सिर्फ 22 साल की उम्र में अकेले आतंकियों से लोहा लेकर 359 लोगों की जान बचाने वाली भारत की वो महान बेटी, देश की पहली ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित महिला ‘नीरजा भनोट’ को जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि

अगर आपको असली नारी शक्ति देखनी है, अगर आपको देखना है की एक औरत की रीढ़ की हड्डी कितनी मजबूत हो सकती है, तो इतिहास के पन्नों को थोड़ा पीछे पलटिए।

आज 7 सितंबर है। आज ही के दिन चंडीगढ़ के एक पंजाबी परिवार में उस शेरनी ने जन्म लिया था, जिसने पूरी दुनिया को बता दिया की एक हिंदुस्तानी बेटी की रगों में कैसा खून दौड़ता है।

हम बात कर रहे हैं नीरजा भनोट की! वो नीरजा भनोट जिसके सामने मौत खड़ी थी, खूंखार आतंकी अपनी बंदूकें ताने खड़े थे, लेकिन उस 22 साल की लड़की की आँखों में खौफ की एक बूंद तक नहीं थी।

आज उनकी जयंती है, और ये देश अपनी उस महान बेटी के बलिदान को कभी भुला नहीं सकता।

दहेज के लोभियों से बगावत कर खुद के पैरों पर खड़ी हुई थी ये बेटी और समाज को दिखा दिया था असली आईना

नीरजा का जन्म 7 सितंबर 1963 को हुआ था। चंडीगढ़ में जन्मी नीरजा के पिता हरीश भनोट एक जाने-माने पत्रकार थे और माँ रमा भनोट हाउसवाइफ थीं।

घर में सबसे छोटी होने की वजह से वो सबकी लाडली ‘लाडो’ थी। बचपन से ही बेहद खूबसूरत नीरजा ने मॉडलिंग शुरू कर दी थी। उस ज़माने में उनके कई विज्ञापन टीवी और मैगज़ीन में आते थे। सब कुछ एकदम परियों की कहानी जैसा चल रहा था।

फिर आया साल 1985 का मार्च महीना। नीरजा तब 22 साल की थी। परिवार वालों ने एक अच्छा-खासा लड़का देखकर नीरजा की अरेंज मैरिज कर दी।

शादी के बाद वो अपने पति के साथ गल्फ (Gulf) चली गई। वहां पहुंचते ही इस परियों की कहानी ने भयानक डरावना रूप ले लिया।

पति और उसके परिवार वाले लालची निकले। दहेज के भूखे उन भेड़ियों ने नीरजा पर तानों की बौछार शुरू कर दी। बात-बात पर उसे जलील किया जाता, उसे भूखा रखा जाता और भयानक मानसिक टॉर्चर किया जाता। वो दिन-रात घुटती रही।

कोई आम लड़की होती तो शायद घुट-घुट कर उसी नरक में अपनी जान दे देती।

लेकिन नीरजा कोई मामूली लड़की नहीं थी। शादी के महज़ 2 महीने बाद ही उसने तय कर लिया की अब वो किसी के टुकड़ों पर नहीं पलेगी और ना ही ये ज़िल्लत सहेगी।

उसने अपना बैग पैक किया, उस दहेज के लोभी पति के मुंह पर शादी दे मारी और वापस मुंबई अपने मायके लौट आई।

मुंबई वापस आकर उसने ठान लिया की अब वो खुद के पैरों पर खड़ी होगी। उसी दौरान पैन एम (Pan Am) एयरलाइंस ने भारत में अपनी क्रू के लिए वैकेंसी निकाली।

आपको जानकर हैरानी होगी की उस वक़्त 10,000 से ज़्यादा लड़कियों ने अप्लाई किया था, और नीरजा ने उन सबको पछाड़कर टॉप में अपनी जगह बनाई!

उसकी काबिलियत देखकर एयरलाइंस वालों ने उसे मियामी (Miami) भेजा, जहां उसे एक आम एयर होस्टेस की नहीं, बल्कि ‘सीनियर फ्लाइट पुरसर’ (Senior Flight Purser) की ट्रेनिंग दी गई।

जब वो मियामी से लौटकर आई, तो वो एक टूटी हुई, तलाकशुदा लड़की नहीं थी… वो आसमान में उड़ने वाली एक ऐसी आज़ाद परिंदा थी जिसने अपनी किस्मत खुद अपने हाथों से लिखी थी!

5 सितंबर 1986 की वो खौफनाक सुबह जब कराची एयरपोर्ट पर 4 खूंखार आतंकियों ने किया था पैन एम फ्लाइट 73 को हाईजैक

तारीख थी 5 सितंबर 1986… मुंबई के सहार इंटरनेशनल एयरपोर्ट से पैन एम (Pan Am) की फ्लाइट 73 ने उड़ान भरी।

इस फ्लाइट को मुंबई से न्यूयॉर्क जाना था और बीच में कराची और फ्रैंकफर्ट में रुकना था। प्लेन में कुल 379 लोग बैठे थे, जिनमें यात्री और क्रू मेंबर्स दोनों शामिल थे।

सुबह का वक़्त था और प्लेन पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर उतरा। तभी अचानक बाहर से गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी।

किसी को कुछ समझ आता, उससे पहले ही एयरपोर्ट सिक्योरिटी फोर्स (ASF) की वर्दी पहने 4 दरिंदे प्लेन के अंदर घुस आए। इनके हाथों में AK-47 जैसी भारी मशीनगनें और कमर पर ग्रेनेड लटके हुए थे।

ये खूंखार फिलिस्तीनी आतंकी संगठन ‘अबू निदाल ऑर्गनाइजेशन’ (Abu Nidal Organization) के ट्रेंड जिहादी थे।

पायलट दुम दबाकर भाग गए और 379 यात्रियों की जान बचाने का जिम्मा आ गया 22 साल की एक हिंदुस्तानी लड़की के कंधों पर

जैसे ही वो भेड़िये हथियारों के साथ प्लेन में घुसे, नीरजा वहीं दरवाज़े के पास खड़ी थी। कोई और लड़की होती तो शायद डर के मारे वहीं बेहोश हो जाती या रोने-गिड़गिड़ाने लगती।

लेकिन उस शेरनी की फुर्ती तो देखिए! उसने तुरंत प्लेन के इंटरकॉम की तरफ छलांग लगाई और कॉकपिट में बैठे पायलट दल को हाईजैक का सीक्रेट कोड (Hijack Code) भेज दिया।

अब यहाँ इंटरनेशनल एविएशन का एक नियम समझिए। जब भी प्लेन ज़मीन पर हाईजैक होता है, तो पायलटों को सख्त निर्देश होता है की वो किसी भी तरह कॉकपिट से भाग निकलें।

ऐसा इसलिए ताकि आतंकी गन पॉइंट पर पायलट से प्लेन उड़वा कर उसे किसी इमारत या शहर से न टकरा दें (जैसे 9/11 में हुआ था)।

नीरजा का कोड मिलते ही प्लेन का अमेरिकन पायलट, को-पायलट और फ्लाइट इंजीनियर तीनों ने कॉकपिट की छत का इमरजेंसी दरवाज़ा खोला और रस्सियों के सहारे प्लेन छोड़कर भाग गए।

ज़रा उस खौफनाक मंज़र की कल्पना कीजिए दोस्त। प्लेन पाकिस्तान के रनवे पर खड़ा है। कॉकपिट खाली है। आतंकियों को जब पता चला की पायलट भाग गए हैं, तो वो गुस्से से पागल हो उठे।

अब 379 रोते-बिलखते यात्रियों की जान बचाने का पूरा का पूरा जिम्मा सिर्फ और सिर्फ नीरजा के कंधों पर आ गिरा था, क्योंकि नियमों के हिसाब से अब वो ही उस प्लेन की सबसे ‘सीनियर क्रू मेंबर’ थी।

आतंकियों की आंखों में धूल झोंककर अमेरिकी यात्रियों को बचाने वाली नीरजा का वो गजब का दिमाग जिससे हक्के-बक्के रह गए जिहादी

इन खूंखार जिहादियों का मक़सद कोई पैसे या फिरौती मांगना नहीं था। वो अमेरिका से भयंकर नफरत करते थे और साइप्रस में बंद अपने कुछ साथी आतंकियों को छुड़वाना चाहते थे।

उनका असली टारगेट उस प्लेन में बैठे 43 अमेरिकी नागरिक थे। उनका प्लान बहुत भयानक था- वो एक-एक करके अमेरिकियों को पहचानते, उन्हें दरवाज़े पर लाते और गोली मारकर उनकी लाश रनवे पर फेंकते जाते, ताकि अमेरिकी सरकार पर दबाव बन सके।

उन्होंने नीरजा के सिर पर बंदूक तानी और चिल्लाते हुए कहा की पूरे प्लेन में से सभी यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठे करके लाओ।

अब नीरजा को समझ आ गया था की अगर उसने अमेरिकियों के पासपोर्ट इन दरिंदों के हाथ में दे दिए, तो प्लेन के अंदर खून की नदियां बह जाएंगी। मौत सामने खड़ी थी, लेकिन उस लड़की का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ चल रहा था।

उसने तुरंत अपनी बाकी एयर होस्टेस सहेलियों को इशारा किया। उन्होंने पासपोर्ट तो इकट्ठे किए, लेकिन गज़ब की चालाकी से सारे अमेरिकी नागरिकों के पासपोर्ट छुपा दिए।

जब आतंकियों ने पासपोर्ट का वो थैला पलटा, तो वो बौखला गए। उन्हें उसमें एक भी अमेरिकी का पासपोर्ट नहीं मिला! वो झुंझला कर रह गए, लेकिन किसी को पहचान नहीं पाए।

ज़रा सोचिए दोस्त, 4 भारी हथियारों से लैस खूंखार आतंकी एक 22 साल की निहत्थी लड़की के आगे बेबस हो गए थे।

नीरजा ने अपनी सूझबूझ और चालाकी से उन आतंकियों की आंखों में दिन-दहाड़े धूल झोंक दी थी और 43 अमेरिकियों को मौत के मुंह से खींच लिया था।

दरवाजा खोलकर खुद भाग सकती थी लेकिन 3 मासूम बच्चों को बचाने के लिए खुद के सीने पर खा ली आतंकियों की 5 गोलियां

17 घंटे बीत चुके थे। 379 लोग बंदूकों के साए में बैठे थे। प्लेन के अंदर हर पल मौत सामने नाच रही थी। लेकिन नीरजा बिना थके, बिना डरे लगातार यात्रियों को हौसला दे रही थी।

तभी वो हुआ जिसका सबको डर था। 17 घंटे बाद प्लेन का ईंधन (Fuel) पूरी तरह खत्म हो गया और जनरेटर बंद हो गया। पूरे प्लेन में एकदम घुप्प अंधेरा छा गया।

इस अचानक हुए अंधेरे से वो खूंखार आतंकी बुरी तरह घबरा गए। उन्हें लगा की शायद बाहर से पाकिस्तानी कमांडोज़ ने प्लेन पर धावा बोल दिया है।

डर के मारे बौखलाए हुए उन दरिंदों ने अपनी AK-47 से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी और यात्रियों के बीच ग्रेनेड फेंकने लगे।

चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। खून की होली खेली जाने लगी। लेकिन उस अंधेरे और गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच भी भारत की वो शेरनी नहीं घबराई।

नीरजा ने अंधेरे में टटोलते हुए प्लेन के इमरजेंसी दरवाज़े (Emergency Exit) को ढूँढा और अपनी पूरी ताकत लगाकर उसे खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही इमरजेंसी स्लाइडर नीचे लटक गया।

अब यहाँ रुक कर एक पल के लिए सोचिए दोस्त। दरवाज़ा खुल चुका था। नीरजा दरवाज़े के बिल्कुल पास खड़ी थी। वो चाहती तो सबसे पहले उस स्लाइडर से कूदकर अपनी जान बचा सकती थी। वो आज़ाद थी!

लेकिन उसने खुद भागने के बजाय वहां खड़े रहकर लोगों को उस स्लाइडर से नीचे धकेलना शुरू कर दिया। “जल्दी जाओ, कूदो, भागो!” वो लगातार यात्रियों को बाहर निकालती रही।

देखते ही देखते उसने 359 लोगों को उस मौत के ताबूत से ज़िंदा बाहर निकाल दिया। जब लगभग पूरा प्लेन खाली हो गया और नीरजा खुद उस दरवाज़े से बाहर कूदने ही वाली थी, तभी उसके कानों में कुछ बच्चों के रोने की आवाज़ आई।

उसने मुड़कर देखा तो 3 छोटे-छोटे मासूम बच्चे एक कोने में दुबके हुए रो रहे थे और एक आतंकी ने उन्हें देख लिया था।

नीरजा के पास मुश्किल से चंद सेकंड थे। वो बाहर कूद जाती तो आज ज़िंदा होती। लेकिन उसने छलांग लगाने के बजाय वापस प्लेन के अंदर दौड़ लगा दी।

वो उन बच्चों के पास पहुंची और उन्हें अपनी बांहों में छुपा लिया… उन्हें अपने शरीर से पूरी तरह ढक लिया। उसी वक़्त उस खूंखार आतंकी ने नीरजा पर गोलियों की बौछार कर दी।

वो गोलियां उन मासूम बच्चों को नहीं लगीं, बल्कि भारत की उस महान बेटी के सीने और पीठ को छलनी कर गईं। खून से लथपथ होकर नीरजा वहीं गिर पड़ी।

उन तीन बच्चों की जान बच गई, लेकिन हमारी नीरजा हमेशा-हमेशा के लिए सो गई। उसने 359 लोगों की सांसें बचा लीं, लेकिन खुद अपनी सांसें देश और इंसानियत के नाम कुर्बान कर दीं।

अशोक चक्र पाने वाली पहली महिला बनी नीरजा, और अमेरिका से लेकर पाकिस्तान तक को झुकाना पड़ा इस जांबाज के आगे अपना सिर

नीरजा के इस अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। जब भारत सरकार को अपनी इस 22 साल की बेटी के इस रोंगटे खड़े कर देने वाले पराक्रम का पता चला, तो पूरा देश रो पड़ा।

भारत सरकार ने नीरजा भनोट को शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से मरणोपरांत सम्मानित किया।

नीरजा भनोट यह सर्वोच्च सैन्य सम्मान पाने वाली भारत की सबसे कम उम्र की (महज़ 22 साल) और देश की पहली महिला बन गईं।

जो मेडल बड़े-बड़े कमांडोज़ और फौजी अफसरों को उनके अदम्य साहस के लिए मिलता है, वो मेडल एक निहत्थी एयर होस्टेस ने अपने अदम्य शौर्य से हासिल कर लिया था।

और तो और, नीरजा की बहादुरी इतनी विशाल थी की दुश्मनों को भी उसके आगे अपना सिर झुकाना पड़ा।

जो पाकिस्तान हमेशा भारत से नफरत करता है और हमारे खिलाफ साज़िशें रचता है, उसी पाकिस्तान की सरकार को मजबूर होकर नीरजा को पाकिस्तान का सबसे बड़ा मेडल ‘तमगा-ए-इंसानियत’ देना पड़ा।

अमेरिका, जिसके नागरिकों की जान नीरजा ने अपनी जान देकर बचाई थी, उसने भी इस भारतीय शेरनी को ‘स्पेशल करेज अवॉर्ड’ (Special Courage Award) से नवाज़ा।

दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश था जिसने नीरजा की शहादत के आगे नतमस्तक होकर सलाम न किया हो।

आज जयंती के इस पावन मौके पर, पूरा हिंदुस्तान अपनी इस अमर बेटी के उस लहूलुहान मगर मुस्कुराते हुए चेहरे को याद कर रहा है।

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