उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की सबसे ऊँची मंजिल पर एक द्वार है जो वर्ष के अधिकांश दिनों चुप रहता है।
तीन सौ चौंसठ दिन वह ताला बंद रहता है। आखिरी सीढ़ियाँ खाली पड़ी रहती हैं। कोई दीपक नहीं जलता। कोई घंटी नहीं बजती। कोई भक्त उन पायदानों पर नहीं चढ़ता। नीचे नगर अपनी दिनचर्या में लगा रहता है। क्षिप्रा बहती रहती है। भस्म आरती गूँजती रहती है। ऊपर एक छोटा सा कक्ष अपनी गहरी नींद में लिपटा रहता है।
फिर श्रावण की एक रात वह ताला खुलता है।
नागपंचमी की मध्यरात्रि में नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट ठीक चौबीस घंटे के लिए खुलते हैं। पूरे वर्ष की प्रतीक्षा करने वाली भीड़ ऊपर की ओर बढ़ने लगती है। एक रात और एक दिन के लिए शिव, पार्वती और नागराज का दुर्लभ स्वरूप दिखाई देता है। अगली मध्यरात्रि को द्वार फिर बंद हो जाते हैं। लंबी प्रतीक्षा फिर शुरू हो जाती है।
यह मंदिर रोज का ध्यान नहीं माँगता। यह धैर्य माँगता है। यह विश्वास माँगता है। यह भक्त से कहता है कि कुछ पवित्र स्थान तब अधिक शक्तिशाली होते हैं जब वे छिपे रहते हैं।
भारत के सबसे व्यस्त ज्योतिर्लिंग परिसर के भीतर यह स्थान वर्ष भर बंद क्यों रहता है? लाखों लोग कुछ क्षण के दर्शन के लिए क्यों आते हैं? एक बंद द्वार भक्तों के हृदय में इतनी गहराई से क्यों बस जाता है?
उत्तर पत्थर में है। उत्तर प्राचीन कथा में है। उत्तर उस इच्छा में है जिसका सम्मान आज भी किया जाता है। उत्तर नागराज तक्षक की कहानी में है, जिन्होंने भीड़ नहीं बल्कि एकांत माँगा। उत्तर उस अनोखी प्रतिमा में है जो परिचित छवि को पलट देती है। उत्तर इस विश्वास में है कि एक रात का दर्शन पुराने भय को शांत कर सकता है।
यह उस सोते हुए मंदिर की कथा है।
भूमिका – वह मंदिर जो 364 दिन सोता है
उज्जैन की पावन नगरी में एक ऐसा द्वार है जो लगभग कभी नहीं खुलता।
तीन सौ चौंसठ दिन वह ताला लगा रहता है। महाकालेश्वर मंदिर की आखिरी सीढ़ियाँ बंद रहती हैं। उस द्वार के पीछे कोई दीपक नहीं जलता। कोई घंटी नहीं बजती। कोई भक्त उन अंतिम पायदानों पर नहीं चढ़ पाता। पुजारी उस बंद मार्ग के पास से ऐसे निकल जाते हैं जैसे वह एक जीवित रहस्य हो। नीचे नगर चलता रहता है। क्षिप्रा बहती रहती है। भस्म आरती सुबह को गूँजती है। फिर भी ज्योतिर्लिंग परिसर के सबसे ऊपर बैठा एक मंदिर मौन में लिपटा रहता है।
यह मौन खालीपन नहीं है। यह प्रतीक्षा है। यह सम्मान है। यह उस इच्छा का पालन है जो सदियों पहले कही गई थी। शहर की हलचल नीचे रहती है। ऊपर का कक्ष अपनी निद्रा में डूबा रहता है। कोई साधारण दिन उस निद्रा को तोड़ने का साहस नहीं करता।
फिर श्रावण की एक रात ताला घूमता है।
मध्यरात्रि के बाद, नागपंचमी पर, नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट मात्र चौबीस घंटे के लिए खुलते हैं। जो भीड़ पूरे वर्ष प्रतीक्षा करती रही है, वह चढ़ना शुरू करती है। एक रात और एक दिन के लिए शिव, पार्वती और नागराज का छिपा दरबार प्रकट होता है। दीपक जलते हैं। मंत्र गूँजते हैं। आँखें उस दुर्लभ रूप पर ठहर जाती हैं जिसे वर्ष भर देखना मना है। अगली मध्यरात्रि को द्वार फिर बंद हो जाते हैं। प्रतीक्षा फिर से शुरू होती है।
यह ऐसा मंदिर नहीं जो प्रतिदिन ध्यान माँगता हो। यह धैर्य माँगता है। यह विश्वास माँगता है। यह भक्त से यह स्वीकार करवाता है कि कुछ पवित्र वस्तुएँ तब और अधिक शक्तिशाली होती हैं जब वे दिखाई नहीं देतीं। रोज खुले रहने वाला मंदिर परिचित हो जाता है। वर्ष में एक बार खुलने वाला मंदिर हृदय में बस जाता है।
रहस्य सरल भी है और गहरा भी। भारत के सबसे अधिक देखे जाने वाले ज्योतिर्लिंग परिसरों में से एक के भीतर स्थित यह स्थान वर्ष भर बंद क्यों रहता है? लाखों लोग कुछ क्षण के दर्शन के लिए क्यों यात्रा करते हैं? भक्तों के हृदय में एक बंद द्वार उस मंदिर से अधिक शक्ति क्यों रखता है जो हर सुबह खुला रहता है?
उत्तर पत्थर में है। उत्तर कथा में है। उत्तर उस इच्छा में है जिसका सम्मान परंपरा आज भी करती है। उत्तर नागराज तक्षक की कथा में है, जिन्होंने भीड़ भरा दरबार नहीं, एकांत माँगा। उत्तर उस दुर्लभ प्रतिमा में है जो हिंदू शिल्प की परिचित छवि को पलट देती है। उत्तर इस विश्वास में है कि एक रात का दर्शन पुराने भय को शांत कर सकता है।
यह मंदिर सोता है। पर उसकी नींद में भी एक जीवंत शक्ति छिपी है। तीन सौ चौंसठ दिन की चुप्पी उस एक रात को और अधिक पवित्र बना देती है। जो द्वार सदा खुला रहता है, वह आसानी से नजरअंदाज हो सकता है। जो द्वार लगभग सदा बंद रहता है, वह याद रहता है। वह प्रतीक्षा कराता है। वह आशा जगाता है।
उज्जैन की इस ऊँचाई पर बैठा नागचंद्रेश्वर मंदिर हमें याद दिलाता है कि भक्ति केवल उपस्थिति नहीं है। भक्ति कभी-कभी अनुपस्थिति में भी फलती-फूलती है। बंद कपाट के पीछे शिव और नागराज की संगति है। बंद कपाट के पीछे एक प्राचीन वचन है। बंद कपाट के पीछे वह मौन है जो स्वयं एक प्रकार का दर्शन बन जाता है।
यह उसी सोते हुए मंदिर की कथा है।

बंद द्वार और दुर्लभ प्रतिमा
वर्ष के तीन सौ चौंसठ दिन यही दृश्य रहता है: ताला लगा कपाट, और उसके पीछे शिव-पार्वती नागराज के फनों के नीचे। यही लेख का हृदय है।
बाएँ बंद द्वार है। दाएँ वही अनोखी मूर्ति है जिसमें शिव और पार्वती बहुफणाधारी नाग पर विराजमान हैं, साथ में गणेश, नंदी और सिंह।
नागपंचमी पर जब दीपक और फूल लौटते हैं, तो वही प्रतिमा शृंगारित रूप में दिखाई देती है।
जहाँ नागराज पहरा देते हैं – महाकालेश्वर के भीतर स्थान
उज्जैन काल, प्रार्थना और नदी का प्राचीन नगर है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग उसके आध्यात्मिक केंद्र पर विराजमान है। लाखों लोग दक्षिणमुखी महाकाल के दर्शन के लिए आते हैं। पवित्र भस्म की प्रातः आरती के लिए आते हैं। क्षिप्रा की शांति के लिए आते हैं। नगर की गलियों में मंत्र गूँजते रहते हैं। घाटों पर दीप जलते रहते हैं। फिर भी बहुत से लोग यह नहीं जानते कि उसी परिसर में एक और गहरा रहस्य छिपा है।
पहली बार आने वाले बहुत से यात्री यह नहीं जानते कि यही परिसर तीन पवित्र स्तरों में उठता है।
सबसे नीचे बाबा महाकाल का गर्भगृह है। यही ज्योतिर्लिंग का हृदय है। यहाँ समय स्वयं पूजा जाता है। महाकाल का यह रूप दक्षिण की ओर मुख किए हुए विराजमान है। यह रूप काल को भी अपने अधीन रखता है। उसके ऊपर ओंकारेश्वर का स्थान है। यहाँ शिव का परिचित और मधुर स्वरूप भक्तों को अपने में समेट लेता है। तीसरी और सबसे ऊँची मंजिल पर नागचंद्रेश्वर मंदिर है। नागों का यह मंदिर उसी गर्भगृह के ऊपर बैठता है जिसे संसार देखने आता है।
यह व्यवस्था भक्ति का एक जीवंत मानचित्र लगती है। नीचे समय को महाकाल के रूप में पूजा जाता है। मध्य में शिव का परिचित स्वरूप ओंकारेश्वर प्रार्थना को आगे बढ़ाता है। शीर्ष पर नाग और चंद्रमा के स्वामी एक बंद कक्ष में विश्राम करते हैं। नागचंद्रेश्वर नाम स्वयं शिव के दो प्राचीन संबंधों को जोड़ता है। वे नागों के स्वामी हैं। वे चंद्रमा को अपनी जटा में धारण करने वाले भी हैं। नाम में ही एक पूरी कथा छिपी है। नाग की शक्ति और चंद्रमा की शीतलता एक साथ यहाँ बसती है।
वर्ष के अधिकांश दिनों में श्रद्धालु निचली मंजिलों से निकल जाते हैं और अंतिम मंदिर नहीं देख पाते।

यहाँ नाग का छत्र, त्रिशूल, गणेश और पुष्पमालाएँ एक साथ दिखते हैं। यही वह क्षण है जिसके लिए भक्त पूरे वर्ष प्रतीक्षा करते हैं।
सीढ़ी बंद रहती है। सुरक्षा और परंपरा मार्ग को बंद रखती हैं। वह मौन खालीपन नहीं है। इस स्थान की मान्यता में वह निवास है। कहा जाता है कि नागराज तक्षक वहाँ शांति से वास करते हैं। बंद द्वार इंकार नहीं है। वह सम्मान का एक रूप है। वह एक प्राचीन वचन का पालन है।
स्थान का महत्व गहरा है। यह वन में बैठी कोई एकाकी कुटिया नहीं। यह भारत के सबसे व्यस्त मंदिरों में से एक के भीतर छिपा कक्ष है। यही अंतर आश्चर्य का हिस्सा है। नीचे कतारें कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं। भक्तों के चरण थकते नहीं। घंटियाँ और जयकारे हवा में घुलते रहते हैं।
ऊपर पत्थर का एक दरबार अंधकार में प्रतीक्षा करता है। एक ही भवन महाकाल का लोकमुख भी रखता है और एकांत की निजी प्रतिज्ञा भी।
जब द्वार अंततः खुलते हैं, तो चढ़ाई स्वयं तीर्थ बन जाती है। भक्त परिचित आंगनों को छोड़कर ऊपर उठते हैं। पायदान दर पायदान। उस मंदिर की ओर जिसे वे जीवन में एक बार देख सकते हैं। यदि भाग्य और संकल्प साथ दें तो वर्ष में एक बार। वायु बदलती है। स्थान संकरा होता है। प्रतीक्षा लंबी होती है। हृदय की धड़कन तेज हो जाती है। फिर वह दुर्लभ रूप दिखाई देता है।
इस ऊँचाई पर खड़े होकर भक्त नीचे के संसार को कुछ देर के लिए भूल जाते हैं। महाकाल का गर्भगृह नीचे रहता है। ओंकारेश्वर मध्य में रहता है। सबसे ऊपर नागराज का पहरा और शिव-पार्वती की शांत उपस्थिति होती है। तीन स्तर तीन अलग भाव जगाते हैं। नीचे काल की विराटता। मध्य में भक्ति की सहजता। ऊपर एकांत और रहस्य की गहराई।
नागचंद्रेश्वर मंदिर का यह स्थान हमें याद दिलाता है कि पवित्रता केवल भीड़ में नहीं बसती। वह मौन में भी फलती है। वह बंद द्वार के पीछे भी जीवित रहती है। उज्जैन का यह ऊपरी कक्ष नागराज की रक्षा में है। और नागराज स्वयं शिव की कृपा में सुरक्षित हैं। यही कारण है कि यह स्थान वर्ष भर सोता रहता है। और एक रात जागकर पूरे नगर को आशीष देता है।
एक सहस्राब्दी की कथा – नागचंद्रेश्वर मंदिर का इतिहास
उज्जैन में इतिहास एक साफ पन्ने की तरह कम ही आता है। वह परत दर परत आता है। जैसे यह मंदिर स्वयं तीन स्तरों में उठता है, वैसे ही इसकी स्मृति भी कई युगों से गुजरती हुई हमारे सामने खड़ी है।
परंपरा नागचंद्रेश्वर मंदिर को परमार नरेश भोज से जोड़ती है। लगभग 1050 ईस्वी के आसपास की बात है। मालवा के राजा भोज विद्वान् नरेश थे। वे निर्माता थे। वे मंदिर और विद्या के आश्रयदाता थे। इस नगर की स्मृति में उनका काल वह समय है जब पत्थर और शास्त्र साथ-साथ चले। ऊपरी मंजिल का यह स्थान उसी विश्वास और शिल्प के युग से जुड़ा माना जाता है। राजा भोज के नाम से जुड़ी अनेक रचनाएँ और मंदिर आज भी मध्य भारत की भूमि पर जीवित हैं। नागचंद्रेश्वर भी उसी शृंखला की एक कड़ी लगता है।
सदियों बाद पूरे महाकालेश्वर परिसर को नई देखभाल की आवश्यकता पड़ी। 1732 में महाराज राणोजी सिंधिया ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। यह क्षेत्र के एक कठिन अध्याय के बाद हुआ था। सिंधिया शासन ने महाकाल को नए सार्वजनिक जीवन में लौटाया। ज्योतिर्लिंग परिसर फिर से भक्तों के केंद्र में आ गया। उसी पवित्र संरचना में बैठा नागचंद्रेश्वर भी उस बाद की देखभाल का भागीदार बना। जीर्णोद्धार केवल दीवारों की मरम्मत नहीं था। वह आस्था की पुनः स्थापना थी।
मंदिर के केंद्र की प्रतिमा को प्रायः ग्यारहवीं शताब्दी की कृति कहा जाता है। अनेक लोकप्रिय विवरण कहते हैं कि इसे नेपाल से लाकर यहाँ स्थापित किया गया। नेपाल का यह संबंध स्थानीय कथन में बार-बार आता है। इससे मूर्ति को एक हिमालयी आभा मिलती है। लगता है मानो उत्तर के ऊँचे मंदिरों से जाना-पहचाना कोई रूप उज्जैन के ज्योतिर्लिंग के ऊपर आकर बस गया हो।
फिर भी सटीक उत्पत्ति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। मंदिर के पुजारियों ने हाल के वर्षों में कहा है कि कोई पक्का दस्तावेज यह सिद्ध नहीं करता कि प्रतिमा बाहर से आई। कुछ स्थानीय ज्ञान कहता है कि इसे यहीं गढ़ा गया। कुछ लोग नेपाल की कथा को इसलिए संजोए रखते हैं क्योंकि वह बहुत दिनों से कही जाती रही है। इसके विषय में ईमानदार बात सरल है। परंपरा पुरानी है। शिल्प दुर्लभ है। कागजी प्रमाण पतला है। रहस्य इतिहास की समस्या नहीं। रहस्य इतिहास का हिस्सा है।
एक और, अपेक्षाकृत नई स्मृति भी है। कुछ पुजारी याद करते हैं कि कुछ दशक पहले ऊपरी मंजिल इतनी कठोरता से बंद नहीं थी। श्रद्धालु उसी ऊँचाई पर स्थित शिवलिंग के दर्शन के लिए अधिक आसानी से ऊपर जा सकते थे। जब नागचंद्रेश्वर की दुर्लभ पारिवारिक प्रतिमा अधिक प्रसिद्ध हुई, और पुरानी संरचना तथा भीड़ की सुरक्षा की चिंता बढ़ी, तब वर्ष में एक बार खोलने की प्रथा स्थिर नियम बन गई। कथा और व्यावहारिक देखभाल अब साथ चलती हैं। बंद द्वार तक्षक का सम्मान करता है। वह एक नाजुक और अनमोल स्थान की रक्षा भी करता है।
भक्त के लिए निरंतरता ही सबसे महत्वपूर्ण है। राजा बदलते हैं। साम्राज्य मिटते हैं। शासन आते-जाते हैं। मंदिर उसी ऊँचे स्थान पर रहता है। उसी ज्योतिर्लिंग के ऊपर। श्रावण की उसी रात की प्रतीक्षा में। एक हजार वर्षों की प्रार्थना ने उस द्वार को साधारण नहीं बनाया। उसने प्रतीक्षा को और अधिक अर्थवान बनाया।
आज जब भक्त ऊपर चढ़ते हैं, तो वे केवल वर्तमान नहीं देखते। वे भोज के युग की छाया देखते हैं। वे सिंधिया के जीर्णोद्धार की स्मृति देखते हैं। वे उस अज्ञात शिल्पी के हाथों को महसूस करते हैं जिसने नाग के फन और शिव-पार्वती के शांत मुख गढ़े। इतिहास यहाँ सूखी तिथियों का संग्रह नहीं। वह जीवित श्रद्धा की धारा है। एक सहस्राब्दी से अधिक समय से यह धारा बह रही है। और आज भी बह रही है।
वह दुर्लभ प्रतिमा जो परिपाटी को पलट देती है
प्रतिमा की पहली झलक लोगों के मन में रह जाती है।
हिंदू कला की सामान्य भाषा में महान नाग-शैया विष्णु की है। शेषनाग, अथवा अनंत, जलों पर लेटे हुए भगवान को धारण करते हैं। यह चित्र इतना परिचित है कि एक बालक भी उसे पहचान लेता है।
यहाँ चित्र उलटा है।
भगवान शिव और देवी पार्वती बहुफणाधारी नाग पर विराजमान हैं। फन उनके पीछे जीवित छत्र की तरह उठे हैं। कुछ विवरण सात फनों की बात करते हैं। कुछ दस फनों की। दोनों संख्याएँ श्रद्धापूर्ण वर्णन में आती हैं, क्योंकि पत्थर विवरण से भरा है और दर्शन का समय बहुत छोटा होता है। नाग को नागराज तक्षक कहा जाता है। शिव के गले और भुजाओं पर और नाग आभूषण की तरह लिपटे हैं। यह नागेश्वर रूप है, पर उस सामान्य लिंग से अधिक पूर्ण, जिस पर एक नाग होता है।
परिवार उपस्थित है। गणेश वहाँ हैं। कुछ वर्णन में कार्तिकेय भी हैं। शिव के नंदी और पार्वती के सिंह उसी रचना में दिखाई देते हैं। कुछ विवरण ऊपर सूर्य और चंद्रमा की भी बात करते हैं। पूरा पटल एक चित्र नहीं, एक दरबार लगता है। यह नाग-सिंहासन पर उमा-महेश्वर हैं, और साथ में पुत्र तथा वाहन एक ही दृष्टि में एकत्र हैं।
इसीलिए पुजारी और तीर्थयात्री इस मूर्ति को अद्वितीय कहते हैं। बात केवल इतनी नहीं कि शिव वहाँ विराजमान हैं जहाँ प्रायः विष्णु दिखाए जाते हैं। बात यह है कि कैलास का पूरा घर नाग को आसन और आश्रय मानता है। नाग किनारे की सजावट नहीं है। नाग स्वयं सिंहासन है।
आध्यात्मिक अर्थ कोमल भी है और दृढ़ भी। शिव वे स्वामी हैं जो बिना भय के नाग धारण करते हैं। वे विष पीते हैं और उसे पवित्र बना देते हैं। वे श्मशान में भी बैठते हैं और हिम में भी। उन्हें तक्षक पर बिठाना यह कहना है कि भय का पात्र अब कृपा का सेवक बन गया है। नाग दंपति को नहीं डराता। वह उन्हें धारण करता है।
जो भक्त अंततः प्रतिमा के सामने खड़े होते हैं, वे आश्चर्य से अधिक स्थिरता की बात करते हैं। पत्थर पुराना है। मुख शांत हैं। फन आशीष की तरह फैले हैं। कुछ क्षण के दर्शन में आँख को एक साथ शिव, शक्ति, पुत्र, वाहन और महान नाग समेटना पड़ता है। मन सब कुछ सूचीबद्ध नहीं कर सकता। श्रद्धा को इसकी आवश्यकता भी नहीं। एक दृष्टि पर्याप्त है यह अनुभव करने के लिए कि यह भिन्न दरबार है।
इस ऊपरी मंदिर से एक शिवलिंग भी जुड़ा है। पारिवारिक प्रतिमा के बाद कुछ तीर्थयात्री शिव का लिंग रूप में भी दर्शन पाते हैं। दोनों रूप एक दूसरे को पूरा करते हैं। एक दुर्लभ, कथात्मक छवि है। दूसरा कालातीत चिह्न है।
असंख्य शिव मंदिरों वाले इस देश में यह एक प्रतिमा अब भी चौंकाती है। वह शोर किए बिना ऐसा करती है। वह केवल बैठती है, वर्ष दर वर्ष, अंधकार में, जब तक वह रात नहीं आती जब दीपक लौटते हैं।
तक्षक की कथा – एकांत क्यों मिला
बंद द्वार को समझने के लिए नागराज को जानना होगा।
तक्षक भारतीय स्मृति का कोई छोटा पात्र नहीं। वे प्राचीन कथाओं के नागराज हैं। महाभारत में वे वही सर्प हैं जो अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित को मृत्यु देते हैं। वह कथा गर्व, शाप और परिणाम से भरी है। तक्षक शक्तिशाली हैं। बाद के कथन में वे वह सत्ता भी हैं जिन्हें अपने किए के साथ जीना है।
उज्जैन की स्थानीय परंपरा कथा को आगे ले जाती है, उस वन में जो कभी महाकाल के चारों ओर था।
कहा जाता है कि तक्षक यहाँ घोर तपस्या करने आए। उन्होंने सर्पों के राजा का गर्व छोड़ दिया। उन्होंने शिव को शस्त्र की तरह नहीं, शरण की तरह चाहा। तप लंबा और कठिन था। वह स्थान तब महाकाल वन था, मौन और तीव्र पवित्रता का भूदृश्य।
शिव प्रसन्न हुए।
भगवान ने तक्षक को अमरत्व दिया। उन्होंने उन्हें अपने पास स्थान भी दिया। तक्षक ने सिंहासन या पद से अधिक असामान्य वस्तु माँगी। उन्होंने शिव के निकट बिना विघ्न के रहने की इच्छा की। उन्होंने एकांत चाहा। उन्होंने ऐसा घर चाहा जहाँ उनका विश्राम और उनकी आराधना संसार के आवागमन से हर घंटे न टूटे।
शिव ने वह इच्छा स्वीकार की।
बंद मंदिर उसी वरदान का पार्थिव रूप है। वर्ष के अधिकांश समय इस स्थान को तक्षक के शांति-कक्ष की तरह माना जाता है। विश्वास है कि वे वहाँ अदृश्य रूप में रहते हैं, उसी भगवान की संगति में जिन्होंने उनकी प्रार्थना सुनी। कुछ लोककथाएँ यह भी कहती हैं कि बंद महीनों में तक्षक स्वयं विशाल, मौन जप करते हैं, और नागपंचमी पर देवताओं की उपस्थिति में वह पूजा पूर्ण होती है।
इसीलिए परंपरा ताले को मात्र प्रथा नहीं मानती। वह उसे प्रतिज्ञा मानती है। किसी अन्य दिन द्वार को जबरदस्ती खोलना वरदान तोड़ना होगा।
तक्षक की कथा एक पुराने भय को कोमल भी बनाती है। वही नाग जो महाकाव्य में मृत्यु का वाहक दिखाई देता है, यहाँ भक्त बनकर आता है। डरावना दंश झुका हुआ मस्तक बन जाता है। सर्पों का राजा स्थिरता का रक्षक बन जाता है। उस संस्कृति के लिए जो नाग का सम्मान भी करती है और उससे डरती भी है, यह हृदय-परिवर्तन स्वयं एक शिक्षा है।
शिव का वर दोहरा है। वे ऐसा जीवन देते हैं जो समाप्त नहीं होता। वे एक ऐसा कक्ष भी देते हैं जिसमें वह जीवन शांत रह सके। व्यस्त युग में यह दूसरा वर अधिक आश्चर्यजनक लग सकता है।
रहस्य का हृदय – द्वार वर्ष में केवल एक बार क्यों खुलते हैं
केवल एक बार क्यों?
पहला उत्तर: कथा है। द्वार तक्षक की शांति के सम्मान में बंद रहते हैं। वे नागपंचमी पर खुलते हैं क्योंकि वह दिन नागों का है। वही क्षण है जब नागराज का पर्व और भगवान की करुणा मिलते हैं। नगर भीतर आ सकता है। प्रतिज्ञा टूटती नहीं। वह पूरी होती है।
दूसरा उत्तर: ज्योतिष और ऋतु का है। नागपंचमी श्रावण शुक्ल पंचमी को पड़ती है, श्रावण के शुक्ल पक्ष की पाँचवीं तिथि को। श्रावण शिव का महीना है। शुक्ल पंचमी नाग का दिन है। पुजारी कहते हैं कि इस तिथि का मंदिर की ऊर्जा से संयोग विशेष है। राहु और केतु, जो सर्प से जुड़े छायाग्रह हैं, इसी उपाय के काल में स्मरण किए जाते हैं। द्वार केवल कथा से नहीं, आकाश के पंचांग से भी खुलते हैं।
तीसरा उत्तर: व्यावहारिक है, और वह पहले दो को मिटाता नहीं। ऊपरी मंदिर छोटा है। सीढ़ियाँ तीव्र हैं। प्रतिमा प्राचीन है। महाकाल को अब जो भीड़ प्रतिदिन देखती है, वैसी भीड़ इस स्थान के अनुकूल नहीं होगी। वार्षिक रूप से खुलना भक्ति को एक पवित्र खिड़की में केंद्रित करता है। वह कक्ष को विशाल मंदिर का एक और साधारण गलियारा बनने से भी बचाता है।
तीनों कारण उज्जैन के मन में साथ रहते हैं।
इनके नीचे एक और गहरा भाव है। हिंदू जीवन में हर पवित्र वस्तु निरंतर प्रदर्शन के लिए नहीं होती। कुछ मंत्र फुसफुसाए जाते हैं। कुछ रूप ढके रहते हैं। कुछ व्रत न करने से पूरे होते हैं। बंद मंदिर वही पाठ पढ़ाता है। पवित्रता पीछे हटने का एक रूप भी हो सकती है। जो देवता सदा उपलब्ध हैं, वह एक कृपा है। जो देवता वर्ष में एक बार उपलब्ध होते हैं, वह दूसरी कृपा है।
लोग कभी पूछते हैं कि क्या अपवाद हो सकता है। परंपरा का उत्तर दृढ़ रहा है। कोई साधारण दिन नहीं। कोई ऐसा विशेष पात्र नहीं जो नियम को शिष्टाचार बना दे। बंद द्वार की समानता उसकी गरिमा का हिस्सा है। जब वह खुलता है, सबके लिए खुलता है।
इसलिए रहस्य कोई पहेली नहीं जिसका चतुर समाधान प्रतीक्षित हो। वह एक अनुशासन है। तीन सौ चौंसठ दिन का संयम तीन सौ पैंसठवें दिनको चमक देता है। क्षण रुकें। ऊपर लिखे वाक्य में संख्या ठीक होनी चाहिए। तीन सौ चौंसठ दिन के बाद जो दिन आता है वह वर्ष का वह एक दिन है। कहना चाहिए: तीन सौ चौंसठ दिन का संयम उस एक दिन को चमक देता है। मैं लेख में सही वाक्य रखूँगा।
एक पावन रात्रि – नागपंचमी के पूजन और दर्शन
रात्रि द्वार खुलने से पहले शुरू होती है।
पिछले दिन के अंतिम घंटों में परिसर अपनी लय बदलता है। कतारें लगती हैं। अस्थायी पुल और एकतरफा मार्ग बनते हैं। पुलिस, मंदिर कर्मचारी और स्वयंसेवक अपने स्थान लेते हैं। दूर से आए परिवार पत्थर पर बैठकर प्रतीक्षा करते हैं। कुछ केवल महाकाल के लिए आए होते हैं। बहुत से ऊपरी मंदिर के लिए भी आए होते हैं।
मध्यरात्रि के आसपास, विशेष पूजा के बाद, नागचंद्रेश्वर के कपाट खोले जाते हैं।
पहला पूजन परंपरा से महानिर्वाणी अखाड़े के संत करते हैं। हाल के वर्षों में उसी अखाड़े के महंत ने पट खोलने के अनुष्ठान और प्रथम अभिषेक किए हैं। यह पर्यटकों का आयोजन नहीं। यह एक बंद दरबार को सार्वजनिक प्रार्थना की एक रात सौंपना है। प्रथम पूजन के बाद दर्शन शुरू होते हैं और चौबीस घंटे तक लंबे विराम के बिना चलते हैं।
गति सरल और तीव्र होती है। भक्त चढ़ते हैं। दुर्लभ प्रतिमा के सामने वे शीघ्र निकलते हैं। छोटे क्षण में जो चढ़ा सकते हैं, चढ़ाते हैं। पुष्प, प्रार्थना, एक दृष्टि, जुड़े हाथ। फिर वे आगे बढ़ते हैं, ताकि अगला व्यक्ति देख सके। प्रातः आरती और सायंकाल आरती दिन को चिह्नित करते हैं। दोपहर में मंदिर परंपरा और अखाड़े का अधिक विधिवत पूजन हो सकता है, कभी सरल भोग के साथ। अगली मध्यरात्रि को, अंतिम विधि के बाद, द्वार बंद हो जाते हैं।
अगले श्रावण तक दूसरी संभावना नहीं होती।
उस रात का भाव उसे बताना कठिन है जो उस कतार में नहीं खड़ा रहा। यह केवल उत्साह नहीं। यह थकान, वर्षा अथवा गर्मी, जयकारे, और क्षण चूक जाने के शांत भय का मिश्रण है। लोग कालसर्प दोष की बात करते हैं, परिवार की उलझनों की बात करते हैं, दादी से किए वचन की बात करते हैं। अपेक्षा से कम बोलते हैं। चढ़ाई अतिरिक्त शब्दों को ले जाती है।
इस दिन उज्जैन नागों का नगर होता है। छोटे मंदिरों में दूध चढ़ता है। नाग-नागिन की चाँदी की मूर्तियाँ बिकती हैं। क्षिप्रा के घाटों पर राहु, केतु और सर्प पीड़ा के विशेष पूजन होते हैं। नागचंद्रेश्वर का खुलना इस सब के केंद्र में खड़ा रहता है, जैसे व्यापक घेरे में एक दीपक।
मध्यरात्रि को जब ताला लौटता है, भीड़ पतली पड़ती है। सीढ़ी फिर बंद कर दी जाती है। पुजारी नीचे आते हैं। कक्ष अपनी लंबी निद्रा में चला जाता है। जिन्हें दर्शन मिला, वे एक स्मृति लेकर चलते हैं जिसे एक वर्ष चलना है। जो चूक गए, वे अगली नागपंचमी की योजना पहले ही बनाने लगते हैं।
द्वार के पार तक पहुँचने वाले आशीष – आध्यात्मिक महत्व
यहाँ लोग क्या चाहते हैं?
सबसे अधिक नाम लिया जाने वाला आशीष कालसर्प दोष से मुक्ति है। ज्योतिष की भाषा में यह स्थिति तब बनती है जब सभी ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाते हैं। इससे विलंब, भय, रुकावट, और यह भाव जुड़ा माना जाता है कि जीवन एक कुंडली में फँस गया है। क्योंकि राहु और केतु सर्प से जुड़े हैं, नागों के दिन नागराज का मंदिर उपाय का शक्तिशाली स्थान माना जाता है।
भक्त अन्य सर्प संबंधी कष्टों के लिए भी आते हैं। परिवार की पुरानी सर्पदोष कथाएँ, नागों के स्वप्न, सर्प का भय, और इस जन्म अथवा दूसरे जन्म में सर्पों को पहुँची हानि से जुड़े माने जाने वाले कष्ट, सब इस द्वार पर एकत्र होते हैं। प्रार्थना केवल कुंडली बदलने की नहीं। भय से संबंध बदलने की है।
एक व्यापक आशीष भी है। शिव और पार्वती को साथ बैठे देखना गृहस्थ शांति माँगना है। गणेश को देखना बाधाओं के नरम पड़ने की कामना है। नाग को भय नहीं, सिंहासन के रूप में देखना यह माँगना है कि जो वस्तु कभी जीवन को विष देती थी, अब उसे संभाले। प्रतिमा स्वयं शिक्षा है। जिसे हम डरते हैं, वह कृपा से दिव्य आसन बन सकता है।
नागचंद्रेश्वर शिव का वह रूप भी है जो चंद्रमा और नागों का रक्षक है। आहत होकर शरण चाहने वाला चंद्र शिव की जटा में स्थान पाता है। चंचल और शक्तिशाली नाग शिव के कंठ पर स्थान पाते हैं, और यहाँ शिव के आसन के नीचे भी। भगवान उसे ग्रहण करते हैं जिसे संसार सरलता से नहीं संभालता। जो भक्त इस रूप के सामने खड़ा होता है, वह उसी ग्रहण के सामने खड़ा होता है।
बंद महीनों का अपना अर्थ है। संबंध बनाए रखने के लिए कक्ष में प्रवेश आवश्यक नहीं। बहुत से लोग वर्ष भर इस मंदिर को स्मरण रखते हैं। वे प्रतीक्षा करते हैं। प्रतीक्षा साधना बन जाती है। ऐसे समय में जब लगभग सब कुछ तुरंत उपलब्ध है, वह आशीष भिन्न लगता है जिसके लिए पंचांग और रात्रि यात्रा चाहिए। वह श्रद्धा की पुरानी गति लौटाता है।
इसमें अतिशयोक्ति की आवश्यकता नहीं। परंपरा यह दावा नहीं करती कि एक दृष्टि हर दुख समाप्त कर देती है। वह यह कहती है कि यह दर्शन समयानुकूल, दुर्लभ और कृपालु है। वह यह कहती है कि शिव, जिन्होंने तक्षक को स्वीकार किया, मानव जीवन की कुंडलित उलझनों को भी स्वीकार कर सकते हैं।
वे कहानियाँ जो रहस्य को जीवित रखती हैं
हर बंद मंदिर के चारों ओर कथाएँ उगती हैं।
सबसे अधिक दोहराई जाने वाली स्थानीय कथा उस पुजारी की है जो नागपंचमी के अतिरिक्त किसी दिन भीतर चला गया। वह उस समय गया जब द्वार बंद रहना चाहिए था। अगली सुबह वह बाहर बेहोश पाया गया। उसके शरीर पर ऐसे चिह्न थे जिन्हें कोई समझा नहीं सका। वह यह नहीं कह सका, अथवा नहीं कहा, कि भीतर क्या देखा। कथा चेतावनी भी है और विस्मय भी। यह लोकश्रुति है, न्यायालय का अभिलेख नहीं। फिर भी वह जीवित रही क्योंकि वह इस स्थान के भाव से मेल खाती है। कक्ष को खाली भंडार नहीं माना जाता। उसे अधिष्ठित माना जाता है।
लोग यह भी कहते हैं कि बंद मंदिर की रक्षा सर्प करते हैं। कुछ बंद मार्ग के पास फुफकार की बात करते हैं। कुछ कहते हैं कि वे मौसम के बाहर द्वार के निकट नाग देख चुके हैं। पुराने पत्थर, नदी तट और बागों वाले नगर में सर्प दुर्लभ नहीं। श्रद्धा उनकी उपस्थिति को संयोग से अधिक पढ़ती है। इन बातों को कोई तथ्य माने या भक्ति की कविता, वे रक्षक होने के भाव को जीवित रखती हैं।
लोककथा की एक और धारा कहती है कि तक्षक अदृश्य रूप में उसी कक्ष में रहते हैं। बंद वर्ष में वे तप में रहते हैं। नागपंचमी पर उनकी आराधना और लोगों की आराधना एक हो जाती है। इसीलिए वह दिन केवल मनुष्यों से नहीं, एक बड़े अदृश्य समुदाय से भी भरा लगता है।
ऐसी कथाओं को हल्के हाथ से रखना चाहिए। वे बच्चों को डराने या अंधविश्वास बढ़ाने के लिए नहीं हैं। वे सीमा के बोध की रक्षा के लिए हैं। जो पवित्र कक्ष किसी भी घंटे कोई भी व्यक्ति खोल सके, उसका एक आश्चर्य घट जाता है। जिस पवित्र कक्ष की देहरी हो, और गलत समय पर उसे लाँघने का परिणाम हो, वह देहरी बनी रहती है।
उज्जैन सदा कथाओं का नगर रहा है। विक्रमादित्य, नवग्रह, क्षिप्रा, महाकाल, कवि और योगी, सब यहाँ कथन की परतों में रहते हैं। नागचंद्रेश्वर उसी कथा-परिवार का है। अंतर यह है कि इस कथा के पास अब भी ताला और कुंजी है, और कुंजी वर्ष में एक बार ही लगती है।
रहस्य इसलिए जीवित रहता है क्योंकि द्वार बंद रहता है। यदि मंदिर प्रतिदिन खुला होता, कथाएँ पतली पड़ जातीं। मौन उन्हें पोषण देता है। मौन नवीनतम कथन से पुराना है।
भीड़, देखभाल और आज की जीवंत परंपरा
साधारण प्रातः में भी महाकालेश्वर पहले से लोगों की नदी होता है। नागपंचमी पर वह सागर बन जाता है।
हाल के वर्षों में प्रशासन पूरे परिसर में कई लाख श्रद्धालुओं की तैयारी करता रहा है। विशेष पैदल पुल, अलग प्रवेश और निकास, कैमरे, तथा बड़ी संख्या में पुलिस और कर्मचारी तैनात किए जाते हैं। तीसरी मंजिल की चढ़ाई संकरी है। मंदिर छोटा है। कतार दर्शन जितनी ही तीर्थ है।
नागचंद्रेश्वर में प्रवेश निःशुल्क है। सामान्य प्रथा में ऐसा विशेष सशुल्क मार्ग नहीं होता जिससे संपन्न व्यक्ति प्रतीक्षा छोड़ सके। यह बात मायने रखती है। एक दिन परिसर का सबसे दुर्लभ मंदिर हर भक्त को समान मानता है। रेल से आया व्यक्ति और वाहन से आया व्यक्ति एक ही पंक्ति में खड़े होते हैं।
दिन सदा सरल नहीं होता। श्रावण में वर्षा सामान्य है। बौछारों के बीच गर्मी तीखी हो सकती है। प्रतीक्षा कई घंटे चल सकती है। जिन वर्षों में नागपंचमी श्रावण के सोमवार से मिल जाती है, भीड़ और बढ़ती है, क्योंकि महाकाल की तीसरी सवारी और नाग मंदिर का खुलना एक साथ आते हैं। तब नगर एक साथ श्रद्धा की दो बड़ी यात्राएँ संभालता है।
देखभाल अब परंपरा का हिस्सा बन गई है। मंदिर प्रबंधक, जिला प्रशासन और अखाड़े अब खुलने को केवल विधि नहीं, पूरा नागरिक आयोजन भी मानते हैं। बैरिकेड, जल, चिकित्सा चौकियाँ और एकतरफा आवागमन मंत्र जितने ही आवश्यक हैं। जीवित परंपरा को उन शरीरों की रक्षा करनी होती है जो अपनी आत्मा की रक्षा के लिए आए हैं।
शेष वर्ष मंदिर भूला नहीं रहता। वह केवल प्रदर्शित नहीं होता। पुजारी उसकी बात करते हैं। उज्जैन के बच्चे यह जानते हुए बड़े होते हैं कि “ऊपर वाला मंदिर” श्रावण में खुलेगा। परिसर के निकट दुकानदार पंचांग देखते हैं। अन्य राज्यों के परिवार तिथि अंकित करते हैं और यात्रा के लिए बचाने लगते हैं। बंद मंदिर का सार्वजनिक जीवन तब भी चलता है जब उसके द्वार बंद हों।
पुरानी प्रतिज्ञा आधुनिक नगर में इसी तरह बचती है। वह अनुष्ठान से बचती है, भीड़ प्रबंधन से बचती है, स्मृति से बचती है, और इस साधारण तथ्य से बचती है कि लोग अब भी वह देखना चाहते हैं जो उन्हें प्रतिदिन नहीं देखने दिया जाता।
परंपरा जीवित है क्योंकि उसकी अभी भी कोई कीमत है। कीमत एक वर्ष की प्रतीक्षा है। कीमत बिना नींद की रात है। कीमत कतार का धैर्य है। अंत में जो मिलता है वह क्षणिक है। पूरे हृदय से आने वालों के लिए क्षणिक पर्याप्त है।
भूमजा शैली के उदाहरण
भूमजा शैली परमार काल की सबसे विशिष्ट देन है। यह नागर मंदिर शैली का एक सुंदर और जटिल रूप है। शिखर तारे के आकार का बनता है। उस पर छोटी-छोटी मंदिर जैसी आकृतियाँ पंक्तियों में सजी रहती हैं। यह शैली मालवा में जन्मी और बाद में आसपास के क्षेत्रों में फैल गई।
सबसे उत्कृष्ट और सुरक्षित उदाहरण उदयेश्वर मंदिर है। यह मध्य प्रदेश के उदयपुर में स्थित है। ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य में परमार राजा उदयादित्य ने इसका निर्माण कराया। शिखर की योजना तारे जैसी है। चार मुख्य भागों में पाँच-पाँच पंक्तियाँ छोटी आकृतियों की बनी हैं। मंदिर का सभा मंडप तीन द्वारों वाला है। दीवारें बारीक नक्काशी से भरी हैं। पूरे परिसर में सात छोटे मंदिर भी हैं। यह भूमजा शैली का आदर्श रूप माना जाता है।
उन्न नामक स्थान पर भी कई भूमजा मंदिरों के अवशेष मिलते हैं। ये मंदिर क्षतिग्रस्त हैं, पर उनकी सुंदरता आज भी झलकती है। नेमावर का सिद्धेश्वर मंदिर बारहवीं शताब्दी का है। यह उदयेश्वर से भी बड़ा है, यद्यपि अनुपात और नक्काशी में उतना संतुलित नहीं माना जाता।
भूमजा शैली केवल मालवा तक सीमित नहीं रही। राजस्थान में मेनाल का महानालेश्वर मंदिर, झालरापाटन का सूर्य मंदिर और बिजोलिया का एंडेश्वर मंदिर इसी शैली के उदाहरण हैं। महाराष्ट्र में अंबरनाथ का मंदिर भी समकालीन प्रभाव दिखाता है।
ये मंदिर हमें याद दिलाते हैं कि परमार काल में कला केवल सजावट नहीं थी। वह भक्ति का विस्तार थी। पत्थर में मंत्र गूँजते थे। शिखर आकाश की ओर उठते थे। छोटी-छोटी आकृतियाँ मानो अनंत मंदिरों की कथा कहती थीं।
नागचंद्रेश्वर मंदिर की परंपरा जब ग्यारहवीं शताब्दी से जुड़ती है, तो भूमजा शैली की यही कलात्मक स्वतंत्रता और गहराई याद आती है। शिव की आराधना पत्थर में उतर आई थी। और वह आराधना आज भी इन उदाहरणों में जीवित है।
भूमजा शैली की विशेषताओं पर चर्चा
भूमजा शैली उत्तर भारतीय नागर वास्तुकला का एक विशिष्ट रूप है। यह मालवा की भूमि में जन्मी और परमार काल में निखरी। इसकी विशेषताएँ इसे अन्य शैलियों से अलग पहचान देती हैं। ये विशेषताएँ केवल तकनीकी नहीं हैं। इनमें भक्ति और सौंदर्य दोनों समाए हैं।
सबसे प्रमुख विशेषता शिखर की योजना है। शिखर तारे के आकार का बनता है। इसे स्टेलेट प्लान कहा जाता है। साधारण नागर शिखर सीधा और सरल लगता है। भूमजा शिखर गतिशील और जटिल दिखाई देता है। दूर से देखने पर लगता है मानो शिखर घूम रहा हो।
शिखर को चार मुख्य भागों में बाँटा जाता है। इन्हें लता कहा जाता है। हर लता पर छोटी-छोटी मंदिर जैसी आकृतियाँ पंक्तियों में सजी होती हैं। ये आकृतियाँ शिखर को परत दर परत ऊपर ले जाती हैं। पाँच या उससे अधिक पंक्तियाँ सामान्य हैं। इससे शिखर में लय पैदा होती है। प्रकाश और छाया का खेल पत्थर original को जीवंत कर देता है।
भूमजा मंदिर प्रायः पंचायतन व्यवस्था में बनते थे। मुख्य मंदिर के चारों ओर छोटे मंदिर होते थे। सभा मंडप विशाल और अलंकृत रहता था। दीवारों और स्तंभों पर देवी-देवताओं, अप्सराओं और पौराणिक दृश्यों की बारीक नक्काशी मिलती है। आभूषण, मुद्राएँ और भाव बड़े ध्यान से उकेरे जाते थे।
यह शैली प्राचीन ग्रंथों में भी वर्णित है। समरांगण सूत्रधार में भूमजा शैली का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि परमार शासक वास्तुकला को केवल निर्माण नहीं मानते थे। वे उसे शास्त्र और साधना दोनों मानते थे।
भूमजा शैली की सबसे बड़ी विशेषता उसकी ऊर्ध्वमुखी गति है। आँख शिखर की ओर उठती है। मन कैलास की ओर जाता है। छोटी आकृतियाँ अनंत मंदिरों की कथा कहती हैं। जटिलता में भी संतुलन बना रहता है। यही कारण है कि उदयेश्वर जैसे मंदिर आज भी भक्तों और कला प्रेमियों दोनों को आकर्षित करते हैं।
भूमजा शैली हमें याद दिलाती है कि पत्थर में भी प्रार्थना बस सकती है। जब शिल्पी के हाथ में श्रद्धा हो, तो वास्तुकला केवल दीवार नहीं बनती। वह आकाश की ओर उठती हुई एक जीवित आराधना बन जाती है।
परमार काल की वास्तुकला
परमार काल मालवा की वास्तुकला का एक स्वर्ण युग था। दसवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच इस वंश ने मंदिर निर्माण को नई ऊँचाई दी। राजा भोज का शासन विशेष रूप से याद किया जाता है। वे न केवल विजेता थे। वे कला और शास्त्र के ज्ञाता भी थे। उनके काल में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं रहे। वे भक्ति, शिल्प और ज्ञान के केंद्र बन गए।
परमार वास्तुकला की सबसे बड़ी देन भूमजा शैली है। यह नागर मंदिर शैली का एक विशिष्ट रूप है। शिखर तारे के आकार का बनता है। उस पर छोटी-छोटी मंदिर जैसी आकृतियाँ पंक्तियों में सजी होती हैं। उदयेश्वर मंदिर इस शैली का सर्वोत्तम उदाहरण है। उन्न, नेमावर और अन्य स्थानों पर भी इस शैली के मंदिर और अवशेष मिलते हैं।
परमार मंदिर प्रायः पंचायतन व्यवस्था में बनते थे। मुख्य मंदिर के चारों ओर छोटे मंदिर होते थे। सभा मंडप विशाल और अलंकृत रहता था। दीवारों पर देवी-देवताओं, अप्सराओं और पौराणिक दृश्यों की बारीक नक्काशी मिलती है। स्तंभों पर भी कला का पूरा ध्यान रखा जाता था। बलुआ पत्थर का अधिक उपयोग होता था। शिल्पी हाथों की मुद्रा, वस्त्र की सिलवटें और मुख की शांत अभिव्यक्ति पर विशेष ध्यान देते थे।
इस काल के शासक मुख्य रूप से शैव थे। इसलिए शिव मंदिरों की संख्या अधिक रही। पार्वती, गणेश, नंदी और अन्य रूप भी कुशलता से उकेरे गए। कुछ स्थानों पर विष्णु और जैन मंदिर भी बने। कला में सहिष्णुता और विस्तार दोनों दिखते हैं।
राजा भोज ने स्वयं स्थापत्य पर ध्यान दिया। समरांगण सूत्रधार जैसी रचनाएँ इस युग की समझ को दर्शाती हैं। मंदिर निर्माण केवल राजकीय गौरव नहीं था। वह साधना थी। शिखर आकाश की ओर उठते थे। छोटी आकृतियाँ अनंत लोकों की याद दिलाती थीं। भक्त जब मंदिर के सामने खड़ा होता था, तो उसकी दृष्टि स्वाभाविक रूप से ऊपर जाती थी।
परमार काल की वास्तुकला हमें याद दिलाती है कि पत्थर में भी प्रार्थना बस सकती है। जब शासक के हृदय में श्रद्धा हो और शिल्पी के हाथ में कुशलता, तो मंदिर काल को पार कर जाता है। उज्जैन से लेकर उदयपुर तक फैली यह परंपरा आज भी जीवित है। भूमजा शिखर आज भी आकाश को छूने का प्रयास करते हैं। और भक्त आज भी उनके सामने खड़े होकर उसी प्राचीन श्रद्धा को महसूस करते हैं।
अंतिम चिंतन – जो बंद रहता है उसकी शक्ति
आज का समय खुले द्वार और तुरंत उपलब्ध होने वाली चीजों से भरा है।
मंदिर अपनी आरती प्रसारित करते हैं। दर्शन माँग पर चाहिए। हर छवि का चित्र खिंच जाता है। हर रहस्य से शीघ्र उत्तर माँगा जाता है। इस हड़बड़ी के सामने नागचंद्रेश्वर मंदिर एक शांत शिक्षक की तरह खड़ा है।
वह बताता है कि कुछ कक्ष तब अधिक अपने होते हैं जब उनमें प्रवेश नहीं होता। वह बताता है कि आशीष वर्षा की तरह मौसम में एक बार आ सकता है। वह बताता है कि देवता भक्त का सम्मान निरंतर प्रदर्शन से नहीं, मौन देकर भी कर सकते हैं।
इस मंदिर का बंद द्वार खालीपन नहीं है। वह देखभाल का एक रूप है। वर्ष के अधिकांश समय रूप अनुपस्थिति का है। एक रात रूप उपस्थिति का है। दोनों ही आराधना हैं।
तक्षक को फिर याद कीजिए। महान बल वाला प्राणी और बल नहीं माँगता। वह शिव के पास स्थिर रहने का स्थान माँगता है। व्यस्त उज्जैन नगर आज भी उस अनुरोध को संजोए रखता है। ऐसा करके वह एक दुर्लभ सत्य बचाता है। दूसरे को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान निरंतर प्रवेश नहीं, सम्मानित विश्राम है।
जब मध्यरात्रि को द्वार बंद होते हैं, तो कोई आवश्यक वस्तु नहीं खोती। प्रतिमा वहीं रहती है। वचन वहीं रहता है। नदी घाटों के पास बहती रहती है। यदि पुरानी मान्यता सत्य है, तो बंद कक्ष में नागराज अपनी लंबी प्रार्थना में लौट जाते हैं। हम अपने दिनों में लौटते हैं, एक ऐसी स्मृति लेकर जो पूरे वर्ष चलनी है।
इस लय में एक गहरी शांति है।
हर पवित्र वस्तु के वास्तविक होने के लिए उपलब्ध होना जरूरी नहीं। कुछ पवित्र वस्तुएँ इसलिए वास्तविक रहती हैं क्योंकि वे पीछे हटती हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर सदियों से पीछे हटा है। उसी पीछे हटने के कारण वह भारतीय हृदय में आज भी जीवित है।
तीन सौ चौंसठ दिन सोने वाला मंदिर जागते संसार को एक सरल पाठ पढ़ाता है।
जो बंद रहता है, वह भी आशीष दे सकता है। जो वर्ष में एक बार दिखाई देता है, वह भी प्रतिदिन प्रिय हो सकता है। और जो द्वार ताला लगाए रहता है, वह अपने शांत ढंग से मन में खुला भी रह सकता है।
उज्जैन में, ज्योतिर्लिंग के ऊपर, वह द्वार अपनी रखवाली करता है। एक रात वह फिर खुलेगा।
तब तक मौन ही दर्शन है।
