order) का फेलियर नहीं, बल्कि सीधे तौर पर ‘हिन्दू अस्मिता और तुष्टिकरण’ की लड़ाई बना दिया।
जुमे की नमाज़ के बाद भड़काऊ भाषण और समाजवादी नेताओं को अखिलेश की ‘क्लीन चिट’

अगर आपको लगता है की दंगे सिर्फ सड़कों पर हुए थे, तो आप गलत हैं। इन दंगों का असली बारूद तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने अपने भड़काऊ भाषणों से बिछाया था।
कवाल कांड के ठीक बाद, 30 अगस्त 2013 को जुमे की नमाज़ के बाद मुजफ्फरनगर के खालापार और मीनाक्षी चौक पर एक बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठा की गई। प्रशासन ने धारा 144 लगा रखी थी, लेकिन हिन्दू द्वेष से भरे नेताओं को कौन रोकता?
इस भीड़ के सामने समाजवादी पार्टी के मुजफ्फरनगर शहर अध्यक्ष राशिद सिद्दीकी, कांग्रेस के पूर्व सांसद सईद-उज़-ज़मां और बसपा/सपा से जुड़े कादिर राणा जैसे मुस्लिम नेताओं ने ऐसे भड़काऊ और ज़हरीले भाषण दिए, जिन्होंने पूरे इलाके में सांप्रदायिक आग लगा दी। इन नेताओं ने खुलेआम लोगों को भड़काया।
लेकिन हद तो तब हो गई जब FIR दर्ज होने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मीडिया के सामने आकर अपने नेता को सरेआम ‘क्लीन चिट’ दे दी!
अखिलेश यादव ने कहा की “हमारे सपा नेता राशिद सिद्दीकी ने कोई भड़काऊ भाषण नहीं दिया है, ये सब विपक्ष की साज़िश है।”
कैमरे पर भड़काऊ भाषण रिकॉर्ड हैं, पुलिस की एफआईआर में नाम है, लेकिन मुख्यमंत्री खुद अपने नेता को बचा रहे थे।
बहुसंख्यक समाज के खिलाफ ज़हर उगलने वाले इन नेताओं को सत्ता का जो ये खुला संरक्षण मिला, उसी ने जाटों और हिन्दुओं के धैर्य का बांध तोड़ दिया।
और इसी भड़काऊ भाषण के जवाब में, अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए हिन्दुओं को 7 सितंबर को महापंचायत बुलानी पड़ी।
7 सितंबर 2013 को बहू-बेटी सम्मान बचाओ महापंचायत पर खूनी हमला और सपा की क्रिमिनल चुप्पी जिसके खिलाफ सड़क पर उतरकर संजीव बालियान और संगीत सोम जैसे बीजेपी नेताओं ने जीत लिया हिन्दुओं का दिल

जब सिस्टम खुद ही मुज़रिमों को पालने लगे और पीड़ितों को लाठियां मारे, तो जनता के पास सड़क पर उतरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।
आज़म खान और लखनऊ के दबाव में जब हत्यारों को छोड़ा गया, तो पूरे मुजफ्फरनगर और आस-पास के जिलों का जाट और किसान समुदाय उबल पड़ा। अपने ही गांव में, अपनी ही बेटियों और बेटों की ऐसी बेकद्री? ये किसी भी स्वाभिमानी कौम को बर्दाश्त नहीं था।
इसी आक्रोश का नतीजा था 7 सितंबर 2013 की वो ऐतिहासिक ‘बहू-बेटी सम्मान बचाओ महापंचायत’। मुजफ्फरनगर के नंगला मंदौड़ गांव के इंटर कॉलेज मैदान में यह पंचायत बुलाई गई थी।
प्रशासन को लगा था की डरा-धमका कर लोगों को रोक लिया जाएगा, लेकिन उस दिन पश्चिमी यूपी का हर वो इंसान, जिसके सीने में अपनी बहन-बेटियों के लिए इज़्ज़त थी, अपने घर से निकल पड़ा।
ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरकर एक लाख से ज़्यादा जाट, किसान और स्थानीय हिन्दू उस पंचायत में पहुंचे। उस दिन वहां ना कोई जाट था, ना गुर्जर, ना कोई दलित… सब सिर्फ एक ‘हिन्दू’ बनकर अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने आए थे।
इस महापंचायत में जो भाषण हुए, उन्होंने पश्चिमी यूपी की हवा में एक नया बारूद भर दिया। यहीं से संजीव बालियान और संगीत सोम जैसे बीजेपी नेता सिर्फ राजनेता से उठकर सीधे हिन्दुओं के ‘रक्षक’ बन गए।

मंच पर खड़े होकर संजीव बालियान (जो उस समय एक उभरते हुए स्थानीय नेता थे) ने हुंकार भरते हुए वो बात कही जो सीधे हर गांव वाले के दिल में उतर गई। संजीव बालियान ने दहाड़ते हुए कहा-
“ये लड़ाई किसी एक जाति या पार्टी की नहीं है भाई! ये हमारी बहन-बेटियों की इज़्ज़त और पगड़ी के सम्मान की लड़ाई है। आज सचिन और गौरव के साथ जो हुआ है, अगर आज हम खामोश अपने घरों में बैठ गए, तो कल ये हमारे घरों के दरवाज़े तोड़कर घुसेंगे। प्रशासन चाहे हम पर लाठियां चलाए या गोलियां, लेकिन हम अपने बेटों का खून ऐसे ही पानी नहीं होने देंगे!”
संजीव बालियान के इस बयान ने जाटों और किसानों के अंदर सुलग रही आग में घी डाल दिया। वहीं दूसरी तरफ, सरधना से बीजेपी विधायक संगीत सोम ने तो सीधा समाजवादी सरकार को चुनौती दे डाली।
संगीत सोम ने अपने चिर-परिचित आक्रामक अंदाज़ में डंके की चोट पर प्रशासन को ललकारते हुए कहा-
“अगर इस सरकार ने हिन्दुओं के खून को पानी समझ लिया है और हत्यारों को सरकारी दामाद बनाकर थानों में चाय पिलाई जा रही है, तो कान खोलकर सुन लो… हम ईंट से ईंट बजा देंगे! अगर हिन्दुओं को न्याय नहीं मिला, तो हम इस तुष्टिकरण वाले सिस्टम को उखाड़ फेंकेंगे। हमारी इस खामोशी को हमारी कमज़ोरी समझने की भूल मत करना!”
इन नेताओं के बयानों ने जनता को वो हिम्मत दी, जो सपा सरकार के पुलिसिया आतंक के कारण कहीं दब गई थी। लेकिन इस पंचायत के बाद जो हुआ, वो सीधे तौर पर ‘स्टेट स्पॉन्सर्ड टेरर’ (राज्य प्रायोजित आतंक) था।
पंचायत खत्म होने के बाद जब निहत्थे हिन्दू किसान और युवा अपने-अपने गांवों की तरफ लौट रहे थे, तो बस्सी कलां, जौली नहर और कुछ अन्य मुस्लिम बहुल इलाकों में उन पर एक सुनियोजित ‘एंबुश’ (धोखे से हमला) किया गया।
छतों से गोलियां बरसाई गईं, ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को आग लगा दी गई, कई मोटरसाइकिलों और निजी गाड़ियों को फूंक दिया गया और धारदार हथियारों से उन लोगों को काटा गया जो शांति से अपने घर लौट रहे थे।

दंगों में कई हिंदू किसानों के खेतों में खड़ी गन्ने की फसलों में आग लगाई गई और सुनसान खेतों में लगे उनके ट्यूबवेल और कृषि उपकरणों को भी तबाह कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में सपा सरकार को किसानों की इस कृषि क्षति का सर्वे कर मुआवज़ा देने का निर्देश दिया था।
हैरानी की बात ये थी की पुलिस मूकदर्शक बनी खड़ी थी! जब हिन्दुओं का खून बह रहा था, तब समाजवादी पार्टी की सरकार खामोश थी। इस खूनी हमले के बाद दंगे मुजफ्फरनगर की हदों को पार करके शामली, बागपत और मेरठ के गांवों तक फैल गए।
60 से ज़्यादा लाशें गिरीं और 50 हज़ार से ज़्यादा लोग बेघर हो गए। हालात इतने बेकाबू हो गए की 20 सालों में पहली बार उत्तर प्रदेश में दंगों को रोकने के लिए ‘आर्मी’ (सेना) बुलानी पड़ गई।
अब यहाँ गौर करने वाली बात ये है की जब ये सब हो रहा था, तब विपक्ष का कोई भी बड़ा सेक्युलर नेता हिन्दुओं के आंसू पोंछने नहीं आया। और यहीं पर बीजेपी ने बाज़ी मार ली।
जब सपा सरकार हिन्दुओं पर लाठियां भांज रही थी और उन पर झूठे केस लाद रही थी, तब संजीव बालियान, संगीत सोम, सुरेश राणा और साध्वी प्राची अपनी जान की परवाह किए बिना सड़कों पर खड़े थे।
वो सिर्फ मंच से भाषण नहीं दे रहे थे, बल्कि थानों के बाहर और सड़कों पर पुलिस के डंडों के सामने सीना तानकर खड़े थे।
अखिलेश यादव की सरकार ने अहंकार में आकर इन बीजेपी नेताओं पर सबसे खतरनाक कानून ‘रासुका’ (NSA – नेशनल सिक्योरिटी एक्ट) लगा दिया और इन्हें जेल में ठूंस दिया।
सपा को लगा की जेल भेजकर वो इन नेताओं का राजनीतिक करियर खत्म कर देंगे। लेकिन यहीं सपा ने अपना सबसे बड़ा ‘सेल्फ-गोल’ कर दिया! रासुका लगने और जेल जाने की इस घटना ने संगीत सोम और संजीव बालियान को रातों-रात पूरे हिन्दू समाज का ‘हीरो’ बना दिया।
इन नेताओं ने जेल में जाकर कोई माफ़ीनामा नहीं लिखा, बल्कि अपनी गिरफ़्तारी को एक मेडल की तरह सीने पर सजा लिया।
बीजेपी ने बहुत ही सलीके से जनता के बीच यह नैरेटिव सेट कर दिया की “जब तुम्हारे घर जल रहे थे, तो सिर्फ हम तुम्हारे साथ खड़े थे।”
जब संगीत सोम और संजीव बालियान जेल से छूटकर बाहर आए, तो पश्चिमी यूपी में उनका स्वागत किसी विजयी राजा-महाराजा की तरह हुआ।
फूल-मालाओं और नारों से आसमान गूंज उठा। सपा के इस एकतरफा अत्याचार और बीजेपी नेताओं के इस ज़मीनी संघर्ष ने पश्चिमी यूपी में ऐसा भयंकर ध्रुवीकरण कर दिया की जातियों की दीवारें टूट गईं।
इसी संघर्ष ने हिन्दुओं के दिलों में बीजेपी के लिए एक ऐसी पक्की जगह बना दी, जिसे कोई मायावती, अजीत सिंह या अखिलेश यादव कभी हिला नहीं पाए।
आज़ाद भारत का सबसे खतरनाक तुष्टिकरण, जब अखिलेश सरकार ने सिर्फ मुसलमानों को बांटे 5-5 लाख रुपये और बीजेपी ने इसे मुद्दा बनाकर पूरे देश में खोल दी समाजवादी पाखंड की पोल
दंगे खत्म हो चुके थे, लाशें गिनी जा चुकी थीं और बेघर हुए लोग ठिठुरती सर्दियों में राहत शिविरों (Relief Camps) में दिन काट रहे थे।
किसी भी सभ्य समाज और सरकार का ये पहला कर्तव्य होता है की वो दंगे में उजड़े हुए हर इंसान के आंसू पोंछे, चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान। आग जब लगती है तो वो किसी का धर्म देखकर घर नहीं जलाती।
लेकिन 26 अक्टूबर 2013 को अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने एक ऐसा खौफनाक और शर्मनाक सरकारी फरमान जारी किया, जिसे सुनकर पूरे देश के होश उड़ गए। ये आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे बिकाऊ और सबसे घिनौना तुष्टिकरण था।
यूपी की समाजवादी सरकार ने 90 करोड़ रुपये का एक भारी-भरकम बजट पास किया और एक सरकारी नोटिफिकेशन जारी करके ऐलान किया की दंगे से प्रभावित होकर जो लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं, उनमें से सिर्फ ‘मुस्लिम परिवारों’ को घर बसाने के लिए 5-5 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाएगा।
ज़रा ठहरिए और इस बात को दोबारा पढ़िए! एक सेक्युलर देश की चुनी हुई सरकार, सरकारी खजाने से सिर्फ एक ‘विशेष धर्म’ के लोगों को 5 लाख रुपये बांट रही थी।
क्या दंगे में हिन्दुओं के घर नहीं जले थे? क्या जाटों और दलितों के ट्रैक्टर और दुकानें खाक नहीं हुई थीं? क्या जाटों के परिवार विस्थापित होकर तंबूओं में नहीं रह रहे थे? सरकार ने उन्हें पूरी तरह से अनाथ छोड़ दिया। उनके लिए फूटी कौड़ी भी नहीं दी गई।
अखिलेश सरकार ने सरेआम मुजफ्फरनगर के हिन्दुओं को बता दिया की “तुम हमारे लिए कीड़े-मकोड़ों से ज़्यादा कुछ नहीं हो, हमारा असली वोटबैंक सिर्फ मुसलमान हैं और हम सिर्फ उन्हीं को पालेंगे।”
विपक्ष की इसी मूर्खता और हिन्दू-विरोधी मानसिकता का इंतज़ार बीजेपी के चाणक्य कर रहे थे। अखिलेश यादव ने अपने ही हाथों बीजेपी को 2014 का सबसे बड़ा चुनावी ब्रह्मास्त्र थमा दिया था।
बीजेपी ने इस मुद्दे को सिर्फ यूपी ही नहीं, बल्कि पूरे देश में उछाल दिया। नरेंद्र मोदी ने अपनी तूफानी रैलियों में इस 5 लाख रुपये वाले आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए इसे “वोटबैंक की अंधी और अमानवीय राजनीति” करार दिया।
मोदी जी ने जनता से सीधा सवाल किया की “क्या कोई सरकार लाशों और उजड़े हुए घरों में भी धर्म ढूंढ सकती है?”
राजनाथ सिंह और यूपी के प्रभारी अमित शाह ने डंके की चोट पर अपनी सभाओं में दहाड़ते हुए कहा की “समाजवादी पार्टी के राज में हिन्दू दूसरे दर्जे (Second-class) का नागरिक बनकर रह गया है।”
बीजेपी ने इसे ‘तुष्टिकरण बनाम न्याय’ की लड़ाई में बदल दिया। उन्होंने गांव-गांव जाकर जाटों, गुर्जरों और दलितों को समझाया की अगर तुम आज जातियों में बंटकर सपा या बसपा को वोट दोगे, तो कल ये लोग तुम्हारी लाशों पर भी राजनीति करेंगे।
सपा का वो 5 लाख रुपये वाला आदेश कोई राहत पैकेज नहीं था, वो हिन्दुओं के ज़ख्मों पर नमक रगड़ने का काम कर रहा था। बीजेपी ने कुछ नया नहीं किया, उसने बस उस नमक से हो रही जलन को सही दिशा दे दी।
विपक्ष ने खुद अपने पाखंड का ढिंढोरा पीटा और बीजेपी ने पूरे देश में ये साबित कर दिया की “ये तथाकथित सेक्युलर पार्टियां सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं से नफरत करती हैं।”
और यकीन मानिए, इसी एकतरफा मुआवज़े ने 2014 में अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक ज़मीन को हमेशा के लिए खिसका दिया।
जब सुप्रीम कोर्ट के हथौड़े ने तोड़ा समाजवादी पार्टी का मुस्लिम-प्रेम और इस करारी फटकार के बाद बीजेपी ने डंके की चोट पर पूरे यूपी में खड़ा कर दिया हिन्दुत्व का तूफान
कोई भी सरकार जब सत्ता के नशे में अंधी हो जाती है, तो उसे लगता है की वो संविधान और कानून से भी ऊपर है। अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार को भी यही गलतफहमी हो गई थी।
उन्हें लगा की सिर्फ मुसलमानों को 5-5 लाख रुपये बांटकर वो अपना वोटबैंक पक्का कर लेंगे और बेबस हिन्दू खामोश बैठकर तमाशा देखता रहेगा। लेकिन कहते हैं ना की पाप का घड़ा जब भरता है, तो वो फूटता भी बहुत ज़ोर से है।
अखिलेश सरकार का यह शर्मनाक और एकतरफा सरकारी आदेश आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा धब्बा था। लेकिन इस देश में अभी भी न्याय की एक चौखट बाकी थी- सुप्रीम कोर्ट!
21 नवंबर 2013 का वो दिन समाजवादी पार्टी के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) पी. सदाशिवम की बेंच के सामने जब यह मामला पहुंचा, तो सुप्रीम कोर्ट के जजों ने समाजवादी सरकार की जो क्लास लगाई, उसकी गूंज पूरे देश ने सुनी।
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार के वकीलों को सरेआम फटकार लगाते हुए वो बात कही जो बीजेपी महीनों से सड़कों पर कह रही थी। कोर्ट ने कड़े शब्दों में पूछा-
“राहत कार्यों में कोई सरकार किसी एक धर्म को कैसे फेवर कर सकती है? एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) राज्य अपने ही नागरिकों के बीच धर्म के नाम पर भेदभाव का ये गंदा खेल कैसे खेल सकता है? अगर आप ऐसा करेंगे तो दंगे रुकेंगे नहीं, बल्कि और भड़केंगे!”
सुप्रीम कोर्ट का ये हथौड़ा इतना भारी था की समाजवादी पार्टी का सारा मुस्लिम-प्रेम एक झटके में चकनाचूर हो गया। कोर्ट ने तुरंत उस ‘सिर्फ मुसलमानों को 5 लाख’ वाले असंवैधानिक नोटिफिकेशन को रद्द करने का आदेश दिया।
कोर्ट के डंडे के बाद अखिलेश सरकार को घुटने टेकने पड़े और मजबूरन हिन्दू (जाट, दलित आदि) विस्थापितों को भी वही मुआवज़ा देना पड़ा जो वो अब तक सिर्फ एक विशेष समुदाय को लुटा रहे थे।
अब आप खुद सोचिए, बीजेपी के लिए इससे बड़ा जैकपॉट क्या हो सकता था? जो बात बीजेपी के नेता रैलियों में चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे, उसी बात पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपनी संवैधानिक मुहर लगा दी थी।
बीजेपी ने इस मौके को दोनों हाथों से लपका। बीजेपी के कार्यकर्ता और नेता सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की कॉपी लेकर पूरे यूपी के गांवों, चौपालों और कस्बों में निकल पड़े।
उन्होंने डंके की चोट पर जनता को बताया की “देखो! हम तो पहले ही कहते थे कि ये सपा सरकार घोर हिन्दू-विरोधी है, आज तो सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है।”
इस एक अदालती फैसले ने विपक्ष के उस झूठे ‘सेक्युलरिज्म’ के बुर्के को पूरी तरह तार-तार कर दिया।
यूपी का वो बहुसंख्यक समाज जो अब तक थोड़ा बहुत कन्फ्यूज़ था, उसे भी समझ आ गया की अगर इस देश में हिन्दुओं के हक़ की बात कोई डंके की चोट पर कर सकता है, तो वो सिर्फ और सिर्फ बीजेपी है।
सुप्रीम कोर्ट की इस करारी फटकार ने विपक्ष की ताबूत में आख़िरी कील ठोक दी और पूरे यूपी में हिन्दुत्व का ऐसा भयंकर तूफान खड़ा कर दिया जिसे रोक पाना किसी माई के लाल के बस की बात नहीं थी।
“राहत शिविरों में तो ‘षड्यंत्रकारी’ बैठे हैं”.. अखिलेश और मुलायम के वो बयान जिन्होंने हिन्दुओं के ज़ख्मों पर रगड़ा नमक और बीजेपी का तूफानी पलटवार
जब मुजफ्फरनगर दंगों की आग शांत हो गई और लोग कड़कड़ाती सर्दियों में टेंटों (राहत शिविरों) के नीचे ठिठुर रहे थे, तब किसी भी मुख्यमंत्री या सरकार का काम उनके आंसू पोंछना होता है। लेकिन समाजवादी पार्टी के नेताओं ने पीड़ितों के ज़ख्मों पर मलहम लगाने के बजाय सीधा नमक रगड़ना शुरू कर दिया।
दिसंबर 2013 में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने एक ऐसा संवेदनहीन बयान दिया, जिसने पूरे देश के रोंगटे खड़े कर दिए। मुलायम सिंह ने कैमरे के सामने हंसते हुए कहा-
“राहत शिविरों में कोई दंगा पीड़ित नहीं रह रहा है! ये सब तो बीजेपी और कांग्रेस के भेजे हुए राजनीतिक कार्यकर्ता और षड्यंत्रकारी हैं, जो वहां रात में धरना देने बैठ जाते हैं।”
ज़रा सोचिए! जिन लोगों के घर जला दिए गए, जिनके बच्चे सर्दियों में निमोनिया से मर रहे थे, सत्ता के नशे में चूर ‘नेताजी’ उन्हें दंगाई और षड्यंत्रकारी बता रहे थे।
खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस पूरे दंगे का ठीकरा अपने नेताओं (आज़म खान) के सिर से हटाकर सीधे बीजेपी के सिर फोड़ दिया।
विधानसभा में खड़े होकर अखिलेश यादव ने डंके की चोट पर कहा की- “मुजफ्फरनगर में जो कुछ भी हुआ, वो बीजेपी की रची हुई एक राजनीतिक साज़िश थी। फेक वीडियो और MMS से दंगे भड़काए गए।”
लेकिन बीजेपी के रणनीतिकार कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। जब मुलायम और अखिलेश ने ये बयान दिए, तो बीजेपी ने इसे हाथों-हाथ लिया और इसे पूरे हिन्दू समाज के स्वाभिमान से जोड़ दिया।
नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में दहाड़ते हुए कहा- “जो सरकार राहत शिविरों में ठंड से मरते हुए बच्चों की चीखें नहीं सुन सकती, वो सरकार उत्तर प्रदेश तो क्या, एक गांव चलाने के लायक भी नहीं है।”
सपा के इन बयानों ने बीजेपी का काम इतना आसान कर दिया की उन्हें अब कुछ साबित करने की ज़रूरत ही नहीं थी। अखिलेश और मुलायम ने पश्चिमी यूपी के हिन्दुओं को चीख-चीख कर बता दिया था की सपा की नज़रों में उनके दर्द की कोई हैसियत नहीं है।
मुजफ्फरनगर के समाजवादी रायते ने कैसे मिटा दिया यूपी से विपक्ष का नामो-निशान और अमित शाह की रणनीति ने बिना मांगे ही बीजेपी की झोली में डाल दी 73 सीटों की ऐतिहासिक दावत
जब आप किसी समाज को जानबूझकर ज़लील करते हैं, उसे अनाथ छोड़ देते हैं, तो वो समाज रोता है… वो इंतज़ार करता है उस दिन का, जब वो आपको आपकी सही जगह दिखा सके।
और यूपी के जाटों, गुर्जरों, दलितों और ब्राह्मणों के लिए वो दिन आया 2014 के लोकसभा चुनाव में।
पश्चिमी यूपी की राजनीति दशकों से एक बहुत ही खास फॉर्मूले पर चल रही थी। चौधरी चरण सिंह के ज़माने से यहाँ ‘जाट-मुस्लिम गठजोड़’ का दबदबा था।
इसी गठजोड़ के दम पर अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोक दल (RLD) और समाजवादी पार्टी यहाँ से मलाई खाती थीं। लेकिन मुजफ्फरनगर के दंगों में सपा की इस तुष्टिकरण वाली राजनीति ने इस दशकों पुराने गठजोड़ को हमेशा-हमेशा के लिए राख कर दिया।
अमित शाह, जो उस वक्त यूपी के चुनाव प्रभारी थे, उन्होंने इस सुलगते हुए ज्वालामुखी को बहुत करीब से महसूस किया। अमित शाह का ज़मीनी ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ यहाँ काम आया।
उन्होंने कोई हवा-हवाई बात नहीं की, बल्कि सीधे उस दर्द पर हाथ रखा जो सपा सरकार ने हिन्दुओं को दिया था। अमित शाह की रणनीति का ही कमाल था की यूपी में जातियों की वो पुरानी दीवारें भरभरा कर गिर गईं।
जाट, गुर्जर, ठाकुर, ब्राह्मण, दलित और अति-पिछड़े… सब अपनी-अपनी जातियों का चोला उतार कर सिर्फ और सिर्फ ‘हिन्दू’ के झंडे तले एकजुट हो गए।
सबके दिल में एक ही आग जल रही थी की उस समाजवादी पार्टी को सज़ा देनी है जिसने हमारी लाशों पर भी धर्म की राजनीति की थी। और जब 2014 के चुनावी नतीजे आए, तो टीवी पर बैठे बड़े-बड़े पत्रकारों और विश्लेषकों के तोते उड़ गए।
उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से बीजेपी गठबंधन ने 73 सीटों (71 बीजेपी + 2 अपना दल) पर ऐतिहासिक कब्ज़ा जमा लिया। ये कोई जीत नहीं थी, ये विपक्ष का पूर्ण विनाश था!
मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP), जो कभी यूपी की बेताज बादशाह हुआ करती थी, उसका खाता तक नहीं खुला (0 सीटें)।
मुस्लिम-जाट गठजोड़ का घमंड पालने वाली अजीत सिंह की आरएलडी (RLD) का सूपड़ा साफ हो गया (0 सीटें)।
और वो समाजवादी पार्टी, जो मुसलमानों को 5-5 लाख बांटकर यूपी फतह करने का सपना देख रही थी? वो सिर्फ अपने कुनबे और मुलायम परिवार की 5 सीटों पर सिमट कर रह गई।
बीजेपी की इस बंपर और ऐतिहासिक जीत का पूरा क्रेडिट मोदी लहर को देना सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा। असल बात तो ये है की बीजेपी ने कोई जादू-टोना नहीं किया था।
जब अखिलेश यादव की सरकार ने तुष्टिकरण की सारी हदें पार करके हिन्दुओं को लावारिस छोड़ने की मूर्खता की, तो बीजेपी ने बस आगे बढ़कर उस डरे और ठगे हुए बहुसंख्यक समाज को अपने गले लगा लिया।
विपक्ष ने मुजफ्फरनगर में अपने पैरों पर जो कुल्हाड़ी मारी, उसने बीजेपी को यूपी में अजेय बना दिया।
अगर उस वक्त समाजवादी पार्टी एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ सरकार की तरह बर्ताव करती, अगर वो मुज़रिमों को धर्म देखकर ना बचाती और अगर वो हिन्दुओं के जले घरों की भी कीमत समझती, तो शायद 2014 में बीजेपी को यूपी में इतनी आसानी से 73 सीटें कभी ना मिलतीं।
यही इस सीरीज़ का सबसे बड़ा और कड़वा सच है! बीजेपी कोई अजय मशीन नहीं है, विपक्ष ही अनाड़ी है। ये खुद ही अपने अहंकार और पाखंड का ऐसा रायता फैलाते हैं की बीजेपी को बस चम्मच उठाकर अपनी जीत की दावत उड़ानी होती है।
अगले एपिसोड में हम बात करेंगे विपक्ष के एक और ऐसे ही ऐतिहासिक ‘सुसाइड गोल’ की, जिसने हिन्दुओं को झकझोर कर बीजेपी के पीछे खड़ा कर दिया!
