शनिवार, 25 जुलाई 2026 का दिन देश की सियासत और शिक्षा व्यवस्था के लिए एक ऐसा दिन बन गया जिसे शायद ही कोई भूल पाए।
पिछले करीब एक महीने से पूरे देश में NEET परीक्षा को लेकर जो एक अनिश्चितता का बादल मंडरा रहा था, उस पर अचानक एक बड़ी खबर ने ब्रेक लगा दिया।
आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफा सौंप दिया है।
सच कहूं तो, ये खबर सुनकर किसी को कोई बहुत बड़ा सरप्राइज़ नहीं हुआ। जो हालात चल रहे थे, उसमें सबको पता था की ये होना ही है।
लेकिन भाई, इस इस्तीफे ने एक बहुत बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है। और वो सवाल यही है की जब हालात इतने बिगड़ चुके थे और आखिरकार इस्तीफा ही इस पूरी समस्या का इकलौता समाधान था, तो फिर इसमें इतनी देरी क्यों की गई?
ज़रा सोचिए, कोई भी व्यवस्था जब संकट में होती है, तो जनता उम्मीद करती है की फैसले तुरंत लिए जाएं।
अगर ये फैसला विवाद शुरू होने के कुछ ही दिनों के भीतर ले लिया जाता, तो शायद मुद्दे का इतना बुरा राजनीतिकरण नहीं होता।
शिक्षा मंत्रालय की साख भी बच जाती और मंत्री जी भी एक मिसाल बनकर विदा होते। लेकिन इस देरी ने सारा का सारा ‘रायता’ फैला दिया, जिसे समेटने में अब पूरे सिस्टम के पसीने छूटने तय है।
ट्विटर (X) पर प्रधान जी की वो लंबी चौड़ी सफाई जिसे पढ़कर लगा की काश ये फैसला पहले ले लिया होता
— Dharmendra Pradhan (@dpradhanbjp) July 25, 2026
खैर, इस्तीफा देने के तुरंत बाद धर्मेंद्र प्रधान जी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (ट्विटर) पर एक बहुत ही लंबा-चौड़ा पोस्ट लिखा।
अपने इस पोस्ट में उन्होंने बाकायदा गिनाया की कैसे उन्होंने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत एक्शन लिए थे।
उन्होंने लिखा की जैसे ही पेपर लीक की बात सामने आई, मामला तुरंत सीबीआई (CBI) को सौंप दिया गया।
इसके अलावा, 21 जून को री-एग्जाम भी करवाया गया और सबसे बड़ा फैसला ये लिया गया की अगले साल से NEET की परीक्षा पूरी तरह से कंप्यूटर (CBT) बेस होगी ताकि आगे से कोई भी पेपर लीक ना कर सके।
सच कहूं तो प्रधान जी की ये बातें बिल्कुल सही हैं। उन्होंने कदम तो उठाए थे और सिस्टम को सुधारने की कोशिश भी की। इस बात के लिए उनकी तारीफ होनी चाहिए।
लेकिन भाई, इसी पोस्ट में उन्होंने एक लाइन और लिखी की “यह मेरे लिए ईगो (Ego) या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय नहीं है।”
बस यहीं आकर बात थोड़ी चुभ जाती है। अगर सच में ये ईगो का विषय नहीं था, तो जिस दिन पेपर लीक का वो भयानक सच देश के सामने आया था, उसी दिन प्रधान जी ने सामने आकर ये क्यों नहीं कहा की “मेरे विभाग में इतनी बड़ी चूक हुई है, मैं इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेता हूं और अपना पद छोड़ता हूं।”
ज़रा सोचिए! अगर उन्होंने ऐसा किया होता, तो आज देश का युवा उन्हें सर आंखों पर बिठा लेता। इतिहास उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद रखता जिसने कुर्सी से ज्यादा छात्रों के भविष्य को अहमियत दी।
लेकिन 10-15 दिन तक खामोश रहना, कुर्सी से चिपके रहना और फिर जब चारों तरफ से दबाव बन जाए तब जाकर इस्तीफा देना… ये सफाई अब थोड़ी फीकी लग रही है। इसी को कहते हैं की “अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।”
जंतर-मंतर का वो सियासी अखाड़ा जहाँ छात्रों के कंधों पर रखकर चलाई गई राजनीतिक बंदूकें
खैर, अब ज़रा जंतर-मंतर के उस धरने की असली हकीकत पर भी बात कर लेते हैं, जिसे टीवी पर दिन-रात एक ‘शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन’ बताकर परोसा जा रहा था।
सच्चाई इससे कोसों दूर थी। शुरुआत में बेशक कुछ छात्र अपने जायज़ हक और परीक्षा में हुई धांधली के खिलाफ आवाज़ उठाने वहां गए थे, लेकिन देखते ही देखते ये जगह एक पूरा सियासी अखाड़ा बन गई।
अचानक से वहां सोनम वांगचुक जैसे लोग अनशन पर बैठ गए जिनका इस परीक्षा या शिक्षा मंत्रालय से सीधा कोई लेना-देना नहीं था।
जो मुद्दा सिर्फ और सिर्फ परीक्षा प्रणाली में सुधार का होना चाहिए था, उसे व्यवस्था को अस्थिर करने और अराजकता फैलाने के एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा।
छात्रों की आड़ में हुड़दंग मचाने की कोशिशें हुईं। राजनेताओं ने वहां आकर अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी शुरू कर दीं।
किसी को छात्रों के डिप्रेशन या उनके भविष्य की असल चिंता नहीं थी, उन्हें तो बस एक ऐसा मंच मिल गया था जहाँ से वो अपनी सियासत चमका सकें।
मासूम छात्रों को मोहरा बना लिया गया और उनके कंधों पर बंदूक रखकर सीधा सिस्टम पर निशाना साधा गया। ये हमारे लोकतंत्र का वो डार्क साइड है जहाँ एक जायज़ मुद्दे को भी कुछ मौकापरस्त लोग अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए हाईजैक कर लेते हैं।
इस्तीफे के बाद आखिरकार खत्म हुआ जंतर-मंतर का ड्रामा, CJP की नई मांगें
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर का टेंट आखिरकार उखड़ गया। लेकिन ये सियासी ड्रामा अभी खत्म नहीं हुआ है।
इस्तीफे की खबर आते ही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने मंच से दहाड़ते हुए कहा की “झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए”।
उन्होंने इस इस्तीफे को उनकी जीत तो बताया, उन्होंने साफ कर दिया की उनका ये धरना अभी के लिए खत्म हो गया है। लेकिन उन्होंने धरना ख़त्म करने के बदले कुछ शर्तें रखी हैं।
पहली मांग ये है की नीट (NEET) पेपर लीक और इस पूरे तनाव के कारण जिन भी छात्रों ने डिप्रेशन में आकर आत्महत्या की है, उनके परिवारों को सरकार की तरफ से 1-1 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए।
उनकी दूसरी मांग सीधे तौर पर पुलिस प्रशासन से जुड़ी है। दिपके और उनकी पार्टी का कहना है की इस पूरे आंदोलन के दौरान जितने भी युवाओं ने तोड़ फोड़ करी, जो जेल गए, या जिनके खिलाफ FIR हुई, उन सभी को सरकार बाईज़्ज़त बरी कर दे, यानी पुलिस उनके खिलाफ दर्ज की गयी सारी FIR हटा के उनको आज़ाद कर दे!
ये साफ दिखाता है की जब कोई मुद्दा एक बार सड़क की राजनीति का हिस्सा बन जाता है, तो उसकी मांगें रबर की तरह खिंचती चली जाती हैं।
सियासत से ऊपर उठकर राष्ट्रहित और शिक्षा व्यवस्था को सुरक्षित करने की जरूरत
धर्मेंद्र प्रधान जी का इस्तीफा एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी समझी और पद छोड़ दिया, जो एक परिपक्व राजनीति का संकेत है।
लेकिन अब ज़िम्मेदारी देश के युवाओं की भी है। उन्हें समझना होगा की उनके जज़्बातों से खेलने वाले बहुत लोग सड़क पर घूम रहे हैं।
जो लोग छात्रों के हक की बात करते हुए अपनी खुद की पार्टी और अपना चेहरा चमका रहे थे, उन्हें भी अब पहचानना होगा।
लोकतंत्र में अपनी बात रखना सबका हक है, लेकिन राष्ट्रहित हमेशा सर्वोपरि होना चाहिए।
अब वक्त आ गया है की छात्र अपनी किताबों की ओर लौटें, सिस्टम अपनी खामियों को सुधारे और हम सब मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाएं जहाँ सियासत नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ काबलियत की कद्र हो।
