हिंद महासागर में भारत को घेरने चला था चीन, भारत की नयी दमदार विदेश नीति ने एक ही झटके में फुस्स कर दिया ड्रैगन का सारा प्लान, 38 साल बाद श्रीलंका के साथ मिलकर भारत ने तैयार कर लिया अपना मास्टरप्लान

दोस्तों हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने एक बात कही थी जो आज भी पत्थर की लकीर जैसी सच है- “आप अपने दोस्त बदल सकते हैं, आप दुश्मन भी बदल सकते हैं, लेकिन अपना पड़ोसी कभी नहीं बदल सकते।”

अब ज़रा नक्शा उठाकर देखिए। पूरी दुनिया में सिर्फ एक ही समंदर ऐसा है जिसका नाम किसी देश के नाम पर रखा गया है, और वो है हमारा अपना ‘हिंद महासागर’ (Indian Ocean)।

और इसी समंदर में हमारे ठीक नीचे एक हमारा पुराना छोटा सा पड़ोसी बैठा है, जिसे हम श्रीलंका कहते हैं। सदियों से हमारी रामायण काल से जुड़ी संस्कृति हो या फिर खून-पसीने का नाता, श्रीलंका हमेशा से भारत के करीब रहा है।

लेकिन बीच में ऐसा दौर आया जब हमारी सुस्त कूटनीति का फायदा उठाकर चालबाज चीन ने हम दोनों देशों के बीच खड़े हिंद महासागर में अपनी गन्दी नज़रें गड़ा दीं।

ड्रैगन को लगने लगा था की उसने श्रीलंका को अपनी जेब में रख लिया है और अब वो जब चाहे तब हिंद महासागर में अपनी मनमानी करेगा।

लेकिन चीन शायद भूल गया था की अब भारत 90 के दशक वाला लाचार देश नहीं है। भारत ने अपनी नई और आक्रामक विदेश नीति का ऐसा चाबुक चलाया है की बीजिंग में बैठे शी जिनपिंग की सारी हेकड़ी धरी की धरी रह गई।

भारत की तगड़ी नयी विदेश नीति, 38 साल बाद श्री लंका में पहुंचे विदेश मंत्री और हिंद महासागर में शुरू हो गई ड्रैगन की उल्टी गिनती

दोस्त, इतिहास गवाह है की जब आप अपने घर का दरवाजा खुला छोड़ देते हैं, तो बाहर के चोर-उचक्के अंदर ताक-झांक करने लगते हैं।

श्रीलंका के साथ भी भारत से कुछ ऐसी ही कूटनीतिक चूक हुई थी। ज़रा सोचिए, साल 1988 के बाद से- यानी जब रक्षा मंत्री के.सी. पंत वहां गए थे- पूरे 38 साल तक भारत का कोई भी रक्षा मंत्री श्रीलंका नहीं गया था।

38 साल कोई छोटा समय नहीं होता यार। लगभग चार दशक तक हमारे रक्षा मंत्रियों ने अपने इस सबसे अहम समुद्री पड़ोसी की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा।

इसी खालीपन का फायदा ड्रैगन ने उठाया। चीन ने वहां पैसे फेंके, नेताओं को अपनी तरफ खींचा और श्रीलंका को कर्ज के जाल में फंसाकर भारत को घेरने का पूरा चक्रव्यूह रच डाला।

लेकिन 9 सितंबर 2026 को जब भारत के रक्षा मंत्री कोलंबो की जमीन पर उतरे, तो समझो 38 साल का वो सूखा एक ही झटके में खत्म हो गया।

इस दौरे ने साफ कर दिया की भारत अब अपने समंदर में किसी तीसरे की दादागिरी बर्दाश्त नहीं करेगा। श्रीलंका ने भी अपने पुराने भाई का ऐसा गर्मजोशी से स्वागत किया की चीन के सरकारी अखबारों में मातम छा गया।

यह दौरा सिर्फ हाथ मिलाने या फोटो खिंचवाने के लिए नहीं था, बल्कि यह चीन को उसके ही खेल में मात देने के लिए तैयार किए गए भारत के उस ‘मास्टरप्लान’ का ऐलान था, जिसकी तैयारी नई दिल्ली के गलियारों में पिछले कई महीनों से चल रही थी।

श्रीलंका के राष्ट्रपति का वो एक वादा जिसने बीजिंग में मचाया हड़कंप और साइन हो गए तीन घातक रक्षा समझौते

इस पूरे दौरे का सबसे बड़ा धमाका तब हुआ जब श्रीलंका के नए राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने भारत के सामने वो बात कह दी, जिसे सुनकर चीन के पसीने छूट गए।

राष्ट्रपति ने साफ और कड़े लफ़्ज़ों में पूरी दुनिया के सामने ऐलान कर दिया- “श्रीलंका की जमीन का इस्तेमाल कभी भी और किसी भी सूरत में भारत की सुरक्षा के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा।”

ज़रा इस बयान की गहराई समझिए! यह केवल एक कूटनीतिक लाइन नहीं थी, यह बीजिंग के मुंह पर मारा गया ऐसा जोरदार तमाचा था जिसकी गूंज पूरे हिंद महासागर में सुनाई दी।

चीन को सीधा-सीधा समझा दिया गया की श्रीलंका कोई उसकी जागीर नहीं है जिसे वो भारत के खिलाफ अपना मिलिट्री बेस बना लेगा।

और बात सिर्फ बातों तक नहीं रुकी भाई, मेज पर फाइलें खुलीं और दोनों देशों ने एक साथ तीन ऐसे रक्षा समझौतों पर दस्तखत किए जिन्होंने ड्रैगन के होश उड़ा दिए!

पहला बड़ा वार था श्रीलंका की ‘L-70 एयर डिफेंस गन’ का अपग्रेडेशन। ये 40 एमएम की वो घातक तोपें हैं जो आसमान से आने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों और मिसाइलों को पलक झपकते ही भून डालती हैं।

भारत ने अपनी तरफ से भारी फंड और ग्रांट देकर भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के जरिए इन सभी तोपों को बिल्कुल नए जमाने के रडार और ऑटोमैटिक फायर सिस्टम से लैस करने का फैसला किया।

मतलब अब श्रीलंका के आसमान की हिफाजत सीधे ‘मेड इन इंडिया’ हथियारों के दम पर होगी।

दूसरा समझौता हुआ दोनों देशों के नेशनल डिफेंस कॉलेजों (NDC) के बीच। अब श्रीलंका के सैन्य अफसर और भारत के जांबाज कमांडर एक साथ बैठकर हिंद महासागर की सुरक्षा की नई रणनीतियां बनाएंगे।

और तीसरा पत्ता चला गया ‘सॉफ्ट पावर’ का, यानी नेशनल कैडेट कोर (NCC) का यूथ एक्सचेंज।

स्कूल-कॉलेज के नौजवान जब एक-दूसरे के देश में आएंगे-जाएंगे, तो दोनों मुल्कों के बीच वो दिलों का रिश्ता फिर से मजबूत होगा जिसे चीन अपनी दौलत के दम पर कभी नहीं खरीद सकता।

इतना ही नहीं, इस दौरे में 3 नए ‘बेली ब्रिजेस’ (Bailey Bridges) का भी फीता काटा गया। जब साइक्लोन दितवाह (Cyclone Ditwah) के बाद श्रीलंका की सड़कें और पुल बह गए थे और वहां का पूरा सिस्टम ठप हो गया था, तब चीन कहीं नजर नहीं आया।

तब भारत की सेना ने ‘ऑपरेशन सागर बंधु’ चलाकर रातों-रात ये मजबूत पुल खड़े कर दिए थे।

भारत ने साबित कर दिया की जब समंदर में कोई आफत आती है, तो भारत ही सबसे पहला मददगार बनकर खड़ा होता है, चीन की तरह गिद्ध बनकर जमीनें नहीं छीनता।

समंदर का वो चोकपॉइंट जहां टिकी है भारत के तीनों कोनों की सुरक्षा और पूरी दुनिया का व्यापार

अगर आप दुनिया का नक्शा अपनी आंखों के सामने लाएंगे, तो आपको समझ आएगा की श्रीलंका सिर्फ एक छोटा सा टापू नहीं है, बल्कि वो हिंद महासागर के बीचों-बीच बना हुआ वो ‘टोल प्लाजा’ है जहां से गुजरे बिना दुनिया का कोई बड़ा पानी का जहाज आगे बढ़ ही नहीं सकता।

बहुत से लोगों को लगता है की समंदर तो खुला पानी है, जिसे जिधर मन करे जहाज मोड़ ले। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं होता भाई!

समंदर में भी बाकायदा पक्के रास्ते होते हैं, जिन्हें दुनिया की भाषा में ‘सी-लाइंस ऑफ कम्युनिकेशन’ (SLOCs) कहा जाता है। अब ज़रा खेल समझिए।

मलेशिया और इंडोनेशिया के पास जो मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) है, वहां से जो भी विशाल जहाज निकलता है, उसे यूरोप या अमेरिका जाने के लिए ठीक श्रीलंका के नीचे से होकर गुजरना पड़ता है।

एक रास्ता श्रीलंका के करीब से कटकर सीधे लाल सागर और स्वेज नहर होते हुए यूरोप और अमेरिका की तरफ निकल जाता है।

और दूसरा रास्ता वहीं से मुड़कर सीधे ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ यानी खाड़ी देशों की तरफ जाता है, जहां से पूरी दुनिया का कच्चा तेल आता है।

मतलब दुनिया भर की फैक्टरियों का माल हो या फिर खाड़ी देशों से आने वाला पेट्रोल-डीजल, लगभग 80 फीसदी समुद्री व्यापार ठीक श्रीलंका की नाक के नीचे से होकर निकलता है।

अब ज़रा अपने भारत की तरफ देखिए। हमारा देश तीन तरफ से पानी से घिरा हुआ प्रायद्वीप (Peninsular India) है।

हमारी 7500 किलोमीटर से भी लंबी समुद्री सीमा है। एक तरफ अरब सागर, दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी और नीचे हिंद महासागर।

हमारी पूरी इकॉनमी, हमारी फैक्ट्रियों के लिए आने वाला कच्चा तेल और हमारे बंदरगाहों की सुरक्षा इसी बात पर टिकी है की हमारे नीचे का ये समंदर बिल्कुल शांत और महफूज रहे।

अगर श्रीलंका में कोई ऐसा देश आकर अपना सैन्य अड्डा बना ले जो भारत से खार खाता हो, तो समझो हमारी पूरी समुद्री सीमा पर 24 घंटे खतरा मंडराता रहेगा।

इसीलिए श्रीलंका का भारत के पाले में खड़ा होना कोई शौक नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘करो या मरो’ का सवाल है।

हम्बनटोटा की 99 साल की लीज और जासूसी जहाजों की नौटंकी, कैसे श्रीलंका के बहाने भारत को घेरने चला था ड्रैगन

और इसी बात का फायदा उठाने के लिए ड्रैगन ने अपना सबसे गंदा खेल शुरू किया। चीन का काम करने का तरीका बिल्कुल गांव के उस लालची ब्याजखोर महाजन जैसा है, जो पहले गरीब किसान को महंगे ब्याज पर कर्ज बांटता है और जब वो चुका नहीं पाता, तो उसकी पूरी ज़मीन ही अपने नाम लिखवा लेता है।

इसे दुनिया की भाषा में ‘डेट ट्रैप डिप्लोमेसी’ (Debt Trap) कहा जाता है।

चीन ने श्रीलंका के पिछले नेताओं को बहला-फुसलाकर ऐसे सफेद हाथी जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए अरबों डॉलर का कर्ज बांट दिया, जिनकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी।

जैसे मत्ताला का वो इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जहां साल भर में एक दर्जन फ्लाइट्स भी नहीं उतरती थीं, जिसे दुनिया का सबसे खाली एयरपोर्ट कहा गया! और दूसरा था श्रीलंका के दक्षिणी कोने पर बना ‘हम्बनटोटा पोर्ट’ (Hambantota Port)।

जब 2022 में श्रीलंका दिवालिया हो गया और दाने-दाने को तरसने लगा, तो चीन ने अपना असली रंग दिखाया। उसने कोई दया नहीं दिखाई, बल्कि श्रीलंका की गर्दन मरोड़कर इस रणनीतिक हम्बनटोटा पोर्ट को पूरे 99 साल की लीज पर अपने नाम लिखवा लिया!

यही था चीन का कुख्यात ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (मोतियों की माला) का वो प्लान, जिसके तहत वो पाकिस्तान में ग्वादर, म्यांमार में क्याउकप्यू, बांग्लादेश और फिर श्रीलंका में हम्बनटोटा पर कब्जा करके भारत को चारों तरफ से समंदर में घेरना चाहता था।

इसके बाद चीन ने अपनी जासूसी नौटंकी शुरू की। कभी ‘युआन वांग’ (Yuan Wang) तो कभी ‘शी यान’ (Shi Yan) जैसे अपने तथाकथित ‘रिसर्च जहाजों’ को श्रीलंका के तटों पर भेजना शुरू कर दिया।

नाम तो इनका रिसर्च शिप था, लेकिन असल में ये तैरते हुए जासूसी अड्डे थे।

ये जहाज हिंद महासागर के तल की गहराई नापते थे ताकि वहां चीनी पनडुब्बियां छिपकर घूम सकें, और साथ ही ओडिशा के चांदीपुर और अब्दुल कलाम द्वीप से होने वाले भारत के गुप्त मिसाइल टेस्ट्स का डेटा चुराने की ताक में रहते थे।

चीन सोच रहा था की जैसे उसने साउथ चाइना सी में छोटे-छोटे देशों जैसे फिलीपींस पर दादागिरी की, वैसे ही वो हिंद महासागर में भी भारत को दबा लेगा।

लेकिन भारत की नई और चौकन्नी विदेश नीति ने वक्त रहते ड्रैगन की इस पूरी चाल को भांप लिया और वहीं से शुरू हुआ भारत का वो जवाबी पलटवार जिसने चीन के सारे समीकरण बिगाड़ कर रख दिए।

भारत का ग्रेट निकोबार का वो मास्टरस्ट्रोक जिसने दबा दी चीन के जहाजों की गर्दन

अब बात करते हैं भारत के उस सबसे बड़े कूटनीतिक पासे की, जिसने चीन के होश उड़ा कर रख दिए हैं। भारत ने साफ कर दिया है की हमारा एक बड़ा विजन है जिसे ‘महासागर’ और SAGAR (Security and Growth for All in the Region) कहा जाता है।

इसका सीधा मतलब है- इस समंदर में रहने वाले हर मुल्क की सुरक्षा और तरक्की हमारा साझा मिशन है, यहां किसी एक ड्रैगन की दादागिरी नहीं चलेगी।

भारत ने इस पूरे इलाके में सच्चे ‘बड़े भाई’ (Modern Gujral Doctrine) की भूमिका निभाई है। 2022 का वो दौर याद कीजिए जब श्रीलंका में भुखमरी फैल गई थी, पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी कतारें थीं और लोग सड़कों पर उतर आए थे।

तब जिस चीन से श्रीलंका ने अरबों डॉलर का कर्ज लिया था, वो बीजिंग में मुंह छिपाकर बैठ गया और उसने मदद का एक ढक्कन तक नहीं भेजा।

उस वक्त नई दिल्ली ने अपना खजाना खोल दिया था! भारत ने 4 बिलियन डॉलर की सीधी मदद भेजी, दवाइयां भेजीं, बच्चों के लिए दूध और राशन भेजा, और श्रीलंका को दोबारा पैरों पर खड़ा किया।

श्रीलंका के लोगों को समझ आ गया कि संकट में जो काम आए वही अपना है, बाकी तो सिर्फ कागजी लाला हैं।

और अब सुनिए भारत का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक- ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’!

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी कोने ‘गलाथिया बे’ में भारत करीब 72,000 करोड़ रुपये की लागत से एक बहुत बड़ा इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और पूरा शहर बसा रहा है।

अब तक दुनिया के जितने बड़े मालवाहक जहाज निकलते थे, वो सब सिंगापुर में जाकर रुकते थे। लेकिन ग्रेट निकोबार बनने के बाद वो सारे जहाज भारत के पाले में रुकेंगे।

और सबसे बड़ा डर चीन को इस बात का है की ये ग्रेट निकोबार बिल्कुल उस मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर बैठा है, जहां से चीन का 80 फीसदी कच्चा तेल और पूरा एक्सपोर्ट गुजरता है।

मतलब अगर कल को चीन ने हम्बनटोटा या हिंद महासागर में कोई भी उल्टी-सीधी हरकत करने की कोशिश की, तो भारत निकोबार के मुहाने पर एक सीटी बजाकर चीन के सारे जहाजों का रास्ता रोक सकता है!

साथ ही, भारत और श्रीलंका की सेनाएं अब हर साल ‘मित्र शक्ति’ नाम का मिलिट्री अभ्यास और नौसेनाएं ‘SLINEX’ नाम का समुद्री युद्धाभ्यास कर रही हैं।

‘कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव’ (CSC) के जरिए भारत, श्रीलंका, मालदीव और मॉरीशस ने मिलकर समंदर में एक ऐसा चक्रव्यूह बना दिया है जिसमें चीन का कोई भी जासूसी जहाज अब बिना पकड़े नहीं घूम सकता।

तो पूरा खेल यही है की चीन जो सपना देख रहा था की वो श्रीलंका को अपना गुलाम बनाकर भारत पर तोपें तान देगा, भारत की नई विदेश नीति ने उस सपने को हमेशा के लिए चकना चूर कर दिया है!

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