बीफ खाकर 'सेक्युलर' बनने वाले हिन्दू, वहीं दीप जलाने को 'कुफ्र' बताने वाले जिहादी, अपने पैरों में खुद कुल्हाड़ी मारता हुआ दक्षिण भारत का मूर्ख सनातन समाज

बीफ खाकर ‘सेक्युलर’ बनने वाले हिन्दू, वहीं दीप जलाने को ‘कुफ्र’ बताने वाले जिहादी, अपने पैरों में खुद कुल्हाड़ी मारता हुआ दक्षिण भारत का मूर्ख सनातन समाज

सच कहूं तो मुझे इस देश के जिहादियों से उतना डर नहीं लगता, जितना डर और घिन मुझे हमारे दक्षिण भारत के उन ‘सेक्युलर’ हिन्दू भाइयों से आती है जो ‘प्रोग्रेसिव’ दिखने की अंधी दौड़ में अपनी ही आस्था को सरेआम बाज़ार में नीलाम कर रहे हैं।

खुद को मॉर्डन और पक्का सेक्युलर साबित करने के लिए ये दक्षिण भारतीय हिंदू सरेआम चौराहों और कॉलेज कैंपसों में ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन करते हैं।

जिस गौ माता को हमारे पूर्वजों ने भगवान का दर्जा दिया, ये मूर्ख हिंदू उसी गौ माता को काटकर उसका मांस खाते हैं। ये अपनी थाली में बीफ सिर्फ इसलिए परोसते हैं ताकि ये उन जिहादियों और सेकुलरों की नज़रों में ‘हीरो’ बन सकें।

लेकिन लानत है ऐसे खोखले और आत्मघाती सेक्युलरिज्म पर! तुम जिनके सामने अपनी आस्था को काटकर परोस रहे हो, ज़रा उनकी कट्टरता का नंगा सच तो देख लो।

अभी जून की ताज़ा घटना ने इस एकतरफा ‘गंगा-जमुनी भाईचारे’ के मुंह पर ऐसा थूका है की बीफ खाने वाले पूरे दक्षिण भारत के सेक्युलर हिंदुओं को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।

केरल के पेराम्ब्रा इलाके में मुस्लिम लीग (IUML) की एक महिला विधायक, फातिमा तहिलिया, एक रेस्टोरेंट का उद्घाटन करने गई थीं।

भारत की हज़ारों साल पुरानी सनातन परंपरा है की शुभ काम के वक्त हम रोशनी करते हैं। उस महिला विधायक ने भी बस वहां एक ‘निलाविलक्कू’ (पारंपरिक तेल का दीया) जला दिया।

बस! वो एक दीया क्या जला, केरल के उस पूरे जिहादी इकोसिस्टम में जैसे किसी ने आग लगा दी। एक छोटे से दीये की रोशनी से इनका पूरा का पूरा मज़हब खतरे में आ गया!

3 जून को केरल के कोझिकोड में ‘समस्त केरल जमीयत-उल-उलेमा’ नाम के एक सुन्नी इस्लामिक संगठन ने आनन-फानन में एक मीटिंग बुलाई। और वहां से ये जिहादी फतवा निकला की दीप जलाना हिंदुओं की परंपरा है और हिन्दुओं की रीति-रिवाजों में शामिल होना पूरी तरह से ‘हराम’ है।

इन्होंने इसे ‘कुफ्र’ (अल्लाह के साथ किसी और को साझीदार मानना) घोषित कर दिया। इन्होंने साफ चेतावनी दे दी की जो भी मुसलमान ऐसे हिंदू रिवाज़ों को मानेगा, उसे इस्लाम से बाहर (खारिज) मान लिया जाएगा।

सिर्फ एक दीया जलाने पर खतरे में आया इस्लाम, केरल के इस्लामिक संगठन का जिहादी चेहरा

ये जो ‘समस्त केरल जमीयत-उल-उलेमा’ नाम का सुन्नी संगठन है, इसे केरल का सेक्युलर इकोसिस्टम बहुत ही ‘मॉडरेट’ यानी ‘नरमपंथी’ संगठन बताता है।

अरे भाई, अगर ये लोग ‘नरमपंथी’ हैं, तो फिर कट्टरपंथी कौन होता है? क्या सीधा ISIS वालों को ही कट्टरपंथी मानोगे? ये सेकुलरों का सबसे बड़ा फ्रॉड है।

ये हमें बताते हैं की केरल में इस्लाम बहुत प्रोग्रेसिव है, वहां लोग बहुत पढ़े-लिखे हैं। लेकिन हकीकत ये है की शिक्षा का इस जिहादी मानसिकता से कोई लेना-देना ही नहीं है। तुम चाहे इन्हें कितनी भी डिग्री दे दो, इनके दिमाग में जो शरिया का कीड़ा घुसा हुआ है, वो कभी नहीं निकलता।

इस फतवे से हमें एक बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए। ये जिहादी अपने मज़हब, अपने दीन और अपने शरिया को लेकर एक मिलीमीटर का भी समझौता करने को तैयार नहीं हैं।

इनके लिए एक हिंदू के साथ खड़े होकर दीप जलाना कोई सांस्कृतिक या कल्चरल चीज़ नहीं है। इनके दिमाग में ये एकदम क्लियर है की भारत की सनातन संस्कृति ‘काफिरों’ की संस्कृति है, और एक मुसलमान कभी भी काफिरों के तौर-तरीकों को अपना नहीं सकता।

ये लोग सेक्युलरिज्म का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ तब तक करते हैं जब तक इन्हें हिंदुओं से अपने हक़ मांगने हों, जब इन्हें सरकारी योजनाओं का फायदा उठाना हो या जब इन्हें मस्जिदों के लिए ज़मीनें चाहिए हों।

लेकिन जब बात हिंदू संस्कृति का सम्मान करने की आती है, तो ये तुरंत शरिया का डंडा लेकर खड़े हो जाते हैं और उस नेता या इंसान को सरेआम ज़लील करके इस्लाम से बेदखल करने की धमकियां देने लगते हैं।

अगर आपको लग रहा है की ये सिर्फ एक दीया जलाने का मामला है, तो आप इस ‘समस्त’ नाम के जिहादी संगठन के खौफनाक इतिहास को नहीं जानते।

इस संगठन का इतिहास देशद्रोह और कट्टरपंथ के काले कारनामों से भरा पड़ा है। ये वही लोग हैं जिन्होंने 2021 में केरल के मुस्लिम बहुल इलाकों (यानी मालाबार क्षेत्र) को काटकर एक अलग राज्य बनाने की मांग की थी।

ये सीधे-सीधे 1947 वाली साज़िश है। ये केरल के अंदर एक नया ‘इस्लामिक देश’ बनाना चाहते हैं जहाँ सिर्फ शरिया का कानून चले। इनकी डेमोग्राफी इतनी बढ़ चुकी है की अब ये सीधा भारत के नक्शे को काटने की बात करते हैं और केरल की कम्युनिस्ट सरकार इनके सामने दुम हिलाती खड़ी रहती है।

और हिंदुओं से नफरत का इनका ये पहला मामला नहीं है। याद कीजिए 2025 का वो वक्त, जब केरल में ‘ओणम’ का त्योहार मनाया जा रहा था। ओणम पूरे केरल का सबसे बड़ा और पारंपरिक त्योहार है।

लेकिन इन्हीं जिहादियों ने तब भी एक खौफनाक फरमान जारी किया था की किसी भी मुसलमान का ओणम के जश्न में शामिल होना ‘शिर्क’ (इस्लाम में सबसे बड़ा पाप) है। ओणम की दावत खाना, ओणम की बधाई देना- इनके लिए सब कुछ हराम था।

बीफ खाकर वामपंथियों की तालियां बटोरने वाला केरल का मूर्ख हिन्दू समाज, अपनी ही जड़ों में डाल रहा है तेज़ाब

अब ज़रा इस सिक्के के दूसरे और सबसे दर्दनाक पहलू को देखिए। एक तरफ तो वो जिहादी हैं जो अपने मज़हब के लिए इतने कट्टर हैं की एक दीया जलने पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं।

और दूसरी तरफ? दूसरी तरफ दक्षिण भारत (खासकर केरल) का वो मूर्ख, आत्मघाती हिंदू है जो खुद को ‘मॉर्डन और सेक्युलर’ साबित करने की अंधी दौड़ में अपने ही धर्म की पीठ में रोज़ छुरा घोंप रहा है।

केरल का वो सेक्युलर हिंदू कितना नीच हो चुका है, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं की वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और बीजेपी का राजनीतिक विरोध करने के लिए सीधे अपने भगवानों और अपनी आस्था को गालियां देने लगता है।

केरल के कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में वामपंथी छात्र संगठनों (SFI और DYFI) के हिंदू लड़के-लड़कियां खुलेआम सड़कों पर ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन करते हैं।

ज़रा सोचिए इस वैचारिक नपुंसकता को! जिस गौ माता में हमारी सनातन आस्था बसती है, जिसे हमारे पूर्वजों ने भगवान का दर्जा दिया, ये कम्युनिस्ट हिंदू उस गौ माता को सरेआम सड़कों पर काटते हैं, उसका बीफ पकाते हैं और फिर बड़े गर्व से उसकी फोटो सोशल मीडिया पर डालकर कहते हैं की “हम सेक्युलर हैं, हम फासीवाद का विरोध कर रहे हैं।”

ये कैसा फासीवाद का विरोध है भाई जहाँ तुम अपने ही धर्म की छाती चीर रहे हो? ये केरल का सेक्युलर हिंदू उन जिहादियों की नज़रों में ‘हीरो’ बनना चाहता है। ये चाहता है की जिहादी इसके बीफ खाने पर ताली बजाएं।

लेकिन ये मूर्ख ये नहीं समझता की जिन जिहादियों के सामने तुम बीफ खाकर अपनी लिबरल पहचान पेश कर रहे हो, वही जिहादी तुम्हारे एक छोटे से ‘दीपक’ को भी अपने मज़हब के लिए खतरा मानते हैं।

जब कोई जिहादी संगठन दीप जलाने से साफ इनकार कर देता है और उसे ‘कुफ्र’ बताता है, तो यही केरल के लिबरल हिंदू बड़े बेशर्म होकर कहते हैं की “ये तो उनकी धार्मिक आज़ादी है, हमें उनके मज़हब का सम्मान करना चाहिए।”

लेकिन जब यही हिंदू अपनी धार्मिक आस्थाओं (गौ-रक्षा या मंदिरों की पवित्रता) की बात करता है, तो यही कम्युनिस्ट इकोसिस्टम उसे ‘सांप्रदायिक’ और ‘संघी’ घोषित कर देता है।

अरे लानत है ऐसे हिंदू समाज पर जो दूसरों को खुश करने के लिए अपनी ही जड़ों में तेज़ाब डाल रहा है! केरल का हिंदू ये भूल चुका है की सेक्युलरिज्म का मतलब अपने धर्म को मिटाना नहीं होता।

जो कौम अपने ही इष्ट देवों का, अपनी ही परंपराओं का सरेआम मज़ाक उड़ते हुए देखे और फिर बीफ की प्लेट लेकर उन जिहादियों के साथ दावत उड़ाए, उस कौम को मिटाने के लिए किसी बाहर के दुश्मन की ज़रूरत नहीं है।

वो कौम अपनी कब्र खुद खोद रही है, और यही आज के दक्षिण भारत और केरल के वामपंथी हिंदुओं का सबसे खौफनाक और नंगा सच है!

वामन अवतार को भूलकर ओणम को ‘सेक्युलर’ बनाने का पाप, अपनी सनातन संस्कृति का खुद चीरहरण कर रहे दक्षिण के हिन्दू

केरल का सबसे बड़ा त्योहार ‘ओणम’ है। हज़ारों सालों से ये त्योहार भगवान विष्णु के ‘वामन अवतार’ और महान शिवभक्त राजा ‘महाबली’ की याद में पूरी श्रद्धा और पूजा-पाठ के साथ मनाया जाता था। ये एक शुद्ध सनातन हिंदू त्योहार है।

लेकिन पिछले कुछ दशकों में इन कम्युनिस्ट और सेक्युलर कीड़ों ने क्या किया? इन्होंने केरल के हिंदुओं के दिमाग में ये ज़हर घोल दिया की ओणम को अगर हिंदू त्योहार कहोगे, तो वहां रहने वाले मुसलमानों और ईसाइयों को बुरा लग जाएगा! हमारा ‘भाईचारा’ खतरे में पड़ जाएगा!

तो फिर उपाय क्या निकाला गया? इन मूर्ख वामपंथी हिंदुओं ने अपने ही भगवान विष्णु को अपने त्योहार से बाहर निकाल फेंका। इन्होंने बड़ी बेशर्मी से ओणम को सिर्फ एक ‘फसल का त्योहार’ और ‘मलयाली कल्चर’ का नाम दे दिया ताकि इसमें जिहादी और मिशनरी लोग भी आकर शामिल हो सकें।

इन्होंने मंदिरों की पूजा छोड़कर सिर्फ नावों की रेस और फूलों की रंगोली को ओणम बना दिया। ज़रा सोचिए इस गिरी हुई मानसिकता को! दुनिया की कौन सी ऐसी कौम होगी जो दूसरों को खुश करने के लिए अपने आराध्य देवों का ही अपने त्योहारों से बहिष्कार कर दे?

और इस बेशर्मी का सिला क्या मिला? जिस ओणम को सेक्युलर बनाने के लिए केरल के हिंदुओं ने अपनी आत्मा बेच दी, उसी ओणम के लिए इन जिहादी संगठनों ने क्या फतवा निकाला?

2025 में और उससे पहले भी कई बार, इन्हीं जिहादियों ने फरमान जारी कर दिया की ओणम की दावत (Sadya) खाना, या ओणम की बधाई देना इस्लाम में ‘शिर्क’ है।

इन्होंने साफ कह दिया की चाहे तुम ओणम को फसल का त्योहार कहो या कुछ और, है तो ये काफिरों का त्योहार, और एक सच्चा मुसलमान कभी काफिरों के जश्न में शामिल नहीं हो सकता!

ये था इन सेक्युलर हिंदुओं के गाल पर जिहादियों का वो करारा तमाचा जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी।

सेक्युलरिज्म का ठेका सिर्फ हिन्दुओं की चिता पर क्यों, जिहादियों की कट्टरता से सबक ना लेना बनेगा सनातनियों की सबसे बड़ी भूल

आज हम जिस मुहाने पर खड़े हैं, वहां सबसे बड़ा सवाल यही है की आखिर इस देश में सेक्युलरिज्म का सारा ठेका क्या सिर्फ हिंदुओं ने ले रखा है? क्या ये भाईचारा सिर्फ हमारी ही चिता पर जलेगा?

जब एक जिहादी संगठन सरेआम एक दीपक जलाने को ‘कुफ्र’ बता देता है, जब वो हिंदू परंपराओं को हराम घोषित कर देता है, तो इस देश के वो सारे लिबरल और वामपंथी पत्रकार कहां जाकर छुप जाते हैं जो दिन-रात ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब की कसमें खाते हैं? तब ये लोग टीवी पर डिबेट क्यों नहीं करते की “केरल में इस्लाम में कट्टरता बढ़ रही है”?

क्योंकि इस लिबरल इकोसिस्टम ने एक अलिखित नियम बना रखा है। नियम ये है की अगर कोई मुसलमान अपने मज़हब के लिए कट्टर है, अगर वो वंदे मातरम बोलने से इनकार कर दे, अगर वो किसी हिंदू के घर का प्रसाद खाने से मना कर दे, तो वो उसकी ‘धार्मिक आज़ादी’ है और वो एक ‘सच्चा मुसलमान’ है।

लेकिन अगर एक हिंदू अपने माथे पर तिलक लगा ले, अगर वो नवरात्रों में अपनी गली में मीट की दुकान बंद करने को कह दे, तो वो ‘संघी आतंकवादी’ और ‘सांप्रदायिक’ हो जाता है!

हमें इस दोगले सिस्टम को गालियां देने के बजाय, इन जिहादियों की कट्टरता से एक बहुत बड़ी सीख लेनी चाहिए। हां भाई, हमें इनसे सीखना चाहिए! ये जिहादी अपने शरिया और अपने मज़हब को लेकर एक इंच का भी समझौता नहीं करते।

इन्हें दुनिया की कोई परवाह नहीं है। इन्हें फर्क नहीं पड़ता की न्यूयॉर्क टाइम्स क्या लिखेगा, इन्हें फर्क नहीं पड़ता की लिबरल मीडिया इन्हें पिछड़ा कहेगा।

इनके लिए इनका इस्लाम सबसे ऊपर है। जब इन्हें लगता है की एक दीपक जलने से इनका दीन भ्रष्ट हो जाएगा, तो ये डंके की चोट पर उस नेता को सरेआम ज़लील कर देते हैं।

और हम हिंदू? हम तो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के नशे में इतने पागल हो चुके हैं की जो लोग हमारी थाली में रोज़ थूक रहे हैं, हम उन्हें ही बार-बार दावत पर बुलाते हैं।

हम अपनी इफ्तार पार्टियां आयोजित करते हैं, हम उनकी टोपी पहनकर फोटो खिंचवाते हैं ताकि समाज हमें ‘प्रोग्रेसिव’ कहे। हमारी इसी सहिष्णुता ने आज हमारी गर्दन पर तलवार रखवा दी है।

जिस दिन हिंदू समाज ये समझ जाएगा की हमारी ये सहिष्णुता अब हमारी सबसे बड़ी कायरता बन चुकी है, उसी दिन इस देश का और सनातन का उद्धार होगा।

जब तक हम भी अपने धर्म के लिए इन जिहादियों की तरह ‘कट्टर’ नहीं बनेंगे, तब तक हम ऐसे ही कटते रहेंगे और ये हमारी पीठ में खंजर घोंपते रहेंगे।

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