दशकों तक जिन्होंने BJP-RSS का झंडा अपने कंधों पर उठाया, उन्हीं सवर्णों को आज लावारिस छोड़ रख रही केंद्र सरकार, घटिया तुष्टिकरण नीतियों से अपनी ही बर्बादी की नींव रख रहे सत्ता के भ्रष्ट नीतिकार

एक बहुत पुरानी और सच्ची कहावत है की जिस पौधे को आप अपना खून-पसीना देकर सींचते हो, जब वो विशाल पेड़ बन जाता है, तो उसकी ठंडी छांव पर सबसे पहला हक़ आपका ही होता है।

लेकिन क्या हो जब वही पेड़ अपने ही रखवालों को छांव देने से इनकार कर दे? आज देश भर का सवर्ण समाज- ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और तमाम जनरल केटेगरी- बिल्कुल इसी दर्द और घुटन से गुज़र रहा है।

जिस हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के वृक्ष को सवर्ण समाज ने दशकों तक लाठियां खाकर, गालियां सुनकर और अपना सब कुछ लुटाकर फर्श से अर्श तक पहुंचाया, आज सत्ता के चरम सुख में उसी समाज को ‘तुष्टिकरण’ के नाम पर दूध में से मक्खी की तरह निकालकर फेंका जा रहा है।

आज सवर्णों का यह उबलता हुआ गुस्सा केंद्र सरकार में बैठे नीतिकारों (Policymakers), अधिकारियों और सिस्टम के उन गद्दारों के खिलाफ है, जो ‘वोट बैंक’ की अंधी लालच में ऐसी घटिया नीतियां बना रहे हैं जिसने सीधे अपने ही ‘कोर वोटर’ की पीठ में खंजर घोंप दिया है।

इन नीतिकारों ने सत्ता के नशे में वो खेल शुरू कर दिया है जो खुद बीजेपी की जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रहा है।

अपना खून देकर जिस विशाल भगवा वृक्ष को सींचा, आज उसी की छांव से खदेड़ा जा रहा सवर्ण समाज

ज़रा आज के हालात को खुली आँखों से देखिए। सत्ता के गलियारों में बैठे इन बाबू लोगों और नीति-निर्माताओं को लगता है की कुर्सी सिर्फ एक खास वर्ग को खुश करके ही बचाई जा सकती है।

‘सबका साथ’ का नारा देने वाले इन अधिकारियों ने इस नारे को इतना तोड़-मरोड़ दिया है की अब ये सिर्फ ‘उनका साथ’ बनकर रह गया है जो कभी इस भगवा झंडे के नीचे खड़े ही नहीं हुए।

आज जनरल केटेगरी का युवा जब सड़कों पर निकलता है, जब वो नौकरियों के लिए दर-दर भटकता है, या जब वो शिक्षण संस्थानों में जाता है, तो उसे ऐसा महसूस कराया जाता है जैसे इस देश में सवर्ण पैदा होना ही सबसे बड़ा अपराध हो गया है।

जिस समाज ने हर कदम पर इस पार्टी का बिना शर्त साथ दिया, आज नीतियां बनाते वक़्त उस समाज को ‘अनचाहा बोझ’ मान लिया गया है।

दिल्ली के दफ्तरों में बैठकर नीतियां बनाने वाले ये अफसर भूल गए हैं की जब देश में वामपंथियों और कांग्रेस का डंडा चलता था, जब बीजेपी का नाम लेने वालों को समाज में प्रताड़ित किया जाता था, तब यही सवर्ण समाज था जिसने सीना तानकर हर वार अपने ऊपर झेला।

मगर आज क्या हो रहा है? आज ये नीतिकार उन जातियों और वर्गों पर अरबों-खरबों रुपये लुटा रहे हैं, उन्हें खुश करने के लिए नए-नए आयोग बना रहे हैं, जो चुनाव के दिन बीजेपी को देखना तक पसंद नहीं करते।

और जिसने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर इस सत्ता को खड़ा किया? उसे कह दिया जाता है की तुम तो यार अपना ही परिवार हो, तुम्हें क्या ज़रूरत है!

संघ की शाखाओं से लेकर राम मंदिर के संघर्ष तक, अपना लहू और धन देकर सवर्णों ने ही खड़ा किया BJP का ये विशाल साम्राज्य

आज जो लोग दिल्ली के आलीशान दफ्तरों में बैठकर सवर्णों के खिलाफ नीतियां ड्राफ्ट कर रहे हैं, उन्हें शायद इतिहास की वो सच्चाई पता ही नहीं है की जिस सत्ता की मलाई वो आज चाट रहे हैं, उसकी नींव में किसका खून और पसीना मिला हुआ है।

ज़रा पन्ने पलटकर देखिए साल 1925 का वो दौर, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना हुई थी।

जब देश में ‘हिन्दू’ शब्द बोलना भी पिछड़ेपन की निशानी माना जाता था, तब वो कौन लोग थे जिन्होंने समाज की गालियां खाकर भी सुबह-सुबह खाकी निक्कर पहनकर शाखाएं लगाईं?

वो सवर्ण ही थे! जब इस भगवा विचार को सींचने के लिए बौद्धिक और वैचारिक नेतृत्व की ज़रूरत पड़ी, तो ब्राह्मण समाज ने अपने तपोबल और बुद्धि से इसे दिशा दी।

जब सड़कों पर वामपंथियों और कांग्रेसियों के गुंडों से लड़ने की बारी आई, तो क्षत्रियों (राजपूतों) ने अपना सीना आगे कर दिया और सड़कों पर अपना लहू बहाया।

और जब जनसंघ और बाद में बीजेपी को चुनाव लड़ने, पोस्टर छपवाने और पार्टी का ढांचा खड़ा करने के लिए पैसों की दरकार हुई… जब कोई बड़ा उद्योगपति इनके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं था, तब वो वैश्य और व्यापारी समाज ही था जिसने अपनी पीढ़ियों की कमाई हुई तिजोरियां राष्ट्रहित के लिए खोल दी थीं।

और हम 1990 के दशक के उस राम जन्मभूमि आंदोलन को कैसे भूल सकते हैं?

अयोध्या की उन सड़कों पर जब मुलायम सिंह यादव की पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलवाई थीं, तब अपनी छाती पर पहली गोली खाने वाले वो शरद और रामकुमार कोठारी कौन थे? वो भी इसी सवर्ण वैश्य समाज के लाल थे।

उस दौर में पूरे देश से जो लाखों कारसेवक अयोध्या पहुंचे थे, जिन्होंने लाठियां खाईं, जेलें काटीं और सरयू नदी को अपने खून से लाल कर दिया… उनमें से हज़ारों गुमनाम युवा इसी सवर्ण समाज से आते थे।

उन्होंने अपना भविष्य, अपनी जवानी, अपना करियर सब कुछ इस भगवा विचार के लिए दांव पर लगा दिया था। लेकिन आज क्या सिला मिल रहा है उन्हें?

आज जब सत्ता का वो स्वर्णिम काल आ गया है जिसका सपना उन कारसेवकों और पुराने स्वयंसेवकों ने देखा था, तब उनके ही बच्चों को इस सिस्टम ने अनाथ छोड़ दिया है।

जनसंघ से लेकर आज तक सवर्णों ने नहीं मांगी कोई खैरात, सिर्फ राष्ट्रहित के लिए झेली थीं कांग्रेसी लाठियां

इतिहास गवाह है दोस्त, सवर्ण समाज ने कभी किसी सरकार से खैरात नहीं मांगी। आप जनसंघ के दौर से लेकर आज तक का इतिहास उठाकर देख लीजिए।

क्या कभी किसी ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य ने सड़क पर उतरकर ये कहा की हमें मुफ्त की बिजली दे दो? क्या कभी इन्होंने कहा की हमारी महिलाओं को फ्री बस यात्रा करवा दो? क्या इन्होंने किसी के हक़ का आरक्षण छीना? नहीं!

इस समाज ने हमेशा देश को सर्वोपरि रखा। जब कांग्रेस के ज़माने में इमरजेंसी लगी, जब कश्मीर सुलग रहा था, जब देश की संस्कृति को वामपंथी इतिहासकार दीमक की तरह चाट रहे थे, तब इस समाज ने सिर्फ तीन चीजें मांगी थीं- राष्ट्र की सुरक्षा, राम लला का भव्य मंदिर और समाज में बराबरी का हक़।

इन्हीं तीन वादों पर सवर्णों ने अपना 100 प्रतिशत वोट बीजेपी की झोली में आंख बंद करके डाल दिया।

दशकों तक कांग्रेसी सरकारों की पुलिस ने इन पर लाठियां तोड़ीं, इनके व्यापार ठप्प करवाए गए, इनके युवाओं को जेलों में ठूंसा गया, लेकिन ये पीछे नहीं हटे।

लेकिन आज केंद्र में बैठे इन घमंडी नीतिकारों ने सवर्ण समाज की इसी ईमानदारी को उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी समझ लिया है।

इन अधिकारियों के दिमाग में एक बहुत ही खतरनाक और सड़ा हुआ कीड़ा बैठ गया है- ‘गारंटीड वोटर सिंड्रोम’।

दिल्ली में बैठे ये सलाहकार आपस में क्या बात करते हैं पता है? ये कहते हैं की “अरे छोड़ो यार इन सवर्णों को! ये जाएंगे कहाँ?”

“गालियां देंगे, नाराज़ होंगे, ट्विटर पर ट्रेंड चलाएंगे, लेकिन चुनाव के दिन जब बटन दबाने की बारी आएगी, तो राम मंदिर और राष्ट्रवाद के नाम पर कमल का ही बटन दबाएंगे। इसलिए इन पर ध्यान मत दो, अपना पूरा फोकस उनको खुश करने में लगाओ जो हमसे दूर हैं।”

यही वो अहंकार है जिसने आज केंद्र सरकार की नीतियों को इतना खोखला कर दिया है। आप किसी को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ (Taken for granted) नहीं ले सकते!

जब आप वफादारी का सिला तिरस्कार और अपमान से देते हो, तो फिर वफादार भी बागी हो जाता है। सवर्णों ने खैरात नहीं मांगी थी, लेकिन कम से कम उन्होंने सम्मान और सुरक्षा की उम्मीद तो की थी।

आज वही नीतिकार ऐसे-ऐसे काले कानून ड्राफ्ट कर रहे हैं जो सीधे तौर पर सवर्णों के बच्चों का भविष्य निगलने के लिए बनाए गए हैं।

दलित तुष्टिकरण वाले नीतिकारों का घटिया खेल और UGC का वो काला कानून जिसने सवर्ण छात्रों का भविष्य दांव पर लगा दिया

जब अहंकार हद से गुज़र जाता है, तो इंसान खुद अपनी बर्बादी के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर देता है। केंद्र सरकार के नीचे काम करने वाले नीतिकारों ने भी बिल्कुल यही किया है।

जनवरी 2026 में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने एक ऐसा ड्राफ्ट देश के सामने फेंका, जिसे पढ़कर हर सवर्ण माता-पिता की सिस्टम से उम्मीद ही खत्म हो गयी।

इस काले कानून का नाम रखा गया ‘UGC Equity Regulations 2026’।

नाम में ‘इक्विटी’ (समानता) है, लेकिन अंदर जो ज़हर भरा गया है, वो दुनिया का सबसे बड़ा ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (उल्टा भेदभाव) है।

आप ज़रा इन बाबू लोगों का दिमाग देखिए। इन्होंने इस ड्राफ्ट के ‘रूल 3(c)’ में बाकायदा लिख दिया है की देश के किसी भी विश्वविद्यालय या कॉलेज में ‘भेदभाव’ (Discrimination) या हैरेसमेंट केवल तभी माना जाएगा, जब वो SC, ST या OBC वर्ग के किसी छात्र या कर्मचारी के साथ हो!

मतलब समझ रहे हैं आप इसका? अगर आप एक सवर्ण (जनरल केटेगरी) छात्र हैं, और कोई आपको जाति के नाम पर गालियां देता है, कॉलेज में आपका मानसिक उत्पीड़न करता है, या आपको प्रताड़ित करके आत्महत्या की कगार पर धकेल देता है…

तो सरकार और UGC के इस नियम के हिसाब से आपके साथ कोई ‘भेदभाव’ हुआ ही नहीं है! आपको कोई कानूनी सुरक्षा नहीं मिलेगी।

आपकी पीड़ा, आपका दर्द, आपकी शिकायत कचरे के डिब्बे में डाल दी जाएगी, क्योंकि आपके माथे पर ‘सवर्ण’ होने का ठप्पा लगा है!

ये कैसा न्याय है भाई? ये कौन से नीति-निर्माता हैं जो देश के युवाओं को जातियों के खांचे में बांटकर जनरल केटेगरी के बच्चों को खुलेआम भेड़ियों के आगे फेंक रहे हैं?

क्या एक सवर्ण बच्चे की जान की कोई कीमत नहीं है? क्या उसका सम्मान इस देश के संविधान के लिए कोई मायने नहीं रखता?

ये कोई छोटी-मोटी भूल-चूक नहीं है। ये पूरी तरह से एक सोची-समझी साज़िश है। दिल्ली में बैठे इन अधिकारियों को लगता है की अगर हम ऐसे सवर्ण-विरोधी कानून लाएंगे, तो आरक्षित वर्ग खुश हो जाएगा और बीजेपी को वोट दे देगा।

तुष्टिकरण की इस भयंकर बीमारी ने इन नीतिकारों को अंधा कर दिया है। ये इस बात को समझ ही नहीं पा रहे हैं की वे जनरल केटेगरी के युवाओं के भविष्य पर बुलडोज़र चला रहे हैं।

एक छात्र, जो सिर्फ अपनी मेरिट और दिन-रात की मेहनत के दम पर कॉलेज में एडमिशन लेता है, उसे सरकार का यह सिस्टम सिर्फ इसलिए लावारिस छोड़ रहा है क्योंकि उसके नाम के आगे कोई ‘रिजर्वेशन का टैग’ नहीं लगा है।

इस एक काले कानून ने पूरे सवर्ण समाज के सब्र का बांध तोड़ दिया है। दशकों तक अपनी अनदेखी बर्दाश्त करने वाला सवर्ण युवा अब समझ चुका है की अगर आज वो नहीं बोला, तो ये नीतिकार कल उसके अस्तित्व को ही मिटा देंगे।

और इसी खौफनाक कानून के खिलाफ जब सवर्ण समाज सड़कों पर उतरा, तो सिस्टम ने उनके साथ जो किया, वो ब्रिटिश राज के जुल्मों से भी बदतर था।

जयपुर में शांतिपूर्ण ‘सवर्ण न्याय पदयात्रा’ पर बरसाई गई लाठियां, और देवराज सिंह पलाड़ा की शहादत जो सिस्टम के मुंह पर है करारा तमाचा

जब से UGC के इस घटिया और सवर्ण-विरोधी ‘काले कानून’ की भनक देश के युवाओं को लगी है, तब से देश में जगह-जगह इसके खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं।

अभी कुछ दिनों पहले 3 अगस्त को ही राजस्थान के जयपुर में राजपूत करणी सेना और तमाम सवर्ण संगठनों ने मिलकर एक ऐसे ही ‘सवर्ण न्याय पदयात्रा’ नाम के आंदोलन का आह्वान किया।

इनका मक़सद कोई दंगा-फसाद करना नहीं था। कोई सरकारी संपत्ति नहीं जलाई गई, किसी को धमकी नहीं दी गई।

ये हज़ारों युवा हाथों में वही भगवा झंडा लिए, अपनी जुबान पर ‘भारत माता की जय’ का नारा लिए, बिल्कुल शांतिपूर्ण तरीके से अपना हक़ मांगने सड़कों पर उतरे थे।

लेकिन केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहे प्रशासन ने इन शांतिपूर्ण भगवाधारियों के साथ जो सुलूक किया, वो किसी दुश्मन देश के आतंकियों से भी बदतर था।

जिस पुलिस के हाथ असली दंगाइयों और पत्थरबाज़ों के सामने कांपते हैं, उसी पुलिस ने अपने ही कोर वोटर पर बेरहमी से लाठियां भांजनी शुरू कर दीं।

बिना किसी वॉर्निंग के आंसू गैस के गोले दागे गए। और सबसे खौफनाक मंज़र तो तब सामने आया, जब प्रशासन ने इन निहत्थे युवाओं पर हाई-प्रेशर वाटर कैनन (Water Cannon) का बर्बर इस्तेमाल किया।

पानी की वो धार इतनी तेज़ और जानलेवा थी की उसकी सीधी चोट से देवराज सिंह पलाड़ा नाम के एक युवा कार्यकर्ता की मौके पर ही मौत हो गई!

ज़रा सोचिए दोस्त! एक जवान लड़का, जो सिर्फ अपने समाज के अस्तित्व और बराबरी की मांग करने शांति से सड़क पर आया था, उसे इस सिस्टम ने मौत की नींद सुला दिया।

देवराज सिंह पलाड़ा की ये शहादत इस पूरे सिस्टम, इन अधिकारियों और उन तमाम नीतिकारों के मुंह पर एक ऐसा करारा तमाचा है जिसकी गूंज दशकों तक सुनाई देगी।

यहाँ सबसे बड़ा और तीखा सवाल खड़ा होता है सिस्टम के दोगलेपन पर।

भाई, जब देश में कुछ लोग हफ्तों-महीनों तक नेशनल हाईवे जाम कर देते हैं, लाल किले पर जाकर उपद्रव करते हैं, सड़कों पर खड़े होकर देश के प्रधानमंत्री और उनकी मां-बहनों को भद्दी-भद्दी गालियां देते हैं…

तब तो सरकार उनके सामने झुख कर माफ़ी दे देती है! तब दिल्ली से बड़े-बड़े मंत्री जाकर उनसे मेज़ पर बैठकर बात करते हैं, उन्हें मनाने के लिए करोड़ों के पैकेज घोषित कर दिए जाते हैं।

लेकिन जब सवर्ण समाज का युवा शांति से अपना हक़ मांगता है, तो उसे क्या मिलता है? उसे मिलती हैं पुलिस की लाठियां, उसके सिर फोड़े जाते हैं, और उसे देवराज सिंह की तरह मौत के घाट उतार दिया जाता है!

क्या इस देश में शांति से बात करने वालों की कोई अहमियत नहीं बची है? क्या सरकार को सिर्फ वही आंदोलन पसंद हैं जिनमें खून-खराबा और देश-विरोधी नारे लगते हों?

अगर आप अपने ही सबसे वफादार समाज के खून से अपनी सत्ता की सड़कें धोएंगे, तो यकीन मानिए, वो सत्ता भी बहुत दिन तक टिकने वाली नहीं है।

बांकीपुर और दतिया के चुनाव नतीजों ने दे दी है वार्निंग, अगर अब भी नहीं जागे तो यूपी चुनाव में हो जाएगा सूपड़ा साफ

दिल्ली में बैठे इन घमंडी नीतिकारों को शायद लगा था की ये सवर्ण समाज है, दो-चार दिन सड़क पर रोएगा, लाठियां खाएगा और फिर चुपचाप घर जाकर बैठ जाएगा।

“आखिर चुनाव में वोट तो हमें ही देना है, जाएंगे कहाँ?” यही सोचते थे ना ये लोग? लेकिन भाईसाहब, सत्ता का नशा जब टूटता है ना, तो ज़मीन बहुत ज़ोर से खिसकती है।

और 3 अगस्त 2026 को आए उपचुनावों (By-polls) के नतीजों ने इन नीतिकारों की अंधी रातों की नींद हमेशा के लिए उड़ा दी है।

सवर्ण समाज ने दिखा दिया है की अब वो सिर्फ ट्विटर पर ट्रेंड नहीं चलाएगा, सड़कों पर सिर्फ लाठियां नहीं खाएगा, बल्कि जब वो ईवीएम (EVM) के सामने खड़ा होगा, तो वो बटन दबाकर तुम्हें तुम्हारी सही जगह भी दिखायेगा!

ताज़ा नतीजे चीख-चीख कर बता रहे हैं की कोर वोटर अब खिसक नहीं रहा, वो बागी हो चुका है।

ज़रा बिहार की बांकीपुर (Bankipur) विधानसभा सीट का हाल देखिए। जो लोग राजनीति समझते हैं, उन्हें पता है की बांकीपुर 1995 से बीजेपी का वो अजेय गढ़ था, जिसे हिलाना किसी के बाप के बस की बात नहीं थी।

यहाँ सवर्ण वोटर ही भगवान है, वही तय करता है की ताज किसके सिर सजेगा। लेकिन UGC के काले कानून और सवर्णों की लगातार हो रही बेइज़्ज़ती का नतीजा क्या हुआ?

बांकीपुर के सवर्णों ने अपनी ही पार्टी को ऐसा ज़ोरदार तमाचा मारा की प्रशांत किशोर की नई नवेली पार्टी ‘जन सुराज’ ने बीजेपी को पूरे 19,000 वोटों के भारी अंतर से धो डाला!

1995 के बाद पहली बार बीजेपी यहाँ से इतनी बुरी तरह हारी है।

और सिर्फ बिहार ही नहीं, मध्य प्रदेश के दतिया (Datia) का हाल भी देख लीजिए। दतिया भी बीजेपी का वो गढ़ माना जाता था जहाँ सवर्णों और ब्राह्मणों का एकतरफा वोट बीजेपी को सत्ता में लाता था।

लेकिन इस बार यहाँ भी सवर्णों ने किनारा कर लिया और बीजेपी को कांग्रेस के हाथों ऐसी करारी शिकस्त झेलनी पड़ी की दिल्ली के नीतिकारों के पसीने छूट गए।

बांकीपुर और दतिया की हार कोई मामूली हार नहीं है। यह एक खौफनाक ट्रेलर है, एक ‘वार्निंग बेल’ (Warning Bell) है जो बज चुकी है।

ये चुनाव बता रहे हैं की अगर सरकार ने अब भी ‘कोर्स करेक्शन’ (Course Correction) नहीं किया, अगर अब भी इन गलत नीतियां बनाने वालो अधिकारियों की लगाम नहीं कसी, तो आने वाले 2027 के उत्तर प्रदेश (UP) चुनावों में बीजेपी का सूपड़ा साफ होने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक पाएगी।

उत्तर प्रदेश तो राम और परशुराम की धरती है भाई! वहाँ का सवर्ण वोटर अगर एक बार छिटक गया, अगर उसने ठान लिया की इन तुष्टिकरण की नीतियों को सबक सिखाना है, तो 2027 का महा-रण बीजेपी के लिए एक ऐसा खौफनाक सपना बन जाएगा जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

जो समाज तुम्हें अर्श तक ले जा सकता है, वो तुम्हें वापस फर्श पर पटकने में एक पल भी नहीं हिचकिचाएगा। सरकार को समझना होगा की वफादारी एकतरफा नहीं होती, इसे दोनों तरफ से निभाना पड़ता है!

खामोश सवर्ण जब सड़क पर उतरेगा तो हिल जाएगी दिल्ली, इसलिए सरकार को तुरंत सुधारनी होगी अपनी ये ऐतिहासिक भूल

सवर्ण समाज स्वभाव से बहुत ही शांत, बौद्धिक और सहनशील समाज है। वो आसानी से सड़कों पर उतरकर बवाल नहीं काटता। लेकिन दिल्ली के नीति-निर्माताओं को इतिहास के पन्ने पलट कर देख लेने चाहिए।

जब ब्राह्मण का स्वाभिमान आहत होता है, जब क्षत्रिय (राजपूत) का खून खौलता है और जब वैश्य अपना खजाना बंद करता है… तो बड़े-बड़े मगरूर सिंहासन राख के ढेर में बदल जाते हैं।

आप एक खामोश समाज को इतना मत डराइए की उसके अंदर से डर ही खत्म हो जाए।

अगर सरकार वाकई में इस डैमेज को कंट्रोल करना चाहती है, अगर उसे 2027 के यूपी चुनावों और आगे 2029 की फिक्र है, तो उसे बिना किसी देरी के ‘कोर्स करेक्शन’ करना ही होगा।

और ये कोर्स करेक्शन कोई बंद कमरों की बैठकों से नहीं होगा, इसके लिए सीधा एक्शन चाहिए!

सबसे पहले तो UGC के उस काले कानून (UGC Equity Regulations 2026) को, जिसमें सवर्ण बच्चों के साथ होने वाले भेदभाव को मज़ाक बना दिया गया है, तुरंत प्रभाव से फाड़कर कचरे के डिब्बे में फेंकना होगा।

दूसरा, जयपुर में उन निहत्थे भगवाधारियों और करणी सेना के युवाओं पर लाठीचार्ज का ऑर्डर देने वाले उन क्रूर पुलिस अफसरों और प्रशासनिक अधिकारियों को तुरंत सस्पेंड कर जेल में डालना होगा।

और सबसे अहम, देवराज सिंह पलाड़ा, जिसने अपनी कौम के स्वाभिमान के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, उसके परिवार को पूरा न्याय और सम्मान मिलना चाहिए।

ये कोई भीख नहीं है, ये सवर्ण समाज का वो हक़ है जिसके लिए वो अब आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार है। दतिया और बांकीपुर तो बस एक छोटी सी झांकी है।

अगर दिल्ली के उन मगरूर नीतिकारों की नींद अभी भी नहीं टूटी, अगर उन्होंने अभी भी इस उबलते हुए लावे को ‘सोशल मीडिया का गुस्सा’ समझकर इग्नोर किया, तो यकीन मानिए… आने वाले चुनावों में ये खामोश सवर्ण जब अपना असली रूप दिखाएगा, तो सिर्फ लखनऊ नहीं, पूरी की पूरी दिल्ली तक हिल जाएगी।

सरकार के पास अब भी वक़्त है की वो अपने ही कोर वोटर की पीठ में छुरा घोंपने वाले इन अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाए और अपने उन वफादारों को गले लगाए, जो तब भी उनके साथ खड़े थे जब उनके पास सत्ता का कोई सुख नहीं था।

वरना इतिहास गवाह है, अपनों की आह से बड़ी-बड़ी सत्ताएं भस्म हो जाती हैं, और इस बार तो आह उस समाज की है जिसने तुम्हें अर्श तक पहुंचाया है!

जय श्री राम

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