BJP की ‘वाशिंग मशीन’ में धुला एक और दाग? अशोक चव्हाण की कहानी (Episode-05)

BJP की ‘वाशिंग मशीन’ में धुला एक और दाग? अशोक चव्हाण की कहानी (Episode-05)

जब इस देश के करोड़ों हिंदुओं और राष्ट्रवादियों ने अपना काम-धाम छोड़कर, लंबी लाइनों में लग-लगकर 2014 में BJP को वोट डाला था.. वो जनादेश सिर्फ एक सरकार बदलने के लिए नहीं था! वो तो हमारी उस तड़प का नतीजा था जो कांग्रेस के दशकों पुराने सड़े-गले, भ्रष्ट और देश-विरोधी सिस्टम को उखाड़ फेंकने के लिए थी। हमने तो यही सोचा था ना की चलो, अब कोई ऐसा आया है जो देश का पैसा लूटने वालों और गद्दारी करने वालों को सीधा जेल की कालकोठरी में डाल देगा।

लेकिन खैर, सियासत भी क्या गज़ब चीज़ है। आज एक दशक बाद पीछे मुड़कर देखते हैं तो कसम से ऐसा लगता है जैसे हमारी राष्ट्रभक्ति और हमारी भावनाओं का सरेआम मज़ाक बना दिया गया है। जो भारतीय जनता पार्टी कल तक चीख-चीख कर खुद को ‘राष्ट्र-प्रथम’ का इकलौता परोकार बताती थी, आज वो सिर्फ एक ‘लॉन्ड्री सर्विस’ और ‘वाशिंग मशीन’ बनकर रह गई है। 

और इस वाशिंग मशीन का काम क्या है? जो जितना बड़ा भ्रष्टाचारी, जो जितना बड़ा घोटालेबाज़.. वो इस मशीन से उतना ज्यादा साफ़ होकर बाहर निकलता है। गले में BJP का पट्टा डाला नहीं की सारे पाप धुल गए!

भाजपा दाग धोने वाली नई ज़माने की वाशिंग मशीन, Episode 5: अशोक चव्हाण (पूर्व महाराष्ट्र उप-मुख्यमंत्री, राज्यसभा सांसद)

भाजपा की ‘अब हर घोटालेबाज़ बनेगा राष्ट्रवादी’ योजना

इस राजनैतिक बेशर्मी का सबसे भद्दा, सबसे घिनौना और कभी ना माफ किया जाने वाला उदाहरण अगर कोई है, तो वो है अशोक चव्हाण का भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना।

अशोक चव्हाण कोई छुटभैया नेता नहीं हैं। ये वो आदमी है जो उस कांग्रेस संस्कृति का जीता-जागता प्रतीक है जिसने इस देश को अंदर से दीमक की तरह खाया है। जिस इंसान पर कारगिल के हमारे वीर शहीदों के खून का सौदा करने का आरोप हो, जिस पर उन रोती-बिलखती विधवाओं के हक पर डाका डालने का आरोप हो, उसे आप अपनी पार्टी में ले आते हो? 

और सिर्फ लाते ही नहीं, बल्कि रेड कार्पेट बिछाकर उसे राज्यसभा के सिंहासन पर बैठा देते हो! एक सच्चा हिंदू और सच्चा राष्ट्रवादी किसी भी चीज़ से समझौता कर सकता है, लेकिन देश के गद्दारों और भ्रष्टाचार से वो कभी हाथ नहीं मिला सकता। तो आइए आज बात करते हैं इस राजनैतिक ढोंग की, और खोलते हैं उस वाशिंग मशीन का कच्चा चिट्ठा जिसने हमारे राष्ट्रवाद को एक भद्दा मज़ाक बनाकर रख दिया है।

सैनिकों की विधवाओं का हक लूटने वाले अशोक चव्हाण का ‘आदर्श घोटाला’

आप ज़रा 1999 के उस दौर को याद कीजिए। वो कारगिल का युद्ध, वो टाइगर हिल की बर्फीली चोटियां, और हमारे वो जांबाज सैनिक जो माइनस डिग्री तापमान में दुश्मन की गोलियां अपने सीने पर खा रहे थे। पूरे देश की आंखें नम थीं।

टीवी स्क्रीन से चिपके हुए हम लोग बस अपने जवानों की सलामती की दुआ मांग रहे थे। उस युद्ध में हमारे 500 से ज्यादा वीर जवानों ने अपनी जान की बाजी लगा दी, तिरंगे की शान रख ली।

देश जब उन शहीदों के गम में डूबा था, तब तय हुआ की मुंबई के सबसे पॉश और महंगे इलाके, कोलाबा में इन शहीदों की विधवाओं और उनके परिवारों के लिए एक 31 मंजिला इमारत बनाई जाएगी- ‘आदर्श हाउसिंग सोसाइटी’।

ये ज़मीन रक्षा मंत्रालय की थी। इसका मक़सद एकदम साफ़ और पवित्र था की जिन परिवारों ने देश के लिए अपना सिंदूर खोया है, अपने बेटे खोए हैं, कम से कम देश उन्हें एक छत तो दे सके।

लेकिन यहीं से शुरू होता है असली खेल। उस वक्त कांग्रेस के एक कद्दावर मंत्री हुआ करते थे अशोक चव्हाण (जो बाद में मुख्यमंत्री भी बने)। इस आदमी ने और इसके पूरे भ्रष्ट तंत्र ने गिद्धों की तरह इस पवित्र योजना पर झपट्टा मारा। सत्ता की हनक और जुगाड़ का इस्तेमाल करके इस पूरी योजना का ही सत्यानाश कर दिया गया। 

जो इमारत सिर्फ और सिर्फ सेना के लोगों के लिए थी, उसमें 40% फ्लैट्स इस आदमी ने आम नागरिकों के लिए अलॉट करवा दिए, ताकि उन्हें बेचकर ये पैसा कमा सके। और ऊपर से इस बिल्डिंग की ऊंचाई और फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) को अशोक चव्हाण ने अपनी मर्जी से बढ़ा लिया।

अब आप सोच रहे होंगे की आखिर में ये फ्लैट्स किसे मिले? यहीं तो असली दाल में काला है! अशोक चव्हाण ने सत्ता का दुरुपयोग करते हुए वो फ्लैट अपनी ही सास (भगवती शर्मा), अपनी पत्नी की बहन और अपने खासमखास रिश्तेदारों के नाम पर हथिया लिए।

मतलब, सोचिए ज़रा! जो छत कारगिल के किसी शहीद की विधवा को मिलनी थी, उसकी बालकनी में खड़े होकर समंदर का नज़ारा एक भ्रष्ट नेता के रिश्तेदार ले रहे थे। सीना छलनी हो जाता है ये सोचकर।

एक सच्चे राष्ट्रवादी के नज़रिए से देखिए, क्या ये महज़ कुछ करोड़ रुपयों की हेराफेरी का मामला था? बिल्कुल नहीं! ये सीधे-सीधे राष्ट्रद्रोह था। जो नेता चंद फ्लैट्स के लालच में हमारे सैनिकों के खून का और उनके परिवारों के आंसुओं का सौदा कर सकता है, वो इस देश का सबसे बड़ा दुश्मन है।

2010 में जब ये ‘आदर्श घोटाला’ सामने आया, तो पूरे देश में बवाल मच गया था। मजबूरी में चव्हाण को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। CBI ने चव्हाण के खिलाफ धारा 120B (आपराधिक साजिश), 420 (धोखाधड़ी) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत FIR दर्ज की।

और मज़ाक देखिए, उस वक़्त इसी भाजपा के बड़े-बड़े नेता सड़कों पर उतरकर छाती पीट-पीटकर अशोक चव्हाण को ‘देशद्रोही’ और ‘शहीदों का गद्दार’ बता रहे थे। लेकिन आज? आज उसी पार्टी के आलाकमान ने कुर्सी के लालच में उसी चव्हाण को सिर माथे पर बिठा लिया है।

अशोक चव्हाण का चुनाव के दौरान किया गया ‘पेड न्यूज़’ घोटाला

अब आप सोच रहे होंगे की शायद आदर्श घोटाला ही इनकी इकलौती “गलती” थी। जी नहीं! अशोक चव्हाण का तो पूरा का पूरा राजनैतिक करियर ही घोटालों से अटा पड़ा है। इनके काले कारनामे इतने हैं की गिनते-गिनते शाम हो जाए।

2009 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों का वो ‘पेड न्यूज़’ वाला किस्सा तो आपको याद ही होगा। लोकतंत्र में चुनाव से पवित्र क्या होता है? लेकिन इन्होंने चुनाव आयोग को भी अपनी जेब में रखने की कोशिश की। 

चुनाव के खर्चे की एक लिमिट होती है, लेकिन भाईसाहब ने जुगाड़ लगाया और महाराष्ट्र के कई बड़े अख़बारों में ‘अशोक पर्व’ (The Era of Ashok) के नाम से खबरें छपवा डालीं। 

चुनाव के दौरान प्रमुख समाचार पत्रों में “अशोक पर्व” जैसे शीर्षकों के साथ दर्जनों खबरें छपीं, जिनमें उनकी प्रशंसा के पुल बांधे गए थे। जांच में पाया गया की दूसरे अखबारों में भी शब्द-दर-शब्द एक जैसी खबरें छपी थीं, जो यह स्पष्ट करती थीं की ये खबरें नहीं, बल्कि पैसे देकर छपवाए गए विज्ञापन थे जिन्हें ‘न्यूज़’ के रूप में पेश किया गया था।

अशोक चव्हाण ने चुनाव आयोग को जो खर्च का ब्यौरा दिया, उसमें उन्होंने अखबारों के विज्ञापनों पर खर्च महज ₹5,379 दिखाया। जबकि वास्तविकता यह थी की करोड़ों रुपये मीडिया को ‘मैनेज’ करने में खर्च किए गए थे।

चुनाव आयोग ने 2014 में उन्हें “गलत विवरण” देने का दोषी माना और उन्हें अयोग्य घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। यह एक ऐसे नेता का चरित्र है जो सच को दबाने और झूठ को बेचने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

जमीन हड़पने में भी अशोक चव्हाण नहीं थे पीछे

इसके अलावा भी, यवतमाल में ज़मीन हथियाने (Public Land Grab) का जो मामला था, उसमें भी इनका नाम उछला। हुआ यूँ था की यवतमाल में जवाहरलाल दर्डा एजुकेशन सोसाइटी ने लगभग 1,000 वर्ग मीटर उस खुली जगह पर रातों-रात कब्ज़ा कर लिया जो सरकार ने ‘पब्लिक यूटिलिटी’ (सार्वजनिक इस्तेमाल) के लिए छोड़ी थी।

वहां धड़ल्ले से स्कूल की इमारत और पक्की दीवार खड़ी कर दी गई। जब इस मामले में FIR कटी तो उसमें अशोक चव्हाण भी मुख्य आरोपियों में से एक थे।

जांच अधिकारियों और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने दस्तावेजों के साथ सिद्ध किया की चव्हाण ने मुख्यमंत्री रहते हुए शहरी विकास विभाग पर दबाव डाला की वह लेआउट प्लान में बदलाव करे ताकि यह कीमती जमीन निजी हाथों में जा सके।

उनके खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश के तहत मामला दर्ज हुआ। एक के बाद एक घोटाले इस बात के प्रमाण थे की अशोक चव्हाण की राजनीति का आधार ‘जनसेवा’ नहीं, बल्कि ‘स्व-सेवा’ और ‘परिवार-सेवा’ था।

और तो और, अपनी कुर्सी पर बैठकर अपने सगे-संबंधियों के सहकारी बैंकों को फायदा पहुंचाने और सिस्टम को मैनिपुलेट करके जनता की गाढ़ी कमाई लूटने के भी इन पर ढेरों आरोप लगे। चव्हाण के लिए राजनीति अपनी तिजोरियां भरने का एक धंधा था। और आज ऐसी दूषित मानसिकता वाले शख्स को एक ‘राष्ट्रवादी’ पार्टी अपनी पनाह में ले रही है, इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी?

फ़रवरी 2024: भाजपा का संसद में अशोक चव्हाण के खिलाफ वाइट पेपर का ड्रामा

अगर मैं कहूं की भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे बड़ा पाखंड कब हुआ, तो आपको ज़्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं है। बस फरवरी 2024 का वो हफ़्ता याद कर लीजिए। कसम से, बॉलीवुड की किसी पिक्चर में भी इतने खतरनाक ट्विस्ट नहीं आते होंगे!

फरवरी के दूसरे हफ्ते में मोदी सरकार बड़े ही गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों के साथ संसद में एक ‘श्वेत पत्र’ (White Paper) लेकर आई। मकसद क्या था? देश को ये बताना की मनमोहन सिंह की यूपीए (UPA) सरकार के 10 सालों में कांग्रेस ने देश को कैसे दोनों हाथों से लूटा। 50 से ज़्यादा पन्नों के उस सरकारी दस्तावेज़ में बाकायदा ‘आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले’ का ज़िक्र बड़े-बड़े अक्षरों में किया गया था। 

संसद के पटल पर पूरे देश को बताया गया की कैसे सेना की ज़मीन हथिया ली गई और कैसे अशोक चव्हाण ने अपने करीबियों को फ्लैट बांटे। सत्ता पक्ष के सांसद मेजें थपथपा रहे थे, वाह-वाही हो रही थी। इशारा सीधे-सीधे अशोक चव्हाण की तरफ था।

अशोक चव्हाण का कांग्रेस से इस्तीफ़ा और भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ में उनका शुद्धिकरण

अब ज़रा पिक्चर का दूसरा सीन देखिए। संसद में ये वाइट पेपर पेश होने के मुश्किल से 3-4 दिन बाद ही अचानक खबर आती है की अशोक चव्हाण ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है।

और अगले ही दिन क्या होता है? महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम और भाजपा के बड़े नेता देवेंद्र फडणवीस साहब, हाथ में एक बड़ा सा बुके लिए, चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान के साथ, भाजपा दफ्तर में उसी अशोक चव्हाण का स्वागत कर रहे होते हैं!

अरे भाई, ये क्या मज़ाक है? जिस आदमी के घोटाले का कच्चा चिट्ठा आप खुद दो दिन पहले देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) में खोल रहे थे, उसी को आपने रातों-रात अपनी पार्टी का ‘रत्न’ बना लिया? और बात यहीं खत्म नहीं हुई। 

भाजपा में एंट्री मारने के 24 घंटे के अंदर-अंदर ही पार्टी ने चव्हाण को अपनी तरफ से राज्यसभा का टिकट भी थमा दिया! जो आदमी कारगिल के शहीदों के साथ गद्दारी करने के जुर्म में तिहाड़ या आर्थर रोड जेल की चक्की पीस रहा होना चाहिए था, उसे इन लोगों ने लोकतंत्र के सबसे ऊंचे सदन में ले जाकर बिठा दिया।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है की चव्हाण भाजपा में क्यों गए- वह तो अपनी जांच और जेल की सजा से बचने के लिए किसी भी चौखट पर झुकने को तैयार थे। प्रश्न यह है की भाजपा ने उन्हें क्यों स्वीकार किया? क्या भाजपा इतनी कमजोर हो गई है की उसे चुनाव जीतने के लिए उन लोगों के बैसाखियों की जरूरत है जो देश के गद्दार माने जाते थे?

अशोक चव्हाण जैसे भ्रष्ट नेताओं के लिए भाजपा की ये  ‘वाशिंग मशीन’ आखिर काम कैसे करती है?

विपक्ष वाले अक्सर चिल्लाते रहते हैं की भाजपा एक ‘वाशिंग मशीन’ बन गई है। पहले तो हम राष्ट्रवादियों को लगता था की ये वामपंथियों और कांग्रेसियों का कोई प्रोपेगेंडा है। लेकिन अशोक चव्हाण और उन जैसे तमाम नेताओं के मामलों ने इस बात को सौ टका सच साबित कर दिया है।

ज़रा इस सिस्टम को समझिए की ये काम कैसे करता है। जब तक कोई दागी घोटालेबाज़ नेता विपक्ष के खेमे में बैठा रहता है, तो देश की तमाम बड़ी-बड़ी एजेंसियां (CBI, ED, इनकम टैक्स) उसके पीछे शिकारी कुत्तों की तरह छोड़ दी जाती हैं।

सुबह-सुबह उसके घर छापे पड़ते हैं, न्यूज़ चैनलों पर एंकर चिल्ला-चिल्लाकर उसे देश का सबसे बड़ा डाकू घोषित कर देते हैं, उसके खिलाफ हज़ारों पन्नों की चार्जशीट कोर्ट में दाखिल हो जाती है। नेता को रात में नींद आनी बंद हो जाती है कि कल को जेल की हवा खानी पड़ेगी।

फिर शुरू होता है असली खेल जिसे राजनैतिक भाषा में ‘सेटलमेंट’ कहते हैं। नेता जी को समझ आ जाता है की जेल जाने से बचना है तो एक ही रास्ता है- भगवा गमछा गले में डालो और “भारत माता की जय” बोलकर भाजपा के दफ्तर में एंट्री मार लो। 

और चमत्कार देखिए! जैसे ही नेता जी भाजपा में शामिल होते हैं, वो वाशिंग मशीन ऑन हो जाती है। रातों-रात ED की फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। CBI अचानक से कोर्ट में जाकर कहती है कि “हुज़ूर, अभी और जांच की ज़रूरत है”, और केस लटक जाते हैं। कुछ महीनों बाद वही नेता मंच पर खड़ा होकर विकास और ईमानदारी के भाषण पेल रहा होता है।

आप सिर्फ अशोक चव्हाण को ही क्यों देखते हैं? ये तो पूरी की पूरी फौज इकट्ठी कर ली है इन्होंने। महाराष्ट्र में अजित पवार का ही केस ले लीजिए। याद है ना वो 70,000 करोड़ का सिंचाई घोटाला? खुद प्रधानमंत्री मोदी जी ने रैलियों में गला फाड़-फाड़ कर कहा था कि अगर हम सत्ता में आए तो इन्हें जेल भेजेंगे। 

और आज? आज वही अजित पवार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बनकर बैठे हैं। छगन भुजबल को देख लीजिए- मनी लॉन्ड्रिंग के केस में बकायदा जेल की हवा खाकर आए थे, आज वो भी भाजपा के साथ सत्ता की मलाई खा रहे हैं। 

प्रफुल्ल पटेल के पीछे तो ED हाथ धोकर पड़ी थी क्योंकि उन पर अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के करीबी इकबाल मिर्ची की पत्नी से प्रॉपर्टी खरीदने का संगीन आरोप था। मतलब सीधे-सीधे टेरर फंडिंग से जुड़े तार! लेकिन जैसे ही वो सत्ता पक्ष के खेमे में आए, उनके सारे केस भी रहस्यमयी तरीके से ठंडे पड़ने लगे।

अशोक चव्हाण ने भी भाजपा में आते ही मीडिया के सामने बड़ी बेशर्मी से कह दिया की आदर्श घोटाला तो बस एक “राजनैतिक दुर्घटना” थी। क्या बात है! कारगिल के शहीदों के नाम पर हुई लूट को आप बस एक ‘दुर्घटना’ कहकर रफा-दफा कर देंगे? और भाजपा आलाकमान इस पर चुप्पी साधे बैठा है। ये सन्नाटा इस बात का सबूत है की भ्रष्टाचार से लड़ना अब इनका मक़सद नहीं रहा, अब सिर्फ और सिर्फ सत्ता हथियाना ही इनका एकमात्र लक्ष्य है।

सत्ता के नशे में अंधी भाजपा कान खोलकर सुन ले.. धर्म और राष्ट्र, कुर्सी से हमेशा ऊपर हैं

हिंदू दर्शन में एक बहुत ही स्पष्ट और सीधी सी बात कही गई है- “धर्मो रक्षति रक्षित:” (जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है)। राष्ट्रवाद कोई सर्दियों का कोट नहीं है जिसे चुनाव आते ही पहन लिया और चुनाव खत्म होते ही उतार कर खूंटी पर टांग दिया। ये हमारी रगों में बहता है, ये हमारा व्रत है।

शायद दिल्ली के AC कमरों में बैठे भाजपा के रणनीतिकारों को एक बहुत बड़ी गलतफहमी हो गई है। उन्हें लगने लगा है की देश का हिंदू वोटर अब उनका बंधुआ मज़दूर या ‘अंधभक्त’ बन चुका है। उन्हें लगता है कि वो राम मंदिर के नाम पर या मोदी जी के चेहरे के पीछे अपने हर पाप, हर वैचारिक पतन और हर भ्रष्टाचार को बड़ी आसानी से छुपा लेंगे, और जनता चुपचाप बटन दबाती रहेगी।

लेकिन ये उनका सबसे बड़ा भ्रम है! सच्चा हिंदू और सच्चा राष्ट्रवादी किसी भी राजनैतिक दल का गुलाम नहीं होता। हमारी वफादारी किसी पार्टी के झंडे या कमल के फूल के प्रति नहीं है; हमारी निष्ठा सिर्फ और सिर्फ भारत माता और उन वीर सैनिकों के प्रति है जिन्होंने सरहदों पर अपना लहू बहाया है।

अशोक चव्हाण जैसे लोग जिन्होंने कारगिल के शहीदों के साथ गद्दारी की, उनका शुद्धिकरण किसी भी राजनैतिक वाशिंग मशीन से नहीं हो सकता। पाप कभी धुलते नहीं हैं जनाब, वो बस कुछ वक्त के लिए कालीन के नीचे छुप जाते हैं। और जब वो बाहर आते हैं, तो पूरी की पूरी व्यवस्था को ले डूबते हैं।

भारत का निर्माण सिर्फ और सिर्फ सत्यनिष्ठा और बलिदान से होता है, राजनैतिक जुगाड़ और अवसरवादिता से नहीं। कारगिल के गद्दारों को सिर पर बैठाने वाली कोई भी सत्ता इस पवित्र भूमि पर बहुत दिनों तक टिक नहीं सकती। ये बात भाजपा जितने जल्दी समझ ले, उतना अच्छा!

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