भाजपा दाग धोने वाली नई ज़माने की वाशिंग मशीन- LPU संस्थापक, AAP का सबसे 'भ्रष्ट' चेहरा, फिर ED की छापेमारी, भाजपा से जुड़ते ही 'शुद्धिकरण' अभियान शुरू

BJP की ‘वाशिंग मशीन’ में धुला एक और दाग? अशोक कुमार मित्तल की कहानी (Episode-01)

हिंदुस्तान की सियासत में इन दिनों एक टर्म बड़ा ट्रेंड कर रहा है- ‘पॉलिटिकल वॉशिंग मशीन’। कोई भी समझदार व्यक्ति ये देख सकता है की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के पास एक ऐसी जादुई मशीन है, जिसमें कोई भी दागी या भ्रष्ट नेता घुसता है, तो बाहर एकदम ‘साफ-सुथरा’ और संस्कारी होकर निकलता है।

और हाल ही में इस मशीन का सबसे ताज़ा और हैरान करने वाला उदाहरण पंजाब से सामने आया है। 

भाजपा दाग धोने वाली नई ज़माने की वाशिंग मशीन, Episode 1: LPU संस्थापक अशोक कुमार मित्तल

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हम बात कर रहे हैं बड़े कारोबारी और लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) के फाउंडर अशोक कुमार मित्तल की। कुछ ही दिन पहले तक जो मित्तल आम आदमी पार्टी (AAP) के सबसे भ्रस्ट नेता और रणनीतिकार हुआ करते थे, वो अचानक से बीजेपी से जुड़ गए और एक ईमानदार नेता बन गए।

दिलचस्प बात तो ये है की ये दल-बदल तब हुआ, जब बस कुछ ही दिन पहले उनके ठिकानों पर ईडी (ED) ने ताबड़तोड़ छापेमारी की थी।

अब ज़ाहिर है, जब कोई इतने बड़े करप्शन के आरोपों में फंसा हो और अचानक सत्ता के खेमे में जाकर बैठ जाए, तो लोग पूछेंगे ही की अगर कोई इतना ही बड़ा भ्रस्ट नेता है, तो उसे BJP अपनी पार्टी में शामिल क्यों कर लेती है?

और तो और शामिल होने के बाद वो एकदम नया राजा हरीशचंद्र बनकर बाहर निकलता है। क्या राजनीति में उसूलों जैसी कोई चीज़ बची भी है?

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मित्तल साहब के बीजेपी में जाने से पहले का उनका पॉलिटिकल बैकग्राउंड समझना बहुत ज़रूरी है। 2022 में आम आदमी पार्टी ने उन्हें अपने टिकट पर राज्यसभा भेजा था। पंजाब में शिक्षा का बड़ा साम्राज्य खड़ा करने वाले मित्तल की पार्टी में अच्छी-खासी पकड़ बन गई थी।

बात सिर्फ सांसद बनने तक नहीं रुकी, 2026 की शुरुआत में तो ‘आप’ ने राघव चड्ढा की जगह उन्हें राज्यसभा में पार्टी का डिप्टी लीडर भी बना दिया।

अरविंद केजरीवाल के साथ उनकी कितनी नज़दीकियां थीं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगा लीजिए की जब 2024 में केजरीवाल को मुख्यमंत्री आवास खाली करना पड़ा था, तो मित्तल ने ही आगे बढ़कर उन्हें नई दिल्ली के फिरोज़शाह रोड वाला अपना सरकारी बंगला रहने के लिए दे दिया था। पूरा एक साल केजरीवाल उसी बंगले से अपनी राजनीति चलाते रहे। दोनों की दोस्ती की मिसालें दी जा रही थीं।

लेकिन अप्रैल 2026 आते-आते कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरी बाज़ी पलट दी। जिस दिन अरविंद केजरीवाल ने वो बंगला खाली किया, ठीक उसी दिन अशोक मित्तल ने भी ‘आप’ को अलविदा कह दिया। सालों की जो पॉलिटिकल और पर्सनल बॉन्डिंग थी, वो चंद घंटों में तार-तार हो गई।

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आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ की मित्तल साहब को अपनी ही पार्टी छोड़नी पड़ी? यहीं से एंट्री होती है ईडी की। इस्तीफा देने से ठीक पहले, करीब 15 अप्रैल 2026 को, मित्तल और उनके पूरे लवली ग्रुप पर ईडी के छापे पड़े थे।

जालंधर में उनके घरों से लेकर LPU के बड़े-बड़े कैंपस तक, हर जगह ईडी की टीमें फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (FEMA) के तहत तीन दिन तक छानबीन कर रही थीं। बात वित्तीय हेराफेरी और करप्शन की हो रही थी।

अब इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और, ईडी की रेड खत्म होने और अशोक मित्तल के बीजेपी जॉइन करने के बीच मुश्किल से 9-10 दिन का फासला था। 25 अप्रैल को जो मित्तल ईडी के रडार पर ‘भ्रष्ट’ माने जा रहे थे, वही मित्तल गले में भगवा पटका डाले बीजेपी के बड़े नेताओं के साथ मुस्कुराते हुए कैमरे के सामने पोज़ दे रहे थे।

विपक्ष ने तो तुरंत इस पर मोर्चा खोल दिया। संजय सिंह और सौरभ भारद्वाज जैसे नेताओं ने साफ कह दिया की दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। उनका सीधा इल्ज़ाम था की ये छापेमारी किसी करप्शन को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि 2027 के पंजाब चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी को तोड़ने और डराने के लिए की गई थी।

उनके मुताबिक, मित्तल के सामने दो ही रास्ते छोड़े गए थे- या तो जेल जाओ और धंधा चौपट करवाओ, या फिर बीजेपी में आकर अपने गुनाह माफ़ करवा लो।

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खैर, दल-बदल की राजनीति तो अपनी जगह है, लेकिन अशोक मित्तल के साथ उनकी यूनिवर्सिटी LPU का जो पुराना विवादित इतिहास जुड़ा है, उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ख़ासकर उन लोगों के लिए जो हिंदुत्व और सनातन मूल्यों से जुड़े हुए हैं, LPU का ट्रैक रिकॉर्ड काफी खटकने वाला रहा है।

अगर आपको याद हो, तो अप्रैल 2022 में इसी यूनिवर्सिटी में एक ज़बरदस्त बवाल हुआ था। एक ऑनलाइन लाइव क्लास के दौरान उनकी असिस्टेंट प्रोफेसर गुरसंग प्रीत कौर ने भगवान राम पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। राम को ‘चालाक’ और रावण को ‘अच्छा इंसान’ बताने वाला वो वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया था।

तब कई हिंदू संगठनों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया और ‘बायकॉट LPU’ ट्रेंड होने लगा था। हालांकि, बाद में डैमेज कंट्रोल करते हुए यूनिवर्सिटी ने उस प्रोफेसर को नौकरी से निकाल दिया, लेकिन इस पूरी घटना ने लोगों के मन में ये सवाल ज़रूर छोड़ दिया की वहां अकादमिक स्तर पर कैसी हिंदू-विरोधी सोच पनप रही है।

बात यहीं खत्म नहीं होती। कैंपस के अंदर हॉस्टल के गलियारों में बड़े पैमाने पर नमाज़ पढ़े जाने के वीडियो भी खूब वायरल हुए थे। कई छात्रों और संगठनों ने तब प्रशासन पर तुष्टिकरण के गंभीर आरोप लगाए थे।

इसके अलावा, इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी के ठीक बाहर जिस तरह का अनियंत्रित माहौल है- जैसे सरेआम नशेबाजी, अवैध शराब की दुकानें और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों, जैसे जिस्मफरोशी, के अड्डे- उस पर भी लोग अक्सर सवाल उठाते रहे हैं।

कहा तो यहां तक गया की प्रशासन सिर्फ मुनाफा कमाने में मस्त है और उसे छात्रों या समाज पर पड़ने वाले असर से कोई लेना-देना नहीं है।

‘भ्रष्टाचार-मुक्त’ होने का दावा करने वाली BJP का सबसे बड़ा वैचारिक दोगलापन 

अब इन सब बातों को एक साथ रखकर देखिए। सबसे बड़ा सवाल तो सीधे बीजेपी से ही बनता है। एक तरफ पार्टी खुद को सनातन धर्म की रक्षक और भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो-टॉलरेंस वाली बताती है।

बात-बात पर विपक्ष की तुष्टिकरण की राजनीति को कोसा जाता है। और दूसरी तरफ, आप ऐसे शख्स के लिए अपने दरवाज़े खोल देते हैं जिसके संस्थान में कभी हिंदू देवी-देवताओं का मज़ाक उड़ाया गया हो और जिस पर खुद ईडी ने करोड़ों की वित्तीय हेराफेरी के शक में छापे मारे हों।

ज़ाहिर है, जब रातों-रात कोई नेता ईडी के खौफ से दागी से उठकर ‘पार्टी का सम्मानित चेहरा’ बन जाता है, तो विपक्ष की ‘वॉशिंग मशीन’ वाली बात एकदम सच लगने लगती है। इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही बीजेपी की पूरी लड़ाई ही कमज़ोर दिखती है।

लेकिन असल में राजनीति में उसूलों से ज़्यादा गणित चलता है। पंजाब में बीजेपी अभी तक अपना कोई बहुत मज़बूत आधार नहीं बना पाई है।

2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए बीजेपी आलाकमान ने शायद ये तय कर लिया है की उन्हें सिर्फ ऐसे नेताओं की ज़रूरत है जो पैसा, पावर और रसूख ला सकें। अशोक मित्तल के पास वो सब कुछ है, और साथ ही वो विरोधी पार्टी ‘आप’ को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। शायद इसीलिए पुरानी सारी बातों और वैचारिक मतभेदों को ताक पर रखकर उन्हें गले लगा लिया गया।

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सच कहूं तो, अशोक कुमार मित्तल की ये पूरी कहानी आज की राजनीति का कड़वा सच बयां करती है। पार्टी का डिप्टी लीडर बनना, अपने खास मुख्यमंत्री को अपना बंगला देना, फिर अचानक से ईडी की रेड पड़ना और महज़ कुछ ही दिन में सब कुछ छोड़कर सत्ताधारी BJP पार्टी में शामिल हो जाना- ये कोई फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं है, बल्कि हमारे देश की मौजूदा हकीकत है।

आम हिन्दू वोटर, जो अपनी सनातन विचारधारा और संस्कृति के लिए भाजपा को वोट देता है, वो ये सब देखकर ठगा सा महसूस करता है। जिन नेताओं को कल तक बेईमान कहा जाता था, आज वो उसी मंच पर भाजपा के साथ शान से बैठे हैं।

इससे एक बात तो साफ हो जाती है- आजकल की हाई-स्टेक राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। चुनाव जीतने के इस खेल में सब माफ़ है, और BJP की ये वॉशिंग मशीन शायद ऐसे ही चलती रहेगी।

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