जैन मंदिर के बिल्कुल बगल में खड़ी कर दी 300 गज की अवैध ‘मुस्तफा मस्जिद’, अब आ गया प्रशासन का आख़िरी अल्टीमेटम, अगर नहीं मिले पुख्ता दस्तावेज तो चलेगा बाबा का पीला बुलडोज़र

एक ज़माना था जब उत्तर प्रदेश में ज़मीनें कब्ज़ाने का एक बड़ा ही सेट और हिट फॉर्मूला हुआ करता था। हाईवे किनारे की कोई प्राइम लोकेशन देखो, सरकारी या खाली ज़मीन तलाशो और वहां रातों-रात ईंटें रखकर हरा कपड़ा डाल दो।

फिर कुछ ही दिनों में वो एक पक्का ‘मजार’ बन जाता था। ये लैंड जिहाद का वो ‘सक्सेसफुल बिजनेस मॉडल’ था जिसे छूने की हिम्मत किसी प्रशासन की नहीं होती थी।

लेकिन अब यूपी की हवा और मिजाज़ दोनों बदल चुके हैं। ये नया योगी बाबा का यूपी है, यहाँ प्रशासन किसी वोटबैंक के दबाव में नहीं, बल्कि पीले बुलडोज़र वाले एक्शन मोड में काम करता है।

मुरादाबाद का जो ताज़ा मामला सामने आया है, उसने इस पूरे अवैध ईकोसिस्टम को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है।

यहाँ एक ऐसी ही 300 गज की ‘मुस्तफा मस्जिद’ की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है, जिसने दशकों तक सिस्टम की आंखों में धूल झोंकने का काम किया।

नेशनल हाईवे की बेशकीमती ज़मीन और जैन मंदिर के ठीक बगल में खड़ी अवैध ‘मुस्तफा मस्जिद’

अगर आप मुरादाबाद में खड़ी इस तथाकथित ‘मुस्तफा मस्जिद’ की लोकेशन देखें, तो ये कोई गली-मोहल्ले या किसी गांव के अंदर की मामूली जगह नहीं है।

ये मुरादाबाद के पाकबड़ा थाना क्षेत्र में दिल्ली-लखनऊ नेशनल हाईवे (NH-9 जिसे दिल्ली रोड भी कहते हैं) पर खड़ी है। लोकेशन भी ऐसी-वैसी नहीं, तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी (TMU) के ठीक सामने वाली प्राइम और करोड़ों की ज़मीन!

लेकिन इस पूरी कहानी में जो सबसे ज्यादा खटकने वाली और उकसाने वाली बात है, वो कुछ और ही है। भाईसाब, इस 300 वर्ग मीटर के भारी-भरकम ढांचे को एक पवित्र जैन मंदिर के बिल्कुल बगल में खड़ा कर दिया गया है!

ज़रा सोचिए, जैन धर्म जो अपनी शांति, अहिंसा और पवित्रता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, उनके मंदिर के ठीक बगल में इस तरह का अतिक्रमण क्या महज़ एक इत्तेफाक हो सकता है? बिल्कुल नहीं!

जो लोग इस ‘ईकोसिस्टम’ के काम करने का तरीका करीब से समझते हैं, वो अच्छे से जानते हैं की ये सनातनी और जैन आस्था को सीधे तौर पर चिढ़ाने और उस पूरे इलाके की डेमोग्राफी को कंट्रोल करने का एक बहुत पुराना और शातिर पैटर्न है।

एक बार आप किसी बड़े मंदिर या हाईवे के पास ऐसा ढांचा खड़ा कर दो, फिर वहां धीरे-धीरे भीड़ जुटने लगेगी, आस-पास की रेहड़ियां और दुकानें लगेंगी, और देखते ही देखते वो पूरी जगह मुस्लिम समुदाय के कब्ज़े में आ जाएगी।

ये जनसांख्यिकी बदलने का एक धीमा ज़हर है जिसे धर्म की चादर ओढ़ा कर हाईवे के किनारे परोसा जा रहा था।

फैक्ट्री के अंदर से शुरू हुआ ये खेल और बाद में बन गया पूरा का पूरा मस्जिद

अब आप पक्का यही सोच रहे होंगे की इतने व्यस्त नेशनल हाईवे पर इतनी बड़ी इमारत क्या एक ही रात में बन गई और किसी को भनक तक नहीं लगी?

तो चलिए आपको इसके पीछे की असली ‘इनसाइड स्टोरी’ बताते हैं। ये लोग कितने शातिर दिमाग से काम करते हैं, ये जानकर आप भी अपना सिर पकड़ लेंगे।

आज से करीब 30-40 साल पहले इस जगह पर एक एक्सपोर्टर की फैक्ट्री हुआ करती थी। शुरुआत में उसी फैक्ट्री के अंदर ही मज़दूरों के नमाज़ पढ़ने के नाम पर एक बहुत छोटा सा ढांचा बनाया गया था।

ये इनका सबसे पुराना और आजमाया हुआ टूलकिट है! पहले अपनी प्राइवेट जगह या किसी की बंद चारदीवारी के अंदर चुपचाप ढांचा खड़ा कर लो।

जब किसी को खबर न हो, तब धीरे-धीरे उसका विस्तार करते रहो। फिर कुछ सालों बाद, जब मामला पूरी तरह ठंडा हो जाए, तो उसे वक्फ की संपत्ति या सार्वजनिक धार्मिक स्थल घोषित कर दो।

इस ‘मुस्तफा मस्जिद’ के साथ भी बिल्कुल यही खेल खेला गया। अंदर ही अंदर वो 300 गज का एक बड़ा रूप ले चुकी थी।

हाल ही में हुआ ये की उस पुरानी फैक्ट्री के आस-पास की बेशकीमती ज़मीन एक निजी यूनिवर्सिटी के मालिक ने खरीद ली। अब जब करोड़ों की ज़मीन बिकी, तो ज़ाहिर सी बात है प्रशासन और राजस्व विभाग वहां बाकायदा सर्वे करने पहुंचा।

बस, यहीं आकर इस पूरे लैंड जिहाद का भांडा फूट गया और प्रशासन की पैनी नज़र इस ढांचे पर पड़ गई।

पैमाइश के दौरान मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (MDA) को शिकायत मिली की भाई, नेशनल हाईवे जैसी क्रिटिकल जगह पर, जहां एक ईंट रखने से पहले सौ बार परमिशन लेनी पड़ती है, वहां ये 300 गज का ढांचा तन कैसे गया?

जब अधिकारियों ने अपने पुराने रिकॉर्ड खंगाले, तो जो सच सामने आया उसने सबको चौंका दिया। पता चला की इस इमारत का तो एमडीए के पास कोई अप्रूव्ड नक्शा (Approved Map) है ही नहीं!

मतलब दशकों से ये लोग एक पूरी तरह से अवैध और अनाधिकृत ढांचे को मस्जिद का रूप देकर हाईवे की ज़मीन पर कुंडली मारे बैठे थे।

ना तो विकास प्राधिकरण से कोई नक्शा पास कराया गया, ना प्रशासन से कोई मंज़ूरी ली गई। बस धर्म का ठप्पा लगाया और अपने दिमाग में ये सोच कर बैठ गए की अब कोई कानून हमारा बाल भी बांका नहीं कर सकता।

लेकिन उन्हें ये अंदाज़ा नहीं था की इस बार उनका पाला किसी कमज़ोर सरकार से नहीं, बल्कि कानून का राज चलाने वाली उस योगी सरकार से पड़ा है जो अवैध ईंटों का हिसाब भी ब्याज समेत लेती है।

योगी प्रशासन का 25 सितंबर का अल्टीमेटम जिसके बाद होगी आर-पार की लड़ाई

 

अब यहाँ से शुरू होता है योगी सरकार के सिस्टम का वो धाकड़ और ‘सुपर लीगल’ एक्शन!

प्रशासन चाहता तो तुरंत बुलडोज़र ले जाकर उस ढांचे को मलबे में तब्दील कर सकता था, लेकिन मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (MDA) ने जो समझदारी दिखाई है, वो वाकई काबिले-तारीफ है।

उन्होंने हवा में तीर नहीं चलाए, बल्कि बाकायदा कानून का चाबुक निकाला।

20-21 अगस्त को एमडीए की टीम ने सीधा एक्शन लेते हुए मस्जिद पर पहला कानूनी नोटिस चस्पा कर दिया। इस नोटिस में मस्जिद के मुतवल्ली (केयरटेकर) जीशान फरीद से दो टूक सवाल पूछा गया की भाई, तुम जो हाईवे पर ये 300 गज का महल तान कर बैठे हो, ज़रा इसका पास हुआ नक्शा और ज़मीन की पक्की रजिस्ट्री तो दिखाना!

प्रशासन ने कागज़ात पेश करने के लिए 3 सितंबर तक की मोहलत दी थी।

अब ज़ाहिर सी बात है, जब ज़मीन पर कब्ज़ा ही अवैध हो और नक्शा कभी पास हुआ ही ना हो, तो 3 सितंबर तक कमेटी वाले कौन सा कागज़ दिखा लेते?

वो कोई पुख्ता दस्तावेज़ नहीं दिखा पाए। इसके बाद एमडीए ने तुरंत बुलडोज़र चलाने के बजाय इन्हें एक दूसरा नोटिस थमा दिया और दस्तावेज़ पेश करने के लिए 25 सितंबर तक का आखिरी समय दे दिया।

ये प्रशासन की कोई ढील या कमज़ोरी नहीं है! ये वो कसी हुई कानूनी चाल है, जिससे कल को ये अतिक्रमणकारी कोर्ट में जाकर रोना-धोना न कर सकें की ‘हुज़ूर, हमें तो कागज़ दिखाने का मौका ही नहीं मिला!’

प्रशासन ने इन्हें मोहलत देकर इनका वो ‘विक्टिम कार्ड’ हमेशा के लिए छीन लिया है। अब अगर 25 सितंबर तक इनके पास मुरादाबाद विकास प्राधिकरण का स्वीकृत नक्शा नहीं मिला, तो फिर कानूनी तौर पर किसी का बाप भी एमडीए की कार्रवाई को रोक नहीं पाएगा।

बुलडोज़र के खौफ से कांपे अतिक्रमणकारी तो बचाव में दौड़ पड़े विपक्षी नेता

इस 25 सितंबर की डेडलाइन ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा रखा है। और इनका डरना लाज़मी भी है। मुरादाबाद वाले अभी भूले नहीं हैं की कुछ ही दिन पहले सहारनपुर में क्या हुआ था।

हुआ यूँ की सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर के पास बनी एक मस्जिद के अवैध हिस्से पर प्रशासन ने बिना किसी राजनीतिक दबाव के सीधा बुलडोज़र चला दिया था।

सहारनपुर वाले एक्शन के बाद से ही मुरादाबाद वाले इस मामले में अवैध कब्ज़ाधारियों की हवा टाइट है। उन्हें पता है की ये योगी की पुलिस है, ये किसी के आगे झुकती नहीं है।

अब जब इन अतिक्रमणकारियों को कानूनी रास्ता बंद नज़र आया, तो हमेशा की तरह इनके बचाव में विपक्षी नेता उतर आए।

सपा के नेता आरोप लगा रहे हैं की “प्रशासन जानबूझकर एकतरफा तरीके से मस्जिदों को टारगेट कर रहा है।”

इस पूरे ड्रामे में ‘भारतीय किसान यूनियन (टिकैत गुट)’ भी बेवजह कूद पड़ा है, जो खुद को किसानों का मसीहा बताता है।

भकियू (टिकैत) के नेताओं ने बकायदा मस्जिद कमेटी के लोगों से मुलाकात की और एमडीए को खुल्लम-खुल्ला चेतावनी दे डाली की अगर बिना मालिकाना हक समझे कोई बुलडोज़र की कार्रवाई हुई, तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे।

मतलब सोचिए! किसानों की आड़ में राजनीति करने वाला ये यूनियन अब अवैध मस्जिदों और अतिक्रमणकारियों को बचाने के लिए इस जिहादी टूलकिट का हिस्सा बन गया है?

इससे साफ पता चलता है की ये सब अंदर से एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। इनका एजेंडा सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रवाद और योगी सरकार के सिस्टम को अस्थिर करना है।

बिना नक़्शे की एक ईंट भी नहीं बचेगी क्योंकि यूपी में अब सिर्फ बाबा का कानून चलेगा

ये लोग चाहे कितनी भी किसान यूनियनें बुला लें, चाहे कितने भी विपक्षी नेता ज़मीन पर लोट-लोट कर रो लें, लेकिन अब यूपी में तुष्टिकरण वाली पिक्चर खत्म हो चुकी है।

योगी सरकार का रुख एकदम शीशे की तरह साफ है, सरकार ने साफ संदेश दे दिया है की धर्म के नाम पर सरकारी ज़मीन और नेशनल हाईवे को हड़पने का ‘ज़मींदारी सिस्टम’ अब नहीं चलेगा।

25 सितंबर की तारीख अब दूर नहीं है। मुरादाबाद प्रशासन ने अपनी फाइलें एकदम दुरुस्त कर ली हैं। पीएसी (PAC) और भारी पुलिस बल पूरी तरह से अलर्ट मोड पर है।

मुरादाबाद की जनता और जैन समाज जो बरसों से इस अतिक्रमण को मूकदर्शक बनकर देख रहा था, आज योगी सरकार के इस निडर सिस्टम पर गर्व कर रहा है।

अगर 25 सितंबर तक इन लोगों ने कोई जादुई पुख्ता कागज़ या नक्शा पेश नहीं किया (जो की है ही नहीं), तो NH-9 के इस हाईवे पर योगी बाबा का वो पीला बुलडोज़र पेट्रोल भर के एकदम तैयार खड़ा है।

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