सिर्फ संयोग या भारत के खिलाफ भयंकर षड्यंत्र? ‘किसान आंदोलन’ और ‘पेगासस’ से लेकर ‘हिंडनबर्ग रिपोर्ट’ और ‘CJP प्रोटेस्ट’ तक, आखिर क्यों ‘संसद सत्र’ शुरू होते ही देश तोड़ने का ‘टूलकिट’ हो जाता एक्टिव?

सच कहूं तो अब पानी सिर के ऊपर से जा चुका है। आप खुद सोचकर देखिए, क्या ऐसा हो सकता है की देश में जब भी कोई बड़ा मौका हो, जब भी संसद का सत्र शुरू होने वाला हो, ठीक उसी वक्त अचानक आसमान से कोई विवाद टपक पड़े?

कोई विदेशी रिपोर्ट आ जाए, कोई डॉक्युमेंट्री रिलीज हो जाए या फिर रातों-रात सड़कों पर कोई नया टेंट गाड़कर प्रदर्शन शुरू हो जाए?

एक बार हो तो हम उसे ‘इत्तेफाक’ कह सकते हैं, दो बार हो तो ‘संयोग’ मान सकते हैं, लेकिन अगर पिछले 5-6 सालों से हर बार, बिल्कुल एक ही टाइमिंग और एक ही स्क्रिप्ट के साथ यही नौटंकी हो रही हो… तो भाई साहब, दाल में कुछ काला नहीं है, बल्कि पूरी की पूरी दाल ही सड़ चुकी है!

आज की तारीख में ये बात हर उस हिंदुस्तानी को समझ लेनी चाहिए जो इस देश से प्यार करता है की ये कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि भारत को अंदर से खोखला करने का एक बहुत ही खौफनाक और सुनियोजित प्रयोग है।

जब देश का विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी, आम चुनावों में मोदी सरकार को हराने में बार-बार औंधे मुंह गिरती है, तो वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है।

सत्ता की भूख में तड़पते हुए ये नेता उन विदेशी ताकतों (Deep State) की गोद में जाकर बैठ गए हैं, जिनका इकलौता मकसद भारत की बढ़ती हुई इकॉनमी और दुनिया में इसके बढ़ते हुए रुतबे को तोड़ना है।

आज हथियार और तोपें नहीं चल रहीं, आज तो ‘इनफॉर्मेशन वॉर’ (Information War) चल रही है।

और इस वॉर में हमारा अपना ही विपक्ष विदेशी आकाओं के भोंपू की तरह काम कर रहा है। चलिए आज इस पूरे ‘टूलकिट गैंग’ की वो जन्मकुंडली खोलते हैं, जिसे देखकर आप भी दाँतों तले उंगली दबा लेंगे।

2021 का बजट और ‘मानसून सत्र’ बर्बाद करने की साजिश, ‘किसान आंदोलन’ से लेकर ‘पेगासस जासूसी’ का हंगामा

कहानी की असली शुरुआत होती है साल 2021 से। वो वक्त था जब पूरी दुनिया कोरोना की मार से कराह रही थी, लेकिन भारत अपनी वैक्सीन बनाकर दुनिया को बचा रहा था।

29 जनवरी 2021 को भारत की संसद का बजट सत्र शुरू होना था। देश को उम्मीद थी की इस मुश्किल वक्त में एक शानदार बजट आएगा जो इकॉनमी को उबारेगा।

लेकिन इन गद्दारों को भारत का खड़ा होना कैसे बर्दाश्त होता? बजट सत्र से ठीक तीन दिन पहले, 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के मौके पर, इन्होंने वो खौफनाक तांडव रचा जिसे देश कभी नहीं भूल सकता।

सोची-समझी साज़िश के तहत, तथाकथित ‘किसान आंदोलन’ की आड़ में उपद्रवियों की भीड़ को लाल किले पर चढ़ा दिया गया।

हमारे तिरंगे का अपमान किया गया और दिल्ली की सड़कों पर पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया।

अब आप सोचेंगे की ये तो लोकल बवाल था, इसमें विदेशी टूलकिट कहाँ से आ गया? अरे भाई, पिक्चर तो अभी शुरू हुई थी!

जैसे ही लाल किले पर बवाल हुआ, अचानक से दुनिया भर के जाने-माने विदेशी सेलेब्रिटीज को भारत के ‘किसानों’ की याद आने लगी।

रिहाना (Rihanna) जैसी पॉप सिंगर, जिसे ये नहीं पता होगा की भारत के नक़्शे में पंजाब कहाँ है, वो अचानक से ट्वीट करने लगी।

ग्रेटा थनबर्ग (Greta Thunberg) नाम की वो बच्ची, जो पर्यावरण का रोना रोती है, वो अचानक भारत के कृषि कानूनों पर ज्ञान बांटने लगी।

ये सब क्या था? कोई मज़ाक चल रहा था क्या? नहीं! ये एक ‘ग्लोबल PR कैम्पेन’ था। और इनकी पोल तब खुल गई जब ग्रेटा थनबर्ग ने गलती से वो ‘टूलकिट’ (Toolkit) वाला डॉक्यूमेंट ही ट्विटर पर शेयर कर दिया।

उस टूलकिट में बाकायदा लिखा था की किस दिन क्या ट्वीट करना है, कौन से हैशटैग चलाने हैं, भारतीय दूतावासों के बाहर कब प्रदर्शन करना है और भारत की छवि कैसे बिगाड़नी है।

पूरा का पूरा भंडाफोड़ हो गया! लेकिन कांग्रेस और विपक्ष ने क्या किया? उन्होंने शर्मिंदा होने के बजाय इसी टूलकिट और आंदोलन के नाम पर पूरे बजट सत्र में जमकर बवाल काटा और संसद नहीं चलने दी।

अब आगे सुनिए। जब बजट सत्र बर्बाद हो गया, तो इनकी नज़रों में अगला टारगेट था 2021 का मानसून सत्र। तारीख तय थी- 19 जुलाई 2021 को संसद खुलनी थी।

पूरा देश इंतज़ार कर रहा था की विपक्ष कुछ जनहित के मुद्दे उठाएगा। लेकिन तभी, 19 जुलाई से ठीक एक दिन पहले… 18 जुलाई की रात को अचानक से एक विदेशी रिपोर्ट टपक पड़ती है।

इस रिपोर्ट में एक मनगढ़ंत दावा किया जाता है की भारत सरकार इज़रायल के ‘पेगासस’ (Pegasus) नाम के जासूसी सॉफ्टवेयर से विपक्ष के नेताओं, पत्रकारों और नामचीन लोगों के फोन हैक करवा रही है।

बस फिर क्या था! जैसे किसी ने बारूद के ढेर में माचिस लगा दी हो। राहुल गांधी और पूरी की पूरी कांग्रेसी ब्रिगेड छाती पीटने लगी।

“हमारा फोन टैप हो रहा है!”, “लोकतंत्र खत्म हो गया!”, “मोदी सरकार हमारी जासूसी कर रही है!”

19 जुलाई को जैसे ही मानसून सत्र शुरू हुआ, विपक्ष ने पेगासस का झूठा जिन्न निकालकर पूरी संसद को बंधक बना लिया।

पूरे के पूरे सत्र में एक भी दिन काम नहीं हुआ। जनता के करोड़ों रुपये जो संसद चलाने में खर्च होते हैं, वो इन नेताओं ने अपनी नौटंकी और ड्रामेबाज़ी की भेंट चढ़ा दिए।

लेकिन सच तो सच होता है ना यार, वो ज़्यादा दिन छुपता कहाँ है! इस पूरे पेगासस ड्रामे का अंत क्या हुआ पता है आपको? अगस्त 2022 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बाकायदा इस मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई।

और उस कमेटी की रिपोर्ट ने कांग्रेस और इस पूरे इकोसिस्टम के मुँह पर ऐसा करारा तमाचा जड़ा की इनकी आवाज़ ही बंद हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कह दिया की जिन लोगों ने अपने फोन जमा कराए थे, उनमें से किसी में भी पेगासस का कोई सबूत नहीं मिला!

मतलब सोचिए, ज़ीरो सबूत! कोई जासूसी नहीं, कुछ नहीं! सब कुछ झूठ, सब कुछ फर्जी!

एक विदेशी रिपोर्ट के नाम पर पूरे देश को बेवकूफ बनाया गया, सुप्रीम कोर्ट का समय बर्बाद किया गया और देश की संसद को ठप कर दिया गया।

और मज़े की बात देखिए, जब सुप्रीम कोर्ट से इतनी भयंकर फजीहत हो गई, तो राहुल गांधी या किसी भी कांग्रेसी नेता ने देश से माफी तक नहीं मांगी।

बेशर्मी की भी कोई हद होती है भाई! उन्हें माफ़ी मांगनी भी नहीं थी, क्योंकि उनका काम तो हो चुका था।

उन्हें बस वो मानसून सत्र बर्बाद करना था और ग्लोबल मीडिया को वो हेडलाइन देनी थी की “भारत में विपक्ष सुरक्षित नहीं है।”

2023 के संसद सत्र से ठीक पहले बीबीसी की फर्जी डॉक्युमेंट्री और ‘हिंडनबर्ग’ की एंट्री, विदेशी रिपोर्टों के पैरों में गिरा विपक्ष

तारीख तय थी- 31 जनवरी 2023 को संसद का बजट सत्र शुरू होना था। लेकिन टूलकिट गैंग की टाइमिंग देखिए!

सत्र शुरू होने से ठीक दो हफ्ते पहले, 17 जनवरी 2023 को ब्रिटेन की ‘बीबीसी’ (BBC) अचानक से नींद से जागती है और ‘India: The Modi Question’ नाम की एक प्रोपेगेंडा डॉक्युमेंट्री रिलीज कर देती है।

अरे भाई, 20 साल पुराने गुजरात दंगों के वो गड़े मुर्दे उखाड़े गए, जिन पर भारत की सर्वोच्च अदालत तक ने सालों की जांच के बाद प्रधानमंत्री मोदी को एकदम क्लीन चिट दे दी थी।

लेकिन क्या बीबीसी और कांग्रेस को भारत के सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है? नहीं यार! इन्हें लगता है की गोरे अंग्रेजों का वो मीडिया हाउस जो कहेगा, वही ब्रह्मवाक्य है।

जैसे ही ये डॉक्युमेंट्री आई, भारत में बैठे इन ‘अर्बन-नक्सलों’ ने इसे अपनी छाती से लगा लिया और पूरे देश में बवाल काटना शुरू कर दिया।

लेकिन रुको, पिक्चर अभी बाकी थी! 31 जनवरी के बजट सत्र से ठीक एक हफ्ता पहले, यानी 24 जनवरी को एक और धमाका किया गया।

अमेरिका की एक अनजान सी शॉर्ट-सेलर कंपनी ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ (Hindenburg Research) अचानक से प्रकट होती है और भारत के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रुप (अडानी) पर एक बिना सर-पैर की रिपोर्ट ठोक देती है।

अब ज़रा इस ‘हिंडनबर्ग’ का धंधा समझिए। ये कोई जांच एजेंसी नहीं है। इसका काम ही यही है की किसी कंपनी के खिलाफ झूठी-सच्ची अफवाहें उड़ाओ, शेयर मार्केट को क्रैश कराओ और जब शेयर गिरें तो ‘शॉर्ट सेलिंग’ के जरिए अरबों रुपये छाप लो।

ये शुद्ध रूप से ब्लैकमेलर और सटोरिए हैं। लेकिन हमारे देश के विपक्ष, और खासकर राहुल गांधी ने क्या किया? उन्होंने हिंडनबर्ग की इस रिपोर्ट को गीता और कुरान मान लिया!

जैसे ही 31 जनवरी को संसद खुली, कांग्रेस और पूरे विपक्ष ने वही अपना पुराना रटा-रटाया राग अलापना शुरू कर दिया।

जेपीसी (JPC) बिठाओ, प्रधानमंत्री जवाब दो, जांच कराओ! पूरे के पूरे बजट सत्र को इन्होने एक अमेरिकी सटोरिए की रिपोर्ट के नाम पर सूली पर चढ़ा दिया।

देश का शेयर बाज़ार क्रैश हो गया, लाखों आम निवेशकों के खून-पसीने की कमाई डूब गई, लेकिन ये कांग्रेसी नेता ठहाके लगा रहे थे। इन्हें देश की इकॉनमी के डूबने में अपनी राजनीतिक जीत नज़र आ रही थी।

बाद में क्या हुआ? वही जो हमेशा होता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की भी जांच कराई और हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को कचरे के डिब्बे में फेंक दिया।

कोर्ट ने साफ कहा की किसी विदेशी रिपोर्ट के आधार पर हम देश की कंपनियों को कटघरे में नहीं खड़ा कर सकते। लेकिन टूलकिट गैंग अपना काम कर चुका था। उन्होंने भारत की इकॉनमी पर दाग लगा दिया और बजट सत्र बर्बाद कर दिया।

2023 मानसून सत्र से ठीक एक दिन पहले मणिपुर का वीडियो वायरल करना और 2024 में SEBI चीफ पर हमला, टूलकिट गैंग की खौफनाक टाइमिंग का सच

चलिए, हिंडनबर्ग पार्ट-1 का तो काम तमाम हो गया। लेकिन साल 2023 का मानसून सत्र अभी बाकी था। 20 जुलाई 2023 को संसद दोबारा खुलने वाली थी।

पूरा देश जानता था की मणिपुर में मई महीने से ही जातीय हिंसा सुलग रही थी। हालात बहुत खराब थे और सरकार उन्हें कंट्रोल करने में लगी थी।

लेकिन गिद्ध राजनीति का सबसे घिनौना चेहरा तब सामने आया, जब 20 जुलाई के सत्र से ठीक एक दिन पहले… ध्यान दीजिएगा, ठीक एक दिन पहले (19 जुलाई को) इंटरनेट पर मणिपुर का एक बेहद खौफनाक और अमानवीय वीडियो अचानक से वायरल कर दिया गया।

अब आप ही बताइए, जो वीडियो दो महीने पुराना था, उसे वायरल करने के लिए ठीक 19 जुलाई का दिन ही क्यों चुना गया?

क्योंकि इन गिद्धों को मणिपुर की उन बेचारी महिलाओं के दर्द से कोई लेना-देना नहीं था। इन्हें तो बस संसद में आग लगाने के लिए एक ‘हथियार’ चाहिए था।

इन्हें पता था की अगर ये वीडियो मानसून सत्र से एक दिन पहले फेंका गया, तो सरकार बैकफुट पर आ जाएगी और पूरा सत्र हंगामे में बह जाएगा।

और बिल्कुल वही हुआ! 19 जुलाई को वीडियो वायरल हुआ और 20 जुलाई को संसद खुलते ही विपक्ष ने आसमान सिर पर उठा लिया।

ये टाइमिंग संयोग नहीं थी दोस्त, ये एक बहुत ही शातिर टूलकिट का हिस्सा था।

और ये सिलसिला 2023 में ही नहीं रुका। 2024 में आ जाइए। अगस्त 2024 में फिर से मानसून सत्र आना था। तब हिंडनबर्ग 2.0 का ड्रामा रचा गया।

इस बार इन्होंने सीधे भारत की रेगुलेटरी बॉडी SEBI की चीफ माधवी पुरी बुच पर ही कीचड़ उछाल दिया। मकसद साफ था- भारत के शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशकों का भरोसा तोड़ना और संसद में फिर से हंगामा काटना।

और तो और, जब नवंबर 2024 का शीतकालीन सत्र शुरू होने वाला था, तो उससे कुछ ही दिन पहले अमेरिका के एक कोर्ट से अडानी पर 265 मिलियन डॉलर की कथित रिश्वतखोरी की ‘इंडिक्टमेंट रिपोर्ट’ प्लांट करवा दी गई।

रिपोर्ट अमेरिका में छपी और यहाँ दिल्ली में बैठे कांग्रेसियों ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला ली! “भारत लुट गया, बर्बाद हो गया, संसद नहीं चलने देंगे!”

समझ रहे हैं आप इस पैटर्न को?

  • सत्र से पहले टूलकिट (2021)
  • सत्र से पहले पेगासस (2021)
  • सत्र से पहले बीबीसी (2023)
  • सत्र से पहले हिंडनबर्ग (2023)
  • सत्र से पहले मणिपुर वीडियो (2023)
  • सत्र से पहले सेबी चीफ पर हमला (2024)
  • सत्र से पहले अमेरिकी रिपोर्ट (2024)

क्या दुनिया में ऐसा कोई गणित है जो इन सब बातों को महज़ एक इत्तेफाक साबित कर सके? बिल्कुल नहीं!

ये एकदम शीशे की तरह साफ है की जब भी भारत का लोकतंत्र अपना काम शुरू करने वाला होता है, कोई अदृश्य हाथ विदेशी धरती से एक बटन दबाता है और यहाँ बैठे उनके गुलाम नाचना शुरू कर देते हैं।

जुलाई 2026 का मानसून सत्र और CJP प्रोटेस्ट का नया प्रायोजित ड्रामा, कैसे नीट के बहाने रातों-रात खड़ा कर दिया गया एक और बवाल

ज़रा आज के हालात देखिए। इसी हफ्ते, 20 जुलाई 2026 को भारत की संसद का मानसून सत्र शुरू होना था। सब कुछ नॉर्मल चल रहा था।

लेकिन जैसे ही जुलाई का महीना आया, अचानक से टूलकिट गैंग का स्लीपर सेल फिर से एक्टिवेट हो गया। रातों-रात दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक नया तमाशा खड़ा कर दिया गया।

इस बार मोहरा बनाया गया नीट (NEET) के मुद्दे को और युवाओं को भड़काने के लिए एकदम नया संगठन खड़ा कर दिया गया- ‘CJP’ (कॉकक्रोच जनता पार्टी)!

कल तक जिस CJP का कोई वजूद नहीं था, उसके पास रातों-रात छपे हुए पोस्टर, बैनर, टेंट, राशन-पानी, और हज़ारों लोगों की भीड़ जुटाने का पैसा कहाँ से आ गया?

एकदम से ‘चलो संसद’ का नारा दे दिया गया। युवाओं की आड़ में वो सारे वामपंथी चेहरे, वही अर्बन-नक्सल जंतर-मंतर पर प्रकट हो गए, जो किसान आंदोलन से लेकर शाहीन बाग तक में बिरयानी खा रहे थे।

और फिर वही हुआ जिसकी स्क्रिप्ट पहले से लिखी जा चुकी थी। 20 जुलाई को जैसे ही मानसून सत्र का ताला खुला, कांग्रेस और पूरे के पूरे विपक्ष (मल्लिकार्जुन खरगे से लेकर राहुल गांधी तक) ने इसी प्रायोजित CJP प्रोटेस्ट को अपना हथियार बना लिया।

संसद में पर्चे उछाले गए, नारेबाज़ी हुई और दोनों सदनों की कार्यवाही पूरी तरह से ठप कर दी गई। और यहाँ तक की PM आवास में धरना दे दिया गया!

अब इसका असर देखिए! जैसे ही संसद ठप हुई, ‘द गार्जियन’ (The Guardian) और बाकी विदेशी मीडिया ने अपनी वेबसाइट्स पर मोटी-मोटी हेडलाइंस छापना शुरू कर दिया की- “भारत के युवा सड़कों पर हैं”, “मोदी सरकार के खिलाफ भयंकर छात्र क्रांति शुरू!”

वाह रे टूलकिट! एक ही स्क्रिप्ट, एक ही तरीका, बस हर बार किरदार और बहाने नए होते हैं। और टाइमिंग? टाइमिंग हमेशा संसद सत्र से ठीक पहले की!

क्या कोई अंधा भी इस क्रोनोलॉजी को झुठला सकता है? ये साफ़ तौर पर संसद को हाईजैक करने का एक घिनौना प्रयोग है, जो हर बार शत-प्रतिशत विदेशी फंडिंग के दम पर अंजाम दिया जाता है।

जॉर्ज सोरोस की फंडिंग और डीप स्टेट की कठपुतली बनी कांग्रेस, चुनाव हारने के बाद विदेशी आकाओं के इशारे पर चल रहा है पूरा खेल

अब सवाल ये उठता है की आखिर ये सब करवा कौन रहा है? इस पूरी कठपुतली का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में है?

जवाब है- ‘डीप स्टेट’ (Deep State) और जॉर्ज सोरोस जैसे वो ग्लोबल सटोरिए, जो अपने पैसों के दम पर दुनिया के किसी भी देश की चुनी हुई सरकार को गिराने का शौक रखते हैं।

जॉर्ज सोरोस ने तो बाकायदा खुले मंच से ऐलान किया हुआ है की वो भारत में चल रही ‘राष्ट्रवादी सरकार’ को उखाड़ फेंकने के लिए 1 बिलियन डॉलर (अरबों रुपये) का फंड देगा।

ये पैसा हवा में तो खर्च होगा नहीं! ये पैसा आता है इन्हीं टूलकिट गैंग्स, विदेशी मीडिया पोर्टल्स और उन राजनेताओं की जेब में, जो चंद रुपयों और सत्ता के लालच में अपना ज़मीर बेच चुके हैं।

कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी का दोगलापन तो देखिए! इन लोगों को भारत के सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं है। इन्हें देश की जांच एजेंसियों (CBI, ED) पर भरोसा नहीं है।

इन्हें सेबी (SEBI) जैसी संस्थाओं पर भरोसा नहीं है। चुनाव आयोग (EC) को तो ये लोग दिन-रात गालियां देते ही हैं। लेकिन… इन्हें अमेरिका में बैठी ‘हिंडनबर्ग’ जैसी एक ब्लैकमेलर कंपनी पर 100% भरोसा है!

इन्हें बीबीसी (BBC) की फर्जी डॉक्युमेंट्री पर आँख बंद करके यकीन है! इन्हें विदेशी अखबारों के हर उस आर्टिक्ल पर भरोसा है, जो भारत को गाली देता हो।

क्यों भाई? ऐसा क्यों? क्योंकि जब जनता चुनाव में इन्हें लात मारकर बाहर का रास्ता दिखा देती है, तो इनकी सत्ता की भूख इन्हें पागल कर देती है।

इन्हें लगता है की अगर भारत की इकॉनमी क्रैश हो जाए, देश में दंगे हो जाएं, खून बहे और दुनिया में भारत की बदनामी हो, तो शायद मोदी सरकार गिर जाएगी और ये फिर से गद्दी पर बैठ जाएंगे।

यही वजह है की जब हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आती है और भारत का शेयर बाज़ार गिरता है, लाखों आम निवेशकों का पैसा डूबता है, तो कांग्रेसी नेता तालियां बजाते हैं।

जब विदेशी मीडिया भारत को ‘तानाशाही’ कहता है, तो राहुल गांधी खुश होकर उसी रिपोर्ट को ट्वीट करते हैं।

ये विपक्ष नहीं है, ये देश के गद्दारों का वो स्लीपर सेल है जो विदेशी आकाओं की उंगलियों पर नाच रहा है!

देश के विकास पर ब्रेक और टैक्सपेयर्स के करोड़ों स्वाहा, भारत को तोड़ने वाले इस गद्दार ईकोसिस्टम का इलाज़ जरुरी

लेकिन इन गद्दारों को एक बात समझनी होगी की जिस संसद को ये अपने बाप की जागीर समझकर ठप कर देते हैं, वो चलती कैसे है?

दोस्तों, संसद चलाने का एक मिनट का खर्च 2.5 लाख रुपये से ज़्यादा आता है! जब ये टूलकिट गैंग पूरे-पूरे सत्र में हंगामा करता है, तो आम टैक्सपेयर का करोड़ों-अरबों रुपया सीधे पानी में बह जाता है।

वो पैसा जिससे देश में अस्पताल बन सकते थे, सड़कें बन सकती थीं, सेना के लिए हथियार खरीदे जा सकते थे… वो पैसा इन नेताओं के घटिया ड्रामे और हंगामे की भेंट चढ़ जाता है।

और नुकसान सिर्फ पैसों का नहीं है। जिन बिलों से देश की किस्मत बदल सकती है, वो पास ही नहीं हो पाते। देश के ज़रूरी काम अटक जाते हैं।

ये विदेशी ताकतें बिल्कुल यही चाहती हैं की भारत अपनी ही अंदरूनी लड़ाइयों में इतना उलझ जाए की वो कभी चीन या अमेरिका को टक्कर देने के लायक ही न बचे।

लेकिन बहुत हो चुका! हमें इस ‘इनफॉर्मेशन वॉर’ को समझना होगा। ये ‘कॉकक्रोच’ (CJP) जैसे फर्जी आंदोलन, ये हिंडनबर्ग की रिपोर्टें, ये बीबीसी का प्रोपेगेंडा… ये सब एक ही ज़हरीले सांप के अलग-अलग फन हैं।

जब तक हमारी सरकार इन अर्बन-नक्सलों और विदेशी कठपुतलियों का पूरी तरह से इलाज़ नहीं करेगीग, तब तक ये ऐसे ही हमारे देश को खोखला करते रहेंगे।

भारत कोई ‘बनाना रिपब्लिक’ नहीं है जो जॉर्ज सोरोस के पैसों और चंद बिकाऊ नेताओं के इशारे पर चलेगा।

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