जब हम और आप टीवी पर बजने वाले ‘विश्वगुरु’ और ‘5 ट्रिलियन इकॉनमी’ के ढोल सुन रहे होते हैं, तो हमें लगता है की हमारा शेयर बाज़ार तो रॉकेट बना हुआ है और दुनिया भर के देश हमारी तरक्की देखकर जल रहे हैं।
लेकिन भाई, ज़रा इन नारों और जुमलों के खुमार से बाहर निकलिए। अभी हाल ही में ग्लोबल मार्केट से एक ऐसी खौफनाक रिपोर्ट आई है, जिसने हमारी इस ‘सब-चंगा-सी’ वाली नौटंकी के मुंह पर ऐसा करारा तमाचा मारा है की नींद उड़ जानी चाहिए।
मैं बात कर रहा हूँ ‘MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स’ की। अगर आसान भाषा में समझाऊं, तो Morgan Stanley द्वारा बनाया गया ये इंडेक्स दुनिया भर के विदेशी निवेशकों का एक ‘रिपोर्ट कार्ड’ है।
दुनिया के जो बड़े-बड़े फंड मैनेजर अरबों-खरबों रुपये लेकर बैठे हैं, वो इसी लिस्ट को देखकर तय करते हैं की किस देश में पैसा लगाना है और किस देश से पैसा निकालना है।
अब ज़रा इस रिपोर्ट कार्ड में भारत का हाल सुन लीजिए। इस इंडेक्स में उभरते हुए बाज़ारों (Emerging Markets) की टॉप 10 कंपनियों की जो लिस्ट आई है, उसमें से हमारे देश भारत का पूरी तरह से सूपड़ा साफ हो गया है!
जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना। 140 करोड़ की आबादी और दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का डंका पीटने वाले हमारे भारत की एक भी कंपनी दुनिया के इस टॉप 10 में अपनी जगह नहीं बचा पाई।
और जब ये खबर बाहर आई, तो हमारे यहां के कुछ ‘सरकारी बाबू’ और इकॉनमी के ठेकेदार बहानेबाज़ी करने लगे। वो कहने लगे की “अरे, ट्रंप के नए टैरिफ आ गए हैं, हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव चल रहा है, लाल सागर में लड़ाई चल रही है, इसलिए हमारा बाज़ार गिर रहा है।”
अरे भाई, ये फालतू के बहाने किसी और को सुनाना! क्या ट्रंप के टैरिफ और लाल सागर का तनाव सिर्फ भारत के लिए है? जो ताइवान और साउथ कोरिया हमारे बगल से गुज़र कर आज टॉप पर बाप बनकर बैठ गए हैं, क्या उनके लिए दुनिया में शांति चल रही थी?
असली सच्चाई ये है की हम अपनी पीठ थपथपाने में इतने व्यस्त हो गए की हमने देखा ही नहीं कि दुनिया की टेक्नोलॉजी किस रफ्तार से आगे निकल गई है और हम कितने पीछे छूट गए हैं।
विदेशी निवेशकों ने मोड़ा मुंह और ग्लोबल बाज़ार में भारत ने खोई अपनी आधी हैसियत, 2024 से 2026 तक का वो डरावना सच
अगर आपको लग रहा है की एक लिस्ट से बाहर होने से क्या फर्क पड़ता है, तो ज़रा इन आंकड़ों की गहराई में उतर कर देखिए। ये आंकड़े बता रहे हैं की दुनिया भर के विदेशी निवेशक अब भारत की कंपनियों से अपना मुंह मोड़ रहे हैं।
ज़रा 2024 का वक्त याद कीजिए। उस समय इसी MSCI इंडेक्स में भारत का कुल वेटेज (हिस्सेदारी) 18.2 प्रतिशत के आसपास हुआ करता था। हम सीना तानकर खड़े थे की हम तो चीन को पछाड़ने वाले हैं।
लेकिन आज, 2026 के इस ताज़ा आंकड़े को देखिए। भारत की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत से धड़ाम से गिरकर मात्र 10.87 प्रतिशत पर आ गई है। मतलब, महज़ दो साल के अंदर हमने ग्लोबल बाज़ार में अपनी आधी हैसियत खो दी!
हमारे देश के जो दो सबसे बड़े नगीने माने जाते थे- Reliance Industries और HDFC Bank- जो पिछली बार तक इस लिस्ट में सातवें और आठवें नंबर पर शान से बैठे थे, आज उन्हें धक्के मारकर टॉप 10 से बाहर कर दिया गया है। HDFC 11वें और रिलायंस 12वें पायदान पर खिसक गए हैं।
अब एक आम हिंदुस्तानी सोचेगा की यार, रिलायंस और एचडीएफसी तो देश में खूब पैसा कमा रहे हैं, फिर विदेशी निवेशक इन्हें क्यों भाव नहीं दे रहे? तो भाई, इसका जवाब बहुत कड़वा है।
ये ग्लोबल निवेशकों का हमें दिया गया एक सीधा मैसेज है। विदेशी निवेशक अब बैंकों, तेल रिफाइनरियों और पुरानी कन्वेंशनल (Conventional) कंपनियों में पैसा लगाने को तैयार नहीं हैं। उनका साफ मानना है की इन कंपनियों का जो Peak था, वो आ चुका। अब भविष्य इनमें नहीं है।
अर्थव्यवस्था को दिखाने वाले ये पारंपरिक शेयर अब निवेशकों के लिए बोरिंग हो चुके हैं। और सबसे डरावनी बात ये है की जब ये निवेशक पुरानी कंपनियों से पैसा निकाल रहे हैं, तो भारत के पास उन्हें देने के लिए कोई ‘भविष्य की कंपनी’ है ही नहीं!
ताइवान और साउथ कोरिया ने दिखा दी हमें हमारी असली हैसियत, सेमीकंडक्टर और AI के दम पर दुनिया पर राज
अब ज़रा उन देशों की तरफ नज़र डालिए जिन्होंने हमें हमारी असली औकात दिखा दी है। भारत के नक्शे के सामने ताइवान और साउथ कोरिया जैसे देश एक छोटे से बिंदु की तरह नज़र आते हैं।
ना उनके पास हमारी जैसी अथाह ज़मीन है, ना हमारे जैसा बड़ा कंज्यूमर बेस (बाज़ार) है, और ना ही 140 करोड़ लोगों की फौज है। लेकिन आज वो दोनों देश इस ग्लोबल इंडेक्स की छाती पर पैर रखकर खड़े हैं।
इस उभरते हुए बाज़ारों की लिस्ट में ताइवान का वेटेज 26.41 प्रतिशत है और साउथ कोरिया का 23.06 प्रतिशत! और हम 10 प्रतिशत पर रेंग रहे हैं।
आखिर इन छोटे से देशों ने ऐसा क्या चमत्कार कर दिया की दुनिया भर के विदेशी निवेशक अपना बोरा भर-भर कर डॉलर इनके चरणों में डाल रहे हैं?
इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही जवाब है- आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर (Semiconductors)! ताइवान और कोरिया की सरकारों ने आज से 10-15 साल पहले ही ये भांप लिया था की आने वाला भविष्य ना तो तेल का है और ना ही डेटा एंट्री का। आने वाला भविष्य उस ‘चिप’ का है जो दुनिया की हर मशीन, हर मोबाइल और हर AI सर्वर को चलाएगी।
ज़रा इनकी कंपनियों का खौफनाक रिटर्न देखिए। टॉप 10 में सबसे ऊपर बैठी है ताइवान की TSMC (Taiwan Semiconductor Manufacturing Company)। इस अकेली कंपनी का वेटेज पूरे भारत के शेयर बाज़ार से ज्यादा (14.46%) है!
TSMC ने पिछले एक साल में निवेशकों को 111 प्रतिशत का भारी-भरकम रिटर्न दिया है। साउथ कोरिया की सैमसंग (Samsung Electronics) ने 399 प्रतिशत का रिटर्न दिया है।
और हद तो तब हो गई जब कोरिया की ही एक और सेमीकंडक्टर कंपनी ‘SK Hynix’ ने एक साल में 775 प्रतिशत का छप्पर फाड़ रिटर्न दे डाला!
आज दुनिया भर के विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI – Foreign Portfolio Investors) भारत के बाज़ार से अपना पैसा ऐसे निकाल कर भाग रहे हैं जैसे किसी डूबते हुए जहाज़ से चूहे भागते हैं।
साल 2026 की शुरुआत से लेकर अब तक, विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से 2 लाख 25 हज़ार करोड़ रुपये (2.25 Lakh Crore) निकाल लिए हैं!
और सिर्फ इसी ताज़ा जून महीने की बात करूं, तो महज़ कुछ ही दिनों के भीतर 60,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम फंड भारत से निकालकर रातों-रात ताइवान और साउथ कोरिया के बाज़ारों में शिफ्ट कर दिया गया।
जब दुनिया के निवेशकों को एक साल में अपना पैसा चार गुना और आठ गुना होता हुआ दिख रहा है, तो वो भारत के बैंकों में पैसा क्यों फंसाएंगे जहाँ उन्हें 10-15 परसेंट का रिटर्न मिलता है?
दुनिया का सारा पैसा, सारा कैपिटल आज एआई (AI) और चिप्स (Chips) की तरफ भाग रहा है। ये देश आज टेक्नोलॉजी के बाप बन चुके हैं, और हम भारतीय सिर्फ यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर इनके बनाए हुए फोन चलाकर खुश हो रहे हैं।
फालतू ज्ञान बांटने वाली भारत की दादाजी के ज़माने की ‘IT कंपनियां’, AI को ‘बुलबुला’ बताकर देश का डुबा रहे हैं भविष्य
ताइवान और कोरिया की इस ज़बरदस्त छलांग को देखने के बाद सबसे ज़्यादा खून तो तब खौलता है जब हम अपने देश की तथाकथित ‘महान’ आईटी (IT) कंपनियों की तरफ देखते हैं।
ये टीसीएस (TCS), इंफोसिस (Infosys), विप्रो (Wipro) और टेक महिंद्रा जैसी कंपनियां, जिन्हें हम दशकों से देश का गौरव मानकर सिर पर बिठाए घूम रहे हैं, असल में ग्लोबल मार्केट में इनकी हैसियत क्या रह गई है?
सच्चाई ये है की हमारी ये आईटी कंपनियां कोई ‘इनोवेशन’ नहीं कर रही हैं। ये महज़ ‘साइबर कुली’ (Cyber Coolies) बनकर रह गई हैं। इनका बिज़नेस मॉडल क्या है?
देश के इंजीनियरिंग कॉलेजों से 25 से 30 हज़ार रुपये महीने पर सस्ते युवाओं की फौज उठाओ, उन्हें कंप्यूटर के सामने बिठाओ, और अमेरिका की कंपनियों के लिए पुरानी कोडिंग, सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस और बीपीओ (BPO) की सर्विस देते रहो।
हमने आज तक दुनिया को कोई Google, कोई Facebook, या कोई Microsoft बनाकर नहीं दिया।
और जब पूरी दुनिया में AI का तूफान आया, तो हमारे इन आईटी दिग्गजों का रवैया कैसा था? अमेरिका में बैठी Nvidia नाम की एक कंपनी, जो AI के लिए चिप बनाती है, वो आज 5 ट्रिलियन डॉलर (5 Trillion Dollar) की कंपनी बन चुकी है!
दुनिया की टॉप टेक कंपनियां (Alphabet, Microsoft, Amazon) AI के इंफ्रास्ट्रक्चर पर साल का 700 बिलियन डॉलर (लगभग 58 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर रही हैं। और हमारे दिग्गज क्या कर रहे हैं?
हमारे देश के एक बहुत बड़े आईटी दिग्गज, नारायण मूर्ति साहब, टीवी पर आकर ज्ञान बांट रहे थे की “देश के युवाओं को हफ्ते में 70 घंटे काम करना चाहिए।”
अरे सर जी! अगर 70 घंटे गधे की तरह वही पुरानी कोडिंग और बीपीओ का काम करेंगे, तो देश आगे नहीं बढ़ेगा। दुनिया अब हार्डवर्क से नहीं, स्मार्टवर्क AI से चल रही है।
हद तो तब हो गई जब इंफोसिस के ही एक पूर्व CFO मोहनदास पई ने कहा की भारत की टॉप 10 कंपनियों को AI में निवेश करना चाहिए, लेकिन बाकी कई भारतीय दिग्गजों ने उस वक्त AI को सिर्फ एक ‘हवा का बुलबुला’ बताकर टाल दिया।
इन्होंने सोचा की ये एआई-वेआई दो दिन का बुखार है, उतर जाएगा। अपनी इस दकियानूसी और घमंडी सोच के चक्कर में इन्होंने पूरे देश का आईटी भविष्य दांव पर लगा दिया।
दुनिया भर की कंपनियां रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर पानी की तरह पैसा बहा रही हैं, और हमारे देश की कंपनियां R&D पर अपनी GDP का 1 प्रतिशत भी खर्च नहीं कर रहीं! अगर तुम अपनी कमाई का पैसा नई चीज़ें खोजने पर नहीं लगाओगे, तो तुम हमेशा अमेरिका के नौकर ही बने रहोगे।
हमारे देश के जो IIT से निकले हुए सबसे तेज़ दिमाग वाले लड़के हैं, वो भी भारत में कोई नई कंपनी खड़ी करने के बजाय, अमेरिका जाकर वहां की AI कंपनियों में नौकरी करना पसंद कर रहे हैं।
हमारे इस ‘सर्विस सेक्टर’ वाले अहंकार ने हमें AI की रेस में इतना पीछे धकेल दिया है की आज हम ग्लोबल मार्केट की टॉप 10 की लिस्ट में दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहे।
अब लानी होगी AI क्रांति, वरना लाचार बनके डिजिटल गुलामी के लिए तैयार रहे भारत
अब ये ‘हम सबसे तेज़ी से बढ़ रहे हैं’ वाला अहंकार और झूठा दिलासा छोड़ना होगा। अगर हमें वाकई 5 ट्रिलियन या 10 ट्रिलियन डॉलर की असली और मज़बूत इकॉनमी बनना है, तो हमें अपनी इस पूरी व्यवस्था को जड़ों से हिलाना होगा।
सरकार ने सेमीकंडक्टर और आईटी के लिए पीएलआई (PLI – Production Linked Incentive) जैसी कुछ स्कीमें निकाली हैं, ये अच्छी बात है। लेकिन सिर्फ कागज़ों पर पॉलिसी बनाने से दुनिया नहीं जीती जाती।
आज भारत को उसी आक्रामकता की ज़रूरत है, जिस तरह हमने 60 और 70 के दशक में भुखमरी से लड़ने के लिए ‘हरित क्रांति’ और दूध की कमी दूर करने के लिए ‘श्वेत क्रांति’ की शुरुआत की थी।
उस वक्त देश भूखा मर रहा था, तो हमने पूरी ताकत झोंक दी। आज हम तकनीकी रूप से भूखे और नंगे हो रहे हैं, तो आज हमें एक भयानक ‘सेमीकंडक्टर और AI क्रांति’ की ज़रूरत है।
सरकार को चाहिए की वो भारत की इन टॉप कंपनियों को एक कमरे में बैठाए और डंके की चोट पर कहे की “बहुत कमा लिया तुमने सर्विस सेक्टर से। अब अपनी तिजोरियां खोलो और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में पैसा लगाओ।”
हमारे देश का जो आरएंडडी (R&D) बजट है, वो हमारी जीडीपी (GDP) का 0.7 प्रतिशत से भी कम है! ये शर्मनाक है। जब तक सरकार और प्राइवेट सेक्टर मिलकर इसे 3 से 4 प्रतिशत तक नहीं ले जाएंगे, तब तक हम दुनिया के इस बाज़ार में सिर्फ पिछलग्गू बनकर रह जाएंगे।
हमारे देश के जो बड़े-बड़े अरबपति हैं, जो सीमेंट, रियल एस्टेट और रिटेल की दुकानें खोलकर खुश हो रहे हैं, उन्हें भी अपना विज़न बदलना होगा। देश को मॉल और सुपरमार्केट से ज़्यादा आज चिप मैन्युफैक्चरिंग प्लांट की ज़रूरत है।
जिस देश से आईआईटी (IIT) के सबसे ब्रिलियंट दिमाग निकलते हैं, वो दिमाग भारत में कोई नई AI कंपनी खड़ी करने के बजाय अमेरिका जाकर क्यों नौकरी कर रहे हैं? क्योंकि हमने उन्हें वो इकोसिस्टम, वो फंडिंग और वो आज़ादी दी ही नहीं!
