देश का सबसे ज्यादा टैक्स भरने वाले हिन्दुओं की झोली खाली और CM विजय ने मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा कर दी बिल्कुल फ्री, आखिर अपने ही देश में बहुसंख्यकों के साथ ये कैसा न्याय

इस देश के मिडिल-क्लास टैक्सपेयर की जिंदगी भी बड़ी अजीब है। सुबह उठकर जिस मंजन से वो दांत घिसता है, उस पर जीएसटी (GST)।

स्कूटर में जो पेट्रोल डलवाता है, उस पर भारी टैक्स। और महीने के आखिर में जब सैलरी हाथ में आती है, तो सरकार पहले ही अपना ‘इनकम टैक्स’ का हिस्सा काट चुकी होती है।

आम करदाता, जो इस देश में बहुसंख्यक हिन्दू समाज से आता है, वो कोल्हू के बैल की तरह बस पिस रहा है। उसे लगता है की चलो, मेरी खून-पसीने की कमाई से देश की सड़कें बनेंगी, इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा, अस्पताल बनेंगे।

लेकिन तभी कोई नेता आता है और सेक्युलरिज्म का झंडा गाड़ते हुए उसके टैक्स के पैसों को मजहब के तराजू पर तौल देता है।

कोल्हू के बैल की तरह टैक्स भरता है बहुसंख्यक हिन्दू समाज, और CM विजय ने उसी खजाने से कर दी मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा बिल्कुल फ्री

तमिलनाडु में अभी-अभी बिल्कुल यही खेल हुआ है। ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के मुखिया सी. जोसेफ विजय (जिन्हें लोग थलापति विजय कहते हैं) हाल ही में चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं।

जनता ने सोचा था की कोई नया विजन मिलेगा, कुछ बदलाव आएगा। लेकिन कुर्सी मिलते ही विजय बाबू ने भी उसी पुरानी और जंग लगी हुई ‘तुष्टिकरण’ की स्क्रिप्ट को पढ़ना शुरू कर दिया, जो दशकों से वहां की डीएमके (DMK) सरकारें पढ़ती आ रही थीं।

अगस्त 2026 के आखिरी हफ्ते की बात है। तमिलनाडु विधानसभा में विजय सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ए.एम. शाहजहां खड़े होते हैं और एक ऐसा ‘सेक्युलर बम’ फोड़ते हैं, जिसने हर ईमानदार टैक्सपेयर को सन्न कर दिया।

भरे सदन में ऐलान हुआ की सरकारी कोटे से अंडर-ग्रेजुएट (UG) कोर्सेज में एडमिशन लेने वाली सभी ‘मुस्लिम लड़कियों’ की 100% ट्यूशन फीस (100% College Fees) अब सरकार भरेगी।

मतलब, आपकी गाढ़ी कमाई अब सीधे-सीधे धर्म देखकर बांटी जाएगी!

इंजीनियरिंग से लेकर डॉक्टरी तक सब कुछ मुफ्त, तुष्टिकरण के इस नए सरकारी मेन्यू में हिन्दू टैक्सपेयर के लिए बची है सिर्फ खाली थाली

अब ज़रा इस ‘सरकारी दरियादिली’ का पूरा चीरफाड़ करते हैं। आपको क्या लग रहा है, ये कोई पांच सौ या हज़ार रुपये महीने वाली स्कूल की छोटी-मोटी स्कॉलरशिप है?

जी नहीं! सरकार ने बाकायदा लिस्ट जारी की है कि ये 100 प्रतिशत फीस माफी इंजीनियरिंग (B.Tech), मेडिकल (MBBS), एग्रीकल्चर, आर्ट्स, साइंस और लॉ (LLB) जैसे भारी-भरकम और महंगे प्रोफेशनल कोर्सेज पर लागू होगी।

अब एक बार ज़मीनी हकीकत पर आइए। एक आम हिन्दू बाप की हालत सोचिए। जब उसका बेटा या बेटी किसी कॉलेज से B.Tech या MBBS करने जाते हैं, तो क्या होता है?

पिताजी अपनी जीवन भर की सेविंग, पीएफ (PF) या बैंक की एफडी (FD) तुड़वाते हैं। अगर फिर भी पैसे कम पड़ जाएं, तो बैंकों के धक्के खाकर 10 से 12 प्रतिशत के भारी ब्याज पर ‘एजुकेशन लोन’ (Education Loan) लेते हैं।

सालों तक वो बाप और उसका बच्चा उस लोन की EMI के बोझ तले दबे रहते हैं।

और उधर सरकार क्या कर रही है? उसी बाप से टैक्स का पैसा वसूलती है, और उसी के मोहल्ले में रहने वाली एक दूसरी लड़की की पूरी मेडिकल और इंजीनियरिंग की फीस अपने माथे ले लेती है… सिर्फ इसलिए, क्योंकि वो लड़की एक विशेष ‘मुस्लिम समुदाय’ से आती है!

इस मुफ्तखोरी का अर्थशास्त्र देखिए। सरकार ने तुरंत इसके लिए 20 करोड़ रुपये का शुरुआती फंड भी जारी कर दिया है।

लेकिन हकीकत में ये 20 करोड़ तो महज़ एक झांकी है दोस्त। ज़रा हिसाब लगाइए, जब इंजीनियरिंग और डॉक्टरी जैसे महंगे कोर्सेज में इस योजना के तहत हज़ारों एडमिशन होंगे, तो यह आंकड़ा हर साल बढ़कर सैकड़ों करोड़ में जाएगा।

और इसका सीधा बोझ किस पर पड़ेगा? जी हाँ, उसी मिडिल-क्लास हिन्दू टैक्सपेयर पर, जिसे सरकार ने सिर्फ एक एटीएम (ATM) मशीन समझ लिया है।

सवाल ये नहीं है की आप किसी बच्ची को पढ़ा रहे हैं। शिक्षा तो सबको मिलनी चाहिए, अच्छी बात है।

लेकिन क्या बहुसंख्यक समाज की बेटियां इंजीनियरिंग या डॉक्टरी नहीं पढ़ना चाहतीं? क्या उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति खराब नहीं होती?

तुष्टिकरण के इस नए सरकारी मेन्यू में सब कुछ एक खास वर्ग के लिए परोस दिया गया है, और जो टैक्स चुका रहा है, उसके हाथ में पकड़ा दी गई है सिर्फ एक खाली थाली।

तमिलनाडु पर 13 लाख करोड़ का भारी कर्ज और वक्फ बोर्ड पर लुटाए जा रहे हैं 100 करोड़ रुपये, सेक्युलरिज्म के नाम पर चल रहा अर्थशास्त्र का अनोखा मजाक

अब ज़रा तमिलनाडु सरकार के उस अर्थशास्त्र का सच देख लेते हैं, जिसे देखकर दुनिया का कोई भी अर्थशास्त्री अपना सिर पीट ले।

जब कोई राज्य सरकार ऐसे खैरात बांटती है, तो आम आदमी को लगता है की शायद खजाने में पैसा छलक रहा होगा।

लेकिन हकीकत क्या है? स्टेट फाइनेंस के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक, तमिलनाडु सरकार पर इस वक्त लगभग 13.18 लाख करोड़ रुपये का भयंकर कर्ज (State Debt) चढ़ा हुआ है!

राज्य का बिजली विभाग (TNPDCL/TANGEDCO) हर महीने करोड़ों के भयंकर घाटे में चल रहा है। राज्य में बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के लिए पैसे कम पड़ रहे हैं।

लेकिन, जब बात ‘अल्पसंख्यक कल्याण’ की आती है, तो ये कर्ज में डूबी सरकार अचानक अरबपति बन जाती है।

मुस्लिम वक्फ और ईसाई संस्थाओं को अपनी संपत्तियां विकसित करने के लिए सरकार ने 100 करोड़ रुपये का एक ‘रिवॉल्विंग फंड’ (ब्याज मुक्त लोन) बना दिया है।

इसके तहत वक्फ की ज़मीनों पर मैरिज हॉल और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाए जाएंगे।

अब एक सीधा सा तार्किक सवाल पूछिए- वक्फ बोर्ड अपनी ज़मीनों पर कमर्शियल बिल्डिंग बनाकर जो किराया या मुनाफा कमाएगा, वो मुनाफा तो वक्फ के ही पास जाएगा ना?

तो फिर उसके निर्माण के लिए जनता का, यानी हिन्दू टैक्सपेयर का पैसा क्यों लुटाया जा रहा है? Public Money से किसी प्राइवेट धार्मिक संस्था का प्रॉफिट क्यों बढ़ाया जा रहा है?

खैरात बांटने की लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती। वक्फ बोर्ड की स्कॉलरशिप का दायरा बढ़ाकर कक्षा 9 और 10 की 41,384 मुस्लिम छात्राओं के लिए अलग से 8.28 करोड़ रुपये का फंड जारी किया गया है।

और तो और, चेन्नई में सिर्फ और सिर्फ ‘अल्पसंख्यक महिलाओं’ के लिए 2.45 करोड़ रुपये से एक अलग कॉलेज खोला जा रहा है। मतलब कर्ज लेकर घी पीयो, लेकिन वो घी सिर्फ एक खास मजहब वालों को ही पिलाया जाएगा।

मुस्लिमों के लिए 3.5% का अलग कोटा और हाई एनरोलमेंट रेट के बावजूद ये खैरात क्यों, आंकड़े खोल रहे CM विजय की ‘वोट बैंक’ पॉलिटिक्स की पोल

जब आप सरकार से सवाल पूछेंगे, तो वो आपको तुरंत ‘सच्चर कमेटी’ की रिपोर्ट और मुस्लिमों के पिछड़ेपन का पुराना ज्ञान देने लगेंगे।

लेकिन आइए ज़रा ग्राउंड फैक्ट्स और इतिहास के आइने में CM विजय की इस ‘वोट बैंक’ पॉलिटिक्स की पोल खोलते हैं।

क्या आपको पता है की तमिलनाडु में पहले से ही मुस्लिमों के लिए ‘बैकवर्ड क्लास मुस्लिम्स’ (BCM) के नाम पर 3.5 प्रतिशत का अलग से एक्सक्लूसिव रिज़र्वेशन (सीटों में आरक्षण) लागू है?

जी हाँ! मतलब, कॉलेज की सीटों पर पहले ही आरक्षण के जरिए कब्जा पक्का है। अब उस आरक्षण वाली सीट पर 100 प्रतिशत फीस माफी का यह ‘डबल फायदा’ भी दे दिया गया।

अगर शिक्षा मंत्रालय के GER (Gross Enrolment Ratio) के आंकड़े देखें, तो हायर एजुकेशन में जाने वाले युवाओं के मामले में तमिलनाडु का रिकॉर्ड पूरे भारत में सबसे बेहतरीन (लगभग 47% से ऊपर) है।

यहां के सभी वर्गों (हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई) की हायर एजुकेशन में अच्छी खासी पहुँच है। तो फिर अचानक ये फीस माफ़ करने की ज़रूरत क्यों आ पड़ी?

सीधा सा जवाब है- यह शिक्षा का कोई मॉडल नहीं है, यह विशुद्ध रूप से एक ‘इलेक्शन मॉडल’ है। यह DMK के फिक्स वोट बैंक को तोड़कर अपनी नई पार्टी (TVK) की झोली में डालने की एक सोची-समझी राजनीतिक चाल है।

गरीबी का कोई धर्म नहीं होता। आज तमिलनाडु में लाखों OBC, SC, ST और सामान्य वर्ग के हिन्दू परिवार ऐसे हैं जो गरीबी रेखा के नीचे (BPL) जी रहे हैं।

लेकिन याद कीजिए, यही क्षेत्रीय पार्टियां EWS (आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग) कोटे का तो पुरज़ोर विरोध करती हैं। वहां इन्हें ‘सामाजिक न्याय’ याद आ जाता है।

लेकिन जब बात मुस्लिम वोट बैंक की आती है, तो बिना कोई आर्थिक पैमाना देखे सीधे 100 प्रतिशत फीस माफ़ कर दी जाती है।

क्या एक गरीब हिन्दू परिवार की बच्ची सिर्फ इसलिए फ्री शिक्षा की हक़दार नहीं है क्योंकि उसके घर में पूजा होती है?

अगर टैक्स सबका है तो योजनाएं मजहबी क्यों, CM विजय के इस फैसले से आहत हिन्दु करदाता अब अपने ही देश में न्याय मांगने आखिर कहां जाए

अब बात करते हैं उस किताब की, जिसकी कसमें खाकर ये नेता विधानसभाओं में बैठते हैं- यानी हमारा संविधान। भारत का संविधान (Article 14) इस देश के हर नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ (Right to Equality) देता है।

लेकिन जब सरकारी नीतियां बनती हैं, तो ये समानता अचानक कहीं गायब क्यों हो जाती है?

कल्पना कीजिए की अगर आज किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने सिर्फ ‘हिन्दू लड़कियों’ की 100 प्रतिशत कॉलेज फीस माफ करने का ऐलान किया होता, तो क्या होता?

भाईसाहब, अब तक पूरे देश में आसमान सिर पर उठा लिया गया होता!

लेकिन आज, जब बहुसंख्यक हिन्दू समाज की बेटियों को सरेआम दरकिनार करके सिर्फ एक धर्म विशेष की लड़कियों को फ्री शिक्षा बांटी जा रही है, तो इस पूरे ‘सेक्युलर ईकोसिस्टम’ के मुंह में दही जमा हुआ है।

किसी की जुबान से एक शब्द नहीं निकल रहा है। यह सन्नाटा ही भारत के सेक्युलरिज्म का सबसे घिनौना और असली चेहरा है।

किसी भी सच्चे लोकतंत्र में सरकारें राज्य की जनता के लिए ‘माँ-बाप’ के समान होती हैं। और इस दुनिया का सबसे बड़ा सच यही है की कोई भी सच्ची माँ अपने बच्चों के मुंह में निवाला डालने से पहले उनका ‘मजहब’ नहीं पूछती।

अगर सरकार को मदद करनी ही है, तो आर्थिक रूप से कमज़ोर हर उस घर तक मदद पहुंचनी चाहिए, जिसे उसकी ज़रूरत है- चाहे उस घर में पूजा होती हो या नमाज़।

लेकिन गरीबी के नाम पर धर्म का चश्मा पहनकर बहुसंख्यकों का हक़ मारना ना तो सामाजिक न्याय है और ना ही सेक्युलरिज्म। ये सिर्फ और सिर्फ तुष्टिकरण का वो खेल है, जिसका लोकतांत्रिक जवाब ये खामोश टैक्सपेयर एक न एक दिन ज़रूर देगा।

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