अगर आप दुनिया का सबसे बड़ा पाखंड और सबसे बड़ा सिंडिकेट देखना चाहते हैं, तो ज़रा जिओ-पॉलिटिक्स पर नज़र डालिए।
एक तरफ वो लोग हैं जो धर्म के नाम पर खुलेआम दुनिया पर धौंस दिखा रहे हैं, और दूसरी तरफ हम हैं, जो अपनी ही सनातन जड़ों को भूलकर सिर्फ ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का ज्ञान झाड़ रहे हैं।
कभी ठंडे दिमाग से सोचिए की जब दुनिया भर के 57 मुस्लिम देश अपने धर्म के नाम पर एकजुट होकर पूरी दुनिया को ब्लैकमेल कर सकते हैं..
तो सदियों पुरानी, एक ही पावन मिट्टी से जन्मी और एक ही ‘सनातन डीएनए’ (Sanatan DNA) वाली हिन्दू और बौद्ध आबादी अलग-थलग क्यों पड़ी है?
भारत से लेकर नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और जापान तक, जब हमारी जड़ें एक हैं, हमारा इतिहास एक है, तो हम 170 करोड़ लोग एक होकर अपना ताकतवर गुट क्यों नहीं बना पा रहे?
57 मुस्लिम देशों का ‘उम्माह’ सिंडिकेट, और धर्म के नाम पर दुनिया भर में इनकी दादागिरी
भाई साहब, दुनिया में गुंडागर्दी कैसे की जाती है, ये कोई इन 57 इस्लामिक देशों से सीखे।
सऊदी अरब और टर्की से लेकर पाकिस्तान और अल्जीरिया तक.. साल 1969 में इन्होंने मिलकर OIC (Organization of Islamic Cooperation) नाम का एक संगठन खड़ा किया।
कहने को तो ये इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन है, लेकिन असल में ये संयुक्त राष्ट्र (UN) के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे खूंखार धार्मिक सिंडिकेट है।
इनका एजेंडा बिल्कुल क्लीयर है- ‘मुस्लिम उम्माह’ यानी वैश्विक मुस्लिम भाईचारा।
इनके पास अरबों डॉलर का ‘Oil Money’ (तेल का पैसा) है, और इसी पैसे की धौंस दिखाकर ये पूरी दुनिया को ब्लैकमेल करते हैं।
आप इनका दुस्साहस देखिए! दुनिया के किसी भी कोने में, चाहे फिलिस्तीन हो या कश्मीर, अगर किसी मुस्लिम को खरोंच भी आ जाए, तो ये 57 देश एक सुर में कुत्तों की तरह भौंकना शुरू कर देते हैं।
ये डंके की चोट पर अपने धर्म को अपनी विदेश नीति (Foreign Policy) का हथियार मानते हैं।
भारत के आंतरिक मामलों में टांग अड़ाने का तो इन्होंने जैसे ठेका ले रखा है। जब हमारी सरकार कश्मीर से धारा 370 हटाती है, तो OIC के पेट में मरोड़ उठने लगता है।
जब हम अपने ही देश में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लाते हैं, तो ये हम पर प्रतिबंध लगाने की धमकियां देने लगते हैं।
नूपुर शर्मा वाला विवाद तो आपको याद ही होगा!
हमारे ही देश में, हमारे ही भगवान का मज़ाक उड़ाया गया, लेकिन जब जवाब मिला तो इन 57 देशों ने एक साथ मिलकर भारत पर ऐसा कूटनीतिक दबाव बनाया की सिस्टम को बैकफुट पर आना पड़ा।
मतलब ज़रा इनकी नंगी दादागिरी देखिए! अपने देशों में ये अल्पसंख्यकों (हिन्दुओं, ईसाइयों) को इंसान तक नहीं समझते, उनके मंदिर तोड़ देते हैं, उनकी बेटियों को उठा लेते हैं, वहां कोई मानवाधिकार नहीं है।
लेकिन भारत में अगर किसी जिहादी पर पुलिस डंडा भी मार दे, तो ये 57 देश मिलकर UN में रोना-धोना शुरू कर देते हैं। और हम? हम 120 करोड़ हिन्दुओं का देश होकर भी बस सफाई देते रह जाते हैं।
भारत से लेकर म्यांमार और जापान तक एक ही सनातन DNA, फिर भी हम अलग-थलग क्यों
अब ज़रा अपनी तरफ देखो भाई। हमारी असली ताकत क्या है, ये हमें खुद ही नहीं पता! डेमोग्राफी के आंकड़े बता रहे हैं की अगर हम एक हो जाएं, तो दुनिया की कोई ताकत हमारी तरफ आंख उठाकर नहीं देख सकती।
पूरी दुनिया में आज लगभग 120 करोड़ हिन्दू हैं। भारत, नेपाल, मॉरीशस से लेकर इंडोनेशिया के बाली तक हमारा डंका बजता है।
इसके अलावा दुनिया में करीब 50 करोड़ बौद्ध आबादी है। म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान, कंबोडिया, वियतनाम और जापान जैसे देश पूरी तरह से बौद्ध धर्म को मानने वाले देश हैं।
अब अगर आप इन दोनों को जोड़ दें, तो यह आबादी बनती है 170 करोड़!
और सबसे बड़ी बात, हिन्दू और बौद्ध कोई अलग-अलग आसमान से नहीं टपके हैं। इन दोनों का डीएनए एक ही है- शुद्ध सनातन धर्म!
दोनों का जन्म इसी भारत भूमि पर हुआ। बुद्ध को तो हम भगवान विष्णु का ही अवतार मानते हैं। हमारी फिलॉसफी एक है।
हम दोनों ‘कर्म’, ‘पुनर्जन्म’, ‘अहिंसा’ और ‘मोक्ष या निर्वाण’ में विश्वास करते हैं। दुनिया भर के बौद्धों के लिए सबसे बड़े तीर्थ (बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर) आज भी भारत में ही हैं।
ज़रा दक्षिण-पूर्व एशिया (South-East Asia) की तरफ नज़र दौड़ाइए। आपको पता है थाईलैंड एक कट्टर बौद्ध देश है, लेकिन वहां के राजा को आज भी ‘राम’ कहा जाता है।
वहां की पुरानी राजधानी का नाम ही ‘अयुत्थाया’ (अयोध्या) है। इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है, लेकिन वहां के बाली द्वीप पर आज भी रामायण बसती है और उनकी एयरलाइंस का नाम ‘गरुड़’ है।
कंबोडिया में दुनिया का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर (अंकोरवाट) है, जिसे वहां के बौद्ध आज भी अपनी जान से ज़्यादा पूजते हैं।
सवाल ये है की जब हमारी जड़ें एक ही पावन मिट्टी से जुड़ी हैं, हमारा इतिहास एक है, हमारी रगों में एक ही सनातन खून दौड़ रहा है…
और तो और, हमारे दुश्मन (जिहादी और कट्टरपंथी) भी एक ही हैं, जो भारत से लेकर म्यांमार तक आग लगा रहे हैं।
तो फिर हम 170 करोड़ लोग अलग-थलग क्यों पड़े हैं? हम अपना एक ताकतवर महागुट क्यों नहीं बनाते, जिससे OIC जैसे सिंडिकेट की रातों की नींद उड़ जाए?
म्यांमार और श्रीलंका जैसे बौद्ध देशों से सीखना होगा जिहादी आतंक को कुचलने का असली तरीका
ये जो हमें बचपन से रटाया गया है ना की ‘अहिंसा परमो धर्म:’, इसका मतलब कायरता बिल्कुल नहीं होता मेरे भाई!
अगर कोई आपके घर में घुसकर आपकी गर्दन काटने आए, तो वहां हाथ जोड़कर अहिंसा का पाठ नहीं पढ़ाया जाता, बल्कि सुदर्शन चक्र उठाया जाता है।
और ये बात भारत के आस-पास वाले हमारे बौद्ध पड़ोसी देशों ने बहुत अच्छी तरह से समझ ली है।
म्यांमार का ही उदाहरण ले लो। म्यांमार के बौद्ध हमेशा से शांत रहे हैं, लेकिन जब वहां रोहिंग्या कट्टरपंथियों ने अपनी डेमोग्राफी बढ़ाई, बौद्धों पर जानलेवा हमले शुरू किए, उनके गांवों को जलाया और वहां जिहाद (Jihad) का ज़हरीला इकोसिस्टम खड़ा करने की कोशिश की… तो वहां के बौद्धों ने क्या किया?
क्या वो दिल्ली के नेताओं की तरह मोमबत्ती लेकर शांति मार्च निकाल रहे थे? बिल्कुल नहीं!
म्यांमार के बौद्ध भिक्षुओं (जैसे विराथु) और वहां की मिलिट्री ने वो रौद्र रूप दिखाया की इन जिहादियों और उपद्रवियों की सिट्टी-पिट्टी गुल हो गयी।
उन्होंने ईंट का जवाब पत्थर से दिया, सीधा एक्शन लिया और रातों-रात इन कट्टरपंथियों को देश छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया।
और श्रीलंका को कैसे भूल जाएं? ईस्टर संडे वाले दिन जब इस्लामिक कट्टरपंथियों ने धोखे से चर्चों और होटलों में बम धमाके किए और सैकड़ों बेगुनाहों को मार डाला, तो श्रीलंका की सरकार ने कोई ‘कड़ी निंदा’ वाला खोखला ट्वीट नहीं किया।
उन्होंने सीधा सिस्टम पर हथौड़ा मारा। कट्टरपंथी मदरसों पर ताले जड़ दिए गए, ज़हर उगलने वाले मौलवियों को उठाकर अंदर डाला गया और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बुर्के तक पर बैन लगा दिया गया।
इसे कहते हैं अपने देश, अपनी डेमोग्राफी और अपनी सभ्यता को बचाना!
भारत को, जो की इस पूरे सनातन और बौद्ध परिवार का ‘बड़ा भाई’ है, इन देशों से बहुत कुछ सीखना चाहिए।
जब बात अपने अस्तित्व को बचाने की हो, तो वहां ‘डिफेंसिव’ होकर काम नहीं चलता, वहां अपनी पूरी आक्रामकता (Aggression) दिखानी पड़ती है।
170 करोड़ की आबादी वाला शक्तिशाली सनातन राष्ट्र संघ ही है इस वैश्विक ‘उम्माह’ वाली गुंडागर्दी का इकलौता इलाज
अब डिफेंसिव मोड (बचाव की मुद्रा) में खेलने का वक्त चला गया है यार। बहुत सह लिया, बहुत ज्ञान बांट लिया।
जब 57 मुस्लिम देश डंके की चोट पर इस्लाम के नाम पर अपना ग्लोबल सिंडिकेट चला सकते हैं, UN में बैठकर भारत को आंखें दिखा सकते हैं, तो हम 170 करोड़ सनातनी और बौद्ध हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे रहें?
भारत को अब बिना किसी झिझक, बिना किसी डर के ‘सनातन राष्ट्र संघ’ (Sanatan Rashtra Sangh) या एक ‘धार्मिक एलायंस’ की घोषणा करनी ही होगी।
एक ऐसा महासंघ जिसमें भारत, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार, थाईलैंड, और कंबोडिया जैसे देश एक मंच पर खड़े हों।
बिल्कुल नाटो (NATO) की तर्ज पर! इस महासंघ का अपना एक मिलिट्री एलायंस हो, हमारे बीच फ्री-ट्रेड (व्यापार) हो, और हमारी एक साझा, बेहद आक्रामक विदेश नीति हो।
जिस दिन 170 करोड़ की आबादी वाला यह विशाल ‘सनातन गुट’ एक साथ खड़ा होकर दहाड़ेगा, क्या OIC के इन 57 देशों की औकात रह जाएगी की वो कश्मीर या हमारे किसी भी आतंरिक मामले पर एक शब्द भी बोल सकें? बिल्कुल नहीं!
और वो ड्रैगन (चीन) जो हमें बॉर्डर पर आंखें दिखाता है, उसे भी अपनी हैसियत समझ आ जाएगी की अब उसका पाला किसी एक कमज़ोर देश से नहीं, बल्कि पूरे एशिया की संगठित सनातन ताकत से पड़ा है।
चीन को एक बात बहुत अच्छे से पता है। उसे मालूम है की भारत 120 करोड़ हिन्दुओं और पूरी दुनिया के बौद्धों का स्वाभाविक नेता (Natural Leader) है।
अगर कल को भारत ने नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार और थाईलैंड जैसे देशों को मिलाकर एक ‘सनातन ब्लॉक’ या महासंघ खड़ा कर लिया, तो एशिया में चीन की जो ये दादागिरी चल रही है ना, वो हमेशा के लिए मिट्टी में मिल जाएगी।
सीधी सी बात है दोस्त, आज की दुनिया में इज़्ज़त उसी की होती है जिसके पास ताकत होती है, जो गुटों में बंटा नहीं होता।
जब 170 करोड़ का सनातन परिवार एक हो जायेगा, तो फिर धरती पर सिर्फ और सिर्फ हमारा डंका बजेगा!
