इतिहास के कुछ पन्ने ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ते हुए इंसान के गुस्से से हाथ कांपने लगते हैं।
हमें मुगलों की ‘महानता’ के झूठे किस्से तो बहुत रटाये गए हैं। लेकिन जो असली इतिहास था, जो हमारे पुरखों का खून से सना और शौर्य से भरा इतिहास था, उसे हमसे हमेशा दूर रखा गया।
आज मैं आपको मुगलों और जिहादियों के बाप की ऐसी ही एक कहानी सुनाने जा रहा हूँ। एक ऐसा सिख योद्धा, जो सिर्फ सिखों का ही नहीं, बल्कि पूरे हिन्दू समाज की इज़्ज़त का सबसे बड़ा रक्षक बना।
एक ऐसा शेर, जिसके नाम की दहशत से अफगानिस्तान के खूंखार लुटेरे रातों को उठकर बैठ जाते थे।
बात हो रही है भारत माता के उस सच्चे सपूत और दल खालसा के सुप्रीम कमांडर- सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया की!
अगर आज हम अपने घरों में सुकून से बैठे हैं और हमारी मातृभूमि की बहन-बेटियों की आबरू सुरक्षित है, तो उसके पीछे इस महानायक की तलवार का बहुत बड़ा कर्ज़ है। चलिए, आज उस कर्ज़ की याद ताज़ा करते हैं।
पानीपत के मैदान में मराठों की हार और जिहादी दरिंदों का वो खौफनाक जश्न जिसने भारत मातृभूमि को छलनी कर दिया
वो 1761 का बहुत ही मनहूस और काला साल था दोस्तों। पानीपत की तीसरी लड़ाई में जो हुआ, उसने पूरे हिंदुस्तान को झकझोर कर रख दिया था।
मराठा सेना, जो पूरे देश की आज़ादी और सनातन धर्म की रक्षा के लिए लड़ रही थी, वो हार गई। भारत मातृभूमि का सीना छलनी हो गया था।
और इस हार का फायदा उठाया अहमद शाह अब्दाली ने। अब्दाली कोई राजा नहीं था, वो एक निहायत ही नीच, वहशी और खूंखार अफगानी लुटेरा था।
जीत के नशे में अंधा होकर इस दरिंदे ने दिल्ली, मथुरा, वृंदावन और आस-पास के इलाकों में कत्लेआम मचाना शुरू कर दिया।
मंदिरों को तोड़ा गया, हज़ारों बेगुनाह हिन्दुओं के सिर काट दिए गए। लेकिन बात सिर्फ लूट-पाट और खून-खराबे तक नहीं रुकी।
इस जिहादी ने जो सबसे घिनौना काम किया, वो हमारे पूरे समाज के मुँह पर एक तमाचा था।
अब्दाली ने दिल्ली और पानीपत के आस-पास से 2000 से ज़्यादा हिन्दू और मराठा औरतों को बंदी बना लिया। ज़रा सोचिए यार, वो मंज़र कितना खौफनाक रहा होगा!
जिन बेटियों को घरों में फूल की तरह रखा जाता था, उन्हें जानवरों की तरह रस्सियों में बांधकर, नंगे पैर पैदल चलाया जा रहा था।
अब्दाली का प्लान क्या था? उसका गंदा और वहशी प्लान था इन 2000 हिन्दू औरतों को अफगानिस्तान ले जाकर काबुल के बाज़ारों में ‘गुलाम’ बनाकर बेचना।
जिहादियों के टेंट में हमारी बेटियों की चीखें गूंज रही थीं और ये दरिंदे जश्न मना रहे थे।
पूरे उत्तर भारत में खौफ का ऐसा सन्नाटा पसर गया था की किसी भी हिन्दू या राजपूताना राजा की हिम्मत नहीं हो रही थी की वो आगे आकर अब्दाली की उस भयंकर फौज से टकराए। सबको अपनी जान की पड़ी थी।
अब्दाली का काफिला औरतों को लेकर आगे बढ़ रहा था, और लग रहा था की अब कोई चमत्कार ही इन बेटियों को बचा सकता है।
तभी… पंजाब की पवित्र धरती से एक ऐसी खौफनाक हुंकार उठी जिसने अब्दाली के सारे जिहादियों की धज्जियां उड़ा कर रख दीं!
गुरु गोबिंद सिंह जी की पत्नी माता सुंदरी के आशीर्वाद से तैयार हुआ जिहादियों का ये काल ‘जस्सा सिंह अहलूवालिया’
अब आप सोच रहे होंगे की ये जस्सा सिंह अहलूवालिया अचानक से कहाँ से आ गए? तो भाई, ये कोई रातों-रात पैदा हुए योद्धा नहीं थे।
इनका जन्म 3 मई 1718 को लाहौर के पास ‘आहलू’ गाँव में हुआ था। किस्मत देखिए, जब जस्सा सिंह महज़ 5 साल के छोटे से बच्चे थे, तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया।
लेकिन जिनकी किस्मत में मुगलों और अफगानों का काल बनना लिखा हो, उनका रास्ता भगवान खुद तय करता है।
जस्सा सिंह को पालने और बड़ा करने की ज़िम्मेदारी किसी और ने नहीं, बल्कि खुद दशम पिता गुरु गोबिंद सिंह जी की विधवा पत्नी ‘माता सुंदरी जी’ ने उठाई।
माता सुंदरी जी ने उस छोटे से बच्चे को खिलोनो से खेलना नहीं सिखाया। उन्होंने जस्सा सिंह को बचपन से ही धर्म, शास्त्र और शस्त्र की ऐसी भयंकर ट्रेनिंग दिलवाई की अच्छे-अच्छे शूरवीर उनके सामने पानी भरते थे।
उन्हें घुड़सवारी, दोनों हाथों से भारी तलवार चलाना और गुरिल्ला युद्ध की वो बारीकियां सिखाई गईं जो उस दौर में किसी को नहीं आती थीं।
जस्सा सिंह जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही ‘दल खालसा’ (सिख सेना) के सबसे खूंखार, फुर्तीले और चहेते सेनापति बन गए।
मुगलों के खिलाफ छोटे-मोटे हमलों में तो वो ऐसे घुसते थे जैसे भूखा शेर भेड़ों के झुंड में घुसता है।
माता सुंदरी जी का आशीर्वाद और सिख गुरुओं की बख्शी हुई वो ताक़त ही थी, जिसने जस्सा सिंह को सिर्फ एक फौजी नहीं, बल्कि पूरे सिख पंथ का सबसे बड़ा रक्षक बना दिया।
रात के अँधेरे में अब्दाली के कैंप पर भूखे शेर की तरह टूटे जस्सा सिंह और 2000 हिन्दू बेटियों की बचाई आबरू
अब वापस उसी खौफनाक मंज़र पर आते हैं। जब जस्सा सिंह जी को खबर मिली की वो नीच अब्दाली हमारी 2000 हिन्दू बेटियों को रस्सियों से बांधकर अपने साथ काबुल ले जा रहा है, तो उनका सिख खून खौल उठा।
उन्होंने अपनी म्यान से तलवार निकाली और अपनी सेना (अहलूवालिया मिस्ल) के बहादुर सिखों को ललकारा।
सिखों का उसूल बहुत साफ़ है भाई- किसी की बहन-बेटी पर हाथ डालना मतलब अपनी मौत को खुद बुलावा देना।
अब्दाली की फौज बहुत विशाल थी, और वो सतलुज नदी के किनारे गोइंदवाल के पास अपना कैंप लगाकर आराम से सो रहे थे।
उन्हें लगा की पानीपत जीतने के बाद अब इस पूरे हिंदुस्तान में ऐसा कोई मर्द नहीं बचा जो उनकी तरफ आँख भी उठा सके।
लेकिन रात के उस भयंकर अँधेरे में, जब जिहादी दरिंदे अपनी जीत के खुमार में चूर थे, अचानक हर-हर महादेव और जो बोले सो निहाल के नारों से पूरा आसमान गूंज उठा!
जस्सा सिंह अहलूवालिया अपनी सिख सेना के साथ अब्दाली के कैंप पर मौत बनकर टूट पड़े।
सच कहूं तो वो लड़ाई नहीं थी, वो एकतरफा संहार था। सिखों ने अफगानों को संभलने और अपनी तलवारें निकालने तक का मौका नहीं दिया।
जस्सा सिंह के हाथों में जो तलवार थी, वो उस रात सिर्फ और सिर्फ पठानों का खून पी रही थी। उन्होंने जिहादियों को बिल्कुल जानवरों की तरह काटा।
जिधर देखो उधर अफगानों की लाशें बिछने लगीं। अब्दाली की फौज में ऐसी भयंकर भगदड़ मची की वो लोग अपनी पैंट तक नहीं संभाल पाए और अपनी जान बचाकर भागने लगे।
उस एक रात में जस्सा सिंह ने अब्दाली का सारा घमंड मिट्टी में मिला दिया। उन्होंने उन सभी 2000 हिन्दू और मराठा बेटियों को जिहादियों के चंगुल से आज़ाद करवाया।
उन डरी-सहमी बेटियों को साफ कपड़े दिए गए, खाना खिलाया गया और फिर अपनी सिख सेना के पहरे में, पूरे मान-सम्मान और इज़्ज़त के साथ उन्हें उनके घरों तक सुरक्षित पहुँचाया गया।
सोचिए यार, उस दौर में जब एक राजा अपनी ही प्रजा को नहीं बचा पा रहा था, तब एक सिख योद्धा ने अपनी जान पर खेलकर 2000 औरतों की आबरू बचाई।
इस घटना के बाद से पूरे भारतवर्ष ने उन्हें भगवान की तरह पूजना शुरू कर दिया और उन्हें बहुत ही सम्मान से “बंदी छोड़” (बंदियों को आज़ाद कराने वाला) का ख़िताब दिया।
जिस्म पर 72 गहरे घाव खाने के बाद भी अब्दाली की जिहादी फौज का खून पीने वाला ये खूंखार सिख शेर
2000 हिन्दू और मराठा औरतों को सिखों द्वारा आज़ाद करा लेने की घटना ने अहमद शाह अब्दाली को अंदर तक जला कर राख कर दिया था। उस जिहादी लुटेरे का गुरूर टूट चुका था।
पूरी दुनिया में उसकी थू-थू हो रही थी की एक सिख योद्धा ने उसके कैंप में घुसकर उसकी फौज को नंगा दौड़ाया है।
इसी बेइज़्ज़ती का बदला लेने के लिए अब्दाली ने 1762 में अपनी पूरी ताकत झोंक दी और सिखों को जड़ से मिटाने के लिए एक भयंकर और कायरतापूर्ण हमला किया। इतिहास के पन्नों में इसे ‘वड्डा घल्लूघारा’ कहा जाता है।
इस भयंकर युद्ध में अब्दाली की विशाल फौज ने सिखों को चारो तरफ से घेर लिया था। इसमें लगभग 30,000 सिख मारे गए थे, जिनमें औरतें, बच्चे और बूढ़े भी शामिल थे।
लेकिन इस युद्ध में जस्सा सिंह अहलूवालिया का जो खौफनाक और रौद्र रूप सामने आया, वो किसी भी हॉलीवुड फिल्म के एक्शन से हज़ार गुना ज़्यादा रोंगटे खड़े करने वाला था।
जस्सा सिंह सबसे आगे खड़े होकर अपनी सेना का नेतृत्व कर रहे थे। अब्दाली के सैनिक उन पर भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़े।
उस भयंकर मारकाट में जस्सा सिंह के शरीर पर तलवारों, भालों और तीरों के 72 गहरे घाव लगे थे! ज़रा सोचिए… 72 घाव! एक आम इंसान के शरीर पर दो कट लग जाएं तो वो दर्द से तड़प कर गिर जाता है।
लेकिन जस्सा सिंह के पूरे शरीर से खून का फव्वारा फूट रहा था, उनकी दाढ़ी खून से लाल हो चुकी थी, पर वो शेर मरा नहीं!
वो घायल होने के बाद और भी खूंखार हो गए थे। जिस्म छलनी होने के बावजूद उनके दोनों हाथों में तलवारें बिजली की तरह चल रही थीं और वो जिहादियों की लाशें बिछाते जा रहे थे।
वो आखिरी सांस तक लड़ते रहे और अब्दाली की फौज को चीरते हुए अपनी सिख सेना के एक बहुत बड़े हिस्से को सुरक्षित बाहर निकाल ले गए।
अब्दाली उस दिन भी जस्सा सिंह को मार नहीं पाया, और ये बात उसे ज़िंदगी भर चुभती रही।
स्वर्ण मंदिर का कराया दोबारा निर्माण, और लाहौर पर कब्ज़ा कर जस्सा सिंह बन गए ‘सुल्तान उल कौम’
अब्दाली इतना नीच और वहशी था की सिखों से बदला लेने के लिए उसने अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) को बारूद से उड़ा दिया था।
उसने हद तो तब पार कर दी जब उसने पवित्र सरोवर में गाय का खून और गायों के कटे हुए सिर फिंकवा दिए ताकि सिखों की आस्था को गहरी चोट पहुंचे।
लेकिन वो भूल गया की सिखों से पंगा लेना आग में हाथ डालने के बराबर है। वड्डा घल्लूघारा के घाव भरने के बाद जस्सा सिंह अहलूवालिया ने ऐसा भयंकर इंतकाम लिया की अफगानों की रूह कांप गई।
उन्होंने जिहादियों को चुन-चुन कर मारा। जो अफगानी सैनिक ज़िंदा पकड़े गए, जस्सा सिंह ने उन्हें उसी पवित्र सरोवर के पास घुटनों के बल खड़ा किया।
जिन हाथों से उन जिहादियों ने मंदिर तोड़ा था, उन्हीं हाथों से जस्सा सिंह ने उनसे सरोवर की सारी गंदगी साफ करवाई! ये होता है असली न्याय!
इसके बाद जस्सा सिंह जी ने पूरे मान-सम्मान के साथ स्वर्ण मंदिर का दोबारा निर्माण करवाया।
और मुगलों तथा अफगानों की औकात तो इन्होंने 1761 में ही दिखा दी थी। जब अब्दाली के गुर्गे लाहौर पर कब्ज़ा करके बैठे थे, तब जस्सा सिंह ने लाहौर के किले पर ऐसा भयंकर धावा बोला की वहां से मुगलों और अफगानों को लात मारकर भगा दिया।
लाहौर पर खालसा का राज हो गया। अपनी इस गज़ब की वीरता और नेतृत्व के चलते ही पूरे सिख पंथ ने उन्हें ‘सुल्तान-उल-कौम’ (Sultan-ul-Qaum / राष्ट्र का राजा) की सबसे बड़ी और पवित्र उपाधि से नवाज़ा था।
जस्सा सिंह ने बाद में दिल्ली के लाल किले पर मुगलों का झंडा उखाड़ फेंका और वहां केसरी ‘निशान साहिब’ फहरा दिया।
दिल्ली फतह हो चुकी थी! लेकिन मुगलों के घमंड को पूरी तरह तोड़ने के लिए सिखों ने एक और बहुत गज़ब का काम किया।
लाल किले में जिस पत्थर (तख्त) पर बैठकर मुग़ल बादशाह अपने आप को खुदा समझता था, सिखों ने उस पूरे के पूरे पत्थर को ही उखाड़ लिया!
उस मुग़ल तख्त को घोड़ों के पीछे बांधकर ज़मीन पर घसीटते हुए अमृतसर लाया गया। वो पत्थर आज भी स्वर्ण मंदिर परिसर में ‘रामगढ़िया बुंगा’ के नाम से मौजूद है, जो हमें मुगलों की इस भयंकर बेइज़्ज़ती की याद दिलाता है।
हिन्दू और सिख एकता की सबसे बड़ी मिसाल सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया
आज जब कुछ विदेशी ताकतों और राजनीति के ठेकेदारों द्वारा हिन्दू और सिख समाज के बीच दरार डालने की गंदी साजिशें रची जा रही हैं, तब जस्सा सिंह अहलूवालिया का ये इतिहास उनके मुँह पर एक बहुत बड़ा और करारा तमाचा है।
ये इतिहास चीख-चीख कर कहता है की हिन्दू और सिख कोई अलग नहीं हैं! हम एक ही मिट्टी, एक ही खून और एक ही धर्म की रक्षा के लिए पैदा हुए हैं।
जब-जब भारत पर कोई अब्दाली नज़र डालेगा, तब-तब पंजाब की पवित्र धरती से कोई न कोई ‘जस्सा सिंह’ अपनी म्यान से तलवार निकालकर इन जिहादियों को उनकी सही जगह- जहन्नुम पहुँचाने के लिए ज़रूर पैदा होगा!
