आपने देखा होगा की नवरात्रि आते ही हमारे पूरे मोहल्ले का माहौल कैसे बदल जाता है। घरों में कलश की स्थापना, नौ के नौ दिन का उपवास, शाम होते ही मां दुर्गा की आरती और ढोल-नगाड़ों की गूंज… हर हिंदू परिवार के लिए ये दिन बड़े ही पावन और खास होते हैं।
हमारी बहन-बेटियां साल भर इंतज़ार करती हैं की कब नवरात्रि आएगी और कब वो मां के सामने सज-धज कर गरबा खेलेंगी। ये हमारे लिए कोई नाच-गाना नहीं, बल्कि मां अंबे की पूजा करने का अपना एक पारंपरिक तरीका है।
लेकिन पिछले कुछ सालों से इस पूरे माहौल में एक अजीब सी गंदगी घुलने लगी है। जिस गरबा को हम पूजा-पाठ और भक्ति का जरिया मानते हैं, उसे कुछ लोगों ने किसी पब या डिस्को का नाच-गाना समझ लिया है।
और सबसे ज्यादा दिमाग तो तब खराब होता है, जब पंडालों में वो गैर-हिन्दू मुंह उठाकर चले आते हैं जिनका हमारे धर्म, हमारे रीति-रिवाजों और हमारे देवी-देवताओं से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।
अरे भाई, सीधा सा सवाल है- जो लोग साल के 365 दिन हमारी मूर्ति पूजा को हराम बताते हैं, पत्थरों को पूजने पर हमारा मज़ाक उड़ाते हैं, वो अचानक इन नौ दिनों में गरबा पंडालों के चक्कर क्यों काटने लगते हैं?
साफ दिख रहा है की ये कोई श्रद्धा या भक्ति की वजह से नहीं आ रहे, बल्कि इनका मकसद कुछ और ही है। हमारी बेटियों पर गन्दी नज़र रखना और और लव-जिहाद में उनको फ़साने के षड्यंत्र खोजना.. यही इनका असली मकसद है।
जब मूर्ति पूजा है ‘हराम’, तो मां जगदंबा की चौखट पर क्या करने आते हैं ये शांतिदूत
ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिये। किसी भी मजहब की एक बुनियादी सोच होती है। इस्लाम की सबसे पहली और सबसे बड़ी शर्त ही ‘तौहीद’ है, यानी सिर्फ एक को मानना।
वहां किसी मूर्ति, तस्वीर या अवतार को पूजना सबसे बड़ा गुनाह और सरासर ‘हराम’ माना गया है।
बचपन से मदरसों और तकरीरों में यही सिखाया जाता है की मूर्ति पूजा करने वाला इंसान कभी जन्नत का मुंह नहीं देख सकता।
हमारे मंदिरों, हमारी मां दुर्गा की प्रतिमाओं का मज़ाक उड़ाना जिनका रोज़मर्रा का काम है… वे अचानक शुक्ल पक्ष में इतने ‘संस्कृति प्रेमी’ कैसे हो जाते हैं?
गरबा का असल मतलब जानते हैं ये लोग? गरबा शब्द निकला है संस्कृत के ‘गर्भ’ से। पंडाल के ठीक बीचों-बीच एक मिट्टी के घड़े में दीप जलाकर रखा जाता है, जिसे ‘गर्भ दीप’ कहते हैं।
ये दीप इस पूरे ब्रह्मांड, जीवन की उत्पत्ति और मां आदिशक्ति की साक्षात शक्ति का प्रतीक होता है। जब महिलाएं और पुरुष उसके चारों तरफ गोल घेरे में घूमते हैं, तो वो कोई फिल्मी डांस नहीं कर रहे होते, बल्कि उस दिव्य ज्योति की परिक्रमा कर रहे होते हैं।
हर ताली, हर कदम उस परम चेतना को समर्पित एक आहुति होती है।
अब आप ही बताइए, जिस इंसान के मन में उस मूर्ति के प्रति रत्ती भर श्रद्धा नहीं है, जो उस मंत्रोच्चार को दिल से कुफ्र और हराम समझता है, वो वहां क्या घंटा भक्ति करने आता है?
जब तुम्हें हमारे भगवान से नफरत है, तो फिर पंडाल में हमारी बेटियों के बीच तुम्हारी मौजूदगी का क्या औचित्य रह जाता है?
अगर वाकई भक्ति और संगीत के इतने बड़े कद्रदान हो, तो कभी अपने घर पर मां सरस्वती की वंदना करवा कर दिखाओ!
वहां तो तुम्हारा सारा सेक्युलरिज्म हवा हो जाता है। साफ है की गरबा में उनकी ये बेचैनी भक्ति के लिए नहीं, बल्कि किसी निहायत ही घटिया और छुपे हुए मकसद के लिए होती है।
गरबा बनता जा रहा ‘लव जिहाद’ का हेडक्वार्टर, नितेश राणे और VHP ने कर दिया ‘गैर-हिन्दुओं’ की गरबा में एंट्री पर बैन का शंखनाद
यही वजह है की इस बार नवरात्रि शुरू होने से पहले ही ज़मीन पर पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। इस पाखंड की परतें तब खुलीं जब विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल ने महाराष्ट्र और गुजरात के गरबा आयोजकों को सीधी और दो टूक चेतावनी थमा दी।
विहिप ने साफ कह दिया की अगर कोई गरबा पंडाल सनातनी मर्यादा से भटका, तो हिंदू समाज उसे बर्दाश्त नहीं करेगा।
आयोजकों को सख्त निर्देश दिए गए हैं की मेन गेट पर बाकायदा आधार कार्ड देखकर ही एंट्री दी जाए, सुरक्षा में गैर-हिंदू बाउंसरों को न रखा जाए और हर आने वाले के माथे पर चंदन का तिलक लगे।
इस माहौल में तब जबरदस्त राजनीतिक और सामाजिक विस्फोट हुआ, जब महाराष्ट्र सरकार के मंत्री और बीजेपी नेता नितेश राणे ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे माइक पर वो सच कह दिया जिसे बाकी नेता डर के मारे दबा जाते थे।
राणे ने कैमरे के सामने दहाड़ते हुए कहा की “गरबा पंडाल अब सिर्फ डांडिया खेलने की जगह नहीं रह गए, बल्कि लव जिहाद के नए हेडक्वार्टर बन चुके हैं!”
उन्होंने सीधे तौर पर आयोजकों को ललकारा की जो लोग मूर्ति पूजा को नहीं मानते, जो हमारे रीति-रिवाजों को धता बताते हैं, उन्हें हमारे पंडालों में मौज उड़ाने की इजाजत बिल्कुल नहीं मिलनी चाहिए।
राणे ने तो यहां तक चुनौती दे दी की अगर किसी गैर-सनातनी को गरबा में आने का इतना ही शौक चढ़ा है, तो गेट पर पहले आधार कार्ड दिखाए, अपनी असली पहचान कबूले और साथ में हनुमान चालीसा की चार चौपाइयां पढ़कर अंदर जाए।
इस एक बयान ने पूरे सेक्युलर गिरोह के पेट में ऐसा मरोड़ उठाया की इनका सोशल मीडिया पर रोना-धोना शुरू हो गया।
तथाकथित बुद्धिजीवी इसे ‘नफरती बयान’ साबित करने पर तुल गए, लेकिन ज़मीनी सच्चाई ये है की राणे ने वही कहा जो हर जागरूक हिंदू बाप अपने दिल में दबाए बैठा था।
जब खतरा दरवाजे पर खड़ा हो, तो उसे मेहमान नहीं कहा जाता, उसके आगे कुंडी लगाई जाती है!
“कोई मुस्लिम व्यक्ति गरबा एन्जॉय करता है, तो इसमें कुछ गलत नहीं”, अमृता फडणवीस के बयान पर सनातनी समाज हो गया सुन्न
अब ज़रा इस पूरे ड्रामे के उस पहलू पर आते हैं जिसने हाल ही में महाराष्ट्र से लेकर पूरे देश में बवाल छेड़ दिया।
एक तरफ तो ज़मीन पर हिंदू संगठन और कार्यकर्ता अपनी जान जोखिम में डालकर पंडालों की सुरक्षा में लगे हैं, और दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसा ज्ञान दे रहे हैं की सुनकर सिर चकरा जाए।
हुआ ये की महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस से जब मीडिया ने गरबा में गैर-हिंदुओं की नो-एंट्री पर सवाल पूछा, तो उन्होंने कह दिया की-
“भाई हमारा त्योहार तो ‘समावेशी’ (Inclusive) है, अगर कोई मुस्लिम शांति से गरबा देखने आता है या उत्सव का आनंद लेता है, तो इसमें क्या गलत है?”
उन्होंने तो इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर का उत्सव बताकर सबके लिए दरवाजे खुले रखने की वकालत कर दी।
अब देखिए, अमृता जी एक सम्मानित हस्ती हैं और उनकी अपनी एक सोच हो सकती है। लेकिन सवाल ये उठता है की ये जो बड़े-बड़े वीआईपी लोग होते हैं, इन्हें ज़मीनी हकीकत का कितना अंदाज़ा होता है?
ज़रा उस बाप और भाई से पूछिए जिसकी बेटी किसी आम कॉलोनी के पंडाल में गरबा खेलने जाती है और वहां कुछ शोहदे झूठी पहचान बनाकर उसके चक्कर काटने लगते हैं।
मज़ाक तो तब हो गया जब पूरा लिबरल गिरोह, जो दिन-रात बीजेपी को कोसता है, वो अचानक अमृता जी के इस बयान को हाथों-हाथ लपकने लगा।
कांग्रेसी नेता तालियां पीटने लगे की देखो भाभी जी ने अपनी ही सरकार के मंत्री नितेश राणे को आईना दिखा दिया।
लेकिन इस पूरे एलीट सेक्युलरिज्म को ये समझ नहीं आता की जब आस्था का सवाल होता है, तो कोई नेता या वीआईपी बड़ा नहीं होता, बल्कि धर्म और बेटियों की सुरक्षा सबसे पहले आती है।
अगर घर के किसी सदस्य को ज़मीनी खतरे का इल्म नहीं है, तो इसका मतलब ये नहीं कि बाहर मंडरा रहा भेड़िया शाकाहारी हो गया है!
इंदौर से लेकर गुजरात तक, हमारे गरबा पांडालों में रंगे हाथों पकड़े पकडे जाते हैं शांतिदूत
अगर किसी सेक्युलर को अब भी लगता है की ये सब सिर्फ मनगढ़ंत बातें हैं, तो भाई ज़रा मध्य प्रदेश और गुजरात के पुलिस थानों की डायरियां उठाकर देख लो। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
मध्य प्रदेश का इंदौर शहर इस मामले में सबसे बड़ा गवाह रहा है। इंदौर के भंवरकुआं और पलासिया इलाके के गरबा पंडालों में पिछले कुछ सालों में एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों ऐसे गैर-हिंदू लड़के पकड़े गए जो हिंदू नाम बताकर अंदर अपने कुकर्मों को अंजाम दे रहे थे।
जब बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उन्हें घेरा और उनका नाम पूछा, तो किसी ने खुद को ‘संजू’ बताया तो किसी ने ‘राहुल’।
लेकिन जब जेब से असली कागज़ात निकले, तो नाम निकला सलमान और इमरान! पुलिस ने बाकायदा इन शोहदों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNS) और धारा 151 के तहत शांति भंग करने के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे डाला है।
और तो और, इंदौर का वो मशहूर ‘शिखर गरबा मंडल’ वाला कांड याद है ना? जब हिंदू समाज को पता चला की मां अंबे की भक्ति के नाम पर करोड़ों रुपये कमाने वाली गरबा समिति के कर्ता-धर्ताओं में गैर-हिंदू नाम शामिल हैं, तो ऐसा बवाल हुआ की आयोजकों को घुटनों पर आकर पूरा का पूरा कार्यक्रम ही रद्द करना पड़ा।
अरे भाई, जिस उत्सव से तुम्हारा कोई धार्मिक नाता नहीं, वहां तुम आयोजन समिति में बैठकर हिंदू आस्था का धंधा कैसे कर सकते हो?
यही हाल गुजरात के अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत का रहा है। वहां बड़े-बड़े कमर्शियल ग्राउंड्स पर जब कार्यकर्ताओं ने गेट पर निगरानी रखी, तो कई ऐसे संदिग्ध पकड़े गए जो बाउंसरों को रिश्वत देकर या पिछले दरवाज़े से अंदर घुसने की फिराक में थे।
पंडालों में घुसने के बाद इनका काम गरबा खेलना नहीं होता। ये कोनों में झुंड बनाकर खड़े हो जाते हैं। हाथ में फोन होता है और कैमरे का फोकस घूमती हुई उन हिंदू लड़कियों पर होता है।
ज़ूम कर-करके वीडियो बनाए जाते हैं, गंदे-गंदे एंगल से फोटो खींची जाती हैं। जब भी किसी ऐसे शांतिदूत को रंगे हाथों पकड़ा गया है और उसका फोन चेक हुआ है, तो गैलरी में सिर्फ और सिर्फ हिंदू बेटियों के आपत्तिजनक वीडियो मिले हैं!
अब सीधा और साफ नियम होना चाहिए- गरबा पंडालों में गैर-सनातनियों की नो-एंट्री मतलब पूरी तरह नो-एंट्री!
