एक साधारण स्वयंसेवक से तय किया सत्ता का शिखर, दंगाइयों को किया चुन-चुन कर साफ, रामकाज के लिए अपनी सरकार न्योछावर करने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व CM और पद्म विभूषण ‘सुंदरलाल पटवा’

राजनीति में अक्सर एक बात बहुत बेबाकी से कही जाती है की अगर आपके पास किसी बड़े खानदान का सरनेम नहीं है, या आपके पीछे कोई बड़ा धनबल नहीं खड़ा है, तो आप सत्ता के गलियारों में ज़्यादा दिन टिक नहीं सकते।

एक दौर था जब पूरे देश के साथ-साथ मध्य प्रदेश में भी सिर्फ एक ही पार्टी का एकछत्र राज हुआ करता था। ऐसा लगता था जैसे सत्ता की चाबी किसी एक ही विचारधारा के पास गिरवी रखी हुई हो।

लेकिन फिर इस राज्य की माटी से एक ऐसा साधारण सा शख्स उठा, जिसने इस पूरे राजनीतिक तिलिस्म को हमेशा-हमेशा के लिए मिट्टी में मिला दिया।

हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, लौह पुरुष और भारतीय जनता पार्टी के पितृ पुरुष माने जाने वाले श्रद्धेय सुंदरलाल पटवा जी की।

पटवा जी के पास ना तो कोई राजनीतिक विरासत थी और ना ही चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों का फंड।

उनके पास सिर्फ दो चीज़ें थीं- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं में गढ़ा गया कड़क अनुशासन और अपने उसूलों के लिए सत्ता को भी ठोकर मार देने की हिम्मत।

आज जब राजनीति में पल-पल पाले बदले जाते हैं, तब पटवा जी का जीवन हमें बताता है की विचारधारा और सिद्धांतों के दम पर कैसे शून्य से शिखर तक का सफर तय किया जाता है।

आइए, एक ऐसे जननेता की कहानी में उतरते हैं, जिनके नाम से ही एक समय मध्य प्रदेश के अच्छे-अच्छे गुंडे और दंगाई कांप उठते थे।

नीमच के छोटे से गांव कुकड़ेश्वर से शुरू हुआ सफर और 1948 में संघ के लिए जेल की सलाखें चूमने वाला वो युवा

अगर आपको सुंदरलाल पटवा जी की ज़मीनी हकीकत समझनी है, तो आपको मध्य प्रदेश के मालवा अंचल में बसे नीमच जिले के एक बहुत ही छोटे से गांव ‘कुकड़ेश्वर’ चलना होगा।

11 नवंबर 1924 को इसी गांव में उनका जन्म हुआ था। बचपन से ही उन्होंने गांव की उस सादगी, संघर्ष और अभाव को बहुत करीब से जिया था।

1942 का वो दौर था जब पूरा देश आज़ादी की आग में सुलग रहा था। ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ आंदोलन चरम पर था। उसी आज़ादी की लड़ाई और समाज सेवा के जज़्बे ने युवा सुंदरलाल पटवा के कदमों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं की तरफ मोड़ दिया।

पटवा जी अक्सर कहा करते थे की उनके जीवन का असली निर्माण उन शाखाओं की खाकी नेकर और भगवा ध्वज के साये में ही हुआ है। वहां उन्हें जो अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की घुट्टी पिलाई गई, वो ताउम्र उनके साथ रही।

लेकिन असली परीक्षा तो आज़ादी के तुरंत बाद आई। 1948 में जब गांधी जी की हत्या के बाद तत्कालीन सरकार ने संघ पर पूरी तरह से मनमाना प्रतिबंध लगा दिया, तब संघ के कार्यकर्ताओं को चुन-चुन कर जेलों में ठूंसा जा रहा था।

उस वक़्त संघ का नाम लेना भी किसी बड़े जुर्म से कम नहीं माना जाता था। कई लोग डर के मारे घरों में दुबक गए थे, लेकिन 24 साल का वो युवा सुंदरलाल डरा नहीं।

उन्होंने सरकार की उस तानाशाही का डटकर विरोध किया और सत्याग्रह करते हुए पूरे 7 महीने तक जेल की कालकोठरी में बंद रहे।

1948 की वो जेल यात्रा ही दरअसल उस तपती हुई भट्टी की तरह थी, जिसमें से पटवा जी कुंदन बनकर निकले।

प्रजामंडल आंदोलन से लेकर जनसंघ की पहली ईंट रखने तक, पटवा जी ने अपने पसीने से उस विचारधारा को सींचा जिसे आज हम दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में देखते हैं।

जब कुशाभाऊ ठाकरे के साथ मिलकर मध्य प्रदेश से हमेशा के लिए उखाड़ फेंका कांग्रेस का दशकों पुराना राज

आज जो मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा और अभेद्य किला माना जाता है, वो रातों-रात नहीं बन गया था भाईसाब।

1950 और 60 के दशक में जब जनसंघ का कोई नामलेवा तक नहीं होता था, तब सुंदरलाल पटवा जी और संगठन के पुरोधा श्रद्धेय कुशाभाऊ ठाकरे ने जो ज़मीनी पसीना बहाया है, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।

ठाकरे जी और पटवा जी ने गांव-गांव पैदल और साइकिलों पर यात्राएं कीं। टाट-पट्टी पर सोते थे, गांव वालों का दिया हुआ रूखा-सूखा खाना खाते थे, और एक-एक कार्यकर्ता को नाम से पहचानते थे।

इसी ज़मीनी जुड़ाव का नतीजा था की 1980 में जब जनता पार्टी का दौर आया, तो पटवा जी पहली बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे।

हालांकि वो सरकार महज़ एक महीने ही चल पाई, लेकिन उस एक महीने में पटवा जी ने अपनी कड़क प्रशासनिक शैली का जो ट्रेलर दिखाया, उसने जनता को बता दिया की एक गैर-कांग्रेसी सरकार भी बिना भ्रष्टाचार के सुशासन दे सकती है।

इसके बाद आया 1990 का वो ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव, जिसने मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास की धारा ही पलट कर रख दी।

पटवा जी के नेतृत्व में बीजेपी चुनाव मैदान में उतरी और जो चुनावी आंधी चली, उसमें विपक्ष के सारे बड़े-बड़े किले तिनके की तरह उड़ गए।

ज़रा आंकड़ों पर गौर कीजिए- विधानसभा की 320 सीटों में से अकेले बीजेपी ने 219 सीटों पर एकतरफा कब्ज़ा जमा लिया था। कांग्रेस सिर्फ 56 सीटों पर सिमट कर रह गई!

ये कोई साधारण जीत नहीं थी। ये उस ज़मीनी कार्यकर्ता की जीत थी, जिसने 40 साल तक गांव की धूल फांकी थी।

5 मार्च 1990 को जब सुंदरलाल पटवा जी ने दूसरी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो वो एक ऐसा पल था जिसने साबित कर दिया कीअब राज्य में कांग्रेस का दशकों पुराना राज हमेशा के लिए दफन हो चुका है।

मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही पटवा जी ने जो फैसले लिए, उसने उन्हें पूरे देश में एक ‘नो-नॉनसेंस प्रशासक’ (No-Nonsense Administrator) के रूप में मशहूर कर दिया।

अपराधियों के लिए काल था पटवा जी का राज, जब पुलिस को फ्री हैंड देकर इंदौर और पूरे राज्य से साफ किए गए दंगाई

1990 में जब पटवा जी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, तो उन्हें विरासत में एक ऐसा सिस्टम मिला था जहाँ राजनीतिक संरक्षण के चलते अपराधियों, गुंडों और दंगाइयों के हौसले सातवें आसमान पर थे।

लेकिन पटवा जी वो नेता नहीं थे जो वोट बैंक के लालच में किसी अपराधी के सामने घुटने टेक दें। उनका प्रशासनिक अंदाज़ इतना कड़क और पारदर्शी था की मध्य प्रदेश के बड़े-बड़े ब्यूरोक्रेट्स और अफसर उनके नाम से ही सीधा खड़ा होना सीख गए थे।

वो एक पक्के ‘नो-नॉनसेंस प्रशासक’ थे, जिन्हें फाइलों को लटकाना या अपराधियों को पालना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था।

पटवा जी के सुशासन और उनकी सख्ती की सबसे बड़ी मिसाल 1990 के दशक का वो दौर है, जब राज्य के कई शहरों में सांप्रदायिक तनाव चरम पर था।

उस समय इंदौर शहर गुंडों और दंगाइयों का एक बड़ा गढ़ बनता जा रहा था। खासकर ‘बॉम्बे बाज़ार’ जैसे कुछ मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में असामाजिक तत्वों ने अपनी एक अलग ही समानांतर सत्ता चला रखी थी।

वहां पुलिस तक जाने से कतराती थी। पिछली सरकारों ने वोट बैंक खिसकने के डर से कभी इन इलाकों में सख्ती करने की हिम्मत ही नहीं जुटाई थी।

लेकिन पटवा जी के राज में ये सब चलने वाला नहीं था। उन्होंने साफ कर दिया की मध्य प्रदेश में सिर्फ और सिर्फ कानून का राज चलेगा, किसी गुंडे-मवाली या दंगाई का नहीं।

उन्होंने पुलिस महकमे को सीधा और स्पष्ट आदेश दिया- “मुझे राज्य में शांति चाहिए, और इसके लिए आपको जो भी कड़े कदम उठाने पड़ें, उठाएं। सरकार पूरी तरह से आपके पीछे खड़ी है।”

इसी ‘फ्री हैंड’ का नतीजा था की तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (SP) राकेश अस्थाना जैसे जांबाज़ अफसरों ने इंदौर के बॉम्बे बाज़ार में घुसकर उन दंगाइयों और कुख्यात गुंडों की कमर तोड़ कर रख दी।

पुलिस ने घर-घर तलाशी ली, अवैध हथियारों का ज़खीरा पकड़ा और उन उपद्रवियों को सड़कों पर ऐसा सीधा किया की पूरे राज्य के अपराधियों में खौफ की लहर दौड़ गई।

पटवा जी ने स्पष्ट कर दिया था की अगर कोई कानून तोड़ेगा, तो उसकी ना कोई जाति देखी जाएगी और ना ही मज़हब, उसके साथ वैसा ही सलूक होगा जो एक अपराधी के साथ होना चाहिए।

इसी सख्ती ने मध्य प्रदेश में एक लंबे समय के लिए शांति और सुरक्षा की ऐसी नींव रखी, जिसे आज भी लोग याद करते हैं।

श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए बिना एक पल सोचे ठुकरा दी मुख्यमंत्री की कुर्सी और दे दी अपनी चुनी हुई सरकार की आहुति

राजनीति में अक्सर देखा गया है की जब किसी नेता के हाथ में सत्ता आती है, तो वो उसे बचाने के लिए अपने उसूलों, अपनी विचारधारा और यहाँ तक की अपने ज़मीर तक का सौदा कर लेता है।

सत्ता जाने का खौफ अच्छे-अच्छे नेताओं को झुका देता है। लेकिन सुंदरलाल पटवा जी उस मिट्टी के बने ही नहीं थे। उनके लिए सत्ता सिर्फ एक साधन थी, साध्य तो हमेशा से उनकी विचारधारा और उनका हिंदुत्व ही रहा।

इस बात का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक प्रमाण दिसंबर 1992 की वो घटना है, जिसे भारतीय राजनीति कभी भुला नहीं सकती।

1992 का वो दौर था जब पूरा देश श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के रंग में रंगा हुआ था। बच्चा-बच्चा अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण का सपना देख रहा था।

6 दिसंबर 1992 को जब अयोध्या में वो विवादित बाबरी ढांचा गिरा, तो दिल्ली में बैठी तत्कालीन केंद्र सरकार (नरसिम्हा राव सरकार) पूरी तरह से बौखला गई।

अपनी राजनीतिक खीझ मिटाने के लिए केंद्र सरकार ने संविधान का दुरुपयोग करते हुए मध्य प्रदेश सहित चार राज्यों की पूर्ण बहुमत वाली बीजेपी सरकारों पर मनमाने ढंग से राष्ट्रपति शासन लगा दिया और उन्हें रातों-रात बर्खास्त कर दिया।

विपक्ष ने पटवा जी पर खूब मनगढ़ंत आरोप लगाए। उन पर आरोप मढ़ा गया की उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) पर लगे बैन को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया है और उनकी सरकार प्रत्यक्ष रूप से संघ के एजेंडे का समर्थन कर रही है।

ऐसे वक़्त में जहाँ कोई और नेता होता तो शायद बैकफुट पर आ जाता या सत्ता बचाने के लिए सफाई देने लगता, पटवा जी सीना तानकर खड़े रहे।

उन्होंने सत्ता छिनने का कोई अफसोस नहीं किया, बल्कि उन्होंने कल्याण सिंह के उस फेमस बयान का खुल के समर्थन किया-

“श्री राम के काज के लिए ऐसी एक नहीं, बल्कि सौ सरकारें भी कुर्बान हैं।”

उन्होंने साफ-साफ कहा की मुख्यमंत्री वो बाद में हैं, लेकिन एक स्वयंसेवक पहले हैं।

सोचिए ज़रा उस दौर को, जब 219 विधायकों के प्रचंड बहुमत वाली चुनी हुई सरकार को एक झटके में गिरा दिया गया हो। लेकिन पटवा जी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी।

उन्होंने दिखा दिया की जब बात आस्था, रामलला और राष्ट्र निर्माण की आती है, तो सत्ता की कुर्सी उनके लिए जूते की नोक के बराबर भी मायने नहीं रखती।

राम मंदिर के लिए अपनी पूरी की पूरी सरकार न्योछावर कर देने का जो साहस पटवा जी और उनके साथी मुख्यमंत्रियों ने दिखाया था, उसी त्याग का नतीजा है की आज 500 सालों के संघर्ष के बाद अयोध्या में रामलला अपने भव्य महल में विराजमान हैं।

कमलनाथ के 40 साल के अजेय राजनीतिक किले को छिंदवाड़ा में घुसकर ढहाने वाले असली बाहुबली

अगर आप मध्य प्रदेश की राजनीति को थोड़ा भी करीब से समझते हैं, तो आप जानते होंगे की ‘छिंदवाड़ा’ का मतलब क्या है।

दशकों से छिंदवाड़ा को कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ का एक ऐसा अजेय किला माना जाता रहा है, जिसकी एक ईंट भी हिला पाना किसी भी विरोधी के लिए नामुमकिन था।

लेकिन इस अभेद्य किले को ढहाने का जो ऐतिहासिक कारनामा सुंदरलाल पटवा जी ने कर दिखाया था, वो आज भी राजनीतिक विशेषज्ञों के लिए किसी अचम्भे से कम नहीं है।

किस्सा 1997 का है। छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर उपचुनाव (By-election) होने जा रहे थे। कमलनाथ अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में थे।

ऐसे में सवाल उठा की इस शेर की मांद में जाकर उससे लड़ने की हिम्मत कौन करेगा? पूरी पार्टी की नज़रें सिर्फ एक ही चेहरे पर आकर टिक गईं- और वो थे सुंदरलाल पटवा जी। पटवा जी ने इस चुनौती को बिल्कुल एक सिपाही की तरह स्वीकार किया।

वो छिंदवाड़ा गए, वहां महीनों डेरा डाला और कांग्रेस के उस 40 साल पुराने किले में ऐसा सेंध मारा की पूरी दिल्ली हिल गई। जब चुनाव के नतीजे आए, तो लोगों को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ।

सुंदरलाल पटवा जी ने कमलनाथ को उनके ही घर में 37 हज़ार से ज़्यादा वोटों के भारी अंतर से धूल चटा दी थी! ज़रा सोचिए उस नेता के कद का, जिसने एक ऐसे इलाके में जाकर जीत का परचम लहराया, जहाँ से उसका कोई सीधा नाता भी नहीं था।

कमलनाथ के 40 साल के लंबे और दबदबे वाले राजनीतिक करियर में यह उनकी पहली और इकलौती हार थी, जो उन्हें पटवा जी के हाथों नसीब हुई थी।

अटल जी की सरकार में ग्रामीण विकास की क्रांति और मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित एक निस्वार्थ जीवन

पटवा जी का विज़न सिर्फ राज्य की सीमाओं तक ही सीमित नहीं था। उनकी सांगठनिक क्षमता और प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए जब केंद्र में श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार बनी, तो पटवा जी को दिल्ली बुला लिया गया।

अटल जी ने उन्हें अपनी कैबिनेट में जगह दी और ग्रामीण विकास (Rural Development) जैसा बेहद अहम मंत्रालय सौंपा।

आज जब हम देश के दूर-दराज़ के छोटे-छोटे गांवों को पक्की सड़कों से जुड़ा हुआ देखते हैं, तो हमारे ज़हन में ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ (PMGSY) का नाम आता है।

आपको जानकर हैरानी होगी की भारत के गांवों की तकदीर बदल देने वाली इस ऐतिहासिक योजना का खाका खींचने और इसे ज़मीन पर उतारने में पटवा जी की भूमिका कितनी बड़ी थी।

उन्होंने गांव की उस पीड़ा को समझा था, जहाँ बारिश के दिनों में एक बीमार इंसान को खटिया पर लादकर अस्पताल ले जाना पड़ता था क्योंकि सड़कें नहीं थीं।

मंत्री रहते हुए पटवा जी ने जिस तेज़ी से काम किया, उसने साबित कर दिया की वो सत्ता के शिखर पर बैठकर भी अपनी उसी गांव की मिट्टी से जुड़े हुए हैं।

सालों तक निस्वार्थ भाव से समाज और राष्ट्र की सेवा करने के बाद, 28 दिसंबर 2016 को जब 92 वर्ष की आयु में पटवा जी ने अपनी अंतिम सांस ली, तो उस दिन सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि पूरा मध्य प्रदेश रोया था।

उनके इस बेदाग जीवन, राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान और निस्वार्थ सेवा को सलाम करते हुए, 2017 में भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ (Padma Vibhushan) से सम्मानित किया।

यह सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि संघ की उस शाखा का सम्मान था जहाँ से पटवा जी गढ़े गए थे।

विपक्ष का तो काम ही है आरोप लगाना। बाबरी विध्वंस के बाद जब भोपाल में दंगे हुए, तो कांग्रेसियों ने पटवा जी को घेरने की बहुत कोशिश की।

उन पर आरोप मढ़े गए, उन्हें बदनाम करने के तमाम एजेंडे चलाए गए। लेकिन जो नेता सच्चाई के रास्ते पर चलता है, वो इन फालतू के विवादों से कभी डगमगाता नहीं है।

आज मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी जिस चट्टान की तरह खड़ी है, उसकी नींव में सुंदरलाल पटवा का अहम योगदान है।

शिवराज सिंह चौहान जैसे आज के दिग्गज नेता भी पटवा जी को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं

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