राजनीति में अक्सर लोग कहते हैं की जब कोई ‘लहर’ आती है, तो बड़े-बड़े किले ढह जाते हैं। टीवी पर बैठे विश्लेषक भी यही कहते हैं की किसी पार्टी ने रातों-रात कोई ऐसा जादू कर दिया की पूरी जनता उसकी दीवानी हो गई।
लेकिन सच कहूं तो, ज़मीनी राजनीति किसी जादू से नहीं चलती। राजनीति का एक बहुत सीधा सा उसूल है- वैक्यूम (खालीपन)।
जब सत्ता में बैठी पार्टी अपने भ्रष्टाचार और बेतुकी नीतियों से जनता के बीच एक खालीपन पैदा कर देती है, तो कोई न कोई उस वैक्यूम को भरने ज़रूर आता है।
2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव की कहानी बिल्कुल यही है।
ये चुनाव सिर्फ बीजेपी की जीत का इतिहास नहीं है, बल्कि यह इस बात की सबसे शानदार ‘केस स्टडी’ है की कैसे विपक्ष खुद अपने हाथों से अपनी सियासी आत्महत्या करता है और बीजेपी के चाणक्य उसी सजे हुए थाल में अपनी जीत की दावत उड़ा लेते हैं।
2009 में सिर्फ 4 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2014 हरियाणा चुनाव में 47 के पार, ये कोई चमत्कार नहीं बल्कि विपक्ष की सियासी गलतियां और बीजेपी की अचूक रणनीति का नतीजा
ज़रा 2009 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर कीजिए। उस वक्त हरियाणा में बीजेपी का वजूद क्या था? 90 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी सिर्फ 4 सीटों पर सिमट गई थी।
पूरे राज्य में उनका वोट शेयर बमुश्किल 9.04 प्रतिशत था। हरियाणा की राजनीति पूरी तरह से दो ध्रुवों में बंटी हुई थी- एक तरफ भूपिंदर सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस और दूसरी तरफ ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल (INLD)।
बीजेपी को तो कोई मुख्य मुकाबले में गिनता तक नहीं था।
लेकिन फिर आता है 2014 का विधानसभा चुनाव, और नतीजे सबकी आंखें चौंका देते हैं। जो पार्टी 5 साल पहले महज़ 4 सीटों पर खड़ी थी, वो अचानक 33.2 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 47 सीटें जीत लेती है और अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना लेती है।
वहीं, लगातार 10 साल से सत्ता का सुख भोग रही कांग्रेस 15 सीटों पर धड़ाम हो जाती है और मुख्य विपक्षी दल इनेलो 19 सीटों पर सिकुड़ कर रह जाती है।
अब सवाल ये है की क्या हरियाणा के लोगों ने अचानक कोई सपना देखा था की बीजेपी को वोट देना है? बिल्कुल नहीं।
हकीकत ये थी की 10 साल तक सत्ता में बैठी हुड्डा सरकार और विपक्ष में बैठी इनेलो ने जातिवाद, क्षेत्रवाद और करप्शन का ऐसा कॉकटेल तैयार कर दिया था की हरियाणा का आम आदमी इनसे परेशान हो चुका था।
जनता बस एक सुरक्षित विकल्प ढूंढ रही थी जो उन्हें इस घुटन से बाहर निकाल सके।
बीजेपी के रणनीतिकारों (खासकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह) ने इस सुलगते हुए गुस्से को बहुत बारीकी से पढ़ लिया था।
उन्होंने कोई नया जादू नहीं किया, बल्कि बहुत शांति से ज़मीन पर कान लगाकर विपक्ष के पापों की लिस्ट तैयार की। बीजेपी को पता था की विपक्ष ने रायता फैला रखा है, बस उसे समेट कर सही दिशा में मोड़ना है।
और फिर बीजेपी ने विपक्ष की हर एक गलती, हर एक घोटाले और हर एक घमंडी बयान को अपना सबसे मारक हथियार बना लिया।
दामाद श्री का करोड़ों का DLF ज़मीन घोटाला और मोदी जी के एक धारदार तंज ने कैसे कांग्रेस को बैकफुट पर धकेल कर बीजेपी के लिए खोल दिए सत्ता के दरवाज़े

जब भी हरियाणा में 2014 के चुनाव का ज़िक्र होगा, तो विपक्ष के सबसे बड़े ‘सेल्फ-गोल’ के रूप में गांधी परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा का नाम सबसे ऊपर आएगा।
ज़रा इस घोटाले की टाइमिंग और इसके तरीके को समझिए। पूरा हरियाणा जानता है की गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में क्या खेल खेला गया था। रॉबर्ट वाड्रा की एक कंपनी थी- स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी।
इस कंपनी ने शिकोहपुर में 3.5 एकड़ ज़मीन लगभग 7.5 करोड़ रुपये में खरीदी। अब ज़मीन तो खरीद ली, लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू हुआ।
हुड्डा सरकार ने गांधी परिवार के दामाद को खुश करने के लिए सिस्टम के सारे नियम-कानून ताक पर रख दिए और रातों-रात उस ज़मीन का ‘कमर्शियल लैंड यूज़’ (CLU) पास कर दिया।
जैसे ही CLU मिला, उस ज़मीन की कीमत आसमान छूने लगी और वाड्रा की कंपनी ने बिना एक ईंट रखे, उसी ज़मीन को DLF (देश की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनी) को 58 करोड़ रुपये में बेच दिया!
सोचिए, एक आम आदमी को अपने घर का नक्शा पास कराने में पसीने छूट जाते हैं, और यहाँ कांग्रेस सरकार ने एक परिवार को करोड़ों का मुनाफा कमाने के लिए पूरा सरकारी तंत्र उनकी जेब में डाल दिया था।
जब ये घोटाला मीडिया में फूटा, तो किसी भी समझदार राजनीतिक दल को क्या करना चाहिए था? उन्हें जांच बैठानी चाहिए थी, दूरी बनानी चाहिए थी।
लेकिन हुड्डा सरकार का ईगो देखिए, उन्होंने वाड्रा पर आंच तक नहीं आने दी। पूरी की पूरी कैबिनेट और प्रशासन सिर्फ सोनिया गांधी के दामाद को पाक-साफ साबित करने में लग गया।
यहीं पर बीजेपी के रणनीतिकारों ने अपना सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेला। हरियाणा एक शुद्ध कृषि प्रधान राज्य है। यहाँ का किसान अपनी ज़मीन को अपनी मां मानता है।
जब हरियाणा के किसानों ने देखा की उनके हकों की ज़मीनें कौड़ियों के भाव एक एलीट परिवार के दामाद को लुटाई जा रही हैं, तो उनके भीतर भयंकर आक्रोश पैदा हो गया।
बीजेपी ने इस गुस्से को एक धारदार नैरेटिव में बदल दिया। चुनाव प्रचार के दौरान जब नरेंद्र मोदी हरियाणा की रैलियों में उतरे, तो उन्होंने पूरे कांग्रेस इकोसिस्टम की बखिया उधेड़ कर रख दी।
मोदी जी ने मंच से सीधे गांधी परिवार पर प्रहार करते हुए रॉबर्ट वाड्रा के लिए “दामाद श्री” शब्द का इस्तेमाल किया। ये शब्द कोई मामूली शब्द नहीं था; इसमें वो पूरा व्यंग्य और कटाक्ष छुपा था जो एक आम हिंदुस्तानी के मन में इस सामंती परिवार के प्रति उबल रहा था।
मोदी जी यहीं नहीं रुके, उन्होंने हुड्डा सरकार की पूरी क्रोनोलॉजी को एक लाइन में समेटते हुए कहा- “हरियाणा में बाप-बेटे (भूपिंदर हुड्डा और दीपेंद्र हुड्डा) और जीजा-साले (रॉबर्ट वाड्रा और राहुल गांधी) की सरकार चल रही है।”
इस एक तंज ने कांग्रेस को पूरी तरह डिफेंसिव कर दिया। बीजेपी ने यह मैसेज घर-घर तक पहुँचा दिया की हुड्डा सरकार किसानों की सरकार नहीं, बल्कि सिर्फ ‘दामाद श्री’ की तिजोरी भरने वाली सरकार है।
कांग्रेस ने इस हमले का जवाब देने के बजाय फिर वही गलती की- उनके नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर-करके वाड्रा को बचाने लगे।
और इसी अंधभक्ति ने हरियाणा के आम किसान और ग्रामीण वोटर को हमेशा के लिए कांग्रेस से छिटका कर बीजेपी की झोली में डाल दिया। बीजेपी को पता था की जब तक कांग्रेस दामाद को बचाती रहेगी, बीजेपी का वोटबैंक अपने आप बढ़ता रहेगा।
कांग्रेस द्वारा 70 प्रतिशत गैर-जाटों का सरेआम अपमान और बीजेपी की वो 35 बनाम 1 की खामोश सोशल इंजीनियरिंग जिसने हरियाणा में ला दी भगवा आंधी
ज़मीन घोटाले ने तो कांग्रेस की छवि पर भ्रष्टाचार का ऐसा दाग लगाया था जो आसानी से धुंधला नहीं होने वाला था। लेकिन राजनीति में सिर्फ भ्रष्टाचार ही सरकारें नहीं गिराता।
जब किसी सत्ता के भीतर यह घमंड आ जाए की उसे सिर्फ एक खास जाति या एक खास ज़िले के लोगों की ज़रूरत है और बाकी पूरी जनता उनके लिए कोई मायने नहीं रखती, तब वो सत्ता अपनी कब्र खुद खोद रही होती है।
भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार ने पूरे 10 साल तक यही किया। उन्होंने जनसांख्यिकी (Demography) और भूगोल के साथ ऐसा भद्दा मज़ाक किया की हरियाणा की 70 प्रतिशत जनता खुद को अपने ही राज्य में लावारिस महसूस करने लगी थी।
आइये आपको इस पूरे मसले को अच्छे से समझाते हैं। हरियाणा की राजनीति को समझने के लिए वहां के सामाजिक ताने-बाने को समझना बहुत ज़रूरी है।
राज्य में जाट समुदाय की आबादी लगभग 25 से 27 प्रतिशत के बीच है। ये समुदाय खेती-किसानी और राजनीति में हमेशा से बहुत दबंग और मुखर रहा है। हुड्डा साहब खुद इसी समुदाय से आते थे।
लेकिन एक मुख्यमंत्री पूरे राज्य का होता है। हुड्डा सरकार से सबसे बड़ी रणनीतिक और नैतिक चूक यह हुई की उनके 10 साल के शासन में सत्ता, प्रशासन, थानेदार और नौकरियों का पूरा का पूरा फोकस सिर्फ इसी एक जाति के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया।
बाकी जो 70 प्रतिशत आबादी थी- जिसमें पंजाबी, बनिया, ब्राह्मण, अहीर (यादव), सैनी, गुर्जर और दलित समाज के लोग आते थे- उन्हें ऐसा लगने लगा था की हुड्डा राज में उनकी कोई सुनवाई नहीं है।
थानों में आम आदमी की रिपोर्ट तब तक नहीं लिखी जाती थी जब तक उस खास समुदाय के किसी रसूखदार नेता का फोन ना आ जाए। ज़मीन पर एक अजीब सी ‘चौधराहट’ का माहौल बन गया था।
इस 70 प्रतिशत बहुसंख्यक गैर-जाट आबादी को लगने लगा था की उन्हें उनके ही राज्य में दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है।
अब ज़रा बीजेपी की दावत का इंतज़ाम देखिए। विपक्ष ने बहुसंख्यक जातियों का अपमान करके जो रायता फैलाया था, बीजेपी ने उसे समेटने के लिए एक बेहद खामोश लेकिन मारक रणनीति अपनाई।
बीजेपी ने मंचों से कोई जातिवादी भाषण नहीं दिया, ना ही जाट समुदाय का विरोध किया। लेकिन ज़मीन पर, आरएसएस (RSS) और बीजेपी के काडर ने ’36 बिरादरी’ वाले हरियाणा में ’35 बिरादरी बनाम 1 बिरादरी’ का नैरेटिव बहुत ही मजबूती से सेट कर दिया।
बीजेपी ने जानबूझकर उन चेहरों को आगे किया जिन्हें कांग्रेस ने पूरी तरह दरकिनार कर दिया था।
बीजेपी ने पंजाबी समुदाय से मनोहर लाल खट्टर को, ब्राह्मण समाज से रामबिलास शर्मा को, अहीरवाल से राव इंद्रजीत सिंह को, और 14 ओबीसी और 13 दलित चेहरों को मंच पर प्रमुखता दी।
इस साइलेंट सोशल इंजीनियरिंग का नतीजा ये हुआ की वो 70 प्रतिशत बिखरा हुआ वोटबैंक, जो अलग-अलग पार्टियों में बंटा रहता था, वो सिर्फ और सिर्फ हुड्डा सरकार के खिलाफ एकजुट हो गया।
इन गैर-जाट वोटर्स को समझ में आ गया था की अगर इस ‘चौधराहट’ से मुक्ति पानी है, तो उनके वोट का बंटवारा नहीं होना चाहिए।
मतदान के दिन ये 70 प्रतिशत आबादी इतनी खामोशी से पोलिंग बूथ पर गई की कांग्रेस के रणनीतिकारों को भनक तक नहीं लगी। जब ईवीएम (EVM) खुली, तो हुड्डा सरकार का ये जातिवादी अहंकार ताश के पत्तों की तरह ढह चुका था।
बीजेपी ने बिना किसी जाति को गाली दिए, विपक्ष के ही अहंकार को हथियार बनाकर एक पूरी नई वोटबैंक थ्योरी लिख डाली थी।
सिर्फ रोहतक को हरियाणा मान बैठने का हुड्डा का ‘क्षेत्रीय पक्षपात’, और ‘हरियाणा एक हरियाणवी एक’ का नारा देकर कैसे बीजेपी ने समेट लिया पूरे प्रदेश का वोट

जातिवाद के साथ-साथ हुड्डा सरकार ने एक और ऐसा ऐतिहासिक पाप किया था जिसने पूरे हरियाणा को अंदर से बांट कर रख दिया था। वो था- भयंकर क्षेत्रीय पक्षपात।
भूपिंदर सिंह हुड्डा मूल रूप से रोहतक के रहने वाले हैं। 10 साल तक मुख्यमंत्री रहते हुए उनका सारा ‘रोहतक प्रेम’ छलक-छलक कर बाहर आता रहा।
ज़रा सरकारी खजाने और विकास की लूट देखिए। ऐसा लगता था जैसे हुड्डा सरकार के लिए पूरा हरियाणा सिर्फ रोहतक, झज्जर और सोनीपत (जिसे देशवाल बेल्ट कहा जाता है) तक ही सीमित था।
एम्स (AIIMS) का एक्सटेंशन बनवाना हो, नई यूनिवर्सिटी खोलनी हो, आईएमटी (IMT) बनाना हो, स्टेडियम या बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट्स हों- सारा का सारा सरकारी फंड और खजाना सिर्फ इसी इलाके में बहा दिया गया।
और बाकी हरियाणा का क्या? उत्तरी हरियाणा का जीटी रोड बेल्ट (पंचकूला, अम्बाला, कुरुक्षेत्र, करनाल, पानीपत) और दक्षिणी हरियाणा का अहीरवाल बेल्ट (रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, फरीदाबाद) विकास की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे थे।
सबसे ज़्यादा मज़ाक तो अहीरवाल और गुड़गांव के साथ हुआ।
गुड़गांव पूरे हरियाणा के रेवेन्यू का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा अकेला कमा कर देता है, लेकिन जब उस पैसे को खर्च करने की बारी आती थी, तो वो सारा फंड रोहतक शिफ्ट कर दिया जाता था।
इस क्षेत्रवाद ने उत्तरी और दक्षिणी हरियाणा के लोगों के दिलों में एक गहरी नफरत पैदा कर दी थी। उन्हें लगने लगा था की हुड्डा सरकार उनके टैक्स के पैसे से सिर्फ अपना घर भर रही है।
बीजेपी के चाणक्यों के लिए यह एक और परोसी हुई थाली थी। 2014 के चुनाव प्रचार में जब बीजेपी उतरी, तो उन्होंने कांग्रेस के इस क्षेत्रीय पक्षपात को अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार बना लिया।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रैलियों में बाकायदा डेटा रखकर जनता को बताया गया की कैसे आपके हकों का पैसा सिर्फ एक ज़िले के विकास पर लुटाया जा रहा है।
बीजेपी ने मंच से डंके की चोट पर एक नारा दिया- “हरियाणा एक, हरियाणवी एक”।
ये महज़ एक नारा नहीं था, ये उत्तरी और दक्षिणी हरियाणा के उन करोड़ों लोगों के ज़ख्मों पर मरहम था जिन्हें 10 साल से लावारिस छोड़ दिया गया था।
बीजेपी ने जनता को विश्वास दिलाया की अगर हमारी सरकार आई, तो विकास पंचकूला से लेकर पलवल तक एक समान होगा।
नतीजा क्या हुआ? उत्तरी हरियाणा की जीटी रोड बेल्ट और दक्षिणी हरियाणा के अहीरवाल बेल्ट ने कांग्रेस का पूरी तरह से सूपड़ा साफ कर दिया।
जीटी रोड की 27 सीटों और दक्षिण हरियाणा की दर्जनों सीटों पर बीजेपी ने ऐसी क्लीन स्वीप मारी की कांग्रेस के बड़े-बड़े धुरंधर अपनी ज़मानत तक नहीं बचा पाए।
विपक्ष ने अपने अहंकार में सिर्फ एक ज़िले को अपना माना था, बीजेपी ने पूरे प्रदेश को अपना बना लिया और सत्ता की चाबी अपनी जेब में डाल ली।
हरियाणा का ‘पर्ची और खर्ची’ का दीमक कैसे युवाओं का भविष्य खा रहा था और बीजेपी के बिना पर्ची बिना खर्ची वाले वादे ने पलट दी बाज़ी
हरियाणा का युवा हमेशा से सरकारी नौकरी, पुलिस और फौज में जाने का सपना देखता है। इसके लिए वो खेतों में पसीना बहाता है, दिन-रात लाइब्रेरियों में बैठकर पढ़ाई करता है।
लेकिन हुड्डा सरकार और उससे पहले चौटाला सरकार के राज में इस युवा के सपनों की सरेआम नीलामी चल रही थी। पूरे हरियाणा में एक ऐसा सिस्टम बन चुका था जिसे आम बोलचाल में ‘पर्ची और खर्ची’ का सिस्टम कहा जाता था।
यह ‘पर्ची-खर्ची’ आखिर बला क्या थी? हरियाणा स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (HSSC) और हरियाणा पब्लिक सर्विस कमीशन (HPSC) को मानो राजनीतिक दलालों का अड्डा बना दिया गया था।
अगर कोई गरीब किसान का बेटा लिखित परीक्षा में टॉप भी कर ले, तो इंटरव्यू में उसे जानबूझकर फेल कर दिया जाता था।
नौकरी उसी को मिलती थी जिसके पास किसी बड़े मंत्री की सिफारिशी ‘पर्ची’ होती थी, या फिर जिसने नेताओं और दलालों के घर लाखों रुपये की ‘खर्ची’ (रिश्वत) पहुँचाई होती थी।
ज़मीन पर हालात इतने बदतर थे की पुलिस कांस्टेबल से लेकर पटवारी, क्लर्क और मास्टर तक की नौकरियों के ‘रेट कार्ड’ फिक्स थे।
चौटाला राज का वो कुख्यात JBT टीचर भर्ती घोटाला तो पूरे देश ने देखा था, जिसमें 3206 टीचरों की भर्ती में जमकर धांधली हुई और पैसे खाए गए।
हुड्डा राज में भी यही सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। आम माता-पिता अपने बच्चों को नौकरी दिलाने के लिए अपनी खेती की ज़मीनें बेचने और भारी कर्ज़ लेने को मजबूर हो गए थे।
जो मेरिट वाले होनहार छात्र थे, वो डिग्रियां लेकर सड़कों पर धक्के खा रहे थे। युवाओं में भयंकर हताशा और डिप्रेशन था।
अब यहाँ बीजेपी के रणनीतिकारों की अचूक समझ देखिए। उन्होंने जान लिया था की हरियाणा के हर दूसरे घर की दुखती रग यही ‘पर्ची-खर्ची’ है। चुनाव प्रचार में जब बीजेपी उतरी, तो उन्होंने इसे अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना लिया।
बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व और स्थानीय नेताओं ने मंचों से डंके की चोट पर ऐलान किया- “हम हरियाणा में ‘बिना पर्ची, बिना खर्ची’ के नौकरी देंगे!”
बीजेपी ने जनता से सीधा संवाद करते हुए कहा की अगर हमारी सरकार आई, तो नौकरियों में इंटरव्यू सिस्टम खत्म किया जाएगा (ग्रुप सी और डी में) और नौकरियां सिर्फ और सिर्फ मेरिट (योग्यता) के आधार पर मिलेंगी, चाहे वो बच्चा किसी गरीब दलित का हो या किसी साधारण किसान का।
ये कोई साधारण चुनावी वादा नहीं था। यह उन लाखों पिताओं के सीने पर रखा गया मरहम था जो अपने बच्चों का भविष्य अंधकार में देख रहे थे।
बीजेपी का यह “बिना पर्ची, बिना खर्ची” का नारा गांव-गांव में आग की तरह फैल गया। जिन युवाओं ने कांग्रेस और इनेलो के करप्शन की वजह से उम्मीद छोड़ दी थी, उन्होंने रातों-रात अपना वोटबैंक बीजेपी की तरफ शिफ्ट कर दिया।
विपक्ष ने पैसों के लालच में युवाओं का हक़ मारा था, और बीजेपी ने उसी युवा आक्रोश को अपने लिए सत्ता की सीढ़ी बना लिया।
एक ईमानदार IAS अफसर को सरेआम बेइज्जत करने का पाप और बीजेपी ने कैसे इसे मुद्दा बनाकर पूरे देश में कांग्रेस को साबित कर दिया भ्रष्टाचार का रक्षक

अगर ‘पर्ची-खर्ची’ ने गांव और गरीब युवाओं को कांग्रेस से दूर किया, तो एक और ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसने पूरे शहरी वोटर और मिडिल क्लास के मन में हुड्डा सरकार के प्रति भयंकर नफरत भर दी।
यह घटना थी सत्ता के अहंकार में एक बेहद ईमानदार अफसर को सरेआम प्रताड़ित करने की।
कहानी अक्टूबर 2012 की है। हमने पहले रॉबर्ट वाड्रा और DLF के ज़मीन घोटाले की बात की थी। उस वक्त हरियाणा कैडर के एक बेहद कड़क और ईमानदार आईएएस (IAS) अफसर अशोक खेमका ने इस घोटाले की फाइल पकड़ ली।
खेमका ने कानून और नियम का पालन करते हुए वाड्रा की स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी और DLF के बीच हुए उस करोड़ों के इंतकाल (Mutation) को सीधा रद्द कर दिया।
अब ज़रा सोचिए, एक अफसर ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया था। लेकिन हुड्डा सरकार और दिल्ली में बैठी कांग्रेस हाईकमान का ईगो बुरी तरह हर्ट हो गया।
“एक अफसर की इतनी जुर्रत की वो गांधी परिवार के दामाद की फाइल रोक दे?” बस फिर क्या था, कांग्रेस ने अपनी सारी ताकत उस एक ईमानदार अफसर को बर्बाद करने में लगा दी।
रातों-रात अशोक खेमका का ट्रांसफर कर दिया गया। यह उनके करियर का लगभग 43वां ट्रांसफर था! बात सिर्फ ट्रांसफर पर नहीं रुकी, हुड्डा सरकार ने उल्टे खेमका पर ही चार्जशीट थोप दी और उन्हें तरह-तरह की विभागीय जांचों में फंसा कर मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।
विपक्ष की यह सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी। उन्हें लगा की वो एक सरकारी नौकर को दबा देंगे और मामला शांत हो जाएगा। लेकिन बीजेपी के चाणक्य इस पूरे घटनाक्रम को बहुत ध्यान से देख रहे थे।
बीजेपी ने अशोक खेमका के इस अपमान को सिर्फ हरियाणा का नहीं, बल्कि पूरे देश का राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। मिडिल क्लास, जो वैसे भी भ्रष्टाचार से नफरत करता है, उसके लिए अशोक खेमका एक ‘हीरो’ बन गए थे और हुड्डा सरकार एक ‘खलनायक’।
बीजेपी ने अपनी रैलियों, टीवी डिबेट्स और प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक ही नैरेटिव सेट किया- “कांग्रेस भ्रष्टाचार की रक्षक है.. कांग्रेस के राज में ईमानदारी सबसे बड़ा गुनाह है। अगर आप ईमानदार हैं, तो आपको सज़ा मिलेगी, और अगर आप भ्रष्टाचारी हैं, तो आपको इनाम मिलेगा।”
इस एक मुद्दे की वजह से जो शहरी वोटर, पढ़ा-लिखा वर्ग और सरकारी कर्मचारी 2009 में कांग्रेस को वोट देकर आया था, उसने अशोक खेमका के अपमान का बदला लेने के लिए 2014 में बीजेपी का कमल का बटन दबा दिया।
विपक्ष ने अपने ही हाथों से ईमानदारी का गला घोंटा था, और बीजेपी ने उसी ईमानदारी का झंडा बुलंद करके पूरे मिडिल क्लास वोटबैंक की दावत उड़ा ली।
“तिहाड़ जेल से मुख्यमंत्री पद की शपथ लूंगा”, इनेलो के इस अहंकार को बीजेपी ने कैसे गुंडाराज का डर बताकर शांतिप्रिय वोटर्स को कर लिया अपनी मुट्ठी में

भ्रष्टाचार ने तो कांग्रेस की लुटिया डुबो ही दी थी, लेकिन 2014 के हरियाणा चुनाव की बिसात पर सिर्फ कांग्रेस ही अपना रायता नहीं फैला रही थी।
राज्य की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताक़त यानी इनेलो (INLD) भी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी।
राजनीति का एक बहुत सीधा सा नियम है- जनता सब कुछ बर्दाश्त कर सकती है, लेकिन जब उसे अपनी जान-माल की असुरक्षा महसूस होने लगे, तो वो किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करती।
साल 2013 का वो ऐतिहासिक फैसला कोई नहीं भूला है, जब JBT (टीचर भर्ती) घोटाले में ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला को 10 साल की सज़ा सुनाकर तिहाड़ जेल भेज दिया गया था।
2014 के विधानसभा चुनाव सिर पर थे। इनेलो को लग रहा था की कांग्रेस से नाराज़ जनता स्वभाविक रूप से उनके पास आ जाएगी।
इसी दौरान ओम प्रकाश चौटाला स्वास्थ्य कारणों से पैरोल पर जेल से बाहर आए और उन्होंने चुनाव प्रचार में रैलियां करनी शुरू कर दीं।
अब यहाँ इनेलो को बहुत ही सधी हुई और सहानुभूति वाली राजनीति करनी चाहिए थी। लेकिन सत्ता की खुमारी और पुराना अहंकार उनके सिर चढ़ कर बोल रहा था।
एक रैली के दौरान ओम प्रकाश चौटाला ने अति-उत्साह और अहंकार में आकर एक ऐसा बयान दे दिया जिसने हरियाणा की जनता को अंदर तक कंपा दिया।
उन्होंने मंच से दहाड़ते हुए कहा- “मैं तिहाड़ जेल से ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लूंगा।”
इस एक बयान ने हरियाणा के आम आदमी, व्यापारी वर्ग और शांति चाहने वाले शहरी वोटर्स के ज़हन में पुराने ‘गुंडाराज’ का खौफनाक मंज़र ताज़ा कर दिया।
लोगों को इनेलो के राज का वो दौर याद आ गया जब व्यापारियों से फिरौती मांगी जाती थी, दबंगई चरम पर थी और क़ानून-व्यवस्था कुछ रसूखदार लोगों की जेब में हुआ करती थी।
जनता के मन में यह सवाल कौंध गया की अगर कोई इंसान जेल में बैठकर सरकार चलाएगा, तो उस राज्य का लॉ एंड आर्डर (Law and order) कैसा होगा?
बीजेपी ने जनता की इस दुखती और डरती हुई रग को तुरंत पकड़ लिया। बीजेपी के रणनीतिकारों ने रैलियों और घर-घर जनसंपर्क में इस ‘तिहाड़ वाले बयान’ को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया।
बीजेपी ने जनता से सीधा सवाल किया- “क्या आप फिर से वही अपहरण, फिरौती और दबंगई वाला राज चाहते हैं?”
जो स्विंग वोटर (Swing Voter) कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार को तो उखाड़ फेंकना चाहता था, लेकिन इनेलो के गुंडाराज से खौफ खाता था, उसके लिए बीजेपी एक तारणहार (Safe Haven) बनकर उभरी।
बीजेपी ने डंके की चोट पर कहा की सुशासन और शांति सिर्फ हम दे सकते हैं। इनेलो के उस एक घमंडी बयान ने उनके खुद के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसका दी और जो वोट इनेलो को मिलने वाला था, वो रातों-रात छिटक कर बीजेपी की झोली में आ गिरा।
विपक्ष ने जनता को डराया, और बीजेपी ने उसी डर को अपने लिए संजीवनी बना लिया।
तानाशाही ने बजायी कांग्रेस की बैंड, राव इंद्रजीत और बीरेंद्र सिंह जैसे दिग्गजों को अपने साथ लाकर कैसे बीजेपी ने लगा दी विपक्ष के सबसे मजबूत गढ़ में सेंध
अगर इनेलो अपने अहंकार से मर रही थी, तो कांग्रेस के भीतर हुड्डा की तानाशाही ने उनकी रही-सही कसर भी पूरी कर रही थी।
10 साल सत्ता में रहते हुए हुड्डा साहब ने ऐसा एकाधिकार (Monopoly) कायम कर लिया था की कांग्रेस के बाकी बड़े और कद्दावर नेता खुद को पार्टी में घुटन महसूस करने लगे थे।
हुड्डा को लगता था की हरियाणा मतलब सिर्फ वो और उनका रोहतक, बाकी नेताओं की कोई हैसियत नहीं है।
लेकिन राजनीति में आप ज़मीनी क्षत्रपों (Local Leaders) का अपमान करके चुनाव नहीं जीत सकते। हुड्डा के इसी अहंकार ने बीजेपी को वो थाली सजाकर दे दी जिसकी बीजेपी को सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
दरअसल 2014 के चुनाव से पहले बीजेपी के पास सबसे बड़ी कमज़ोरी ये थी की उनके पास पूरे राज्य में सर्वमान्य और कद्दावर स्थानीय चेहरों की भारी कमी थी।
यहीं पर बीजेपी के रणनीतिकारों (विशेषकर अमित शाह) ने अपनी बिसात बिछाई। हुड्डा के अपमान से तिलमिलाए दक्षिण हरियाणा (अहीरवाल) के निर्विवाद राजा राव इंद्रजीत सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को लात मार दी।
बीजेपी ने उनके लिए रेड कार्पेट बिछा दिया। राव इंद्रजीत अकेले नहीं आए, वो अपने साथ पूरे दक्षिण हरियाणा का वो तगड़ा वोटबैंक और बूथ लेवल का नेटवर्क लेकर आए जो दशकों से कांग्रेस की ताकत हुआ करता था।
बात यहीं नहीं रुकी। विधानसभा चुनाव (अगस्त 2014) से ठीक पहले हुड्डा के चचेरे भाई लेकिन उनके धुर सियासी विरोधी, चौधरी बीरेंद्र सिंह ने भी कांग्रेस से बगावत कर दी।
बीरेंद्र सिंह बांगर क्षेत्र (जींद और आसपास) के सबसे बड़े जाट नेताओं में गिने जाते थे। अमित शाह की मौजूदगी में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया।
इनके अलावा कैप्टन अजय यादव, कुमारी शैलजा और रणदीप सुरजेवाला जैसे नेता भी पार्टी के भीतर हुड्डा से इतने खफा थे की कांग्रेस अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी थी।
ज़रा बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक देखिए! उन्हें हरियाणा में अपना ज़मीनी कैडर खड़ा करने में शायद 10-15 साल लग जाते। लेकिन हुड्डा की तानाशाही की वजह से कांग्रेस के सबसे बड़े दिग्गजों ने बगावत कर दी।
बीजेपी ने इन बागियों को ससम्मान अपने पाले में खड़ा किया और बिना कोई पसीना बहाए, दक्षिण हरियाणा (अहीरवाल) और बांगर जैसे कांग्रेस के सबसे मज़बूत गढ़ों पर सीधा कब्ज़ा जमा लिया।
कांग्रेस के हुक्मरान दिल्ली दरबार में बैठकर मुगालता पाले रहे की ये नेता जाएंगे तो क्या उखाड़ लेंगे, लेकिन जब नतीजे आए, तो राव इंद्रजीत और बीरेंद्र सिंह ने बीजेपी को उन इलाकों में ऐसी एकतरफा जीत दिलाई की कांग्रेस अपने ही गढ़ में मुंह के बल गिर पड़ी।
विपक्ष ने अपनों का ही गला घोंटा था, और बीजेपी ने उन बागी सुरों को मिलाकर अपनी जीत का सबसे शानदार संगीत तैयार कर लिया।
बीजेपी विपक्ष की गलतियों का सबसे शानदार पोस्टमार्टम करती है और 2014 का हरियाणा चुनाव इसका सबसे बड़ा सबूत है

ज़रा एक बार पीछे मुड़कर उस पूरी ‘7 पकवानों वाली थाली’ पर नज़र डालिए जो कांग्रेस और इनेलो (INLD) ने 2014 में बीजेपी के सामने सजाकर रखी थी।
क्या बीजेपी ने खुद जाकर दामाद श्री रॉबर्ट वाड्रा का ज़मीन घोटाला करवाया था? क्या बीजेपी ने हुड्डा साहब को मजबूर किया था की वो सिर्फ रोहतक का विकास करें और बाकी 70 प्रतिशत हरियाणा को लावारिस छोड़ दें?
क्या बीजेपी ने कांग्रेस से कहा था की वो राज्य की बहुसंख्यक गैर-जाट आबादी का अपमान करे?
बिल्कुल नहीं! ये सारे पाप विपक्ष ने खुद किए थे। युवाओं का भविष्य खाने वाला ‘पर्ची-खर्ची’ का वो भ्रष्ट सिस्टम विपक्ष ने बनाया था।
तिहाड़ जेल से सरकार चलाने की वो अहंकार भरी हुंकार ओम प्रकाश चौटाला ने खुद भरी थी। और अपने ही दिग्गज नेताओं- राव इंद्रजीत सिंह और चौधरी बीरेंद्र सिंह- को पार्टी से भगाकर बीजेपी के पाले में खड़ा करने का काम हुड्डा सरकार की तानाशाही ने किया था।
विपक्ष ने जनता के सामने गल्तियों, घमंड और भ्रष्टाचार का ऐसा पहाड़ खड़ा कर दिया था की जनता का दम घुटने लगा था।
अब ऐसे में बीजेपी को कोई बहुत बड़ा चमत्कार करने की ज़रूरत थी ही नहीं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जो जोड़ी थी, उन्होंने बस हरियाणा की ज़मीन पर कान लगाकर जनता की धड़कन और उसके गुस्से को सुन लिया था।
बीजेपी जानती थी की उसे कोई नया नैरेटिव गढ़ने की ज़रूरत नहीं है। विपक्ष ने खुद इतने ‘सेल्फ-गोल’ दाग दिए हैं की बस उन्हें सही समय पर जनता के सामने बेनकाब करना है।
बीजेपी के पास चुनाव जीतने की कोई जादुई छड़ी नहीं है। बीजेपी की असली ताकत उसका वो अनुशासित कैडर और वो चाणक्य नीति है, जो गिद्ध सी नज़रों से विपक्ष की हर गलती का इंतज़ार करती है।
इस सीरीज के अगले एपिसोड में हम ऐसे ही विपक्ष के एक और ऐतिहासिक ‘सेल्फ-गोल’ का पोस्टमार्टम करेंगे।
