बीजेपी अजेय नहीं विपक्ष ही अनाड़ी है, Episode 3- किसानों का मजाक, 70 हज़ार करोड़ का सिंचाई घोटाला, चुनाव से पहले गठबंधन तोड़ना, कांग्रेस-NCP के वो तीन ‘सेल्फ-गोल’ जिससे BJP को महाराष्ट्र 2014 चुनाव में मिली 122 सीटों की जीत की दावत

एक बात बहुत साफ़-साफ़ समझ लीजिए, बीजेपी इसलिए नहीं जीतती की वो कभी गलती नहीं करती, बल्कि वो इसलिए बंपर जीत से सत्ता में आती है क्योंकि सामने बैठा हमारा विपक्ष अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में PhD कर चुका है।

जब-जब विपक्ष इस देश के आम आदमी को, किसान को या बहुसंख्यक समाज को हलके में लेने की भूल करता है, तब-तब वो अपना वोटबैंक गंवा बैठता है।

और बीजेपी के चतुर रणनीतिकार कोई जादुई छड़ी नहीं घुमाते, वो बस किनारे पर बैठकर विपक्ष के इसी ‘रायते’ को बड़ी खामोशी से समेटते हैं और उसे अपनी शानदार जीत की दावत में बदल देते हैं।

आज हम जिस चुनाव की बात करने जा रहे हैं, वो भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी और सबसे तगड़ी केस स्टडी है। यह कहानी है 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की।

लोकसभा चुनाव के महज़ पांच महीने बाद (अक्टूबर 2014 में) हुए इस चुनाव में विपक्ष का अहंकार इतने चरम पर था की उन्होंने अपने विनाश की स्क्रिप्ट खुद अपने हाथों से लिखी थी।

15 साल सत्ता की मलाई और जमीनी हकीकत से कोशों दूर, विपक्ष ने खुद ही खोल दिए 2014 महाराष्ट्र चुनाव में बीजेपी की जीत के दरवाज़े

अब ज़रा 2014 से पहले के महाराष्ट्र का वो राजनीतिक बैकग्राउंड समझिए। 1999 से लेकर 2014 तक, पूरे 15 साल महाराष्ट्र की सत्ता पर कांग्रेस और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) का एकछत्र राज था।

15 साल किसी भी लोकतंत्र में बहुत लंबा समय होता है। इतने लंबे समय तक सत्ता में चिपके रहने के बाद इन नेताओं की आँखों पर ऐसी भयंकर पट्टी बंध चुकी थी की इन्हें ज़मीन की हकीकत दिखनी ही बंद हो गई थी।

महाराष्ट्र कोई मामूली राज्य नहीं है। ये देश की आर्थिक राजधानी चलाता है। कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं को लगता था की उन्होंने महाराष्ट्र के पूरे सिस्टम को अपनी जेब में डाल लिया है।

खासकर पश्चिमी महाराष्ट्र में इनका ऐसा दबदबा था की कोई इनके खिलाफ आवाज़ उठाने की सोच भी नहीं सकता था।

इनका पूरा ईकोसिस्टम तीन पिलर्स पर टिका हुआ था- मराठा वोटबैंक, चीनी मिलों (Sugar Lobby) का सिंडिकेट, और सहकारी बैंकों (Cooperative Banks) व कृषि उपज मंडियों (APMC) पर इनका पुश्तैनी कब्ज़ा।

ज़रा सोचिए, गांव-गांव में फैले सहकारी बैंकों से लेकर गन्ने की फैक्ट्रियों तक, हर जगह कांग्रेस और एनसीपी के छुटभैये से लेकर बड़े नेताओं का कंट्रोल था।

इसी कंट्रोल ने इनके अंदर वो घमंड भर दिया था जहाँ ये खुद को महाराष्ट्र का ‘राजा’ और आम जनता को अपनी ‘प्रजा’ समझने लगे थे।

इन्हें लगता था की चाहे राज्य में कितना भी भयंकर सूखा पड़ जाए, चाहे किसान कर्ज़ के बोझ तले दबकर कितनी भी आत्महत्याएं कर ले, लेकिन वोट तो लौट-फिरकर इन्हीं के पास आएगा क्योंकि गांव के किसान का लोन और उसकी फसल का पैसा तो इन्हीं नेताओं की चीनी मिलों और बैंकों के हाथ में फंसा है।

दूसरी तरफ बीजेपी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी थी। गोपीनाथ मुंडे, नितिन गडकरी और उस वक्त के युवा और तेज़-तर्रार प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फडणवीस जैसे नेता ज़मीन पर बहुत पैनी नज़र बनाए हुए थे।

बीजेपी के रणनीतिकार जानते थे की कांग्रेस-एनसीपी का यह सहकारी सिंडिकेट अंदर से पूरी तरह सड़ चुका है। भ्रष्टाचार की दीमक ने इस पूरे सिस्टम को खोखला कर दिया है। बीजेपी को पता था की बस एक चिंगारी की ज़रूरत है और विपक्ष का यह पूरा महल ढह जाएगा।

और यकीन मानिए, सत्ता के मद में चूर कांग्रेस और एनसीपी ने बीजेपी को बिल्कुल निराश नहीं किया! 2014 का चुनाव आते-आते इन सत्ताधीशों ने एक के बाद एक तीन ऐसे भयंकर और खौफनाक ‘सेल्फ-गोल’ दागे, जिसने महाराष्ट्र की ज़मीन के नीचे गुस्से का ऐसा खौलता हुआ लावा तैयार कर दिया, जिसने चुनाव वाले दिन कांग्रेस-एनसीपी के 15 साल पुराने साम्राज्य को भस्म कर दिया।

अजित पवार के मुँह से निकला वो बयान जिसने सूखे की मार झेलते किसानों को कर दिया गुस्से से लाल और बीजेपी ने ‘मराठी अस्मिता’ जगाकर छीन लिया विपक्ष का पूरा वोटबैंक

आप ज़रा उस दौर के महाराष्ट्र की कल्पना कीजिए। साल 2012 और 2013 का वो वक्त, जब महाराष्ट्र (विशेषकर मराठवाड़ा और विदर्भ का इलाका) पिछले 40 साल के सबसे भयंकर सूखे की चपेट में था।

ज़मीनें फट चुकी थीं, नदियों में धूल उड़ रही थी और डैम का जलस्तर शून्य पर पहुँच गया था। मवेशी प्यास से तड़प-तड़प कर मर रहे थे।

किसान के खेत में एक दाना नहीं उगा था और साहूकार के कर्ज़ का फंदा उसके गले को हर दिन कस रहा था। हज़ारों किसान बेबसी में आकर हर रोज़ पेड़ से लटक कर या ज़हर खाकर आत्महत्या कर रहे थे।

पूरा ग्रामीण महाराष्ट्र त्राहि-त्राहि कर रहा था। ऐसे में एक लोकतांत्रिक सरकार से क्या उम्मीद की जाती है? यही ना की वो अपने प्यासे और मरते हुए किसानों के आंसू पोंछे, उन्हें राहत दे और उनके दर्द को समझे।

लेकिन जैसा की हमने पहले बताया, 15 साल से सत्ता का सुख भोग रहे कांग्रेसी और एनसीपी के मठाधीशों के अंदर इंसानियत ख़त्म हो चुकी थी और अहंकार कूट-कूट कर भर गया था।

इसी सूखे के बीच, पानी की मांग को लेकर सोलापुर ज़िले के एक आम किसान कार्यकर्ता ‘प्रभाकर देशमुख’ (जिन्हें लोग भैया देशमुख कहते थे) मुंबई के आज़ाद मैदान में भूख हड़ताल पर बैठ गए।

ज़रा सोचिए, एक किसान अपनी खेती छोड़कर चिलचिलाती धूप में पूरे 55 दिन से भूखा-प्यासा बैठा था, सिर्फ इसलिए ताकि सरकार सोलापुर के डैम में पानी छोड़ दे और किसानों की जान बच जाए। 55 दिन तक महाराष्ट्र सरकार के किसी भी बड़े मंत्री ने उसकी सुध तक नहीं ली।

और फिर अप्रैल 2013 में वो मनहूस दिन आया, जब सत्ता के अहंकार ने सारी हदें पार कर दीं। पुणे ज़िले के इंदापुर में एक जनसभा चल रही थी। मंच पर माइक पकड़े खड़े थे महाराष्ट्र के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री (Deputy CM) और एनसीपी के कद्दावर नेता अजित पवार।

अजित पवार के पास ही जल संसाधन (Irrigation) मंत्रालय की भी ज़िम्मेदारी थी। मंच से भाषण देते हुए अजित पवार ने भैया देशमुख के अनशन का ज़िक्र किया और फिर हंसते हुए एक ऐसा बयान दिया, जिसे सुनकर आज भी किसी भी इंसान का खून खौल जाए।

उन्होंने भरे मंच से हँसते हुए कहा- “वो प्रभाकर देशमुख 55 दिन से पानी के लिए अनशन पर बैठा है। अरे भाई, अगर डैम में पानी ही नहीं है, तो मैं क्या करूँ? पानी कहाँ से लाऊँ? क्या डैम में जाकर पेशाब कर दूँ?”

इतना ही नहीं, इस भद्दे मज़ाक के बाद उन्होंने एक और घटिया टिप्पणी की। उन्होंने लोड शेडिंग (बिजली कटौती) का मज़ाक उड़ाते हुए कहा की “बिजली नहीं होने की वजह से आजकल राज्य में आबादी बढ़ रही है, क्योंकि लोगों के पास रात में करने को कोई काम नहीं होता।”

भाई साहब, ये बयान नहीं था, ये उस किसान के मुंह पर थूका गया सत्ता का वो घमंड था जो खुद को भगवान समझ बैठा था। एक तरफ विदर्भ का किसान कर्ज़ और प्यास से अपनी जान दे रहा था, उसकी लाशें पेड़ों पर झूल रही थीं, और दूसरी तरफ राज्य का उपमुख्यमंत्री उस किसान की मौत का ऐसा मज़ाक उड़ा रहा था।

अब आप सोच रहे होंगे की इस बयान के बाद क्या हुआ? यहीं पर एंट्री होती है बीजेपी के चतुर और ज़मीनी रणनीतिकारों की।

बीजेपी जानती थी की अजित पवार ने सिर्फ एक बयान नहीं दिया है.. बल्कि उन्होंने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारकर बीजेपी के हाथ में वो अचूक ब्रह्मास्त्र दे दिया है जो सीधे कांग्रेस-एनसीपी की जड़ों को काट देगा।

अगर विपक्ष सोच रहा था की लोग इस बयान को भूल जाएंगे, तो बीजेपी ने ऐसा होने नहीं दिया। उस वक्त बीजेपी के दिग्गज नेता गोपीनाथ मुंडे और प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फडणवीस ने इस मुद्दे को सड़कों पर ला दिया।

बीजेपी ने कोई साधारण प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, बल्कि उन्होंने इस बयान को महाराष्ट्र के गांव-गांव, हर चौपाल, हर चाय की टपरी और हर किसान के खेत तक पहुँचा दिया।

बीजेपी ने एक बहुत ही गज़ब का मनोवैज्ञानिक नैरेटिव सेट किया। महाराष्ट्र में किसान को ‘बलिराजा’ (अन्नदाता) कहा जाता है। बीजेपी के नेताओं ने रैलियों में जाकर सीधे मराठी मानुष के स्वाभिमान को झकझोरा।

उन्होंने पूछा- “क्या छत्रपति शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र में ‘बलिराजा’ का यही सम्मान है? जो किसान तुम्हें अन्न देता है, जब वो पानी मांगता है तो क्या तुम उसे अपनी पेशाब पिलाओगे?”

इस एक लाइन ने पूरे ग्रामीण महाराष्ट्र में आग लगा दी। जो किसान दशकों से एनसीपी और कांग्रेस की चीनी मिलों और सहकारी बैंकों के जाल में फंसा हुआ था, उसका भावनात्कम जुड़ाव टूट गया।

उसे समझ आ गया की जिन नेताओं को वो अपना माई-बाप समझता था, असल में वो गिद्ध हैं जो उसकी लाश नोचने का इंतज़ार कर रहे हैं।

बीजेपी ने बहुत ही सलीके से इस बयान को ‘मराठी अस्मिता’ और किसानों के आत्मसम्मान से जोड़ दिया। देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा के अंदर और बाहर इस मुद्दे पर ऐसी दहाड़ लगाई की पूरी सरकार बैकफुट पर आ गई।

बाद में अजित पवार ने दिखावे के लिए माफ़ी भी मांगी और एक दिन का उपवास भी रखा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। तीर कमान से निकलकर सीधे जनता के दिल में चुभ चुका था।

सूखे से मरते किसानों का मज़ाक उड़ाने वाले इस एक ‘सेल्फ-गोल’ ने कांग्रेस और एनसीपी के उस अभेद्य माने जाने वाले ग्रामीण वोटबैंक की कमर तोड़ कर रख दी।

बीजेपी ने बिना कोई पैसा बांटे, बिना कोई झूठा वादा किए, सिर्फ विपक्ष के अहंकार को आईना दिखाकर महाराष्ट्र के करोड़ों किसानों का वोट अपने पक्ष में फिक्स कर लिया था।

70 हज़ार करोड़ के सिंचाई घोटाले से तिलमिलाई जनता और देवेंद्र फडणवीस के तीखे प्रहारों ने कैसे बीजेपी के पक्ष में कर दी वोटों की आंधी

लेकिन बात सिर्फ एक बयान की नहीं थी। अगर आपको लग रहा है की डैम में पानी बारिश न होने की वजह से नहीं था, तो आप गलत हैं।

डैम में पानी इसलिए नहीं था क्योंकि डैम बनाने का वो 70,000 करोड़ रुपया इन नेताओं और ठेकेदारों की तिजोरियों में चला गया था।

वो डैम कभी ज़मीन पर बने ही नहीं! पानी रोकने के लिए जो दीवारें बननी थीं, उनका पैसा कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं और उनके चेले-चपाटे ठेकेदारों की तिजोरियों में चला गया था।

चलिए आपको उस घोटाले की पूरी जन्मकुंडली बताते हैं, जिसे आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे वीभत्स घोटाला कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यह था महाराष्ट्र का ’70 हज़ार करोड़ का सिंचाई घोटाला’ (Irrigation Scam)।

ज़रा इन आंकड़ों को गौर से पढ़िएगा। 1999 से लेकर 2009 तक, पूरे दस साल महाराष्ट्र का सिंचाई मंत्रालय (Irrigation Department) एनसीपी के सबसे बड़े नेता अजित पवार के हाथों में था।

इन दस सालों में 70,000 करोड़ रुपया सिंचाई के नाम पर पानी की तरह बहा दिया गया। कहा गया की इस पैसे से पूरे महाराष्ट्र, खासकर विदर्भ और मराठवाड़ा के सूखे इलाकों में बड़े-बड़े डैम बनेंगे, नहरें बनेंगी और हर किसान के खेत तक पानी पहुंचेगा।

70 हज़ार करोड़ बहुत बड़ी रकम होती है भाई साहब! इतने पैसों में तो पूरा का पूरा नया राज्य खड़ा किया जा सकता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत क्या थी?

2012 में जब महाराष्ट्र सरकार का अपना आधिकारिक ‘आर्थिक सर्वेक्षण’ (Economic Survey) सामने आया, तो उसमें जो खुलासा हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।

उस सरकारी रिपोर्ट में लिखा था की 10 साल में 70,000 करोड़ रुपये फूंकने के बाद भी महाराष्ट्र की सिंचाई क्षमता (Irrigation potential) में मात्र 0.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

अरे भाई, ये क्या मज़ाक चल रहा था? 0.1 प्रतिशत? मतलब आपने 70 हज़ार करोड़ रुपये सिर्फ कागज़ों पर नहरें खोदने और हवा में डैम बनाने के लिए निकाल लिए?

घोटाले का तरीका इतना शातिर था की आप सोच भी नहीं सकते। मान लीजिए, किसी प्रोजेक्ट को पास किया गया। टेंडर निकलने के बाद रातों-रात उस प्रोजेक्ट की लागत 300% से लेकर 1000% तक बढ़ा दी जाती थी।

विदर्भ इरिगेशन डेवलपमेंट कारपोरेशन (VIDC) के तहत महज़ चंद महीनों के भीतर 38 बड़े प्रोजेक्ट्स की लागत बिना किसी सरकारी मंज़ूरी के 20 हज़ार करोड़ रुपये से भी ज़्यादा बढ़ा दी गई।

ठेकेदारों को बिना काम शुरू किए ही हज़ारों करोड़ रुपये का ‘मोबिलाइजेशन एडवांस’ बांट दिया गया। और ये ठेकेदार कौन थे? ये सब इन्हीं कांग्रेस और एनसीपी नेताओं के रिश्तेदार, उनके चेले और उनके फ्रंटमैन थे।

इस पूरे नेक्सस का भांडा तब फूटा जब सिंचाई विभाग के ही एक ईमानदार चीफ इंजीनियर ‘विजय पंढारे’ ने एक 15 पन्नों की चिट्ठी लिखी।

इन्होंने अपनी चिट्ठी में साफ-साफ लिख दिया की सिंचाई विभाग में कोई काम नहीं हो रहा है, यह पूरी तरह से नेताओं और ठेकेदारों की मिलीभगत है जो जनता का पैसा लूट रहे हैं।

जब ये रिपोर्ट और विजय पंढारे की चिट्ठी मीडिया में लीक हुई, तो कांग्रेस और एनसीपी के खेमे में हड़कंप मच गया। नेताओं ने जनता से माफ़ी मांगने के बजाय एक ‘वाइट पेपर’ (White Paper) लाने का ड्रामा किया और लीपापोती शुरू कर दी।

और बस, यहीं पर एंट्री होती है बीजेपी की! देवेंद्र फडणवीस, जो उस वक्त विपक्ष के एक तेज़-तर्रार युवा विधायक थे और खुद उसी विदर्भ इलाके से आते थे जहाँ सबसे ज़्यादा किसानों ने आत्महत्या की थी, उन्होंने इस मुद्दे को अपने हाथों में ले लिया।

फडणवीस ने कोई हवा-हवाई राजनीति नहीं की। उन्होंने आरटीआई (RTI) लगाई, हज़ारों पन्नों के दस्तावेज़ निकाले, कैग (CAG) की रिपोर्ट्स खंगालीं और पूरा एक पुलिंदा बनाकर महाराष्ट्र विधानसभा में रख दिया।

देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा के अंदर और सड़कों पर ऐसा भूचाल ला दिया की पूरी कांग्रेस-एनसीपी सरकार ‘चोरों की बारात’ नज़र आने लगी।

बीजेपी ने बहुत ही चतुराई से इस 70 हज़ार करोड़ के घोटाले को सीधा किसान की फांसी के फंदे से जोड़ दिया।

बीजेपी ने गांव-गांव जाकर किसानों को समझाया की “तुम्हारा बेटा कर्ज़ से नहीं मरा है, उसे इस सरकार ने मारा है! जो पैसा तुम्हारे खेत में पानी लाने के लिए था, उससे इन नेताओं ने मुंबई में अपने बंगले खड़े कर लिए हैं।”

जनता के दिमाग में यह बात एकदम पत्थर की लकीर की तरह बैठ गई की कांग्रेस और एनसीपी की यह सरकार सिर्फ भ्रष्ट नहीं है, बल्कि यह हमारे किसानों की कातिल है।

बीजेपी ने किसानों के इस खौलते हुए गुस्से को पूरी तरह अपने पक्ष में मोड़ लिया। जिस मराठा और ग्रामीण वोटबैंक पर एनसीपी अपना पुश्तैनी हक़ समझती थी, वो वोटबैंक रातों-रात खिसक कर बीजेपी के खेमे में आ गया।

कारगिल के शहीदों के फ्लैट डकारने वाले आदर्श घोटाले पर भड़का मध्यम वर्ग और बीजेपी ने इसी गुस्से को बना लिया अपना सबसे बड़ा हथियार

अब तक हमने बात की ग्रामीण महाराष्ट्र की, जहाँ 70 हज़ार करोड़ का सिंचाई घोटाला हुआ और सूखे से तड़पते किसान की मौत का मज़ाक उड़ाया गया।

लेकिन सत्ता की मलाई खाने की इनकी भूख इतनी भयंकर थी की मुंबई जैसे महानगरों में इन्होंने ऐसे पाप किए, जिन्हें सुनकर ‘भ्रष्टाचार’ शब्द को भी खुद पर शर्म आ जाए।

शहरी मध्यम वर्ग अक्सर राजनीतिक भ्रष्टाचार को एक ‘नॉर्मल’ बात मानकर बर्दाश्त कर लेता है। लोग सोचते हैं की यार नेता हैं, तो सड़क या पुल बनाने में थोड़ा-बहुत कमीशन तो खाएंगे ही।

लेकिन जब कोई सरकार कमीशन खाने की हदों को पार करके सीधे देश के शहीदों के कफ़न और उनके हक़ पर डाका डालने लगे, तो उसे भ्रष्टाचार नहीं, ‘देशद्रोह’ कहा जाता है।

और कांग्रेस सरकार ने ठीक यही किया ‘आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले’ (Adarsh Housing Society Scam) के रूप में!

ज़रा कहानी को फ्लैशबैक में ले चलते हैं। 1999 में जब भारत-पाकिस्तान के बीच कारगिल का युद्ध हुआ, तो हमारे हज़ारों वीर जवानों ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर तिरंगे की शान बचाई थी।

उन कारगिल के शहीदों की विधवाओं और देश के रक्षा कर्मियों को छत देने के लिए मुंबई के सबसे पॉश इलाके ‘कोलाबा’ (Colaba) में एक ज़मीन आवंटित की गई थी।

कोलाबा वो इलाका है जहाँ ज़मीन की कीमत करोड़ों-अरबों में होती है। तय हुआ था की इस ज़मीन पर कारगिल के शहीदों के परिवारों के लिए 6 मंज़िला इमारत बनेगी।

लेकिन सत्ता के इन भूखे लोगों ने क्या किया? पर्यावरण के सारे नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए, सेना की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए, 6 मंज़िल की उस बिल्डिंग को रातों-रात 31 मंज़िला खड़ी कर दिया गया!

और सबसे बड़ा पाप तो ये था की इस बिल्डिंग के फ्लैट कारगिल के शहीदों की विधवाओं को नहीं, बल्कि कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं, उनके रिश्तेदारों, मंत्रियों और भ्रष्ट नौकरशाहों को कौड़ियों के भाव बाँट दिए गए।

सोचिए, जिस फ्लैट में किसी शहीद की विधवा को अपने अनाथ बच्चों के साथ रहना था, उस फ्लैट पर तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के करीबियों और रिश्तेदारों ने कब्ज़ा जमा लिया था।

जब इस महा-घोटाले का भंडाफोड़ हुआ, तो पूरे देश में हाहाकार मच गया। कांग्रेस की इतनी थू-थू हुई की दबाव में आकर मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। लेकिन कुर्सी छोड़ देने से क्या शहीदों का वो अपमान धुलने वाला था?

बिल्कुल नहीं! और यहीं से शुरू हुआ बीजेपी का वो मास्टरस्ट्रोक, जिसने महाराष्ट्र के पूरे शहरी और मध्यम वर्ग को झकझोर कर रख दिया।

आप जानते हैं कि बीजेपी की राजनीति का सबसे मज़बूत पिलर ‘राष्ट्रवाद’ (Nationalism) और सेना का सम्मान है।

बीजेपी ने इस आदर्श घोटाले को महज़ एक ‘ज़मीन घोटाले’ तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने इसे सीधे भारत माता की रक्षा करने वाले जवानों के सम्मान और शहीदों के खून से जोड़ दिया।

मुंबई, पुणे, नासिक, नागपुर और ठाणे जैसे शहरों में, जहाँ का पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग कांग्रेस का एक बड़ा वोटबैंक हुआ करता था, बीजेपी के नेताओं ने वहां जाकर सीधा नैरेटिव सेट किया।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र की धरती पर उतरकर अपनी रैलियों में इस ‘आदर्श घोटाले’ की बखिया उधेड़ी थी।

मोदी जी ने गरजते हुए कहा था0 “भाइयों, ज़रा इनकी बेशर्मी देखिए! इन्होंने तो कारगिल के उन वीर जवानों की विधवाओं को भी नहीं बख्शा, जिन्होंने हमारी रक्षा के लिए अपनी जान दे दी थी। जो लोग हमारे शहीदों का कफ़न और उनके फ्लैट तक डकार जाएं, क्या आप उन्हें महाराष्ट्र की तिजोरी सौंपेंगे?”

इस एक नैरेटिव ने आग में घी का काम किया। मध्यम वर्ग, जो पहले से ही महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त था, वो इस घोटाले को सुनकर नफरत से भर गया। सेना और सैनिकों के प्रति हर हिंदुस्तानी के मन में एक गहरा सम्मान होता है।

जब उस आम शहरी नागरिक ने देखा की ये नेता कितने लालची हो सकते हैं की ये शहीदों के हक़ का निवाला भी छीन लें, तो उनका कांग्रेस-एनसीपी से हमेशा के लिए मोहभंग हो गया।

बीजेपी ने बहुत ही खामोशी लेकिन पूरी आक्रामकता के साथ शहरी और ग्रामीण गुस्से को एक साथ जोड़ दिया।

गांव का किसान सिंचाई घोटाले और अजित पवार के बयान से भड़का हुआ था, और शहर का युवा आदर्श घोटाले के पाप से खौल रहा था। कांग्रेस और एनसीपी की हालत उस नाविक की तरह हो गई थी जिसकी नाव में सैकड़ों छेद हो चुके थे और पानी अंदर भर रहा था।

लेकिन कहते हैं ना, विनाश काले विपरीत बुद्धि! जब सब कुछ तबाह हो रहा था, तब इन कांग्रेसी और एनसीपी नेताओं को एकजुट होकर डैमेज कंट्रोल करना चाहिए था।

लेकिन सत्ता का लालच इतनी बुरी बीमारी है की चुनाव से ठीक पहले ये दोनों पार्टियां आपस में ही लड़ पड़ीं। इन्होंने वो ‘सेल्फ-गोल’ कर दिया, जिसने बीजेपी की जीत का सीधा रेड कारपेट बिछा दिया।

चुनाव से 15 दिन पहले सीटों के लालच में आपस में लड़े कांग्रेस-NCP और बीजेपी ने अपने शांत अनुशासन से उड़ा ली पूरे महाराष्ट्र की दावत

जब किसी राज्य की जनता त्राहि-त्राहि कर रही हो, किसान आत्महत्या कर रहे हों, और सरकार के घोटालों की फाइलें सड़कों पर उड़ रही हों… तो ऐसे में किसी भी समझदार राजनीतिक दल को क्या करना चाहिए?

ज़ाहिर सी बात है, उन्हें जनता के बीच जाकर माफ़ी मांगनी चाहिए और एकजुट होकर डैमेज कंट्रोल करना चाहिए। लेकिन 15 साल तक सत्ता की मलाई खाने वाले कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं का अहंकार इतना भयंकर था की उन्हें ज़मीन का खौलता हुआ लावा दिखाई ही नहीं दे रहा था।

इन्हें लग रहा था की जनता कितनी भी गालियां दे दे, लेकिन चुनाव वाले दिन तो वो हमारी झोली में ही वोट डालेगी। इसी घमंड और सत्ता के भयंकर लालच ने 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक ऐसा ऐतिहासिक ‘सेल्फ-गोल’ करवाया, जिसने रही-सही कसर भी पूरी कर दी।

हुआ यूँ की चुनाव एकदम सिर पर आ चुके थे। महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए अक्टूबर 2014 में वोट पड़ने थे। लेकिन जनता के बीच जाने के बजाय कांग्रेस और एनसीपी के नेता बंद कमरों में सीटों के बंटवारे को लेकर आपस में ही लड़ पड़े।

एनसीपी, जो उस वक्त केंद्र में भी झटके खा चुकी थी, वो महाराष्ट्र में कांग्रेस से ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ (50-50) की डिमांड कर रही थी।

शरद पवार की एनसीपी अड़ गई थी की हमें 288 में से 144 सीटें चाहिए और मुख्यमंत्री का पद भी ढाई-ढाई साल के लिए बंटेगा। दूसरी तरफ कांग्रेस अपनी जिद में थी, वो एनसीपी को 124 सीटों से ज़्यादा देने को तैयार ही नहीं थी।

ज़रा सोचिए, बाहर जनता इन्हें सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए तैयार बैठी थी, और अंदर ये इस बात पर लड़ रहे थे की लूट का माल आपस में कैसे बांटा जाए!

आखिरकार, 25 सितंबर 2014 को- यानी चुनाव से मात्र 15 दिन पहले- वो हुआ जिसने पूरे महाराष्ट्र की राजनीति को भूचाल में धकेल दिया।

सीटों के इसी लालच में आकर कांग्रेस और एनसीपी ने अपना 15 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया। दोनों ने ऐलान कर दिया की हम अब अकेले-अकेले चुनाव लड़ेंगे।

मज़े की बात तो ये थी की इसी दौरान 25 साल पुराना शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन भी सीटों के पेंच के चलते टूट गया था। यानी अब महाराष्ट्र के चुनावी मैदान में चार बड़ी पार्टियां (बीजेपी, शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी) चारों अलग-अलग चुनाव लड़ रही थीं।

गठबंधन टूटने के बाद कांग्रेस और एनसीपी का जो रूप जनता के सामने आया, उसने वोटर को पूरी तरह चिढ़ा दिया। कल तक जो कांग्रेस और एनसीपी के नेता गले मिलकर एक-दूसरे को क्लीन चिट बांट रहे थे, गठबंधन टूटते ही वो रैलियों में एक-दूसरे के घोटालों की पोल खोलने लगे।

तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने तो बकायदा इंटरव्यू में मान लिया कि आदर्श घोटाला और सिंचाई घोटाला हुआ था, लेकिन इसके लिए एनसीपी ज़िम्मेदार है।

दूसरी तरफ एनसीपी के नेता कांग्रेस को भ्रष्ट बताने लगे। मतलब, जनता के सामने दोनों पार्टियों ने खुद ही कबूल कर लिया कि “हां, हम चोर हैं!”

लेकिन असली खेल यहीं से शुरू होता है और यहीं से पता चलता है की बीजेपी क्यों चुनाव जीतने के मामले में बाकी पार्टियों से कोसों आगे है।

विपक्ष के इस फैलते हुए रायते के बीच, बीजेपी ने जिस ‘शांत अनुशासन’ का परिचय दिया, वो राजनीति विज्ञान के छात्रों के लिए एक केस स्टडी है। BJP और शिवसेना का गठबंधन भी टूट चूका था, दोनों ने अपने दम पे चुनाव लड़ने का फैसला किया था।

लेकिन बीजेपी ने गठबंधन टूटने पर कोई विलाप नहीं किया। उन्होंने अपनी पुरानी साथी शिवसेना के खिलाफ एक भी अभद्र शब्द नहीं बोला, बल्कि अपना पूरा फोकस सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस-एनसीपी के 15 साल के भ्रष्टाचार और पापों पर टिका दिया।

बीजेपी ने बहुत ही बारीकी से इस चौतरफा लड़ाई को अपने फायदे में मोड़ लिया। उन्हें पता था की विपक्ष आपस में लड़कर अपना वोट काट रहा है, ऐसे में अगर बीजेपी अपने कैडर को एकजुट रखे, तो जीत पक्की है।

बीजेपी ने महाराष्ट्र के लोगों के सामने देवेंद्र फडणवीस के रूप में एक एकदम युवा, बेदाग़ और तेज़-तर्रार चेहरा पेश किया। फडणवीस के ऊपर भ्रष्टाचार का एक दाग तक नहीं था और वो सिंचाई घोटाले को सड़कों पर लाकर पहले ही जनता के हीरो बन चुके थे।

और सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक था बीजेपी का वो नारा जिसने पूरे महाराष्ट्र के रग-रग में दौड़ते ‘मराठी स्वाभिमान’ को सीधे दिल्ली के राष्ट्रवाद से जोड़ दिया।

बीजेपी ने पूरे महाराष्ट्र को होर्डिंग्स और पोस्टरों से पाट दिया, जिन पर लिखा था- “छत्रपति शिवाजी का आशीर्वाद, चलो चलें मोदी के साथ!”

इस एक नारे ने पूरा खेल खत्म कर दिया। इस नारे ने महाराष्ट्र के क्षत्रीय स्वाभिमान (शिवाजी महाराज) और राष्ट्रीय नेतृत्व (नरेंद्र मोदी) का ऐसा अचूक कॉम्बिनेशन तैयार किया की आम वोटर के मन का सारा कन्फ्यूज़न दूर हो गया।

जनता ने देखा की एक तरफ वो कांग्रेस-एनसीपी है जो सत्ता के लालच में आपस में लड़ रही है, जिन्होंने हमारे किसानों का मज़ाक उड़ाया और हमारे शहीदों के फ्लैट खा गए।

और दूसरी तरफ एक अनुशासित बीजेपी है, जिसके पास बेदाग़ नेता है और जो विकास की बात कर रही है।

चुनाव प्रचार के आखिरी 10 दिनों में बीजेपी ने ऐसा आक्रामक और सधा हुआ ग्राउंड कैंपेन चलाया की विपक्ष पूरी तरह हवा में उड़ गया।

विपक्ष की गलतियों का हुआ पूरा हिसाब और 46 से सीधे 122 सीटों की ऐतिहासिक छलांग लगाकर बीजेपी ने महाराष्ट्र में गाड़ दिया अपना भगवा

आखिरकार वो दिन आ ही गया जिसका पूरे देश को बेताबी से इंतज़ार था। 19 अक्टूबर 2014 को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने शुरू हुए।

जैसे-जैसे ईवीएम (EVM) के बटन दबने की आवाज़ें टीवी स्क्रीन पर आंकड़ों में बदल रही थीं, वैसे-वैसे कांग्रेस और एनसीपी के खेमे में सन्नाटा पसरता जा रहा था। दोपहर होते-होते तो विपक्ष के उस 15 साल पुराने महल की एक-एक ईंट ज़मीन पर आ गिरी।

चुनावी आंकड़े ऐसे थे की बड़े-बड़े राजनीतिक एक्सपर्ट्स के पसीने छूट गए। ज़रा इन नंबरों पर गौर कीजिए! 2009 के विधानसभा चुनाव में जो बीजेपी महज़ 46 सीटों पर अटकी हुई थी, उसने इस बार सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए सीधे 122 सीटों की ऐतिहासिक और अकल्पनीय छलांग लगा दी।

बिना किसी गठबंधन के, बिल्कुल अकेले चुनाव लड़ते हुए बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

दूसरी तरफ वो विपक्ष था जो चुनाव से 15 दिन पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर आपस में लड़ रहा था। 2009 में 82 सीटें जीतने वाली कांग्रेस इस चुनाव में औंधे मुंह गिरकर मात्र 42 सीटों पर सिमट गई।

और जिस एनसीपी के नेता (अजित पवार) ने डैम वाला वो बयान दिया था, उस एनसीपी को जनता ने 62 सीटों से उठाकर सीधे 41 सीटों पर पटक दिया।

बीजेपी ने बहुत ही सटीकता के साथ अपना काम कर दिया था। हाँ, यह सच है की 122 सीटें जीतने के बावजूद बीजेपी 288 सीटों वाली विधानसभा में जादुई बहुमत के आंकड़े (145 सीटों) से 23 सीटें दूर रह गई थी।

लेकिन महाराष्ट्र की जनता का जनादेश एकदम शीशे की तरह साफ़ था- उन्हें किसी भी कीमत पर कांग्रेस-एनसीपी का भ्रष्ट सिंडिकेट सत्ता से बाहर चाहिए था।

ऐसे में चुनाव से ठीक 15 दिन पहले जो शिवसेना (63 सीटें) बीजेपी से गठबंधन तोड़कर अलग लड़ी थी, उसने भी ज़मीन पर हवा का रुख भांप लिया।

शिवसेना समझ गई की महाराष्ट्र का ‘मराठी मानुष’ और समूचा हिन्दू समाज अब बीजेपी के विकास और हिंदुत्व के विज़न के साथ खड़ा है। जनता के इसी स्पष्ट मेंडेट का सम्मान करते हुए, चुनाव के बाद बीजेपी और शिवसेना फिर से एक साथ आ गए।

दोनों ने मिलकर महाराष्ट्र में एक मजबूत और पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई और कांग्रेस-एनसीपी को हमेशा के लिए सत्ता से बाहर खदेड़ दिया।

देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और महाराष्ट्र को 15 साल बाद एक ऐसा मुख्यमंत्री मिला जो उसी विदर्भ की मिट्टी से आता था, जहाँ के किसानों ने सबसे ज़्यादा आंसू बहाए थे।

इस पूरे चुनाव का अगर आप एक लाइन में निचोड़ निकालें, तो बात बिल्कुल शीशे की तरह साफ़ हो जाती है। कांग्रेस और एनसीपी को मोदी लहर या देवेंद्र फडणवीस ने अकेले नहीं हराया था। उन्हें असल में उनकी ही उन घोर गलतियों ने हराया था।

बीजेपी ने तो बस एक बहुत ही चतुर शिकारी की तरह बर्ताव किया। जब विपक्ष ने ‘सेल्फ-गोल’ करके अपना रायता फैलाया, तो बीजेपी ने पूरे शांत अनुशासन के साथ उस रायते को समेटा, जनता के गुस्से को एक सही दिशा दी, और एक ऐसी बंपर जीत की दावत उड़ाई जिसकी मिसाल भारतीय राजनीति में बहुत कम देखने को मिलती है।

अपनी इसी सीरीज़ के अगले एपिसोड (Episode 4) में हम विपक्ष के ऐसे ही दूसरे ‘सेल्फ-गोल’ का पोस्टमार्टम करेंगे, जिसने जनता को हमेशा के लिए उनसे दूर कर दिया और बीजेपी को एक और शानदार राजनैतिक बढ़त दे दी।

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