सुश्रुत और भास्कराचार्य की खोज को यूरोप ने बताया अपना 'आविष्कार', हमारे वेदों के विज्ञान को चुराकर दुनिया को बेवकूफ बनाते गोरे वैज्ञानिक

सुश्रुत और भास्कराचार्य की खोज को यूरोप ने बताया अपना ‘आविष्कार’, हमारे वेदों के विज्ञान को चुराकर दुनिया को बेवकूफ बनाते गोरे वैज्ञानिक

हमारी किताबों में भर-भर कर ये पढ़ाया गया की दुनिया की सारी महान खोजें, सारा विज्ञान और सारी तकनीक सिर्फ और सिर्फ यूरोप और अमेरिका से आई है। हमें बताया गया की न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण खोजा, एडिसन ने बल्ब बनाया, राइट ब्रदर्स ने हवाई जहाज़ उड़ाया और हम भारतीय तो बस सपेरों की तरह बीन बजाते रह गए।

इन गोरे अंग्रेज़ों और पश्चिमी देशों ने हमारे साथ जो डकैती की है ना, वो सिर्फ हमारे कोहिनूर हीरे या सोने-चांदी तक सीमित नहीं थी।

इन लुटेरों ने हमारी हज़ारों साल पुरानी बौद्धिक संपदा, हमारे वेदों, उपनिषदों और हमारे ऋषि-मुनियों के उस खजाने पर डाका डाला, जिसके दम पर भारत कभी पूरी दुनिया का शिरोमणि हुआ करता था।

ज़रा सोचिए, जब यूरोप के ये गोरे लोग जंगलों में बिना कपड़ों के जानवरों की तरह घूमते थे, जब इन्हें आग जलाना और ढंग से बोलना तक नहीं आता था, उस वक्त हमारे सनातन धर्म के ऋषि-मुनि धरती पर बैठकर सूरज और चांद के बीच की सटीक दूरी नाप रहे थे। हमारे लोग ब्रेन की सर्जरी कर रहे थे और धातुओं को पिघलाकर हथियार बना रहे थे।

लेकिन जब ये अंग्रेज़ भारत में घुसे, तो इन्होंने बड़ी चालाकी से हमारी उस महान शिक्षा व्यवस्था को तोड़ा। इन्होंने जहाज़ों में भर-भर कर हमारे संस्कृत के अमूल्य ग्रंथों, ताड़पत्रों और प्राचीन पाण्डुलिपियों को लंदन, जर्मनी और यूरोप के दूसरे देशों में भेज दिया।

वहां बैठे इनके चालाक ट्रांसलेटर्स ने हमारे संस्कृत श्लोकों का अनुवाद अपनी भाषा में किया, उस ज्ञान को चुराया और फिर बड़ी बेशर्मी से उसी ज्ञान पर अपना ठप्पा लगाकर खुद को ‘महान वैज्ञानिक’ घोषित कर दिया। आज दुनिया जिन गोरे वैज्ञानिकों की पूजा करती है, वो असल में हमारे ही शास्त्रों की चोरी करके हीरो बने बैठे हैं।

न्यूटन के सेब का वो सफेद झूठ और भास्कराचार्य का असली गुरुत्वाकर्षण, हमारा ही सनातन विज्ञान चुरा कर महान बन गए गोरे

चलिए इस फ्रॉड की शुरुआत दुनिया के उस सबसे बड़े झूठ से करते हैं जिसे आज भी हमारे बच्चों को साइंस की किताबों में रटाया जा रहा है।

न्यूटन और उसके सिर पर गिरने वाला वो सेब! पूरी दुनिया को ये बकवास कहानी सुनाई गई की न्यूटन एक पेड़ के नीचे बैठा था, अचानक उसके सिर पर एक सेब गिरा और उसने ‘गुरुत्वाकर्षण’ (Gravity) की खोज कर ली।

क्या मज़ाक है यार! मतलब सेब के गिरने से पहले क्या दुनिया में चीज़ें हवा में उड़ती थीं? सच तो ये है की आइजैक न्यूटन के पैदा होने से 500 साल पहले ही इस धरती पर गुरुत्वाकर्षण का पूरा और सटीक सिद्धांत लिखा जा चुका था। और वो लिखा था हमारे महान सनातन गणितज्ञ और खगोलशास्त्री भास्कराचार्य जी ने।

12वीं सदी में भास्कराचार्य जी ने अपना एक अमर ग्रंथ लिखा था जिसका नाम था ‘सिद्धांत शिरोमणि’। इस ग्रंथ के ‘लीलावती’ और ‘गोलाध्याय’ वाले हिस्से में उन्होंने डंके की चोट पर वो सूत्र लिख दिया था जिसे अंग्रेज़ आज न्यूटन का लॉ बताते हैं।

भास्कराचार्य जी ने अपने श्लोक में साफ-साफ लिखा था की- “पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकाश में स्थित भारी चीज़ों को अपनी ओर खींचती है।

और जब वो चीज़ें ज़मीन पर गिरती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वो गिर रही हैं, लेकिन ये धरती का खिंचाव है।” इसी खिंचाव को उन्होंने ‘गुरुत्वाकर्षण’ नाम दिया था।

अब आप ही बताइए, जो ज्ञान हमारे ऋषि हज़ारों साल पहले ताड़पत्रों पर लिखकर चले गए, उसे एक सेब के गिरने की फर्जी कहानी बनाकर न्यूटन के नाम पर चिपका देना डकैती नहीं तो और क्या है?

सुश्रुत की प्लास्टिक सर्जरी चुराकर यूरोप ने अपने नाम पर छापा, आयुर्वेद के ज्ञान पर डाका डालने वाले इन लुटेरों का सच

अब ज़रा गणित से निकलकर मेडिकल साइंस (Medical Science) की तरफ आइए। अगर आप किसी भी अंग्रेज डॉक्टर से पूछेंगे की सर्जरी किसने शुरू की, तो वो किसी ना किसी गोरे का नाम ले लेगा।

लेकिन अगर आप आज से 2500 साल पीछे जाएंगे, तो आपको पता चलेगा की जब यूरोप के लोग बीमारियों को भूत-प्रेत का साया समझकर लोगों को ज़िंदा जला देते थे, तब हमारे महर्षि सुश्रुत इंसान के शरीर की चीर-फाड़ करके खौफनाक बीमारियों का सफल ऑपरेशन कर रहे थे।

महर्षि सुश्रुत को यूं ही ‘फादर ऑफ सर्जरी’ नहीं कहा जाता। उन्होंने अपना जो महान ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ लिखा है, उसे पढ़कर आज के मॉडर्न डॉक्टरों का भी दिमाग सुन्न पड़ जाता है। उस ग्रंथ में 300 से ज़्यादा सर्जिकल प्रक्रियाओं (Operations) का बिल्कुल सटीक वर्णन है।

मोतियाबिंद (Cataract) का ऑपरेशन हो, पथरी निकालना हो, या टूटी हुई हड्डियों को जोड़ना हो- सुश्रुत जी ने सब कुछ लिख दिया था। उन्होंने 120 से ज़्यादा ऐसे सर्जिकल उपकरणों (Surgical Instruments) के डिज़ाइन बनाए थे, जो बिल्कुल आज के मॉडर्न स्कैल्पल और चिमटियों जैसे दिखते हैं।

लेकिन इन पश्चिमी लुटेरों ने क्या किया? 18वीं सदी की बात है, जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के गोरे सैनिक भारत में युद्ध लड़ते थे, तो अक्सर तलवारों से उनकी नाक कट जाती थी। तब हमारे भारत के गांव-देहात के वैद्य (आयुर्वेदिक डॉक्टर) उन गोरे सैनिकों की कटी हुई नाक की प्लास्टिक सर्जरी (Rhinoplasty) करते थे और उन्हें एकदम ठीक कर देते थे।

ये देखकर इन अंग्रेज़ों की आंखें फटी रह गईं। 1815 में जोसेफ कॉन्सटेंटाइन कारप्यू (Joseph Constantine Carpue) नाम का एक चालाक गोरा डॉक्टर भारत आया।

उसने हमारे वैद्यों से नाक जोड़ने की वो हज़ारों साल पुरानी सुश्रुत वाली तकनीक सीखी। वो चुपचाप सारा ज्ञान समेट कर यूरोप वापस भाग गया।

वहां जाकर उसने एक मैगज़ीन में वो पूरी प्रक्रिया अपने नाम से छाप दी। और रातों-रात वो शातिर गोरा दुनिया भर में ‘प्लास्टिक सर्जरी का बाप’ बन बैठा!

कितनी नीचता है ना! पहले तो इन गोरों ने हमारे सुश्रुत का सारा ज्ञान चुराया, अपना नाम चमकाया, और फिर अपनी एलोपैथी (Allopathy) दवाइयां बेचने के लिए उसी आयुर्वेद को पिछड़ा, अंधविश्वास और जादू-टोना बताना शुरू कर दिया।

जिस सनातन विज्ञान के दम पर इन गोरों की कटी हुई नाकें जुड़ती थीं, उसी विज्ञान का इन्होंने पूरी दुनिया में सरेआम मज़ाक उड़ाया।

कॉपरनिकस और गैलीलियो से हज़ारों साल पहले आर्यभट्ट ने बता दिया था ब्रह्मांड का सच, विदेशियों की इस चोरी से उठेगा पर्दा

अगर आप आसमान की तरफ देखेंगे, तो ब्रह्मांड के रहस्यों में भी आपको इन गोरों की डकैती के साफ निशान नज़र आएंगे। हमें स्कूल में रटाया गया की दुनिया तो मानती थी की पृथ्वी बीच में है और सूरज उसके चक्कर लगाता है।

फिर एक महान गोरा इंसान आया जिसका नाम था ‘कॉपरनिकस’ और उसने दुनिया को बताया की नहीं भाई, सूरज बीच में है और पृथ्वी उसके चक्कर लगाती है। और फिर गैलीलियो आया जिसने टेलिस्कोप से ये साबित कर दिया।

क्या सच में ऐसा था? अरे इन गोरों से कोई पूछे की जब तुम लोग इस बात पर लड़ रहे थे कि धरती चपटी (Flat) है या गोल, उससे ठीक एक हज़ार साल पहले हमारे भारत की धरती पर आर्यभट्ट नाम का एक ऐसा दिमागी शेर पैदा हो चुका था जिसने ब्रह्मांड का पूरा नक्शा खोल कर रख दिया था।

5वीं सदी में आर्यभट्ट जी ने अपना अमर ग्रंथ ‘आर्यभटीय’ लिखा। कॉपरनिकस के पैदा होने से एक हज़ार साल पहले ही आर्यभट्ट ने डंके की चोट पर लिख दिया था की पृथ्वी गोल है और वो अपनी धुरी (Axis) पर घूमती है, और इसी के घूमने की वजह से दिन और रात होते हैं।

इतना ही नहीं, आर्यभट्ट ने एक साल की लंबाई बिल्कुल सटीक तरीके से 365.25858 दिन बताई थी, जो आज के मॉडर्न सैटलाइट्स के डेटा से बिल्कुल मेल खाती है।

उस ज़माने में जब दुनिया ग्रहण (Eclipse) को शैतानों का हमला या राहु-केतु का प्रकोप मानकर डरती थी, तब आर्यभट्ट ने गणित और खगोल शास्त्र के ज़रिए बिल्कुल सटीक तरीके से बता दिया था की सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण सिर्फ और सिर्फ चांद और पृथ्वी की परछाइयों का खेल है। उन्होंने ग्रहण का समय नापने का बिल्कुल सटीक फॉर्मूला तैयार कर लिया था।

और सबसे बड़ी बात, जिस पाई (π – Pi) की वैल्यू को लेकर आज पूरी दुनिया के गणितज्ञ सीना तानते हैं, उस पाई की चार दशमलव स्थानों तक बिल्कुल सही वैल्यू (3.1416) आर्यभट्ट ने उसी ज़माने में दे दी थी।

लेकिन हमारे इस अथाह और अकल्पनीय सनातन ज्ञान का क्या हुआ? इन शातिर पश्चिमी देशों ने हमारे ज्ञान को संस्कृत से Latin और अरबी में ट्रांसलेट करवाया और उसे अपने वैज्ञानिकों के नाम पर थोप दिया।

आज हमारा ही बच्चा गैलीलियो और कॉपरनिकस की फोटो अपनी किताबों में देखता है और आर्यभट्ट को सिर्फ एक पुरानी कहानी समझ कर भूल जाता है। ये कोई छोटी-मोटी चोरी नहीं है भाई, ये एक पूरी की पूरी सभ्यता की हत्या है।

जॉन डाल्टन और पाइथागोरस के नाम पर दुनिया को मूर्ख बनाते गोरे, महर्षि कणाद और बौधायन के असली ज्ञान की खौफनाक डकैती

अगर आप आज के किसी भी स्कूल जाने वाले बच्चे से पूछेंगे की इस दुनिया में मौजूद हर चीज़ किस चीज़ से बनी है, तो वो तपाक से जवाब देगा की हर चीज़ ‘एटम’ (Atom) यानी परमाणु से बनी है।

और अगर आप पूछेंगे की इस एटम की खोज किसने की थी, तो हमारा वही मासूम बच्चा अपनी साइंस की किताब रटकर गर्व से कहेगा- “जॉन डाल्टन ने!”

अरे भाई, इस जॉन डाल्टन की तो कोई औकात ही नहीं थी! जब ये गोरे लोग साइंस की स्पेलिंग भी ठीक से नहीं जानते थे, उससे पूरे 2500 साल पहले हमारे भारत की पवित्र ज़मीन पर महर्षि कणाद नाम के एक ऋषि पैदा हुए थे।

महर्षि कणाद ने ‘वैशेषिक सूत्र’ नाम का एक ऐसा अमर ग्रंथ लिखा था, जिसे पढ़कर आज के बड़े-बड़े गोरे वैज्ञानिकों का भी दिमाग चकरा जाता है।

कणाद ऋषि ने डंके की चोट पर उस ज़माने में लिख दिया था की इस ब्रह्मांड की हर भौतिक चीज़ एक बहुत ही छोटे, न दिखने वाले और कभी न खत्म होने वाले कण से बनी है। उन्होंने ही सबसे पहले इस कण को ‘अणु’ और ‘परमाणु’ का नाम दिया था।

उन्होंने परमाणुओं के आपस में जुड़ने, उनके बर्ताव और रासायनिक बदलावों की पूरी की पूरी थ्योरी दुनिया के सामने रख दी थी। और ये जॉन डाल्टन नाम का गोरा क्या करता है?

ये 19वीं सदी में आता है, हमारे उसी प्राचीन सनातन ज्ञान को अंग्रेज़ी में ट्रांसलेट करके एक नई थ्योरी (Atomic Theory) बनाता है और रातों-रात दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक बन जाता है।

हमारे ही ऋषियों का ज्ञान चुराकर ये शातिर गोरे आज दुनिया भर की किताबों में हीरो बने बैठे हैं और हमारा कणाद ऋषि अपने ही देश की किताबों से गायब है!

और ज़रा उस ‘पाइथागोरस’ (Pythagoras) का सफेद झूठ तो सुनिए। मैथ्स की क्लास में हर बच्चे का दिमाग इस ‘पाइथागोरस थ्योरम’ (Pythagoras Theorem) को रटते-रटते खराब हो जाता है। पूरी दुनिया को ये बताया जाता है की ग्रीस (Greece) के एक महान गणितज्ञ पाइथागोरस ने ये फार्मूला दुनिया को दिया था।

अरे चोरी की भी कोई हद होती है यार! पाइथागोरस के पैदा होने से भी कई सौ साल पहले हमारे महान सनातन ऋषि ‘बौधायन’ ने अपना एक ग्रंथ लिखा था जिसका नाम था- ‘बौधायन शुल्ब सूत्र’।

हमारे सनातन धर्म में जब भी कोई बड़ा यज्ञ होता था, तो उसकी वेदी (Fire Altar) बनाने के लिए एकदम सटीक और परफेक्ट ज्योमेट्री (Geometry) की ज़रूरत होती थी। उसी यज्ञ की वेदी को बनाने के लिए महर्षि बौधायन ने ये पूरा का पूरा फार्मूला संस्कृत के श्लोकों में लिख दिया था।

बाद में जब ये यूनानी और ग्रीक लोग भारत आए, तो इन्होंने हमारे गुरुकुलों से वो ज्योमेट्री सीखी, हमारा गणित चुराया और वापस अपने देश जाकर उसे ‘पाइथागोरस थ्योरम’ के नाम से पेटेंट करा लिया।

अब सनातन के विज्ञान से ही विश्वगुरु बनेगा हमारा नया भारत

ये गोरे लोग ज्ञान के मामले में इतने कंगाल थे की इनके पास अपना खुद का कोई इतिहास ही नहीं था। इन्होंने हमारी सभ्यता से भीख मांगी, हमारा ज्ञान चुराया और फिर अपनी चौड़ी छाती करके दुनिया को बेवकूफ बनाया की ये सारा विज्ञान इनका अपना है।

अब हमें इन चोर गोरों का महिमामंडन अपने स्कूलों में बंद करना होगा। आज दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटीज़ में ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ (IKS – Indian Knowledge System) पर रिसर्च हो रही है।

जर्मनी के लोग संस्कृत सीख रहे हैं ताकि वो हमारे विमान शास्त्र और वैदिक गणित को समझ सकें। और हम अपने ही देश में अपने ज्ञान को कूड़े में डाल रहे हैं?

अब भारत सरकार और शिक्षा बोर्ड्स को डंके की चोट पर हमारे सिलेबस को बदलना ही होगा। हमारी किताबों के पहले पन्ने पर न्यूटन नहीं, बल्कि भास्कराचार्य की फोटो छपनी चाहिए।

मेडिकल की पढ़ाई शुरू करने से पहले हमारे छात्रों को हिप्पोक्रेट्स की कसम नहीं, बल्कि महर्षि सुश्रुत की कसम खानी चाहिए। विज्ञान की किताबों में डाल्टन से पहले महर्षि कणाद के चैप्टर बड़े-बड़े अक्षरों में छपने चाहिए।

भारत का वो असीमित ज्ञान जो दुनिया ने हमसे चुरा लिया था, अब उसे डंके की चोट पर वापस छीनने का वक्त आ गया है। जिस दिन हम अपने वेदों के असली विज्ञान को फिर से अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लेंगे, उस दिन दुनिया का कोई भी गोरा देश हमें आंख दिखाने की हिम्मत नहीं करेगा।

जय सनातन!

Scroll to Top