भारत का वो ‘ब्रह्मांड का ज्ञाता’ जिसे अंतरिक्ष के रहस्य खोजने के लिए 7 बार किया गया ‘नोबेल प्राइज’ के लिए नॉमिनेट, देश में विशाल बांधों और न्यूक्लियर रिसर्च की नींव रखने वाले महान वैज्ञानिक ‘मेघनाद साहा’

कभी रात के समय खुले आसमान में चमकते हुए अनगिनत तारों को गौर से देखिएगा। हमें और आपको ये तारे बस टिमटिमाते हुए सफेद बिंदु लगते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं की जब नासा (NASA) या हमारी अपनी स्पेस एजेंसी इसरो (ISRO) का कोई बड़ा से बड़ा वैज्ञानिक आज भी अपनी शक्तिशाली दूरबीन से किसी तारे को देखता है..

तो उसका तापमान और उसकी उम्र नापने के लिए वो सबसे पहले एक महान भारतीय वैज्ञानिक के बनाए फॉर्मूले को सलाम करता है?

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं भारत के उस महान सपूत, उस आधुनिक ऋषि की, जिनकी मेधा (Intelligence) ने पूरी दुनिया के अंतरिक्ष विज्ञान (Astrophysics) का नक्शा ही बदल कर रख दिया.. मेघनाद साहा!

मेघनाद साहा एक ऐसे विज़नरी थे जिनका दिमाग आसमान के तारों से लेकर धरती की उफनती नदियों तक, सब कुछ एक साथ कैलकुलेट कर रहा था।

आप सोच भी नहीं सकते की एक ही इंसान न्यूक्लियर फिजिक्स की नींव भी रख सकता है, विनाशकारी बाढ़ को रोकने वाले विशाल बांधों का खाका भी खींच सकता है, और हमारे सनातन पंचांग को उसका वैज्ञानिक गौरव भी लौटा सकता है।

7 बार नोबेल के लिए नॉमिनेट होने वाला वो ‘साहा समीकरण’ जिसने पूरी दुनिया के लिए खोले ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्य

ज़रा 1920 से पहले की दुनिया के बारे में सोचिए। उस समय दुनिया भर के वैज्ञानिकों के पास बड़ी-बड़ी दूरबीनें तो आ गई थीं, लेकिन उन्हें ये बिल्कुल नहीं पता था की आसमान में जो करोड़ों तारे और सूरज धधक रहे हैं, वो आखिर किस चीज़ से बने हैं।

उनका तापमान कितना है? उनके अंदर कौन सी गैसें जल रही हैं? कोई इंसान वहां जाकर थर्मामीटर तो लगा नहीं सकता था! वैज्ञानिक बस दूर से देखकर तुक्के मारते थे। पूरा का पूरा खगोल विज्ञान एक अंधी सुरंग में फंसा हुआ था।

और फिर 1920 में भारत के एक 27 साल के युवा वैज्ञानिक ने अपनी लैब में बैठकर एक ऐसी थ्योरी लिखी, जिसने पूरी दुनिया के विज्ञान जगत में भूचाल ला दिया।

इसे आज पूरी दुनिया ‘साहा आयोनाइजेशन इक्वेशन’ (Saha Ionization Equation) के नाम से जानती है।

अब आप सोचेंगे की ये इक्वेशन करती क्या है? साहा ने दुनिया को बताया की जब तारों से रौशनी निकलकर धरती तक आती है (जिसे हम स्पेक्ट्रा या Spectra कहते हैं), तो उस रौशनी की तरंगों को पढ़कर ही ये सटीक कैलकुलेट किया जा सकता है की उस तारे का तापमान कितना है और उसके अंदर कौन से केमिकल या गैसें मौजूद हैं।

मतलब सोचिए, धरती पर बैठे-बैठे आसमान के किसी भी तारे की पूरी जन्मकुंडली निकाल कर रख देना!

यह कोई छोटी-मोटी खोज नहीं थी भाई। साहा की इस एक इक्वेशन ने एस्ट्रोफिजिक्स को रातों-रात एक नया विज्ञान बना दिया।

इस खोज का कद इतना विराट था की मेघनाद साहा को 1930, 1937, 1939, 1940, 1951 और 1955 में कुल 7 बार नोबेल प्राइज़ (Nobel Prize) के लिए नॉमिनेट किया गया।

लेकिन यहाँ गोरे सिस्टम का वो दोगलापन सामने आता है जो हर सच्चे हिंदुस्तानी को चुभता है। साहा की थ्योरी का इस्तेमाल करके, उस पर आगे की रिसर्च करने वाले विदेशी वैज्ञानिकों को तो नोबेल प्राइज़ दे दिया गया, लेकिन उस थ्योरी के असली जनक, एक भारतीय वैज्ञानिक को जानबूझकर इस सर्वोच्च सम्मान से दूर रखा गया।

खैर, साहा को नोबेल नहीं मिला तो इससे उनका कद छोटा नहीं हो गया, बल्कि नोबेल प्राइज़ का ही नुकसान हुआ की वो साहा जैसे महान ब्रह्मांड के ज्ञाता तक नहीं पहुंच पाया।

आज़ादी से पहले ही भारत में न्यूक्लियर रिसर्च का बीज बोने वाले और देश को पहला ‘साइक्लोट्रॉन’ सौंपने वाले असली मास्टरमाइंड

हमारे देश में एक नैरेटिव बहुत सलीके से सेट किया गया है। हमें हमेशा यही रटाया गया की भारत में परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) और न्यूक्लियर रिसर्च की शुरुआत आज़ादी के बाद ही हुई थी।

निसंदेह होमी भाभा का इसमें बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन क्या आप जानते हैं की भारत में न्यूक्लियर फिजिक्स का सबसे पहला बीज किसने और कब बोया था?

ज़रा साल पर गौर कीजिएगा- 1943! देश अभी आज़ाद भी नहीं हुआ था, दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था, और अंग्रेजों का राज था।

उसी दौर में मेघनाद साहा ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी के अंदर भारत के पहले ‘इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स’ की स्थापना कर दी थी (जिसे आज दुनिया साहा इंस्टीट्यूट के नाम से जानती है)।

साहा समझ चुके थे की भविष्य की दुनिया परमाणु ऊर्जा (Atomic Energy) से ही चलेगी। अगर भारत को दुनिया से कदम मिलाकर चलना है, तो हमें अपने देश में ही न्यूक्लियर रिसर्च शुरू करनी होगी।

वो सिर्फ एक लैब बनाकर नहीं रुके। साहा ने अपनी पूरी ताकत लगाकर भारत का सबसे पहला ‘साइक्लोट्रॉन’ (Cyclotron) देश में मंगवाया।

साइक्लोट्रॉन कोई छोटी मशीन नहीं होती, यह एक पार्टिकल एक्सीलेरेटर होता है जो एटम (परमाणु) की स्टडी के लिए ब्रह्मास्त्र माना जाता है।

मेघनाद साहा ने सिर्फ मशीनें नहीं जोड़ीं, उन्होंने इंसानों को तैयार किया। उन्होंने अपनी देखरेख में होनहार भारतीय छात्रों की एक पूरी की पूरी फौज तैयार कर दी।

इन छात्रों ने ही आगे चलकर भारत के परमाणु कार्यक्रम को उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां आज हम सीना तान कर खड़े हैं। साहा का विज़न इतना क्लीयर था की वो भारत को विज्ञान के मामले में किसी भी पश्चिमी देश का मोहताज नहीं रहने देना चाहते थे।

लैब की चारदीवारी से निकलकर बने ‘नदियों के डॉक्टर’ और दामोदर घाटी में विनाशकारी बाढ़ को रोकने के लिए खींचा विशाल बांधों का खाका

आमतौर पर दुनिया में वैज्ञानिक कैसे होते हैं? वो अपनी लैब में बंद रहते हैं, माइक्रोस्कोप और कागज़ों में उलझे रहते हैं और उन्हें बाहरी दुनिया से कोई खास मतलब नहीं होता।

लेकिन मेघनाद साहा मिट्टी से जुड़े इंसान थे। वो सिर्फ आसमान के तारे नहीं गिन रहे थे, बल्कि धरती पर हो रहे आम आदमी के दर्द को भी उतनी ही गहराई से महसूस कर रहे थे।

उस दौर में बंगाल में दामोदर नदी को ‘बंगाल का शोक’ (Sorrow of Bengal) कहा जाता था। हर साल मॉनसून में यह नदी ऐसा भयंकर रौद्र रूप धारण करती थी की लाखों गरीब किसानों की फसलें, उनके घर और मवेशी बाढ़ में बह जाते थे।

जब दिल्ली में बैठे नेता सिर्फ मीटिंग-मीटिंग खेल रहे थे, तब साहा अपनी लैब से बाहर निकले और उन्होंने ठान लिया की इस विनाशकारी बाढ़ का कोई पक्का वैज्ञानिक इलाज खोजना ही होगा।

साहा ने बाकायदा हाइड्रोलॉजी (नदियों के विज्ञान और जल प्रवाह) का बहुत गहराई से अध्ययन किया। उन्होंने अमेरिका की ‘टेनेसी वैली अथॉरिटी’ (TVA) की तर्ज पर रिसर्च की और भारत के लिए सबसे पहला ‘नदी घाटी प्रोजेक्ट’ डिज़ाइन किया।

आप हैरान रह जाएंगे ये जानकर की आज जिस दामोदर वैली कॉर्पोरेशन (DVC) के बड़े-बड़े बांधों को देखकर हम गर्व करते हैं, उसका पूरा का पूरा मास्टर प्लान (Blueprint) और डिज़ाइन मेघनाद साहा के ही दिमाग की उपज था।

उन्होंने सरकार को समझाया की नदियों को सिर्फ बाढ़ के नज़रिया से मत देखो। इन पर विशाल बहुउद्देशीय बांध (Multi-purpose Dams) बनाओ, जिससे बाढ़ भी रुकेगी, किसानों को सिंचाई के लिए पानी भी मिलेगा और देश के लिए बिजली भी पैदा होगी।

आज भारत में भाखड़ा नंगल से लेकर हीराकुंड तक जितने भी बड़े बांध और रिवर वैली प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, उनके असली डिज़ाइनर और ‘नदियों के डॉक्टर’ मेघनाद साहा ही थे।

वेदों और प्राचीन सूर्य सिद्धांत का गहरा अध्ययन कर देश को एकरूप सनातन पंचांग सौंपने वाले आधुनिक भारत के विश्वकर्मा

अगर आपको लगता है की मेघनाद साहा सिर्फ आधुनिक विज्ञान के ज्ञाता थे, तो आप उनके विराट व्यक्तित्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा मिस कर रहे हैं।

विज्ञान और हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति का जो अद्भुत संगम साहा के अंदर था, वो सदियों में किसी विरले इंसान में ही देखने को मिलता है।

आज़ादी के बाद हमारे देश में एक बहुत अजीब सी अराजकता फैली हुई थी। पूरे भारत में 30 से भी ज़्यादा अलग-अलग पंचांग और कैलेंडर चल रहे थे।

कहीं साल की शुरुआत चैत्र से हो रही थी, तो कहीं कार्तिक से। राष्ट्रीय स्तर पर त्योहारों और सरकारी तिथियों को लेकर इतना भयंकर कन्फ्यूजन था की सिस्टम चरमरा रहा था।

देश को एक ऐसे कैलेंडर की ज़रूरत थी जो पूरे भारत को एक सूत्र में पिरो सके और जो पूरी तरह से वैज्ञानिक हो।

साल 1952 में भारत सरकार ने ‘कैलेंडर रिफॉर्म कमिटी’ (पंचांग सुधार समिति) का गठन किया और इसकी कमान मेघनाद साहा के हाथों में सौंपी।

साहा ने इसके बाद जो किया, वो हर सनातनी के लिए गर्व की बात है। एक आधुनिक वैज्ञानिक होने के बावजूद, साहा ने हमारे प्राचीन हिन्दू ‘सूर्य सिद्धांत’, वेदों के खगोल ज्ञान और आर्यभट्ट से लेकर भास्कराचार्य तक के ग्रंथों का बहुत गहरा वैज्ञानिक अध्ययन किया।

उन्होंने दुनिया को साबित कर दिया की हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि जो खगोल विज्ञान (Hindu Astronomy) लिख कर गए हैं, वो आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सौ फीसदी खरा उतरता है।

साहा ने उस प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का ज़बरदस्त तालमेल बिठाते हुए देश को ‘राष्ट्रीय शक संवत कैलेंडर’ (Indian National Calendar) सौंपा।

आज जो हम 22 मार्च या 21 मार्च से अपना नव वर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) और राष्ट्रीय तिथियां तय करते हैं, वो साहा की ही देन है।

एक ऐसे वैज्ञानिक का अपनी सनातन जड़ों पर लौटना और उसे पूरी दुनिया के सामने वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ खड़ा करना, उनके महान चरित्र को दर्शाता है।

अंत में बस इतना ही कहूँगा यार की मेघनाद साहा एक ऐसी आंधी थे जिसने भारत के विज्ञान, विकास और संस्कृति की दिशा बदल दी।

तारों का तापमान नापने वाले फॉर्मूले से लेकर, भारत को परमाणु ताकत बनाने वाले साइक्लोट्रॉन तक… और उफनती नदियों को बांधने वाले डैम से लेकर हमारे घरों में टंगे राष्ट्रीय पंचांग तक, हर जगह इस ‘ब्रह्मांड के ज्ञाता’ की अमिट छाप मौजूद है।

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