बीजेपी अजेय नहीं विपक्ष ही अनाड़ी है, Episode 10: A.O. Hume के डीएनए से जन्मी कांग्रेस कैसे आज़ादी के बाद भी नहीं छोड़ पाई अपनी वो रजवाड़े वाली मानसिकता, जनता को सिर्फ वोटबैंक समझने वाली इसी विदेशी सोच ने BJP के लिए सजा दी सत्ता की दावत

अगर आप आज भी देश के किसी पुराने गांव की चौपाल पर चले जाएं और वहां बैठे किसी बुजुर्ग से पूछें की नब्बे के दशक में आज़ादी मिलने के बाद आम हिंदुस्तानी की ज़िंदगी में क्या बदला?

तो वो आपको बिल्कुल यही बताएगा की “बदला कुछ नहीं बाबू, बस गोरे अंग्रेजों की जगह दिल्ली में बैठे भूरे अंग्रेजों ने ले ली।”

सच कहूं तो यह सिर्फ एक ताना नहीं है, यह भारत के राजनीतिक इतिहास का वो सबसे बड़ा और कड़वा सच है जिसे दशकों तक एक खास ‘दरबारी ईकोसिस्टम’ ने बहुत ही चालाकी से कालीन के नीचे छिपा कर रखा।

हम में से बहुत अनजान लोग यही सोचते हैं की कांग्रेस से जुड़े हुए लोगों ने हमें आज़ादी दिलाई।

हम कभी ये सवाल ही नहीं पूछ पाए की आखिर जिस पार्टी ने देश को विदेशी हुकूमत से ‘आज़ाद’ कराया, वो आज़ादी के कुछ ही दशकों बाद अपने ही देश की जनता, अपनी माटी और अपनी सनातन संस्कृति से इतनी कट कैसे गई?

ऐसा कैसे हो गया की जिस जनता को ये आज़ादी दिलाने का दम भरते थे, सत्ता में आते ही उसी जनता को इन्होंने कीड़े-मकौड़े और अपना ‘गुलाम’ समझना शुरू कर दिया?

इस सवाल का जवाब आज के किसी राजनीतिक घटनाक्रम में नहीं, बल्कि साल 1885 में छिपे उस विदेशी डीएनए (DNA) में है, जिसके बीज से कांग्रेस नाम का यह पौधा निकला था।

1. जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है

जो पार्टी भारत के क्रांतिकारियों के खून से न जन्मी, वो भारत के आम नागरिक को अपने बराबर कैसे बैठाएगी?

राजनीति का एक बहुत ही सीधा सा नियम है- जो जैसा बोता है, वो वैसा ही काटता है। जो पार्टी भारत की माटी, भारत के किसानों या भारत के क्रांतिकारियों के खून-पसीने से जन्मी ही न हो, उससे आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं की वो सत्ता में आने के बाद भारत के आम नागरिक को अपने बराबर बैठाएगी?

आज़ादी के बाद जब 1947 में सत्ता का हस्तांतरण (Transfer of Power) हुआ, तो सत्ता तो हाथ बदल गई, लेकिन ‘सिस्टम’ और ‘मानसिकता’ पूरी तरह से ब्रिटिश ही रही।

लुटियंस दिल्ली के उन बड़े-बड़े बंगलों में बैठकर इन कांग्रेसी नेताओं ने खुद को देश का ‘शासक’ (Ruler) मान लिया और आम हिंदुस्तानी को अपनी ‘प्रजा’। – इन्हें लगने लगा की अंग्रेजी बोलने वाला, सूट-बूट पहनने वाला और विदेशों में छुट्टियां मनाने वाला एलीट (Elite) क्लास ही इस देश को चलाने के लायक है।

धोती-कुर्ता पहनने वाले, माथे पर तिलक लगाने वाले और खेतों में पसीना बहाने वाले आम बहुसंख्यक समाज को इन्होंने एकदम बैकवर्ड और गंवार मान लिया।

यही वो सामंती और राजवाड़े वाली सोच थी जिसने धीरे-धीरे कांग्रेस को इस देश की असली आत्मा से काट दिया। और इसी भयंकर ‘सेल्फ-गोल’ का सबसे बड़ा फायदा मिला भारतीय जनता पार्टी (BJP) को, जिसने इस कॉलोनियल माइंडसेट (गुलामी की मानसिकता) पर ऐसा हथौड़ा मारा की लुटियंस का पूरा का पूरा रजवाड़ा ही भरभरा कर गिर पड़ा।

आइए, इस रायते की शुरुआत से बात करते हैं और देखते हैं की कैसे एक अंग्रेज के दिमाग की उपज ने आज़ाद भारत में भी अपनी राजशाही कायम रखी।

2. कैसे रखी गयी थी मानसिक गुलामी की नींव

1885 में अंग्रेज A.O. Hume और डफरिन के हाथों कांग्रेस का जन्म

अगर आपको किसी पेड़ की बीमारी समझनी हो, तो उसकी जड़ों को खोद कर देखना पड़ता है। कांग्रेस की जड़ें खोदेंगे तो वहां आपको किसी भारतीय क्रांतिकारी का खून नहीं, बल्कि एक गोरे अंग्रेज अधिकारी का शातिर दिमाग मिलेगा।

बात साल 1885 की है। देश में 1857 की क्रांति (भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ पहला संगठित और व्यापक जन-विद्रोह) को बीते लगभग तीन दशक हो चुके थे।

लेकिन उस खूनी क्रांति का खौफ अंग्रेजों के दिलो-दिमाग में इतना गहरा बैठा था की उन्हें रात में भी बगावत के सपने आते थे।

उन्हें हर पल यह डर सताता था की हिंदुस्तानी फिर से हथियार ना उठा लें। – इसी खौफ के बीच एक रिटायर्ड ब्रिटिश अधिकारी एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume) ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन (Lord Dufferin) के साथ मिलकर एक बहुत ही शातिर चाल चली।

उन्होंने सोचा की क्यों ना हिंदुस्तान के कुछ पढ़े-लिखे, रसूखदार और अंग्रेजी बोलने वाले लोगों को मिलाकर एक ऐसा मंच बना दिया जाए, जो दिखने में तो हिंदुस्तानियों का लगे, लेकिन काम अंग्रेजों के लिए करे!

इसी चाल को इतिहास में ‘सेफ्टी वाल्व थ्योरी’ (Safety Valve Theory) कहा जाता है। महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय जी ने 1916 में अपने अखबार ‘यंग इंडिया’ (Young India) में इस थ्योरी का पर्दाफाश किया था।

लाला जी ने साफ लिखा था की कांग्रेस की स्थापना का असली मक़सद देश को आज़ादी दिलाना था ही नहीं। इसका असली मक़सद ब्रिटिश साम्राज्य को एक और 1857 जैसी खूनी बगावत से बचाना था। – ये एक ‘सेफ्टी वाल्व’ था। जैसे प्रेशर कुकर में बहुत ज़्यादा भाप बन जाने पर सेफ्टी वाल्व सीटी मारकर गैस बाहर निकाल देता है ताकि कुकर फटे नहीं!

बिल्कुल वैसे ही ह्यूम ने कांग्रेस को इसलिए बनाया ताकि हिंदुस्तानियों का गुस्सा सड़कों पर हथियार बनकर ना फूटे, बल्कि इस मंच के ज़रिए प्रार्थना पत्रों (Petitions) में निकल जाए।

ज़रा 28 दिसंबर 1885 को बॉम्बे में हुए कांग्रेस के सबसे पहले अधिवेशन के बारे में सुनिए। वहां 72 प्रतिनिधि (Delegates) जुटे थे।

क्या आपको लगता है की उनमें कोई गांव का किसान, कोई मज़दूर या कोई ज़मीनी क्रांतिकारी था? बिल्कुल नहीं!

वहां जुटे थे वकीलों, बड़े-बड़े ज़मींदारों, पत्रकारों और विदेशी तालीम हासिल किए हुए रईसों के झुंड। सब के सब अंग्रेजी में बतिया रहे थे, काले कोट और सूट-बूट पहने हुए थे। – इनका काम क्या था? साल में एक बार दिसंबर के महीने में इकट्ठा होना, अंग्रेजी में लंबे-चौड़े भाषण देना और ब्रिटिश महारानी के प्रति अपनी ‘वफादारी’ की कसमें खाते हुए छोटी-मोटी रियायतें मांगना।

पूर्ण स्वराज (Complete Independence) की तो उस वक्त तक इनके डिक्शनरी में कोई जगह ही नहीं थी।

यही वो दिन था, यही वो अधिवेशन था, जिसने कांग्रेस के डीएनए में ‘मानसिक गुलामी’ और ‘एलीट कल्चर’ (Elite Culture) का बीज बो दिया था।

इन्होंने शुरू से ही मान लिया था की जो आदमी फर्राटेदार अंग्रेजी नहीं बोल सकता, जो कोट-पैंट नहीं पहनता, वो देश के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हो ही नहीं सकता।

दशकों तक ये लोग अंग्रेजों के सामने सिर्फ जी-हुज़ूरी करते रहे और आम हिंदुस्तानी समाज से बिल्कुल कटे रहे। – जब बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) जैसे ठेठ ज़मीनी और सनातन संस्कृति से जुड़े नेताओं ने इस अंग्रेज़-परस्त नीतियों का विरोध किया, तो कांग्रेस के इसी ‘नरम दल’ (Moderates) ने उन्हें पार्टी से साइडलाइन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कांग्रेस का यह दरबारी ईकोसिस्टम उस समय से ही तय कर चुका था की सत्ता और फैसले लेने का अधिकार सिर्फ एक खास मुट्ठी भर लोगों (वीआईपी क्लब) के पास रहेगा।

जब 1947 में अंग्रेज बोरिया-बिस्तर बांधकर गए, तो उन्हें कोई फिक्र नहीं थी। वो जानते थे की वो पीछे एक ऐसा ‘ब्राउन साहिबों’ (Brown Sahibs) का सिस्टम छोड़ कर जा रहे हैं, जो दिखने में भले ही इंडियन हों, लेकिन उनका दिल, उनका दिमाग और उनके काम करने का तरीका पूरी तरह से ब्रिटिश ही रहेगा।

यहीं से शुरुआत हुई आज़ाद भारत में उस रजवाड़े की, जिसने आम जनता को कभी नागरिक नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ एक ‘वोटबैंक’ समझा।

3. आज़ादी के बाद सत्ता का ट्रांसफर हुआ मानसिकता का नहीं

लुटियंस दिल्ली बन गई भूरे अंग्रेजों की नई रियासत

15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हुआ। लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया गया और पूरे देश की जनता खुशी से झूम उठी की सदियों की गुलामी के बाद अब इस देश पर हिंदुस्तानियों का राज होगा।

लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही आकार ले रही थी। आज़ादी के नाम पर सिर्फ एक कागज़ पर दस्तखत हुए थे, जिसे हम ‘सत्ता का हस्तांतरण’ (Transfer of Power) कहते हैं।

गोरे अंग्रेज अपनी चाबियां उन ‘भूरे अंग्रेजों’ को सौंप गए थे, जिनकी नस-नस में ब्रिटिश राजशाही का खून दौड़ रहा था।

लुटियंस दिल्ली के उन चौड़े रास्तों और बड़े-बड़े बंगलों में एक नया रजवाड़ा आकार ले रहा था। देश का संविधान भले ही ‘वी द पीपल’ (हम भारत के लोग) से शुरू होता हो, लेकिन इस दरबारी ईकोसिस्टम ने कभी भारत के आम आदमी को नागरिक माना ही नहीं।

इन्होंने सिस्टम को इस तरह से डिज़ाइन किया की सत्ता के गलियारों में आम आदमी की आवाज़ कभी पहुँच ही न सके।

इनके इस ‘एलीट’ और राजशाही घमंड का सबसे बड़ा सबूत आपको आज़ादी के तुरंत बाद ही मिल जाता है। ज़रा इतिहास के पन्नों को पलटिए और सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार (Reconstruction) वाले अध्याय पर नज़र डालिए।

4. 1951 में सोमनाथ मंदिर जाने पर नेहरू ने डॉ राजेंद्र प्रसाद को रोका

और हिन्दू आस्था को बताया ‘पिछड़ापन’

 

विदेशी आक्रांताओं द्वारा लूटे गए और तोड़े गए सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण पूरे हिन्दू समाज के लिए एक गौरव और आस्था का विषय था। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और के.एम. मुंशी ने इस भग्नावशेष को फिर से एक भव्य मंदिर में बदलने का बीड़ा उठाया था।

मई 1951 में जब मंदिर बनकर तैयार हुआ, तो वहां प्राण-प्रतिष्ठा के लिए आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी को न्योता दिया गया।

राजेंद्र बाबू, जो ज़मीन से जुड़े हुए एक सच्चे सनातनी और भारतीय थे, उन्होंने सहर्ष यह न्योता स्वीकार कर लिया। लेकिन जैसे ही यह खबर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तक पहुंची, उनके अंदर का ‘लुटियंस अहंकार’ भड़क उठा। – नेहरू जी ने तुरंत डॉ. राजेंद्र प्रसाद को कड़े शब्दों में पत्र लिखा और कहा की उन्हें सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में नहीं जाना चाहिए। नेहरू जी ने अपने पत्र में इसे “हिन्दू रिवाइवलिज़्म” (Hindu Revivalism – हिन्दू पुनरुत्थानवाद) करार दिया।

ज़रा सोचिए! जिस देश का बंटवारा ही धर्म के नाम पर हुआ हो, वहां बचे हुए बहुसंख्यक समाज के सबसे पवित्र मंदिर के उद्घाटन में जाने से देश के प्रधानमंत्री को ‘सेक्युलरिज्म’ खतरे में नज़र आने लगा था।

नेहरू जी को लगता था की आधुनिक भारत का मतलब सिर्फ कारखाने और पश्चिमी सभ्यता है। भारत की असली माटी, उसकी सनातन संस्कृति, गेरुआ वस्त्र और मंदिरों को यह ईकोसिस्टम ‘पिछड़ा’ और ‘गंवार’ मानता था।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू की इस सलाह को सिरे से ख़ारिज कर दिया और डंके की चोट पर सोमनाथ गए।

लेकिन यह वाकया चीख-चीख कर यह साबित कर गया की कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भारत के बहुसंख्यक समाज की आस्था को किस हिकारत और दोयम दर्जे की नज़र से देखता था।

यहीं से देश में वीआईपी कल्चर (VIP Culture) की नींव पड़ी। लाल बत्ती की गाड़ियों का रौब, विदेशी दौरों का चस्का और जनता से दूरी बनाने वाली नौकरशाही पनपने लगी।

एक आम हिंदुस्तानी को सरकारी दफ्तरों में साहबों के सामने गिड़गिड़ाने के लिए छोड़ दिया गया, जबकि ये लुटियंस के साहब खुद को भारत का नया ‘वायसराय’ समझने लगे थे।

5. 1975 की इमरजेंसी और ‘शाहबानो’ कांड

कांग्रेस ने भारत की जनता को सिर्फ अपना गुलाम और वोटबैंक समझा

 

अगर आपको किसी शासक के अंदर छिपे तानाशाह और उसके घमंड की असली परीक्षा लेनी हो, तो उसकी कुर्सी पर आंच डालकर देखिए।

कांग्रेस की रजवाड़े वाली सोच का सबसे क्रूर और भयंकर चेहरा 1975 में देखने को मिला।

12 जून 1975 को जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चुनावी धांधली के आरोप में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया, तो उनके पास इस्तीफा देने का लोकतांत्रिक विकल्प था।

लेकिन एक राजपरिवार की रानी इस्तीफा कैसे दे सकती थी? सत्ता उनके लिए कोई ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि उनका जन्मसिद्ध अधिकार थी। – कुर्सी बचाने के लिए 25 जून 1975 की आधी रात को इस देश के लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया और पूरे देश पर ‘आपातकाल’ (Emergency) थोप दिया गया।

कांग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ (D.K. Barooah) ने तो चमचागिरी की सारी हदें पार करते हुए वो मशहूर नारा गढ़ दिया- “Indira is India, and India is Indira” (इंदिरा ही इंडिया है, और इंडिया ही इंदिरा है)।

मतलब एक व्यक्ति को पूरे राष्ट्र से बड़ा घोषित कर दिया गया! यह क्या है? यह विशुद्ध रूप से एक राजशाही सोच है, जहाँ राजा खुद को भगवान समझ बैठा है।

इमरजेंसी के उन 21 महीनों में आम हिंदुस्तानी को कीड़े-मकौड़े की तरह कुचला गया। संविधान के मौलिक अधिकारों को डस्टबिन में डाल दिया गया। – मीसा (MISA) और डीआईआर (DIR) जैसे काले कानूनों के तहत लाखों निर्दोष युवाओं, छात्रों और राजनीतिक विरोधियों को जेल की काल कोठरियों में सड़ा दिया गया।

और तो और, संजय गांधी के आदेश पर चली ‘नसबंदी’ (Forced Sterilization) की मुहिम ने तो क्रूरता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।

बसों से उतारकर, गांवों से घसीटकर गरीब मज़दूरों, रिक्शा चलाने वालों और किसानों की ज़बरन नसबंदी कर दी गई।

क्या कोई लोकतांत्रिक सरकार अपनी ही जनता के साथ ऐसा जानवरों वाला सुलूक कर सकती है? नहीं! ऐसा सुलूक सिर्फ एक क्रूर राजा अपनी गुलाम प्रजा के साथ करता है।

इमरजेंसी खत्म हुई, लेकिन कांग्रेस की इस तानाशाही मानसिकता का अंत नहीं हुआ।

1980 के दशक में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, तो उन्हें अपनी इस ‘राजशाही’ ताकत का एहसास कराने के लिए एक नया हथियार मिल गया- ‘तुष्टिकरण’ (Appeasement)।

और इसका सबसे बड़ा और काला अध्याय है 1985 का ‘शाहबानो कांड’ (Shah Bano Case)। – शाहबानो एक 73 साल की बुजुर्ग मुस्लिम महिला थी, जिसे उसके पति ने तलाक दे दिया था।

दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 1985 में फैसला सुनाया की शाहबानो के पति को उसे गुज़ारा भत्ता (Alimony) देना पड़ेगा।

यह एक बहुत ही मानवीय और संविधान सम्मत फैसला था। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कट्टरपंथियों को यह हज़म नहीं हुआ। वो सड़कों पर उतर आए और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध करने लगे।

अब यहाँ एक लोकतांत्रिक सरकार का फर्ज़ क्या था? फर्ज़ ये था की वो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ खड़ी होती और एक बेसहारा महिला को न्याय दिलाती।

लेकिन नहीं! राजीव गांधी की सरकार को लगा की अगर कट्टरपंथी नाराज़ हो गए, तो उनका मुस्लिम ‘वोटबैंक’ खिसक जाएगा। – वोटबैंक के लालच में कांग्रेस ने 1986 में संसद में अपने पूर्ण बहुमत (400 से ज़्यादा सीटों) का घमंड दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया और ‘मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम’ पास कर दिया।

शाहबानो को न्याय से वंचित कर दिया गया। इस एक घटना ने पूरे देश को यह मैसेज दे दिया की कांग्रेस के लिए इस देश का संविधान, सुप्रीम कोर्ट और मानवीय अधिकार कोई मायने नहीं रखते।

उनके लिए जनता सिर्फ एक ‘वोटबैंक’ है। अगर उनके वोटबैंक को खुश करना है, तो ये लोग संसद में बैठकर किसी भी लोकतांत्रिक नियम की धज्जियां उड़ा सकते हैं।

यह कोई लोकतांत्रिक पार्टी का काम नहीं था, यह एक ऐसे घमंडी शासक का काम था जिसे लगता था की वो जो चाहे कर सकता है और जनता चुपचाप सहती रहेगी।

लेकिन वो भूल गए थे की भारत की जनता किसी की गुलाम नहीं है। कांग्रेस के इस घमंड और बहुसंख्यक समाज की उपेक्षा ने ज़मीन पर जिस गुस्से और ज्वालामुखी को जन्म दिया, उसी ज्वालामुखी के लावे ने आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए वो ज़मीन तैयार की, जिस पर आज वो खड़ी है।

6. मनमोहन सिंह के लाये अध्यादेश को फाड़ना और सीताराम केसरी को बाथरुम में बंद करना

गांधी परिवार का वो वीआईपी राजशाही घमंड

जब कोई पार्टी खुद को देश का ‘मालिक’ और रजवाड़ा मान लेती है, तो उसका यह अहंकार सिर्फ जनता तक सीमित नहीं रहता। यह घमंड उनके अपने संगठन के अंदर भी रिसने लगता है।

कांग्रेस के दरबारी ईकोसिस्टम का एक अलिखित नियम है- इस पार्टी में चाहे कोई ज़मीन से उठकर कितनी भी बड़ी कुर्सी पर बैठ जाए, उसकी असली हैसियत ‘गांधी परिवार’ के सामने एक वफादार दरबारी से ज़्यादा कुछ नहीं हो सकती।

अगर आप उस ‘खानदान’ के सदस्य नहीं हैं, तो आपका अपमान करना इन राजवाड़ों के लिए बाएं हाथ का खेल है।

ज़रा साल 1998 की उस शर्मनाक घटना को याद कीजिए। सीताराम केसरी, जो एक बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आते थे और उस वक्त कांग्रेस के निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।

उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने के लिए जिस गुंडागर्दी का इस्तेमाल किया गया, वो किसी लोकतांत्रिक पार्टी का काम नहीं था। – 14 मार्च 1998 को दिल्ली के 24 अकबर रोड (कांग्रेस मुख्यालय) में सीताराम केसरी को उन्हीं के दफ्तर के बाथरुम में कथित तौर पर बंद कर दिया गया।

उनकी नेमप्लेट उखाड़ कर फेंक दी गई और सोनिया गांधी को रातों-रात कांग्रेस का बॉस बना दिया गया।

यह सिर्फ एक केसरी का अपमान नहीं था। यह उन तमाम ज़मीनी कार्यकर्ताओं का अपमान था जो खून-पसीना बहाकर ऊपर उठने का सपना देखते हैं।

और पी.वी. नरसिम्हा राव के साथ जो सुलूक हुआ, वो तो कांग्रेस के माथे पर ऐसा कलंक है जो कभी नहीं मिट सकता।

नरसिम्हा राव वो प्रधानमंत्री थे जिन्होंने 1991 के भयंकर आर्थिक संकट से देश को बाहर निकाला था और जनवरी 1993 में राम मंदिर निर्माण और जमीन अधिग्रहण से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण अध्यादेश पेश किया था। – लेकिन जब 23 दिसंबर 2004 को उनका निधन हुआ, तो उनके पार्थिव शरीर को दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय (AICC) के अंदर तक नहीं जाने दिया गया।

उनके शव से लदा वाहन मुख्यालय के गेट पर खड़ा रहा और गेट पर ताला लगा दिया गया। क्यों? क्योंकि नरसिम्हा राव ने कभी ‘परिवार’ के सामने घुटने नहीं टेके थे।

यह है इस लुटियंस एलीट क्लास का असली वीआईपी घमंड, जो मरने के बाद अपने खुद के लोगों को भी नहीं बख्शता। – लेकिन इस राजशाही अहंकार का सबसे वीभत्स नज़ारा 27 सितंबर 2013 को देखने को मिला। देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अमेरिका के आधिकारिक दौरे पर गए हुए थे।

इधर दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अंदर कांग्रेस का एक मीडिया इवेंट चल रहा था। तभी अचानक राहुल गांधी वहां आते हैं और अपनी ही सरकार (मनमोहन सिंह कैबिनेट) द्वारा पास किए गए एक अध्यादेश (Ordinance) को लेकर एक ऐसा बयान देते हैं जिसने पूरे देश को सन्न कर दिया। – राहुल गांधी ने कैमरे के सामने चिल्लाते हुए कहा- “मेरी राय में यह अध्यादेश पूरी तरह से नॉनसेंस (Nonsense) है, और इसे फाड़कर कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए!”

ज़रा रुकिए और सोचिए! देश का प्रधानमंत्री विदेश की धरती पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा है, और उसी की पार्टी का एक ‘शहज़ादा’ दिल्ली में बैठकर देश के प्रधानमंत्री की कैबिनेट के फैसले को फाड़ कर कूड़ेदान में फेंकने की बात कर रहा है।

यह क्या था? यह विशुद्ध रूप से एक राजशाही घमंड था। यह इस बात का ऐलान था की इस देश का प्रधानमंत्री चाहे जो भी हो, असली ‘सत्ता’ और असली ‘ताकत’ सिर्फ इस परिवार की मुट्ठी में है।

इस एक घटना ने देश के आम आदमी के मन में भयंकर गुस्सा भर दिया। लोगों को यह बात बहुत बुरी लगी की एक पढ़ा-लिखा और बुजुर्ग प्रधानमंत्री, जो एक सामान्य परिवार से आता है, उसकी बेइज़्ज़ती सरेआम की जा रही है।

बीजेपी ने जनता की इसी नब्ज़ को पकड़ा। बीजेपी ने देश को बताया की देखो, जो लोग अपने ही प्रधानमंत्री की इज़्ज़त नहीं करते, वो तुम्हारी क्या इज़्ज़त करेंगे?

7. “चायवाला” से लेकर “हुआ तो हुआ” तक कांग्रेस के वो दरबारी बयान

उड़ाया आम हिंदुस्तानी की हैसियत का सरेआम मज़ाक

कांग्रेस के पतन की सबसे बड़ी वजह उनकी नीतियां कम और उनके नेताओं के वो ज़हरीले बयान ज़्यादा रहे हैं, जिनमें सरेआम आम हिंदुस्तानी की ‘औकात’ का मज़ाक उड़ाया गया।

जब आप सत्ता के नशे में अंधे हो जाते हैं, तो आपकी ज़ुबान से वो सच निकल ही आता है जो आप बंद कमरों में सोचते हैं।

इस घमंड की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। 1984 में जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में हज़ारों बेगुनाह सिखों का कत्लेआम हुआ, सड़कों पर खून की नदियां बह गईं, तब देश के नए-नवेले प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक रैली में क्या कहा था?

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती थोड़ी हिलती ही है।” – यह कोई साधारण बयान नहीं था। यह एक शासक का वो बेरहम अहंकार था, जिसे हज़ारों नागरिकों के ज़िंदा जल जाने पर कोई अफ़सोस नहीं था।

उनके लिए वो सिख नागरिक महज़ ‘कीड़े-मकौड़े’ थे जो एक वीआईपी नेता की मौत के बदले बलि चढ़ा दिए गए।

जैसे-जैसे समय बीता, लुटियंस के इन मठाधीशों का घमंड और भी बड़ा होता गया। साल 2009 में जब देश में इकॉनमी क्लास में सफर करने वाले आम यात्रियों की बात आई, तो कांग्रेस के एलीट और अंग्रेजीदां नेता शशि थरूर ने उन्हें ‘कैटल क्लास’ (Cattle Class – जानवरों का डिब्बा) कह दिया।

मतलब जो हिंदुस्तानी पसीना बहाकर टिकट खरीदता है और इकॉनमी क्लास में सफर करता है, वो इनके नज़रों में ‘जानवर’ है। – और 2014 के मणिशंकर अय्यर के उस ‘चायवाला’ वाले बयान को तो कोई भूल ही नहीं सकता, जिसने नरेंद्र मोदी को सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी পিছিয়ে बैठा दिया।

लेकिन अय्यर साहब यहीं नहीं रुके। दिसंबर 2017 में जब गुजरात के चुनाव चल रहे थे, तब मणिशंकर अय्यर ने फिर अपना लुटियंस वाला ज़हर उगला और देश के प्रधानमंत्री को “नीच किस्म का आदमी” कह दिया।

अब ज़रा भारत के आम मतदाता के मनोविज्ञान को समझिए। जब आप किसी को ‘नीच’ कहते हैं, तो आप सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि समाज के उस पूरे निचले और पिछड़े तबके (OBC) को गाली दे रहे होते हैं जो अपनी मेहनत से आगे बढ़ना चाहता है।

मोदी जी ने तुरंत इसे लपक लिया और गुजरात की रैलियों में कहा की “हां, मैं नीच जाति से हूँ, लेकिन मेरे काम ऊंचे हैं।” कांग्रेस की इस एक गाली ने गुजरात में बीजेपी की डूबती हुई नैया को ऐसे पार लगाया कि कांग्रेस आज तक वहां संभल नहीं पाई। – और अगर इस सामंती सोच (Elitism) का कोई सबसे बड़ा ‘अंकल’ है, तो वो हैं राहुल गांधी के राजनैतिक गुरु सैम पित्रोदा (Sam Pitroda)।

2019 के लोकसभा चुनाव सिर पर थे, और सैम पित्रोदा से 1984 के सिख दंगों पर सवाल पूछा गया। जवाब में उन्होंने जो कहा, वो कांग्रेस के कफन में आखिरी कील साबित हुआ।

पित्रोदा ने कहा- “अब 1984 की बात क्या करनी? 1984 में जो हुआ तो हुआ।” (Hua to hua!)

ज़रा सोचिए, हज़ारों लोगों के नरसंहार पर ‘हुआ तो हुआ’ बोलने का घमंड कहाँ से आता है? यह वहीं से आता है जहाँ जनता को गुलाम समझा जाता है।

और यही पित्रोदा 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतवासियों के रंग-रूप पर ऐसा भयंकर नस्लभेदी (Racist) बयान दे बैठे जिसने अंग्रेजों की भी याद दिला दी। – उन्होंने सरेआम कहा की “दक्षिण भारतीय अफ्रीकी जैसे दिखते हैं, पूरब वाले चीनी जैसे दिखते हैं और पश्चिम वाले अरबों जैसे दिखते हैं।”

यह क्या बकवास थी? क्या एक हिंदुस्तानी को हिंदुस्तानी दिखने के लिए किसी गोरे एलीट जैसा दिखना ज़रूरी है? ये वो लोग हैं जो आज़ादी के 75 साल बाद भी देश को अंग्रेजों की चश्मे से देखते हैं।

कांग्रेस के इन दरबारियों ने अपने इन्हीं घटिया, अहंकारी और राजशाही बयानों से देश की जनता के दिलों में अपने लिए इतनी भयंकर नफरत भर दी की बीजेपी को कुछ एक्स्ट्रा करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

जनता ने खुद तय कर लिया की जो नेता हमारी औकात, हमारे रंग और हमारे दर्द का मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें सत्ता की दहलीज़ पर फटकने भी नहीं देना है।

8. कांग्रेस की सनातन संस्कृति से नफरत

चिदंबरम की हिन्दू टेरर थ्योरी और 2024 में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का बहिष्कार

जब आपकी रगों में A.O. Hume और अंग्रेजों की दी हुई राजनीतिक ‘मानसिक गुलामी’ का खून दौड़ रहा हो, तो एक बात बिल्कुल तय है-आपको इस देश की असली माटी, यहाँ की मूल संस्कृति और सनातन धर्म से चिढ़ होने लगेगी।

कांग्रेस के ईकोसिस्टम के साथ बिल्कुल यही हुआ। सत्ता के नशे और मुस्लिम वोटबैंक के तुष्टिकरण में ये लोग इतने अंधे हो गए की इन्हें देश का बहुसंख्यक हिन्दू समाज दूसरे दर्जे (Second-class) का नागरिक नज़र आने लगा।

वोटबैंक की राजनीति के लिए किसी वर्ग का तुष्टिकरण करना एक बात है, लेकिन किसी एक वर्ग को खुश करने के लिए पूरे के पूरे हिन्दू समाज और उसकी हज़ारों साल पुरानी शांतिपूर्ण सभ्यता को ‘आतंकवादी’ घोषित करने की साज़िश रचना… यह राजनीति नहीं, यह विशुद्ध रूप से देशद्रोह था।

याद कीजिए साल 2010 से 2013 का वो दौर। देश में कांग्रेस (UPA) की सरकार थी। – वोटबैंक खिसक रहा था, तो कांग्रेस के शीर्ष मंत्रियों- पी. चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे- ने एक बहुत ही खौफनाक और घिनौनी थ्योरी गढ़ी, जिसे नाम दिया गया ‘भगवा आतंकवाद’ (Saffron Terror) या ‘हिन्दू टेरर’ (Hindu Terror)।

दुनिया जानती है की आतंकवाद की कोई सीमा नहीं होती और दुनिया भर में आतंक कौन फैला रहा है, ये किसी से छिपा नहीं है।

लेकिन सिर्फ अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए इन नेताओं ने सरेआम मंचों से हिन्दू धर्म को आतंकवाद से जोड़ दिया।

समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव जैसे ब्लास्ट मामलों में जानबूझकर ऐसी चार्जशीटें बनाई गईं ताकि किसी तरह निर्दोष हिन्दुओं को फंसाकर दुनिया के सामने यह साबित किया जा सके की हिन्दू भी आतंकवादी होते हैं।

बाद में कोर्ट में इनकी ये झूठी थ्योरी बुरी तरह औंधे मुंह गिरी, लेकिन इस एक साज़िश ने भारत के करोड़ों हिन्दुओं के दिल में वो घाव कर दिया जो कभी नहीं भर सकता।

आम हिंदुस्तानी को समझ में आ गया था की ये विदेशी मानसिकता वाले काले अंग्रेज उन्हें अपने ही देश में विदेशी और अपराधी साबित करने पर तुले हुए हैं।

और ये नफरत समय के साथ कम नहीं हुई, बल्कि और बढ़ती चली गई। साल 2023 में जब कांग्रेस के सहयोगी दल (DMK) के नेता उदयनिधि स्टालिन ने भरे मंच से सनातन धर्म की तुलना ‘डेंगू, मलेरिया और कोरोना’ से की और उसे जड़ से मिटाने की बात कही, तो पूरी कांग्रेस पार्टी ने मुंह में दही जमा लिया। – राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी तक, किसी के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। मौन रहने का मतलब ही सहमति होता है।

लेकिन इस ईकोसिस्टम ने अपने राजनैतिक ताबूत में सबसे आखिरी और सबसे बड़ी कील ठोंकी जनवरी 2024 में।

500 सालों के कड़े संघर्ष, लाखों बलिदानों और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनकर तैयार हुआ और 22 जनवरी 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा का दिन तय हुआ, तो राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने पूरी इज़्ज़त के साथ कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व (सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अधीर रंजन चौधरी) को निमंत्रण भेजा।

एक सामान्य भारतीय या एक ज़मीनी नेता इस निमंत्रण को माथे से लगाता। लेकिन इलीट क्लास के अहंकार में डूबी कांग्रेस ने बाकायदा एक ‘आधिकारिक प्रेस रिलीज़’ (Official Statement) जारी करके राम मंदिर के निमंत्रण को ठुकरा दिया!

उन्होंने इसे आरएसएस और बीजेपी का ‘इवेंट’ बताकर इसका बहिष्कार (Boycott) कर दिया।

ज़रा सोचिए, जो राम इस देश की आत्मा हैं, जो राम भारत के कण-कण में बसते हैं, उनके मंदिर जाने से इन कांग्रेसी दरबारियों ने सरेआम इनकार कर दिया।

यह सिर्फ एक निमंत्रण का तिरस्कार नहीं था, यह भारत की आत्मा और 100 करोड़ हिन्दुओं की आस्था का तिरस्कार था। और इसी अहंकार ने बची-खुची कांग्रेस को भी बहुसंख्यक समाज के दिलों से हमेशा के लिए मिटा दिया।

9. लाल बत्ती को हटाने वाला BJP सरकार का मास्टरस्ट्रोक

VIP दरबारी इकोसिस्टम को कर दिया जमींदोज

अब आते हैं इस पूरी कहानी के क्लाइमैक्स पर। बीजेपी के पास चुनाव जीतने की कोई जादुई छड़ी नहीं थी, और ना ही नरेंद्र मोदी कोई जादूगर थे।

बीजेपी और मोदी जी ने बस एक बहुत ही साधारण, लेकिन अचूक काम किया- उन्होंने कांग्रेस के इस ‘कॉलोनियल माइंडसेट’ (Colonial Mindset) और रजवाड़े वाले अहंकार पर सीधा ज़मीनी प्रहार कर दिया।

कांग्रेस जहाँ खुद को ‘नामदार’ (Royalty) समझती थी, वहीं मोदी जी ने पूरे देश के सामने खुद को एक ‘कामदार’ (मेहनतकश) के रूप में पेश किया।

उन्होंने कभी अपनी चाय वाले की पृष्ठभूमि को छिपाया नहीं, बल्कि डंके की चोट पर कहा की “हाँ, मैं ज़मीन से उठा हूँ, और मैं यहाँ शासन करने नहीं, बल्कि तुम्हारा ‘प्रधान-सेवक’ बनकर आया हूँ।”

एक आम भारतीय जो 70 सालों से दिल्ली के शासकों की अकड़ देख रहा था, उसे पहली बार दिल्ली की गद्दी पर बैठा हुआ आदमी अपने ही परिवार का एक सदस्य लगा।

मोदी जी ने सत्ता में आते ही सबसे पहला काम किया इस वीआईपी कल्चर को कमजोर करने का। – जो लाल बत्ती वाली गाड़ियां इन राजनेताओं और अफसरों के लिए स्टेटस सिंबल (Status Symbol) हुआ करती थीं, जिनके हूटर की आवाज़ से आम आदमी को सड़क किनारे खड़ा कर दिया जाता था, मोदी जी ने एक झटके में पूरे देश से उस लाल बत्ती कल्चर को ही उखाड़ फेंका।

जनता ने पहली बार देखा की दिल्ली का शासक अब उनके बराबर आकर खड़ा हो गया है।

मोदी जी जानते थे की जब तक देश में मानसिक गुलामी के ये प्रतीक मौजूद रहेंगे, तब तक आम हिंदुस्तानी खुद को आज़ाद महसूस नहीं करेगा। इसलिए उन्होंने एक-एक करके अंग्रेजों और इन भूरे अंग्रेजों (कांग्रेस) के बनाए प्रतीकों को मिटाना शुरू किया। – जिस सड़क पर बैठकर दिल्ली का एलीट वर्ग राज करता था, उस ‘राजपथ’ (Rajpath) का नाम बदलकर मोदी जी ने ‘कर्तव्य पथ’ (Kartavya Path) कर दिया।

यह सिर्फ नाम का बदलाव नहीं था, यह सोच का बदलाव था- की अब यहाँ राज नहीं होगा, अब यहाँ देश के प्रति कर्तव्य निभाया जाएगा। प्रधानमंत्री आवास वाले ‘रेस कोर्स रोड’ का नाम बदलकर ‘लोक कल्याण मार्ग’ कर दिया गया। – और तो और, जिन अंग्रेजों के बनाए कानूनों के दम पर पुलिस और सिस्टम जनता को डराता था, मोदी सरकार ने उन 150 साल पुराने कॉलोनियल कानूनों- IPC (इंडियन पीनल कोड), CrPC, और इंडियन एविडेंस एक्ट- को ही उठाकर कूड़ेदान में डाल दिया।

उनकी जगह भारतीय मिट्टी और न्याय की समझ से रचे गए नए कानून ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS), ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ और ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ लागू किए।

देश को पहली बार एहसास हुआ की उनके कानून ‘दंड’ देने के लिए नहीं, बल्कि ‘न्याय’ देने के लिए बने हैं।

जिस सनातन संस्कृति को लुटियंस का ईकोसिस्टम बैकवर्ड (पिछड़ा) समझता था, उसी सनातन संस्कृति को मोदी जी ने दुनिया के पटल पर मुकुट पहना दिया।

केदारनाथ का भव्य पुनर्निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, उज्जैन का महाकाल लोक, और अंततः अयोध्या का भव्य राम मंदिर… इन सबने उस बहुसंख्यक हिन्दू समाज को उसका वो खोया हुआ गौरव लौटा दिया, जिसे कांग्रेस ने दशकों तक कुचलने की कोशिश की थी।

10. विपक्ष का रायता और बीजेपी की दावत

यही है अंतिम सत्य

अंत में, यह बात शीशे की तरह साफ हो जाती है की 1885 में ए.ओ. ह्यूम द्वारा बोया गया विदेशी सोच का वो पौधा आज़ाद भारत में एक ऐसा ज़हरीला पेड़ बन गया था, जिसकी छाँव में आम हिंदुस्तानी का दम घुटने लगा था।

कांग्रेस के पतन की कहानी किसी और ने नहीं, बल्कि खुद उनके अहंकार, उनके ‘राजशाही’ घमंड, और भारत की मूल माटी से उनकी नफरत ने लिखी है।

बीजेपी ने बस जनता की उस दुखती रग को समझा। बीजेपी ने उस फैले हुए रायते को समेटा और आम हिंदुस्तानी को यह विश्वास दिलाया की यह देश किसी एक ‘खानदान’ या किसी लुटियंस एलीट की जागीर नहीं है।

जब भी विपक्ष जनता की आस्था को ललकारेगा या आम आदमी को ‘नीच’ और ‘चायवाला’ कहकर अपमानित करेगा, तब-तब बीजेपी उसी गुस्से को हथियार बनाकर अपनी जीत की दावत उड़ाती रहेगी।

जनता ने उन ‘राजाओं’ को सत्ता के सिंहासन से उठाकर सड़क पर फेंक दिया है जो उन्हें अपना गुलाम समझते थे।

क्योंकि अब ये 21वीं सदी का नया भारत है, जो अपनी जड़ों से प्यार करता है, और जो ‘सेफ्टी वाल्व’ से निकली किसी पार्टी का नहीं, बल्कि अपनी माटी से निकले ‘प्रधान-सेवक’ का साथ देना बखूबी जानता है!

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