वो जांबाज जिसने भारतीयों की बेइज्जती करने वाले तानाशाह ‘हिटलर’ को घुटनों पर लाकर मंगवाई ‘लिखित माफी’, ‘जय हिन्द’ के असली जनक और अखंड भारत के पहले विदेश मंत्री ‘चेम्पाकरमन पिल्लई’

आज हम आपको भारत के एक ऐसे खूंखार और दिमागी जांबाज के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके आगे दुनिया को अपनी उँगलियों पर नचाने वाला क्रूर तानाशाह अडोल्फ हिटलर भी पानी भरता था!

आज जब भी हम “जय हिन्द” बोलते हैं, तो हमें लगता है की ये नारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दिया था।

परन्तु सच्चाई ये है की इस नारे की गूंज नेताजी से भी दशकों पहले एक ऐसे गुमनाम शेर ने गढ़ी थी, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

उनका नाम था- चेम्पाकरमन पिल्लई (Chempakaraman Pillai)। ये वो आदमी थे जिन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, 12 से ज़्यादा विदेशी भाषाओं (जर्मन, फ्रेंच, इटैलियन आदि) पर ऐसी महारत हासिल की कि अंग्रेज भी चकमा खा जाएं।

चलिए आज इसी गुमनाम महानायक के उन कारनामों का कच्चा-चिट्ठा खोलते हैं जो हर हिंदुस्तानी को गर्व महसूस कराने के लिए काफी है।

वो हिंदुस्तानी शेर जिसका नाम सुनकर कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत और हिटलर, जिसने पहली बार बोला ‘जय हिन्द’ का नारा

चेम्पाकरमन पिल्लई का जन्म 15 सितंबर 1891 को केरल के तिरुवनंतपुरम में एक तमिल परिवार में हुआ था।

उनके पिता चिन्नास्वामी पिल्लई पुलिस में हवलदार थे। जब पिल्लई के उम्र के लड़के गली-मोहल्लों में खेल रहे होते थे, तब पिल्लई के दिमाग में सिर्फ एक ही धुन सवार रहती थी- इन गोरों को अपने देश से कैसे खदेड़ना है!

अब आपको आज़ादी के उस सबसे बड़े नारे ‘जय हिन्द’ के बारे में बताते हैं। इसके लिए हमें 1907 के दौर में चलना पड़ेगा। पिल्लई उस समय तिरुवनंतपुरम के ‘मॉडल स्कूल’ में पढ़ाई कर रहे थे।

बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं के भाषणों का उन पर इतना तगड़ा असर था की उन्होंने स्कूल के अंदर ही अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया। और यहीं पर, इतिहास में पहली बार किसी हिंदुस्तानी के मुँह से वो जादुई शब्द निकले थे- “जय हिन्द” (Jai Hind)!

सोचिए ज़रा, उस ज़माने में जब अंग्रेजों के सामने लोग नज़रें झुका कर चलते थे, तब एक स्कूली लड़का सीना तानकर “जय हिन्द” चिल्ला रहा था।

स्कूल में जब ये नारे लगे तो प्रिंसिपल की तो हवा टाइट हो गई। उसने तुरंत पुलिस बुला ली की भैया यहां तो बगावत हो रही है।

और सबसे मज़े की बात सुनिए! जाँच करने के लिए थाने से जो हवलदार स्कूल पहुंचा, वो कोई और नहीं, खुद चेम्पाकरमन पिल्लई के सगे बाप चिन्नास्वामी पिल्लई थे!

बाप-बेटे का ये आमना-सामना किसी फ़िल्मी सीन से कम नहीं था। लेकिन यही वो घटना थी जिसने पिल्लई को हमेशा के लिए अंग्रेजों की हिट-लिस्ट में डाल दिया।

उसी दौरान वहां एक ब्रिटिश वैज्ञानिक सर वाल्टर स्ट्रिकलैंड (Sir Walter Strickland) आए हुए थे।

वो पिल्लई के बगावती तेवर, उनकी अकल और उनके अंदर की आग से इतने भयंकर प्रभावित हुए की उन्होंने पिल्लई को अंग्रेजों की नज़रों से बचाया और अपने साथ यूरोप ले गए।

पहले इटली, फिर स्विट्ज़रलैंड और उसके बाद जर्मनी। यहीं से शुरू हुई ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में कील ठोकने की असली प्लानिंग।

समंदर में घुसकर अंग्रेजों पर बरसाए बम और ब्रिटिश साम्राज्य के लिए खौफ का दूसरा नाम बन गया ‘एम्डेन’

अब जो किस्सा मैं आपको बताने जा रहा हूँ, वो पिल्लई की ज़िंदगी का सबसे खतरनाक और रौंगटे खड़े कर देने वाला मिशन था। बात 1914 की है।

पूरी दुनिया में प्रथम विश्व युद्ध (First World War) छिड़ चुका था। पिल्लई जर्मनी में थे और उन्होंने जर्मन नेवी के साथ मिलकर एक ऐसी साज़िश रची जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला कर रख दी।

पिल्लई सीधे जर्मन नेवी के उस खूंखार जंगी जहाज़ ‘एम्डेन’ (SMS Emden) पर सवार हो गए, जो समंदर में तबाही मचाने के लिए ही जाना जाता था।

22 सितंबर 1914 की वो काली रात, मद्रास (आज का चेन्नई) के तट पर घुप अंधेरा था। अचानक समंदर को चीरते हुए एम्डेन क्रूजर भारतीय तट के एकदम करीब आ गया। और फिर शुरू हुआ मौत का तांडव!

एम्डेन ने सीधे मद्रास में अंग्रेजों के ठिकानों, उनके विशाल तेल डिपो और फौजी बेड़ों पर भयंकर बमबारी शुरू कर दी। आसमान में आग के गोले उठ रहे थे और अंग्रेज अपनी जान बचाकर पागलों की तरह भाग रहे थे।

कहा जाता है की इस पूरे मिशन का मास्टरमाइंड और नेविगेटर चेम्पाकरमन पिल्लई ही थे। एक अकेला हिंदुस्तानी शेर, जर्मन जहाज़ पर बैठकर, अपने ही देश में घुसे अंग्रेजों पर समंदर से बम बरसा रहा था!

खौफ इतना भयंकर था की मद्रास शहर से कई अंग्रेज रातों-रात अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर भाग खड़े हुए।

आज 100 साल से भी ज़्यादा बीत गए, लेकिन तमिल भाषा में आज भी अगर किसी बहुत चालाक, निडर या खतरनाक आदमी का ज़िक्र करना हो, तो उसे ‘एम्डेन’ (Emden) कहकर बुलाया जाता है। ये था पिल्लई का खौफ!

देश आज़ाद होने से 32 साल पहले ही बना दी थी भारत की अपनी सरकार और बन गए अखंड भारत के पहले विदेश मंत्री

ये गोरे अंग्रेज भारत पर हुकूमत का घमंड पाले बैठे थे, और उधर यूरोप में बैठा ये शेर भारत को आज़ाद कराने की पूरी नीव खड़ी कर चुका था।

1915 का वो साल हर हिंदुस्तानी को याद रखना चाहिए। राजा महेंद्र प्रताप सिंह, मौलाना बरकतुल्लाह और चेम्पाकरमन पिल्लई ने मिलकर अफगानिस्तान के काबुल में एक ऐसा कारनामा कर दिखाया जो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।

इन्होंने काबुल में भारत के बाहर पहली ‘अस्थायी भारत सरकार’ (Provisional Government of India) की स्थापना कर दी! मतलब देश के असली आज़ाद होने से पूरे 32 साल पहले ही भारत की अपनी एक आज़ाद सरकार बन गई।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह इसके राष्ट्रपति बने और चेम्पाकरमन पिल्लई का रुतबा इतना बड़ा था की उन्हें अखंड भारत का पहला ‘विदेश मंत्री’ (Foreign Minister) बनाया गया।

विदेश मंत्री बनते ही पिल्लई ने अपना गेम शुरू कर दिया। उन्होंने अपनी कूटनीति और 12 भाषाओं के ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए सीधे जर्मनी के कैसर (Emperor) और तुर्की के सुल्तान से संपर्क साधा।

उनका एक ही मक़सद था- इन ताकतों को एकजुट करके ब्रिटिश भारत पर सीधा सैन्य हमला करवाना ताकि इन गोरों को हमेशा के लिए भारत से खदेड़ा जा सके।

सोच कर देखिए दोस्त, जब भारत के अंदर कई तथाकथित बड़े नेता अंग्रेजों के सामने हाथ जोड़कर ‘डोमिनियन स्टेटस’ (Dominion Status) की भीख मांग रहे थे, तब विदेश में बैठा ये जांबाज सीधे वर्ल्ड वॉर की ताकतों को भारत पर हमला करने के लिए राज़ी कर रहा था।

जब गुरूर में अंधे तानाशाह हिटलर ने की भारत की बेइज्जती तो इस अकेले हिंदुस्तानी शेर ने उसे घुटनों पर लाकर मंगवाई लिखित माफ़ी

अब आते हैं इस कहानी के सबसे बड़े क्लाइमैक्स पर। बात 1931 की है। अडोल्फ हिटलर (Adolf Hitler) जर्मनी में तेज़ी से उभर रहा था। उसके नाम से पूरा यूरोप दहसत में था।

हिटलर का गुरूर सातवें आसमान पर था और वो खुद को और अपनी नाजी नस्ल को दुनिया में सबसे ऊपर मानता था।

उसी साल, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस घमंड में अंधे तानाशाह ने हिंदुस्तानियों की बेइज्जती कर दी। हिटलर ने सरेआम कहा की “भारतीय लोग खुद पर शासन करने के लायक ही नहीं हैं, वो एक कमज़ोर नस्ल हैं और उन पर ब्रिटिश हुकूमत ही बिल्कुल सही है।”

बस फिर क्या था! जैसे ही ये बयान बर्लिन में बैठे चेम्पाकरमन पिल्लई के कानों तक पहुंचा, उनका खून खौल उठा।

अरे भाई, जिस शेर ने समंदर में अंग्रेजों पर बम फोड़े हों, वो अपने देश का ऐसा अपमान कैसे बर्दाश्त कर लेता? पिल्लई ने कोई धरना नहीं दिया, कोई शांति मार्च नहीं निकाला। उन्होंने सीधा उस खूंखार तानाशाह हिटलर की आँखों में आँखें डालने का फैसला किया।

पिल्लई ने हिटलर को एक बेहद कड़क खत लिखा और उसकी सारी औकात उसे याद दिला दी। उन्होंने हिटलर को साफ-साफ अल्टीमेटम दे दिया की-

“तुमने मेरे देश और मेरे लोगों का जो अपमान किया है, उसे हम हिंदुस्तानी किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। 10 दिसंबर 1931 तक तुम्हें अपने इन घटिया शब्दों के लिए लिखित में माफ़ी मांगनी होगी, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना।”

ज़रा सोचिए यार! जिस हिटलर के नाम से दुनिया के बड़े-बड़े राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कांपते थे, उसे एक अकेला हिंदुस्तानी उसकी ही ज़मीन (जर्मनी) पर बैठकर अल्टीमेटम दे रहा था!

और फिर वो हुआ जिस पर आज भी यकीन करना मुश्किल लगता है। एक भारतीय शेर की वो दहाड़ सुनकर दुनिया को डराने वाले हिटलर को पसीना आ गया। जी हाँ, अडोल्फ हिटलर को झुकना पड़ा।

10 दिसंबर 1931 को हिटलर के सेक्रेटरी ने पिल्लई को एक लिखित माफ़ीनामा भेजा, जिसमें हिटलर ने अपने बयान के लिए माफ़ी मांगी और सफाई दी। इतिहास में ऐसा दूसरी बार कभी नहीं हुआ जब हिटलर ने किसी के आगे ऐसे घुटने टेके हों!

हिटलर अपना अपमान बर्दास्त नहीं कर पाया और इस जांबाज को दे दिया धीमा ज़हर

लेकिन दोस्त, एक कायर और क्रूर तानाशाह अपना अपमान कभी भूलता नहीं है। हिटलर अंदर ही अंदर इस सरेआम हुई बेइज्जती की आग में जल रहा था।

1933 में जैसे ही हिटलर जर्मनी का चांसलर बना और सत्ता पूरी तरह से उसके हाथ में आई, उसने अपना असली नीच रूप दिखाना शुरू कर दिया।

सत्ता मिलते ही नाज़ियों ने सबसे पहला काम पिल्लई से बदला लेने का किया। नाजी गुंडों ने बर्लिन में पिल्लई के घर और ऑफिस पर भयंकर धावा बोल दिया।

उनकी सारी प्रॉपर्टी, उनके ज़रूरी दस्तावेज़ और पैसे सब ज़ब्त कर लिए गए। पिल्लई को नाज़ियों ने पकड़ लिया और उन्हें बुरी तरह पीटा गया।

अब हिटलर जानता था की अगर इस हिंदुस्तानी शेर को सरेआम मारा, तो दुनिया भर में फैले इसके आज़ाद सरकार वाले साथी बवाल काट देंगे। इसलिए नाज़ियों ने एक बहुत ही कायरतापूर्ण तरीका अपनाया।

उन्होंने पिल्लई को धोखे से ‘धीमा ज़हर’ (Slow Poison) देना शुरू कर दिया। ये वो ज़हर था जो इंसान को तुरंत नहीं मारता, बल्कि धीरे-धीरे उसके शरीर के अंदरूनी अंगों को गला देता है।

ज़हर का असर होने लगा। वो फौलादी शरीर जो कभी अंग्रेज़ों के लिए काल बन गया था, अब धीरे-धीरे अंदर से टूटने लगा। महीनों तक पिल्लई बर्लिन के एक अस्पताल में मौत से लड़ते रहे।

लेकिन आख़िरकार, 26 मई 1934 को मात्र 42 साल की उम्र में भारत माँ के इस जांबाज सपूत ने विदेशी ज़मीन पर अपनी आख़िरी सांस ली। देश की आज़ादी का वो परवाना, जिसने ‘जय हिन्द’ का नारा गढ़ा था, वो हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गया।

32 साल बाद जब अपने वतन लौटी इस महान सपूत की अस्थियां तो रो पड़ा था पूरा देश

पिल्लई साहब की आख़िरी इच्छा थी की जब भी मेरा वतन आज़ाद हो, तो मेरी अस्थियों को भारत ले जाया जाए और मेरे गांव (नंजिल नाडु) की करमाना नदी में विसर्जित किया जाए। वो अपनी राख को भी किसी विदेशी ज़मीन पर नहीं छोड़ना चाहते थे।

लेकिन इस आज़ाद देश के सिस्टम का दोगलापन देखिए। 1947 में देश आज़ाद हो गया, बड़े-बड़े नेता सत्ता के मज़े लूटने लगे, लाल किले से भाषण दिए जाने लगे, लेकिन किसी भी सरकार ने इस महान क्रांतिकारी की अस्थियां वापस लाने की कोई ज़हमत नहीं उठाई।

आख़िरकार उनकी मौत के पूरे 32 साल बाद, 1966 में जाकर उनकी अस्थियां भारत लौटीं। उनकी पत्नी लक्ष्मी बाई खुद उन अस्थियों को लेकर मुंबई पहुंचीं।

तब जाकर थोड़ा बहुत सिस्टम जागा और भारतीय नौसेना के जहाज़ ‘INS दिल्ली’ से पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन अस्थियों को केरल ले जाया गया।

32 साल के एक लम्बे इंतज़ार के बाद आख़िरकार करमाना नदी में पिल्लई साहब की अस्थियां विसर्जित हुईं और उनकी आख़िरी इच्छा पूरी हुई।

उस दिन उस नदी के किनारे खड़ा हर वो इंसान फूट-फूट कर रोया था, जो इस शूरवीर के कारनामे जानता था।

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