जब किसी गरीब के घर में कोई भयानक बीमारी दस्तक देती है ना, तो वो बीमारी दरवाज़े पर खड़ा होकर उस परिवार का बैंक बैलेंस या जाति का सर्टिफिकेट नहीं मांगती।
बीमारी तो बस चुपचाप घुस जाती है शरीर में, और अपने साथ लाती है बर्बादी का वो खौफनाक सैलाब जिसमें इंसान की झोपड़ी से लेकर घर के बर्तन, बीवी के गहने और पुश्तैनी ज़मीन तक… सब कुछ बह जाता है।
मौत की चौखट पर खड़ा इंसान बस एक ही चीज़ मांगता है-सांसें!
अभी हाल ही की बात है, अगस्त 2026 में केंद्र सरकार के ‘सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय’ ने एक बड़ा फैसला लिया।
यह फैसला ‘डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन’ की तरफ से SC/ST परिवारों के लिए चलाई जा रही ‘डॉ. अंबेडकर मेडिकल एड स्कीम’ को लेकर था।
अब 5 लाख सालाना कमाने वाले SC/ST परिवारों को भी सरकार की संजीवनी, और गरीब OBC परिवार अभी भी खाली हाथ
सरकार ने एक झटके में इस जीवन रक्षक योजना की आय सीमा 3 लाख से बढ़ाकर सीधे 5 लाख रुपये सालाना कर दी।
यानी अब अगर कोई SC/ST परिवार साल का 5 लाख रुपये भी कमाता है, तो उसे कैंसर या हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए सरकार से लाखों रुपये की सीधी मदद मिलेगी।
और इतना ही नहीं, गंभीर बिमारियों में दी जाने वाली राशि भी बढ़ा दी गयी है।
दिल से कहूं तो यह बहुत अच्छी बात है। एक गरीब परिवार की जान बच रही है, कोई मां अपने बेटे को खोने से बच रही है, इसका तो पूरे दिल से स्वागत होना चाहिए।
लेकिन यहीं से एक ऐसा सवाल जन्म लेता है जो सीधे कलेजे को चीर देता है। सवाल ये है की जब 5 लाख कमाने वाले एक SC/ST परिवार को सरकार के खज़ाने से यह संजीवनी मिल सकती है, तो ठीक उसी गली में रहने वाले, उसी 5 लाख की आय वाले गरीब ओबीसी (OBC) परिवार को मरने के लिए लावारिस क्यों छोड़ दिया गया है?
ज़रा सोचिए, क्या एक लोहार, कुम्हार, बढ़ई, नाई या छोटे से खेत में दिन-रात मिट्टी फांकने वाला किसान कोई टाटा-बिड़ला है?
जब उसकी आमदनी बराबर है, जब उसकी बेबसी और गरीबी बराबर है, तो फिर मदद बांटते वक़्त ये ओबीसी समाज अचानक से सरकार की नज़रों में ‘अमीर’ कैसे हो जाता है?
SC/ST के लिए डेढ़ लाख से लेकर 3 लाख तक की नकद मदद, लेकिन OBC के गरीब मरीज की झोली बिल्कुल खाली क्यों
ज़रा इस सरकारी योजना का पूरा पोस्टमार्टम करके देखते हैं, तब समझ में आएगाकी परिवारों के साथ कितनी बड़ी नाइंसाफी हो रही है।
ये ‘डॉ. अंबेडकर मेडिकल एड स्कीम’ कोई छोटी-मोटी स्कीम नहीं है, बल्कि ये सच में मौत के मुंह से इंसान को खींच लाने वाला ब्रह्मास्त्र है।
इसका पैसा किसी राज्य सरकार के लचर फंड से नहीं, बल्कि सीधे केंद्र सरकार के खज़ाने से निकलकर सीधा अस्पताल के खाते में जाता है ताकि इलाज में कोई रुकावट न आए।
अब ज़रा उन पैसों के सटीक आंकड़ों पर नज़र डालिए जो अगस्त 2026 के नए नियमों के तहत इन गंभीर बीमारियों के लिए तय किए गए हैं
सबसे पहले बात करते हैं किडनी फेलियर की। इस योजना के तहत किडनी ट्रांसप्लांट या किसी भी ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए सीधे 3.50 लाख रुपये दिए जाते हैं।
आपने कभी किसी किडनी के मरीज़ का दर्द देखा है? डायलिसिस मशीन के चक्कर काटते-काटते पूरे परिवार की चप्पलें घिस जाती हैं, खून पानी हो जाता है और घर में खाने को दाना नहीं बचता।
ऐसे में साढ़े तीन लाख की मदद किसी भगवान के वरदान से कम नहीं है।
कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के लिए, जिसमें सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी शामिल हैं, सरकार पहले 1.75 लाख रुपए देती थी।
लेकिन अब उस राशि को बढ़ा कर 2.50 लाख रुपये कर दिया गया है। कैंसर का एक-एक इंजेक्शन हज़ारों का आता है भाई, जिसे एक गरीब आदमी सपने में भी नहीं खरीद सकता।
इसी तरह ब्रेन सर्जरी के लिए पहले 1.50 लाख रुपए दिए जाते थे, जो अब 2 लाख रुपये हो गए हैं।
और हार्ट या स्पाइनल (रीढ़ की हड्डी) सर्जरी के लिए दी जाने वाली राशि भी बढ़ा कर 1.50 लाख रुपये कर दी गयी है।
दूसरी गंभीर बिमारियों के लिए दी जाने वाली रकम तो सीधा 1 लाख से बढ़ा कर 2 लाख रुपये हो गयी है।
अब ज़रा इस पूरे डेटा को एक ओबीसी परिवार के नज़रिए से देखिए। कल्पना कीजिए की एक 5 लाख कमाने वाले ओबीसी परिवार का बूढ़ा बाप या जवान बेटा कैंसर से तड़प रहा है।
वो परिवार भी तो उसी महंगाई, उसी बेबसी और उसी लचर सिस्टम का मारा हुआ है ना?
लेकिन जब वो ओबीसी मरीज़ अस्पताल के बिलखते हुए काउंटर पर जाकर खड़ा होता है और डॉक्टर उसे कीमोथेरेपी या हार्ट सर्जरी के लिए ढ़ाई लाख का एस्टीमेट थमाता है, तो वो इंसान टूट कर बिखर जाता है।
वो रोते हुए पूछता है की क्या मेरे लिए कोई योजना है? तो उसे दो टूक जवाब मिलता है की “नहीं, नकद मदद वाली ये योजना सिर्फ SC/ST वर्ग के लिए है, तुम्हारी जाति इस लिस्ट में नहीं आती।”
ज़रा सोचिए उस बाप पर क्या बीतती होगी जो उस दिन पैसों के इंतज़ाम के लिए अपनी ज़मीन औने-पौने दामों में बेच देता है, अपनी बीवी के गहने गिरवी रख देता है, और गांव के साहूकार के आगे हाथ फैलाता है।
बीमारी ने तो इंसानियत देखकर हमला किया था, लेकिन हमारे सिस्टम ने इलाज को भी जातियों में बांट दिया।
एक ही देश में, एक ही जैसी चरमराती गरीबी में, महज़ जाति का ठप्पा अलग होने की वजह से इलाज बांटने का यह दोगलापन आखिर कब तक चलेगा?
जब कैंसर किसी OBC के खून में घुसता है तो क्या वो अपना असर कम कर देता है? बिल्कुल नहीं! तो फिर जीवन रक्षक योजनाएं बनाते वक़्त सरकार OBC की खाली झोली देखकर अपना मुंह क्यों फेर लेती है?
2600 जातियों वाला पिछड़ा OBC समाज क्या कैंसर और हार्ट अटैक जैसी गंभीर बिमारियों से पूरी तरह सुरक्षित है?
जब हम OBC यानी अन्य पिछड़ा वर्ग का नाम लेते हैं, तो दिल्ली में बैठे पॉलिसी मेकर्स को लगता है की ये शायद कुछ गिने-चुने ज़मींदार या अमीर लोग होंगे।
लेकिन भाई, हकीकत तो ये है की मंडल कमीशन और रोहिणी आयोग के आंकड़े चीख-चीख कर बताते हैं की ओबीसी कोई एक-दो जातियों का गुट नहीं है।
केंद्रीय सूची में इसमें पूरे देश की 2600 से भी ज़्यादा जातियां शामिल हैं। ये जातियां हमारे देश की आबादी का 50 प्रतिशत से भी ज़्यादा हिस्सा हैं।
अब ज़रा इन 2600 जातियों के असली चेहरों को देखिए। ये महलों में रहने वाले लोग नहीं हैं यार। ये वो लोग हैं जो सदियों से हाड़-तोड़ मेहनत कर रहे हैं।
इनमें वो कुम्हार शामिल है जो चिलचिलाती धूप में मिट्टी गूंथता है, वो लोहार है जो भट्टी की आग में खुद को तपाता है, वो बढ़ई है, नाई है, धोबी है, गड़ेरिया है और वो छोटा किसान है जिसकी पूरी ज़िंदगी कर्ज़े की किश्तें चुकाने में निकल जाती है।
ये वो बहुजन आबादी है जिनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी दो वक़्त की रोटी जुटाने और बच्चों की स्कूल फीस भरने में ही खप जाती है।
अब सिस्टम से एक बहुत सीधा सा सवाल पूछने का मन करता है। क्या सरकार को ऐसा लगता है की इन 2600 जातियों के लोगों ने कोई अमर होने का ‘अमृत’ पी रखा है?
क्या इनके कच्चे घरों में कभी कैंसर नहीं घुसता? क्या इनके बूढ़े मां-बाप को हार्ट अटैक नहीं आते?
ओबीसी समाज की एक बहुत बड़ी आबादी कपड़ा बुनने, सिलाई करने और पावरलूम कारखानों में काम करती है। दिन-रात सूत, धागों और कपड़े की धूल के बीच सांस लेने की वजह से इनके फेफड़ों में फाइबर जम जाता है।
सबसे ज़्यादा टीबी (TB), अस्थमा और फेफड़ों का कैंसर इन्ही बुनकर और दर्जी समाज के लोगों को होता है। क्या सरकार इनकी मदद को आती है?
हमारे देश के छोटे किसान और खेतों में काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों का एक बहुत बड़ा हिस्सा ओबीसी जातियों से आता है।
पंजाब, हरियाणा, बिहार और महाराष्ट्र के खेतों में दिन-रात ज़हरीले कीटनाशक (Pesticides) और यूरिया छिड़कने की वजह से आज ये किसान कैंसर जैसी खौफनाक बीमारी का शिकार हो रहे हैं।
भटिंडा से बीकानेर जाने वाली ट्रेन को तो लोग ‘कैंसर ट्रेन’ ही कहने लगे हैं, जिसमें सफर करने वाले ज़्यादातर लोग इन्ही पिछड़े और किसान परिवारों के होते हैं।
सोचिए दोस्त, ये वो लोग हैं जो अपना खून-पसीना बहाकर इस देश की अर्थव्यवस्था का पहिया चला रहे हैं। लेकिन जब यही ओबीसी कारीगर या किसान अपने पेशे की वजह से बीमार पड़कर अस्पताल पहुंचता है, तो उसके पास क्या होता है?
ना तो किसी प्राइवेट कंपनी का महंगा हेल्थ इंश्योरेंस और ना ही सरकार की तरफ से ‘डॉ. अंबेडकर मेडिकल एड’ जैसी कोई जीवन रक्षक योजना!
वो बस अपनी बीमारी, अपनी किस्मत और सिस्टम को कोसते हुए घुट-घुट कर मरने को मज़बूर हो जाता है।
